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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

उपनिषद्‌का तात्पर्य ( श्री १००८ श्रीपूज्य स्वामीजी श्रीकरपात्रीजी महाराज )

प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्मको प्राप्त अथवा व्यक्त कराने- वाली, नि:सन्धिबन्धनात्मिका चिज्जडग्रन्थिरूपा अविद्याको शिथिल करनेवाली अविचारितरमणीय नामरूप क्रियात्मक मायामय विश्वप्रपञ्चको समूलोन्मूलन करके जीवकी ब्रह्मात्मताको बोधित करनेवाली ब्रह्मविद्या ही उपनिषद् है। उसके उत्पादक एव व्यञ्जक होनेसे ईशावास्य, केन, कठ आदि मन्त्र ब्राह्मण वेदगीर्ष ग्रन्थ भी उपनिषत्पदवाच्य होते हैं। अतएव मन्त्र एव ब्राह्मण उभयस्वरूप वेदगीर्ष उपनिषद् है और वे सब-के-सब ही अनादि अविच्छिन्न सम्प्रदाय-परम्परया प्राप्त तथा अस्मर्यमाणकर्तृक होनेसे अपौरुषेय वेदस्वरूप ही हैं। ( 'तुल्य साम्प्रदायिकम्' जै० सू० ) अतएव प्रमाणान्तरोंसे अर्थोपलम्भपूर्वक विरचितत्व अथवा पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्षोच्चरि- तस्वरूप पौरुषेयत्व न होनेसे पुरुषाश्रित भ्रम-प्रमाद-विप्र- लिप्सा-करणापाटवादि दोषोंमे असम्पृष्ट अपास्तसमस्तपुदोष- शङ्काकलङ्क उपनिषदोंका प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्ममें परम प्रामाण्य है। यद्यपि उपनिषदें वेदगीर्ष या वेदसार हैं तथापि वे वेदसे पृथक् नहीं हैं। अतएव वे भी परमेश्वरके नि श्वासभूत तथा अनादि ही है। अतएव वेदकाल, उपनिषत्काल आदि आधुनिक कालभेद-कल्पनाएँ व्यर्थ एव निराधार हैं। पौरुषेय वस्तुओंमें ही ज्ञान, क्रिया, शक्तिके विकासकी कल्पना सम्भव है। उपनिषदोंका सार होनेसे ही गीतामें भी गीतोपनिषद्का व्यवहार होता है। गीताका भी मूल होनेसे उपनिषदोंकी महिमा अत्यन्त प्रख्यात है, यद्यपि जैसे इक्षुदण्डकी अपेक्षा भी उसके सारभूत शर्करा सिता आदिकी मधुरताके समान उपनिषदोंसे भी अधिक मधुरता गीतामे है। अतएव उपनिषद्रूप गौओंका अमृतमय दुग्ध गीताको कहा है— सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दन । पार्थो वत्स सुधीर्भोक्ता दुग्ध गीतामृत महत् ॥ —तथापि कारण होनेसे उपनिषदोंका महत्त्व अत्यन्त अनुपेक्षणीय है। जैसे गो न होनेसे दुग्ध एव इक्षुदण्ड न होनेसे सिता शर्करा दुर्लभ है, वैसे ही उपनिषदोंके न होनेपर गीता भी दुर्लभ ही होती। यद्यपि कहा जाता है कि उपनिषद् तो भगवान्‌के निःश्वास है जो कि सावधान-असावधान, सुप्त- प्रबुद्ध किमी भी अवस्थामें प्रकट होते रहते हैं, परन्तु गीता पद्मनाभ भगवान्‌के मुखपद्मसे प्रकट हुई है। तत्रापि योगयुक्त परम सावधान भगवान्‌के मुखपद्मसे गीताका प्रादुर्भाव है, इसलिये गीताकी महिमा अधिक है, तथापि भगवान्‌का निःश्वास होनेसे ही उपनिषदोंकी विशेषता है। सुप्त प्रबुद्ध, सावधान-असावधान प्रत्येक अवस्थावालेसे श्वास प्रकट होते हैं, इसलिये ही उसमे बुद्धि और प्रयत्नकी निरपेक्षता और सहज अकृत्रिमता सिद्ध होती है। इसीलिये पुरुषाश्रित भ्रम प्रमादादि दूषणोंका असम्पर्क होनेसे उपनिषदोंका स्वतःप्रामाण्य सिद्ध होता है। जीवकी कौन कहे, परमेश्वरके भी प्रयत्न और बुद्धि- का उपयोग उपनिषदोंके निर्माणमे नहीं हुआ, किंतु वह अकृत्रिम अपौरुषेय निःश्वासवत् सहज प्रकट होते हैं। हाँ, सर्वज्ञ परमेश्वरकी बुद्धि और प्रयत्नका उपयोग उपनिषदोंका अर्थ निर्णय करनेमे ही होता है। अतएव उपनिषदोंके महद् एव