कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद्का तात्पर्य ( श्री १००८ श्रीपूज्य स्वामीजी श्रीकरपात्रीजी महाराज )
प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मको प्राप्त अथवा व्यक्त कराने- वाली, नि:सन्धिबन्धनात्मिका चिज्जडग्रन्थिरूपा अविद्याको शिथिल करनेवाली अविचारितरमणीय नामरूप क्रियात्मक मायामय विश्वप्रपञ्चको समूलोन्मूलन करके जीवकी ब्रह्मात्मताको बोधित करनेवाली ब्रह्मविद्या ही उपनिषद् है। उसके उत्पादक एव व्यञ्जक होनेसे ईशावास्य, केन, कठ आदि मन्त्र ब्राह्मण वेदगीर्ष ग्रन्थ भी उपनिषत्पदवाच्य होते हैं। अतएव मन्त्र एव ब्राह्मण उभयस्वरूप वेदगीर्ष उपनिषद् है और वे सब-के-सब ही अनादि अविच्छिन्न सम्प्रदाय-परम्परया प्राप्त तथा अस्मर्यमाणकर्तृक होनेसे अपौरुषेय वेदस्वरूप ही हैं। ( 'तुल्य साम्प्रदायिकम्' जै० सू० ) अतएव प्रमाणान्तरोंसे अर्थोपलम्भपूर्वक विरचितत्व अथवा पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्षोच्चरि- तस्वरूप पौरुषेयत्व न होनेसे पुरुषाश्रित भ्रम-प्रमाद-विप्र- लिप्सा-करणापाटवादि दोषोंमे असम्पृष्ट अपास्तसमस्तपुदोष- शङ्काकलङ्क उपनिषदोंका प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्ममें परम प्रामाण्य है। यद्यपि उपनिषदें वेदगीर्ष या वेदसार हैं तथापि वे वेदसे पृथक् नहीं हैं। अतएव वे भी परमेश्वरके नि श्वासभूत तथा अनादि ही है। अतएव वेदकाल, उपनिषत्काल आदि आधुनिक कालभेद-कल्पनाएँ व्यर्थ एव निराधार हैं। पौरुषेय वस्तुओंमें ही ज्ञान, क्रिया, शक्तिके विकासकी कल्पना सम्भव है। उपनिषदोंका सार होनेसे ही गीतामें भी गीतोपनिषद्का व्यवहार होता है। गीताका भी मूल होनेसे उपनिषदोंकी महिमा अत्यन्त प्रख्यात है, यद्यपि जैसे इक्षुदण्डकी अपेक्षा भी उसके सारभूत शर्करा सिता आदिकी मधुरताके समान उपनिषदोंसे भी अधिक मधुरता गीतामे है। अतएव उपनिषद्रूप गौओंका अमृतमय दुग्ध गीताको कहा है— सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन । पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता दुग्ध गीतामृत महत् ॥ —तथापि कारण होनेसे उपनिषदोंका महत्त्व अत्यन्त अनुपेक्षणीय है। जैसे गो न होनेसे दुग्ध एव इक्षुदण्ड न होनेसे सिता शर्करा दुर्लभ है, वैसे ही उपनिषदोंके न होनेपर गीता भी दुर्लभ ही होती। यद्यपि कहा जाता है कि उपनिषद् तो भगवान्के निःश्वास है जो कि सावधान-असावधान, सुप्त- प्रबुद्ध किमी भी अवस्थामें प्रकट होते रहते हैं, परन्तु गीता पद्मनाभ भगवान्के मुखपद्मसे प्रकट हुई है। तत्रापि योगयुक्त परम सावधान भगवान्के मुखपद्मसे गीताका प्रादुर्भाव है, इसलिये गीताकी महिमा अधिक है, तथापि भगवान्का निःश्वास होनेसे ही उपनिषदोंकी विशेषता है। सुप्त प्रबुद्ध, सावधान-असावधान प्रत्येक अवस्थावालेसे श्वास प्रकट होते हैं, इसलिये ही उसमे बुद्धि और प्रयत्नकी निरपेक्षता और सहज अकृत्रिमता सिद्ध होती है। इसीलिये पुरुषाश्रित भ्रम प्रमादादि दूषणोंका असम्पर्क होनेसे उपनिषदोंका स्वतःप्रामाण्य सिद्ध होता है। जीवकी कौन कहे, परमेश्वरके भी प्रयत्न और बुद्धि- का उपयोग उपनिषदोंके निर्माणमे नहीं हुआ, किंतु वह अकृत्रिम अपौरुषेय निःश्वासवत् सहज प्रकट होते हैं। हाँ, सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धि और प्रयत्नका उपयोग उपनिषदोंका अर्थ निर्णय करनेमे ही होता है। अतएव उपनिषदोंके महद् एव अकृत्रिम होनेसे उनका स्वतःप्रामाण्य हे, परन्तु गीताका प्रामाण्य उपनिषद्-मूलक होनेसे ही है। भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर ही ह, तथापि तन्मुखविनिसृत गीताका ईश्वरोक्तत्वात् प्रामाण्य नहीं, किंतु वेदमूलक होनेसे ही है। अन्यथा बुद्ध- देवकी उक्तिको भी ईश्वरोक्तत्वात् प्रमाण मानना पड़ता, परतु आस्तिकोंने वेदविरुद्धत्वात् उनकी उक्तियोंको प्रमाण नहीं माना। वेदसार होनेसे उपनिषदोंमे भी कर्म, उपासना एव ज्ञानका वर्णन है। तत्सारभूत होनेसे गीतामे भी ये ही तीनों विषय वर्णित हैं। वेद, उपनिषद्, गीता—इन सभीका अवान्तर तात्पर्य कर्म और उपासनामे होते हुए भी महातात्पर्य स्वप्रकाश प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परात्पर परब्रह्ममे ही है। जन्मना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एव अनादि अविच्छिन्न उपनीत पितृ पितामहादि- परम्परामें उत्पन्न एव विधिवदुपनीत ही वेदों और उपनिषदोंके अध्ययनका अधिकारी होता है। यह पूर्वोत्तर-मीमासामें स्पष्ट है। उपनिषदोंमे कर्मका दिक्मात्र प्रदर्शन किया गया है। उपासना और विशेषतः ज्ञानका ही प्रतिपादन किया गया है। अतएव नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थ फल-भोग-वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान तथा तीव्र मुमुक्षाके होनेपर ही उपनीत द्विजाति उपनिषदोंके विचारात्मक श्रवणका अधिकारी होता है। जैसे आलोकादिसहकारिसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोष चक्षुसे ही रूपका बोध होता है, अन्यथा नहीं, और तादृक् चक्षुसे रूपका बोध अवश्य ही होता है, इसी प्रकार साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारीको ही उपक्रमोपसंहारादि