भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपनिषदुक्त ज्ञानसे ही सच्ची शान्ति ( श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमद्रासालपुरवराधीश्वर अनन्तश्री स्वामीजी श्रीपुरुषोत्तमनरसिंह भारतीजी महाराज ) इस समय चारों ओर अनेकों राजनीतिक और आर्थिक वादोंका ऐसा भयङ्कर जाल फैल गया है जिसके कारण जिन महान् दार्शनिक वादोंने हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवनको चिन्तनशील एवं विचारशील बनाकर आध्यात्मिक उत्कृष्टताकी ओर प्रवृत्त कर रक्खा था, उनकी चर्चा ही बंद हो गयी है। इसीके परिणामस्वरूप आज चारों ओर राग-द्वेष और हिंसा-प्रतिहिंसाका प्रवल प्रवाह वह रहा है एवं समाजकी भयानक दुर्दशा हमारे सामने प्रत्यक्ष हो रही है। बाह्य विज्ञानसे मनुष्यको सच्ची शान्ति कभी नहीं मिल सकती । उपनिषदुक्त आत्मस्वरूपके सम्यक् ज्ञानसे ही मनुष्य शोक-मोहसे निवृत्त होकर शाश्वती शान्तिको प्राप्त होता है। 'तरति शोकमात्मवित्', 'तत्र को मोहः क शोक एकत्वमनुपश्यत', 'ज्ञात्वा शिव शान्तिमत्यन्तमेति' —इत्यादि अनेकों उपनिषद्-वाक्य तथा तदनुसार चलकर शान्तिको प्राप्त करनेवाले महापुरुषोंके पवित्र जीवन इसके प्रमाण हैं। उपनिषद्का अर्थ है—अध्यात्मविद्या । 'उप' तथा 'नि' उपसर्गपूर्वक सद् धातुमे क्विप् प्रत्यय जोडनेपर 'उपनिषद्' शब्द निष्पन्न होता है। जिसके परिशीलनसे संसारकी कारणभूता अविद्याका नाश हो जाता है, गर्भवासादि दुःखोंसे सर्वथा छुटकारा मिल जाता है और परब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उसीका नाम उपनिषद् है। हमें बड़ा संतोष है कि बहुत ही उपयुक्त समयपर 'कल्याण' का यह 'उपनिषद्-अङ्क' प्रकाशित हो रहा है। आशा है, इस अङ्कके पठन तथा चिन्तनसे भारतीयोंको अत्यधिक लाभ होगा। अन्तमे हमारी अपने उपास्यदैवत श्रीराजराजेश्वरी, चन्द्रचूड़, लक्ष्मी-नृसिंहके चरणारविन्दोंमें यही प्रार्थना है कि मुमुक्षुजनोंके उपनिषद्-चिन्तनमें आनेवाले समस्त विघ्नोंको दूर करके उन्हें अपने सच्चिदानन्द-स्वरूपका साक्षात्कार करा दें, जिससे पृथिवीपर सच्ची शान्तिके साम्राज्यकी शुभ स्थापना हो। जय सच्चिदानन्द भगवान् ! उपनिषद् - ( रचयिता—पुरोहित श्रीप्रतापनारायणजी ) निर्गुण है या सगुण रूप क्या परमात्माका । क्या है कारण, सूक्ष्म, स्थूल तन इस आत्माका ॥ क्या लीला है ललित, मोहिनी क्या माया है। किन तत्त्वोंसे बनी हुई सबकी काया है ॥ पंचभूत हैं कौनसे, क्या, क्या इनका काम है। सत्य-चेतनानन्दका कहाँ और क्या धाम है ॥ १ ॥ ऐसे-ऐसे गूढ़ प्रश्न समझाने वाले। प्रकृति पुरुष सम्बन्ध, भेद बतलाने वाले ॥ वैदिक ब्रह्मज्ञान सु-मनमें भरने वाले। मुक्तिमार्गको सरल, सुगमतम करने वाले ॥ सभी उपनिषद् धन्य हैं, ऐसे कहीं न अन्य हैं। इनके कर्त्ता धन्य हैं, वक्ता श्रोता धन्य हैं ॥ २ ॥