अकृत्रिम होनेसे उनका स्वतःप्रामाण्य हे, परन्तु गीताका प्रामाण्य उपनिषद्-मूलक होनेसे ही है। भगवान् श्रीकृष्ण परमेश्वर ही ह, तथापि तन्मुखविनिसृत गीताका ईश्वरोक्तत्वात् प्रामाण्य नहीं, किंतु वेदमूलक होनेसे ही है। अन्यथा बुद्ध- देवकी उक्तिको भी ईश्वरोक्तत्वात् प्रमाण मानना पड़ता, परतु आस्तिकोंने वेदविरुद्धत्वात् उनकी उक्तियोंको प्रमाण नहीं माना। वेदसार होनेसे उपनिषदोंमे भी कर्म, उपासना एव ज्ञानका वर्णन है। तत्सारभूत होनेसे गीतामे भी ये ही तीनों विषय वर्णित हैं। वेद, उपनिषद्, गीता—इन सभीका अवान्तर तात्पर्य कर्म और उपासनामे होते हुए भी महातात्पर्य स्वप्रकाश प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परात्पर परब्रह्ममे ही है। जन्मना ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एव अनादि अविच्छिन्न उपनीत पितृ पितामहादि- परम्परामें उत्पन्न एव विधिवदुपनीत ही वेदों और उपनिषदोंके अध्ययनका अधिकारी होता है। यह पूर्वोत्तर-मीमासामें स्पष्ट है। उपनिषदोंमे कर्मका दिक्मात्र प्रदर्शन किया गया है। उपासना और विशेषतः ज्ञानका ही प्रतिपादन किया गया है। अतएव नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थ फल-भोग-वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान तथा तीव्र मुमुक्षाके होनेपर ही उपनीत द्विजाति उपनिषदोंके विचारात्मक श्रवणका अधिकारी होता है। जैसे आलोकादिसहकारिसहकृत मनःसंयुक्त निर्दोष चक्षुसे ही रूपका बोध होता है, अन्यथा नहीं, और तादृक् चक्षुसे रूपका बोध अवश्य ही होता है, इसी प्रकार साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारीको ही उपक्रमोपसंहारादि

  • उपनिषद्का तात्पर्य * १९ षड्विध लिङ्गोंद्वारा ब्रह्ममें तात्पर्य-निर्धारणरूप उपनिषत्-श्रवणसे ही ब्रह्मका साक्षात्कार होता है, अन्य किसी साधनसे नहीं। पूर्वोक्त कारणकलापसहित उपनिषत्-श्रवणसे अवश्य ही ब्रह्मसाक्षात्कार होता है। जैसे श्मशानकी अग्नि और गार्हपत्य अग्निमे पवित्रता-अपवित्रताका महान् अन्तर होता है, वैसे ही मनमानी रेडियो सुनकर या अखबार आदि पढकर उत्पन्न ज्ञान और ब्रह्मचर्य-व्रत गुरुशुश्रूषादि शास्त्रोक्त नियमोंके साथ उत्पन्न ज्ञानमें पवित्रता-अपवित्रता, निर्वीर्यता-वीर्यवत्तरता आदिका महान् अन्तर रहता है। इसीलिये सदाचार स्वधर्म- निष्ठा, तपस्या, उपासना, ब्रह्मचर्य, गुरु-शुश्रूषादि नियमोंके साथ अधिकारीको ही उपनिषदोंका विचार लाभदायक होता है, अन्यथा नहीं। अनधिकारीको तो हानि भी हो सकती है। अज्ञ अर्धबुद्धको उपनिषदोंके महावाक्योंका उपदेश अनर्थकारक होता है— अज्ञस्याल्पप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः ॥ उपनिषदोंके महातात्पर्यका विषय अदृश्य अग्राह्य अलक्षण अचिन्त्य अव्यपदेश्य परात्पर शुद्ध ब्रह्म ही है। वही अचिन्त्य अनिर्वाच्य लीलाशक्तिके योगसे अनन्तकल्याणगुणगण- निलय, सगुण एव सौन्दर्य-माधुर्य सौरस्य-सौगन्ध्य-सुधाजल- निधि, अनन्तकोटिकन्दर्प-दर्पदमनपटीयान् साकार भी होता है। सदाशिव, श्रीमन्नारायण, श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, उमा, रमा, सीता, राधा आदि अनेक रूप उसी परब्रह्मके हैं। इसी- लिये उपनिषदर्थनिर्णायरू ब्रह्मसूत्रोद्वारा विभिन्न आचार्योंने विभिन्न स्वरूपोंसे उसी ब्रह्मका प्रतिपादन किया है। गुरु एवं इष्टकी तथा श्रद्धा, ध्यान, पराभक्तिकी तत्त्वसाक्षात्कारमें अत्यन्त आवश्यकता होती है। 