भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 832 में से

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पृष्ठ 30

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण एवं यथार्थ देवनागरी लिप्यन्तरण है:


१६          * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * <br>

दक्षिणाके रूपमें वाञ्छित धन लाकर दो, फिर उनकी आज्ञा- से गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करके सन्तानपरम्पराको चालू रक्खो, उसका उच्छेद न करना । ५ सत्यसे कभी नहीं डिगना चाहिये । ६ धर्मसे नहीं डिगना चाहिये । ७. शुभ कर्मोंसे कभी नहीं चूकना चाहिये । ८. उन्नतिके साधनोंसे कभी नहीं चूकना चाहिये । ९ वेदोंके पढने और पढानेमें कभी भूल नहीं करनी चाहिये । १० देवकार्य और पितृकार्यकी ओरसे कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये । ११. तुम मातामें देवबुद्धि करनेवाले बनो । १२. पिताको देवरूप समझनेवाले बनो । १३. आचार्यमें देव-बुद्धि रखनेवाले बनो । १४. अतिथिको देवतुल्य समझनेवाले बनो । १५ जो-जो निर्दोष कर्म हे। १६ उन्हींका तुम्हें सेवन करना चाहिये । १७ दूसरोंका नही। १८ जो कोई भी तुमसे श्रेष्ठ गुरुजन या ब्राह्मण आये । १९. उनको तुम्हें आसन आदिके द्वारा सेवा करके विश्राम देना चाहिये । २०. श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये । २१. बिना श्रद्धाके नहीं देना चाहिये । २२. आर्थिक स्थितिके अनुसार देना चाहिये । २३. लज्जा (सङ्कोच) पूर्वक देना चाहिये । २४. भयसे देना चाहिये । २५. विवेकपूर्वक देना चाहिये । २६ इसके बाद यदि तुमको कर्तव्यका निर्णय करनेमे किसी प्रकारकी शङ्का हो अथवा सदाचारके विषयमें कोई शङ्का हो । २७. तो वहाँ जो-जो उत्तम विचारवाले ब्राह्मण हों । २८ जो कि परामर्श देनेमें कुशल हों, कर्म और सदाचारमे पूर्णतया सलग्न हों । २९ स्निग्ध स्वभाववाले तथा एकमात्र धर्मके अभिलाषी हों । ३०. वे जिस प्रकार उन कर्मों और आचरणों- में बर्ताव करें । ३१ वैसा ही उनमे तुमको भी बर्ताव करना चाहिये । ३२ तथा यदि किसी दोषसे लाञ्छित मनुष्योंके साथ बर्ताव करनेमे सन्देह उत्पन्न हो जाय तो भी । ३३. जो वह उत्तम विचारवाले ब्राह्मण हों । ३४. जो कि परामर्श देनेमे कुशल हों, कर्म और सदाचारमें पूर्णतया सलग्न हों । ३५ रूखेपनसे रहित और धर्मके अभिलाषी हों । ३६. वे उनके साथ जैसा बर्ताव करते हों । ३७. तुम भी उनके साथ वैसा ही बर्ताव करो । ३८. यह शास्त्रकी आज्ञा हे । ३९. यही गुरु- जनोंका शिष्योंके प्रति उपदेश है । ४०. यह वेदोंका रहस्य है । ४१. यह परम्परागत शिक्षा है । ४२. इसी प्रकार तुमको अनुष्ठान करना चाहिये । ४३. निश्चय इसी प्रकार यह अनुष्ठान करना चाहिये ।

इस वर्ष कल्याणका विशेषाङ्क 'उपनिषद्-अङ्क' रूपसे प्रकाशित हो रहा है, यह बड़ा ही उत्तम और योग्य कार्य है । जिज्ञासु पुरुषोंको चाहिये कि वे उपनिषदोंके तत्त्वको समझ- कर परम कल्याण प्राप्त करें ।

प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकर-     व्यापिभिर्व्याप्य लोकान् भुक्त्वा भोगान् स्थविष्ठान् पुनरपि धिषणो-     द्भासितान् कामजन्यान् । पीत्वा सर्वान् विशेषान् स्वपिति मधुरभुङ्     मायया भोजयन्नो मायासंख्यातुरीयः परममृतमजं     ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥ अजमपि जनियोगं प्रापदैश्वर्ययोगा-   दगति च गतिमत्तां प्रापदेक ह्यनेकम् । विविधविषयधर्मग्राहि मुग्धेक्षणानां   प्रणतभयविहन्तृ ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥


शिव और शक्ति

( रचयिता—श्रीलक्ष्मीनारायणजी शर्मा 'मुकुर' )

अग्नि व्याप्त ज्यों शमी, अरणि में,     ज्योतिर्मय त्यों चित्-स्वरूप में, परिव्याप्त शिव विश्व-तरणि में ।     होती ज्यों उद्भूत अग्नि है, उत्तर-अधरारणि-घर्षण से,     होती आद्याशक्ति विकीरण, त्यों है शिव-तप के मंथन से ।     किन्तु नहीं शिव-शक्ति भिन्न है, एक तत्त्व के महा रूप दो,     शिव चिति है, चैतन्य अन्य है । शक्ति और शिव-तत्त्व-रूप चिति,     सकल और निष्कल स्वरूप में, निरुपाधिक चिति भासित होती,     सोपाधिक चैतन्य रूप में । जगन्मात्र चिन्मय, चितिमय है,     चितिका प्रकटित रूप, तन्य है, गुप्त, तन्य का रूप अन्य है ।