'यस्य देवे परा भक्ति' 'श्रद्धाभक्तिज्ञानयोगादवेहि' जिससे अनन्तकोटिब्रह्माण्डात्मक विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति एव प्रलय होता है, वही उपनिषदर्थ ब्रह्म है। आकाशका कारण अहम्, अहङ्का भी कारण महान्, महान्‌का भी कारण अव्यक्त है। अव्यक्त उपनिषदर्थ ब्रह्मसे उत्पन्न या उसमे ही अध्यस्त होता है। 'तदैक्षत', 'एकोऽहम्' इत्यादिक ईक्षण और अह ही 'महान्' और 'अह' है। अह, महान्, ईक्षण, निद्रा और अव्यक्त—इन सबका साक्षी, भासक, निर्दृग्यमान ही उपनिषदर्थ ब्रह्म है। उस अखण्डबोधस्वरूप भानकी अत्यन्त अवाध्यता ही सद्रूपता, सद्रूप उसी तत्त्वकी अवेद्यत्वे सति अपरोक्षता ही चिद्रूपता और सच्चिद्रूप उसी परमात्मतत्त्वकी सर्वोपप्लव- विवर्जितता ही आनन्दरूपता है। सम्पूर्ण पुरुषार्थोंका चरम लक्ष्य अनर्थवर्जन एव आनन्दप्राप्ति है। निरुपप्लव निरवधि, निःसीम, आनन्द ही ब्रह्म है। सर्वबाधावधि अत्यन्तावाध्यता ही उसकी अमृतता एव सत्यता है। अग्नि, चन्द्र, विद्युत् सूर्यसे भी सूक्ष्म अन्तरङ्ग प्रकाश चक्षुरादि इन्द्रियाँ हैं एवं उनसे भी सूक्ष्म मन, बुद्धि एव अहमर्थ हैं, परतु उन सबका प्रकाशक सबसे सूक्ष्म भान ज्ञानस्वरूप आत्मा है। जैसे दर्पणभानके अनन्तर तस्थ प्रतिबिम्ब भासित होता है, अथवा सौर्रादि आलोकके भानके अनन्तर नील पीत आदि रूप भासित होते हैं, वैसे ही शुद्ध भानस्वरूप प्रत्यग् ब्रह्म-भानके अनन्तर ही अहमर्थ, ईक्षण, अव्यक्त आदि भासित होते हैं। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ घटादिकी अपरोक्षता मनश्चक्षु आलोकादिसापेक्ष है, परंतु प्रत्यक्‌की अपरोक्षता सर्वनिरपेक्ष स्वतः है। 'यत्साक्षाद- परोक्षाद्ब्रह्म' सर्वकारण सर्वाधिष्ठानस्वरूप प्रत्यक्चैतन्याभिन्न परब्रह्मसे भिन्न सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकार मिथ्या है, जैसे रज्जुमें कल्पित सर्पादि रज्जुसे भिन्न होकर सर्वथा मिथ्या हैं। जैसे मृत्तिका ही घट-शरावादिरूपेण, सुवर्ण ही कटक मुकुट- कुण्डलादिरूपेण, जल ही तरङ्गादिरूपेण प्रतीत होते है, वैसे ही भगवान् भी प्रपञ्चरूपेण प्रतीत होते है। आरम्भवाद, परिणामवाद भी तत्त्वनिश्चयके लिये किसी कक्षामें मान्य होते हैं; परंतु क्षपितकल्मप विद्वान् तो विवर्त ही समझता है। जगदाकारेण परिणममाना मायाका अधिष्ठानभूत ब्रह्म ही दृष्टिभेदसे मायाके कारण ही अतात्त्विक अतएव असममत्ताक अन्यथाभावापन्न होनेसे विवर्ताधिष्ठान कहलाता है। रूपान्तर- से चित्तचाञ्चल्यके कारण भी उसमें मिथ्या द्वैत-प्रतिभास होता है। वस्तुतः कार्यकारणातीत नित्यनिरस्तनिखिलप्रपञ्च- विभ्रम, अज, अनिद्र, अस्वप्न, स्वप्रकाश, अपार, अनन्त सद्‌घन चिद्‌घन आनन्दघन ब्रह्म ही सब कुछ है। जैसे बिम्ब-प्रति- बिम्बका भेद प्रतीत होते हुए भी वास्तवमें वह भेद मिथ्या है। बिम्बसे अतिरिक्त प्रतिबिम्ब कोई वस्तु नहीं है। बिम्ब ही प्रतिबिम्बात्मना प्रतीत होता है, वैसे ही जीवात्मा-परमात्माका भेद भी मिथ्या है। वस्तुतः परमात्मा ही उपाधिके द्वारा जीवात्मस्वरूपसे प्रतीत होता है। इसी तरह अहङ्कारादि उपाधिके कारण ही आत्मामे मिथ्या-कर्तृत्व उसी प्रकार प्रतीत होता है जैसे जपाकुसुमादिके ससर्गसे स्वच्छ स्फटिकमें लौहित्य प्रतीत होता है। जिस प्रकार घट-मठ आदि उपाधिमें रहता हुआ भी आकाश वस्तुतः सर्वथा असङ्ग ही रहता है, तद्वत

२७ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * गुणों और दूषणोंसे वह लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार देहादि उपाधियोंमें रहता हुआ भी आत्मा उपाधियोंके तत्तद्गुणों और दूषणोंसे भूषित और दूषित नहीं होता । उत्पत्तिविपरीत- क्रमेण सम्पूर्ण प्रपञ्चको अधिष्ठानस्वरूप प्रत्यग् ब्रह्ममें लय कर देनेसे ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है, अथवा वागुपलक्षित बाह्येन्द्रियोंको मनमें, मनको ज्ञानात्मा अहम्अर्थमें, उसे अस्मिता- मात्रमें, उसे शान्तशुद्ध चिद्घनमें प्रतिसङ्घट कर लेनेपर फिर शुद्ध अद्वितीय ब्रह्म ही स्फुरित होता है । यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञ तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ इसी वस्तुस्थितिको एकमेवके 'एव' से दृढ किया गया है। इसीको 'नेह नानास्ति किञ्चन', 'नात्र काचन भिदा' के 'किञ्चन' एव 'काचन' से स्पष्ट किया गया है । अचिन्त्यानिर्व्वाच्य मायाके कारण सकल वाङ्मनसव्यपदेशभाक् प्रत्यक् चिति ही सकल- मनोवचनप्रपञ्चातिगता है । यही उपनिषदोंका सार है । फिर भी पूर्णरूपेण वर्णाश्रमानुसारी, धर्मानुष्ठान एव परा भगवद्भक्ति- के बिना उपनिषदर्थबोध एव तन्निष्ठा अत्यन्त दुर्लभ है । इसीलिये— तमेतमात्मान ब्राह्मणा यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन विविदिषन्ति । —इत्यादि वचनोंद्वारा वेदनेच्छा या इष्यमाण वेदनमें यज्ञ तप दानादिका उपयोग बतलाया गया है । ब्रह्मचर्य, सद्उपासना, सदाचार आदिका पद पदपर उपनिषदोंमे समर्थन मिलता है । पञ्चाग्नि विद्या, वैश्वानर विद्या, दहर-विद्या आदि अनेक उपासनाओका प्रतिपादन भी ब्रह्माक्षात्कारकी सुविधाके लिये ही किया गया है । लय एव विक्षेप दोनों ही अवस्थाओंमे तत्त्वसाक्षात्कारमे कठिनाई पडती है । सुषुप्तिकी निद्रा एव जाग्रत्-स्वप्नका द्वैतदर्शन अवरुद्ध हो, तब निश्चल अनिद्र प्रबुद्ध अविक्षिप्त चित्तपर प्रत्यग्ब्रह्मका साक्षात्कार होता है । यलातिदायमाभ्य निर्विकल्प समाधान अथवा सुषुप्ति-प्रबोध सन्धि, वृत्तिसन्धि तथा दण्डायमान दीर्घनिर्विकल्पवृत्तिपर युक्तिसे ब्रह्मानुभव किया जा सकता है । फिर भी उपनिषन्माना पनेय ब्रह्माश्नय ब्रह्मविषयक मूलज्ञानके नाशार्थ उपनिषद्विचार अत्यन्त अपेक्षित ह । परम्परासे जो विधिवत् उपनीत नहीं है या उपनयनके अधिकारी नहीं है, उन्हे गीता, वासिष्ठ, भागवत, विष्णुपुराणादिके श्रवणद्वारा भी तत्त्वबोध प्राप्त हो सकता है । —«»— रस-ब्रह्म ( रचयिता—पाण्डेय प० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम' ) कोई शम-दममें नियममें निरत कोई जप-तप व्रत-उपवासनामें रत हैं। आसन बिछाये पद्मासन लगाये दृढ कोई श्वास-वायुकी ही शासनामें रत है ॥ होके यज्ञ-यागमें प्रवृत्त सानुराग कोई स्वर्गके निवासकी ही वासनामे रत है। कोई शब्द-ब्रह्म कोई अर्थ-ब्रह्म ढूँढ़ा करें हम रस-ब्रह्मकी उपासनामें रत हैं ॥ बतला रही है नित्य-मुक्त वेदवानी जिसे देखो नन्दरानीने उलूखलमे बाँधा है। पूरन अकाम, लिये प्रकट सकाम-भाव प्याती जिसे प्रणयसुधाका रस राधा है ॥ जगको नचाता वही नाचता निकुञ्ज-बीच गोप-गोपियोंने इस भाँति उसे साधा है। वेदोंमें न ढूँढ़, उपनिषद्-निगूढ रस व्रज-सरबस बस एक वही काँधा है ॥

अपौरुषेयताका अभिप्राय ( लेखक - स्वामीजी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज ) वेद शब्दका अर्थ ज्ञान है । वेद-पुरुषके शिरोभागको उपनिषद् कहते हैं । उप ( व्यवधानरहित ) नि ( सम्पूर्ण ) 'षद्' ( ज्ञान ) ही उसके अवयवार्थ हैं । अर्थात् वह सर्वोत्तम ज्ञान जो ज्ञेयसे अभिन्न एवं देश, काल, वस्तुके परिच्छेदसे रहित परिपूर्ण ब्रह्म है, 'उपनिषद्' पदका अभिप्रेत अर्थ । इसलिये जबतक ज्ञानके स्वरूपका ठीक-ठीक विचार न कर लिया जायगा, तबतक उपनिषद् क्या है, यह बात स्पष्ट नहीं हो सकेगी । पहली बात - ज्ञान स्वतः प्रमाण है, परतःप्रमाण नहीं । इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी पदार्थका यथार्थ निश्चय करनेमें ज्ञान ही अन्तिम निर्णायक होगा । सम्पूर्ण व्यवहार अपने ज्ञानके आधारपर ही चलता है । किसी भी विषयके होने एवं न होनेका निर्णय करनेमें ज्ञान ही अन्तिम कारण होगा । उदाहरणार्थ-विषयकी सत्ता इन्द्रियोंसे, इन्द्रियों- की मनसे, मनकी बुद्धिसे और बुद्धिकी ज्ञानस्वरूप आत्मासे निश्चित होती है । अज्ञानका अनुभव भी ज्ञान ही है, परंतु ज्ञानको प्रमाणित करनेके लिये क्या ज्ञानसे भिन्न पदार्थकी आवश्यकता होगी ? कदापि नहीं । प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयकी त्रिपुटी ज्ञानके द्वारा ही प्रकाशित होती है । इसलिये ज्ञानकी सिद्धिके लिये उनकी कोई अपेक्षा नहीं है। यों भी कह सकते हैं कि इस त्रिपुटीके भाव और अभावका प्रकाशक ज्ञान ही है। वे रहें तब भी ज्ञान है और न रहे तब भी ज्ञान है । ज्ञानके बिना उन्हें अनुभव ही कौन करेगा । त्रिपुटीमें ज्ञानका अन्वय है और ज्ञान त्रिपुटीसे व्यतिरिक्त है। इसलिये ज्ञानकी सत्ता अखण्ड है । प्रमाणोंके द्वारा ज्ञानकी सिद्धि नहीं होती । ज्ञानसे ही समस्त प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं। तात्पर्य यह कि ज्ञानका प्रामाण्य स्वतः है, परतः नहीं । दूसरी बात - ज्ञान स्वयंप्रकाश है। यह कर्ता, करण, क्रिया एवं फलके अधीन नहीं है। कर्ता करोड़ प्रयत्न करके भी स्थाणु ज्ञानको पुरुष-ज्ञान नहीं बना सकता । मान्यता कर्ताके अधीन होती है। वह अपनी मानी हुई वस्तुको गणेश माने, सूर्य माने, बादमें फेरफार कर दे या बिल्कुल ही छोड़ दे-इन सब बातोंमें स्वतन्त्र होता है। परंतु यह ज्ञान नहीं है, यह तो कर्ताकी कृति है, जिसको वह स्वयं गढ़ता है और बादमे स्वतन्त्र मान लेता है। ये मान्यताएँ प्रत्येक कर्ताकी, सम्प्रदायकी, जातिकी और राष्ट्रकी अलग-अलग हो सकती हैं और होती हैं परंतु ज्ञान सबका एक होता है। स्थाणुको भिन्न भिन्न मनुष्य चोर, सिपाही अथवा भूतके रूपमे मान सकते हैं । परंतु ज्ञान सबका एक ही होगा कि यह स्थाणु है। पुरुष-भेदसे ज्ञानमें भेद नहीं हो सकता । क्योंकि किसी भी पुरुषके द्वारा अथवा पुरुषविशेषद्वारा ज्ञानका निर्माण अथवा रचना नहीं होती । यहाँतक कि ईश्वर भी ज्ञानका कर्ता नहीं होता । वह तो स्वयं ज्ञानस्वरूप है। यदि ईश्वर ज्ञानका कर्ता हो तो ज्ञानरूप कर्मके पूर्व ईश्वरमे ज्ञानका अभाव स्वीकार करना पड़ेगा । परंतु ज्ञानका अभाव किसी भी प्रमाण अथवा अनुभवसे सिद्ध नहीं हो सकता । वह प्रमाण या अनुभव भी तो ज्ञानरूप ही होगा। अभिप्राय यह है कि ज्ञान साधन-साध्य नहीं है, सिद्ध है। उसके कारण- के रूपमें अज्ञानकी अथवा ज्ञानान्तरकी कल्पना नितान्त असंगत है । इसलिये ज्ञान स्वयंप्रकाश है । तीसरी बात - ज्ञान काल-परिच्छिन्न नहीं है। जब हम यह सोचने लगते हैं कि यह ज्ञान भूत है और यह ज्ञान भविष्य है, तब हम मानो यह स्वीकार कर लेते हैं कि कालकी धारामे ज्ञानका उदय एवं विलय हुआ करता है अर्थात् ज्ञान क्षणिक है। परंतु यह क्षण ही क्या है जिसकी पृथक्ताका आरोप ज्ञानपर किया जाता है। प्रश्न यह है कि काल सावयव है अथवा निरवयव ? यदि निरवयव है तो उसमे भूत-भविष्य एवं कला-काष्ठा आदिके भेद ही सम्भव नहीं हैं, वह ब्रह्म ही है। यदि सावयव है तो ज्ञान उसके भिन्न-भिन्न अवयवोंका प्रकाशक मात्र होगा और प्रकाश्यगत भेद प्रकाशकपर आरोपित नहीं किया जा सकेगा। जैसे घट-पटादिके भिन्न-भिन्न होने- पर भी उनको प्रकाशित करनेवाले प्रकाशमें भेद-कल्पनाका कोई प्रसङ्ग नहीं है, ऐसे ही कला-काष्ठा आदिरूप कालके अवयवोंमें भेद होनेपर भी उनके प्रकाशक ज्ञानमे भेद- कल्पनाका अवसर नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि काल- भेदकी कल्पना ही निर्मूल है । कल्पना करें कि क्या कभी कालका अभाव था या कालका अभाव होगा, जिस कालमे १ गत्यर्थक षद् धातु ।

२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :

हम कालके अभावकी कल्पना करेंगे, वह भी काल ही होगा और कालके अभावकी कल्पनाको निवृत्त कर देगा । अभावरहित वस्तु निरंश होती है । गुणन अथवा विभाजन केवल सांश वस्तुमें हो सकता है, निरंशमें नहीं । इसलिये अभावरहित कालमें कला-काष्ठादिरूप अवयवके आधारपर भूत-भविष्यकी कल्पना करना निःसार है । तब ये जो भूत भविष्य मालूम पड़ते है, वे हे क्या ? संविन्मात्र है । कोई भी संविन्मात्र वस्तु संवित्को परिच्छिन्न नहीं बना सकती । इसलिये ज्ञान कालपरिच्छिन्न नहीं है ।

चौथी बात—ज्ञानमे देश-परिच्छेद भी नहीं है । ज्ञानमें कालपरिच्छेदका निषेध करते समय यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह जो धारा अथवा क्रमकी संवित् है, यह कालनिष्ठ नहीं है, संविन्मात्र ही है । जैसे स्वप्नके पचासो वर्ष कालके अवयव नहीं हैं, संविद्रूप ही ह, उनमे भूतकी स्मृति, भविष्यत्की कल्पना और ज्ञानके द्वितीयत्व सद्वितीयत्व की प्रतीति संविन्मात्र ही है, वैसे ही यह जो दैर्ध्य विस्तार की कल्पना हो रही है, सो भी संवित्मे भिन्न नहीं है ।

पूर्व, पश्चिम, उत्तर आदिके रूपमें प्रतीयमान देशभेद देशनिष्ठ हैं अथवा पृथ्वी, सूर्य, ध्रुव आदि ग्रहनक्षत्रनिष्ठ हैं ? यह स्पष्ट है कि इस भेद-कल्पनाका कारण ध्रुवादि ग्रहनक्षत्र है, देश नहीं । तब क्या अन्यगत भेदका अन्यपर आरोपित करना न्यायोचित है ? कदापि नहीं । कालके समान ही कहीं भी देशका अभाव नहीं है । जिस देशमे देशके अभाव की कल्पना की जायगी, वह भी देश ही होगा । अभावरहित देश ब्रह्म है । पूर्व, पश्चिम आदि एव दैर्ध्य विस्तार आदिकी कल्पना वस्तुनिष्ठ नहीं, संविन्मात्र है, ठीक वैसी ही जैसी स्वप्न-देशकी ल्वाई-चौड़ाई । स्वप्रकाश ज्ञानके द्वारा प्रकाशित देशभेद ज्ञानका भेदक नहीं हो सकता । इसलिये ज्ञान देश परिच्छेदसे रहित है ।

पाँचवीं बात—विषयपरिच्छेद भी ज्ञानका परिच्छेदक नहीं है, सबसे पहले तो यह विचार करनेयोग्य है कि विषय देश काल परिच्छेदके आश्रित है या नहीं ? जब भी कोई विषय प्रकाशित होगा, अपनेको किसी-न किसी काल और देशमे ही प्रकाशित करेगा । देश और कालभेदकी कल्पनाके बिना विषयकी प्रतीति ही नहीं हो सकती । ठीक इसी प्रकार विषयभेदके बिना देश और कालकी भी प्रतीति नहीं हो सकती । जब देश और कालके भेद ही कल्पित हैं, तब उनके आश्रयसे प्रतीत होनेवाले विषय अकल्पित कैसे हो सकते हैं ?

ये पृथक् पृथक् प्रतीयमान विषय सन्मात्र ही हे या और कुछ ? यदि ये सन्मात्र ही हैं तो इनमे भेदकी कल्पनाका क्या आधार है, फिर तो इन्हे त्रिकालाबाध्य सत्तासे भिन्न समझा ही नहीं जा सकता । और यदि ये सन्मात्रसे भिन्न हैं तो इन्हें नितान्त असत् कहनेमे क्या आपत्ति है ? सत् और असत् भाव और अभावका मिश्रण तो कभी हो ही नहीं सकता । अब यह कल्पना करे कि ये भिन्न भिन्न विषय सत्ताके विशेष विशेष रूप हैं, परन्तु यह बात भी निराधार है । बिन देश कालका भेद सिद्ध हुए सत्तामे भेद सिद्ध करनेकी कोई युक्ति नहीं ह । सत्ताका परिणाम स्वीकार करनेपर भी परिणाम की पूर्वावस्था, उत्तरावस्था, क्रम आदि अपेक्षित होंगे । इस प्रकार तो सत्ताका त्रिकालाबाध्यत्व ही कट जायगा और शून्य-वाद, क्षणिकविज्ञानवाद अथवा मर्मोच्छेदवादका प्रसङ्ग होगा । यदि यह कल्पना करें कि सत्ताका एक अंश तो स्थिर है और दूसरे अंशमे यह विपयोंका आरम्भ कर रही है या उनके रूपमे परिणत हो रही है तो यह अगभेदकी कल्पना सर्वथा उपहासास्पद होगी । जो वस्तु एक अगमे विदीर्ण हो रही है, वह दूसरे अगमे नित्य नहीं हो सकती । अशभेद तो असिद्ध है ही । इसलिये सत्तामे विशेष भी उत्पन्न नहीं होता । विषयो-की उत्पत्ति सत्से, असत्से, सदसत्मे अथवा उनमे भिन्नसे किसी भी प्रकार सगत नहीं है । जिनकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ही असिद्ध है, जिनका स्वयं अपने अधिष्ठानमे ही अत्यन्ताभाव है, ज्ञानके बिना जिनकी कल्पना ही नहीं हो सकती, ऐसे विपयोंके द्वारा भी ज्ञान परिच्छिन्न नहीं हो सकता ।

छठी बात—ज्ञानमे ज्ञातृत्व और ज्ञेयत्वका भेद भी औपाधिक ही है । देश काल और वस्तुभेदका निषेध हो जानेपर ज्ञानसे पृथक् ज्ञेयकी उपस्थिति अपने आप ही कट जाती है । ज्ञेयके बिना ज्ञातृत्वके व्यवहारकी सिद्धि नहीं हो सकती । ज्ञेय और ज्ञाता दोनो ही एक दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं, परंतु ज्ञान दोनोंकी, दोनोमेसे किसी एककी अथवा और किसी अन्यकी अपेक्षा रखे विना स्वत सिद्ध है । यदि ज्ञेयरूप विषय भी ज्ञानसे पूर्व सिद्ध है, ऐसा माना जाय तो अननुभूत होनेके कारण वह केवल कल्पना होगी । अनुभवके विना पदार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती । यह जो भिन्न भिन्न विषय और इनकी समष्टि ज्ञेयरूपसे पृथक् प्रतीत होती है, वह क्या ज्ञानसे बहिर्देशमें है अथवा ज्ञानके अन्तर्देशमें ? पहली बात तो यह है कि ज्ञानमें बहिर्देश और अन्तर्देशकी कल्पना नितान्त असगत है । दूसरी यह कि ज्ञेय विषयको बहिर्देशमें माननेपर उसके साथ

ज्ञानका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि अन्तर्द्देशमे ही माने तो ज्ञानके साथ व्यापक व्याप्य-भाव सम्बन्ध स्वीकार करना पड़ेगा। यह सम्बन्ध भी ज्ञानको विषयका उपादान कारण माने बिना सम्भव नहीं है। तब क्या ज्ञान परिणामको प्राप्त होकर विषयका रूप ग्रहण करता है? ऐसी स्थितिमे परिणामकी एक धारा अथवा क्रम स्वीकार करना पड़ेगा। यह बात तभी स्वीकार की जा सकती है, जब कालकी क्षणिकताका आरोप उसके प्रकाशक ज्ञानपर किया जाय; परन्तु अध्यस्तके गुण-दोष अधिष्ठानका स्पर्श भी नहीं कर सकते। आदिरहित, अन्तरहित ज्ञानमे विषयकी उपस्थितिके लिये एक क्षण अथवा भिन्न-भिन्न क्षण ह ही नहीं। यह भी एक प्रश्न है कि विषय सम्पूर्ण ज्ञानमे हे अथवा ज्ञानके एक अशमे । ज्ञानमे अशता, पूर्णता आदि तो कल्पित हैं। फिर यदि ज्ञानका परिणाम माने भी तो क्या उसका कोई आकार है जो दूधसे दहीके समान रूपान्तरित होगा और क्या वह रूपान्तर भी ज्ञानस्वरूप नहीं होगा? ऐसी स्थितिमें प्रथमरूप द्वितीय रूपका भेद विचारहीनों- के द्वारा कल्पित एव केवल विवर्तमात्र होगा। ज्ञेय विषयका निराकरण हो जानेपर ज्ञातृत्वकी कल्पनाका कोई कारण ही नहीं है। सातवीं बात--ज्ञान हेतुफलात्मक नहीं है। ज्ञानकी उत्पत्ति स्वीकार करनेपर उसके प्रागभावकी अर्थात् उसकी उत्पत्तिके पहलेकी स्थिति बतानी पड़ेगी। परन्तु ज्ञानके बिना उसकी भी स्थिति नहीं बतलायी जा सकती। अभिप्राय यह है कि ज्ञानका जन्म नहीं होता। अन्तःकरणकी शुद्ध स्थिति अथवा निर्विषयता भी ज्ञानकी जननी नहीं है, विचारकी जननी है। विचारके द्वारा वृत्त्यात्मक ज्ञान परिपुष्ट होता है और दृढ होनेपर वह अज्ञानका नहीं, अज्ञान-भ्रान्तिका निवर्तक होता है। प्रक्रिया ग्रन्थोंके अनुसार यह वृत्त्यात्मक ज्ञान भी दूसरे क्षणमें नहीं रहता है। यह क्षणसहित वृत्तिको और अपने व्यक्तित्वको भी बाधित कर देता है। जब यह स्वय बाधित होता हे तब कोई अपना कार्य या फल छोड़कर बाधित हो और वह ज्ञान- वृत्तिकी निवृत्तिके अनन्तर रहे, तब तो द्वैत बना ही रहा। इसलिये हेतुता और फलनाकी कल्पना ही मिटती है। हेतु और फल तो कुछ है ही नहीं, जिनकी ज्ञानसे निवृत्ति होती हो। अज्ञान घटके उपादानकारण मृत्तिकाके समान जगत्‌का उपादान नहीं है। वह तो जगत्‌की व्यवस्थाकी सिद्धिके लिये कल्पित है। अज्ञान है--यह कल्पना भी ज्ञानका विवर्त ही है। इसलिये ज्ञानवृत्तिसे अज्ञानका ध्वंस नहीं होता, प्रत्युत कल्पना ही बाधित होती है। यह निवर्त्य-निवर्तक भावकी कल्पना अविचार दशामे ही है। ज्ञानदृष्टिसे हेतुफलात्मक भेद सर्वथा ही असिद्ध है। आठवीं बात-ज्ञानमे यथार्थ-अयथार्थ और परोक्ष- अपरोक्षका भेद भी नहीं है। व्यवहारसे जो ज्ञानमे यथार्थता आदि भेद किये जाते हे, यदि वास्तवमें विचार करके देखें तो कल्पित विषयगत भेद ही ज्ञानपर आरोपित होते हं। स्वप्नका हाथी झूठा है। परतु स्वप्नमे हाथीका देखना झूठा नहीं है। 'हाथी नहीं था' हमारी जाग्रत्कालीन स्मृतिका यही स्वरूप है। हाथी देखा ही नहीं था, यह नही। हाथीकी असत्ता ज्ञानकी असत्ताकी प्रयोजक नहीं हो सकती। अविचार दशामें हाथीकी अयथार्थताका आरोप ज्ञानपर कर दिया जाता है। इसी प्रकार ज्ञानकी परोक्षता भी विचारणीय है। परोक्ष- अपरोक्षका भेद घटादि पदार्थामे होता है या उनके ज्ञानसे ? क्या ज्ञान भी कभी अपनेसे दूर होता है। यदि ऐसा मान लें 'पृथ्वीपर घट है और अन्तःकरणमे ज्ञान' तब भी तो घट- ज्ञान अपने अन्तःकरणमे ही रहा। उसकी परोक्षता कहाँ हुई। घटगत परोक्षताका ही आरोप ज्ञानपर हुआ। यह तो छोटी बात है। आश्रयत्व, विषयत्व आदि विभागसे रहित अद्वितीय चित्स्वरूप ज्ञानमें अयथार्थता और परोक्षताकी कथा- का कोई प्रमंग ही नहीं है। नवीं बात-ज्ञान सर्वथा अवाध्य है। ज्ञानका कोई भी प्रतियोगी या विरोधी नहीं है। स्वयं अज्ञान भी ज्ञानके द्वारा ही प्रकाशित होता है। 'मैं अज्ञ हूँ' यह भाव भी एक प्रकारका ज्ञान ही है। ज्ञानमें यह प्रकारभेद भी विचार न करनेसे जान पड़ता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि सन्निहीन होनेके कारण ज्ञान और अज्ञानका भेद कल्पित है। इसलिये अज्ञान ज्ञानका बाध नहीं कर सकता। ज्ञानके बाधकी कल्पना करनेपर यह प्रश्न होता है कि ज्ञानका बाध ज्ञात होगा या अज्ञात, वह ससाक्षिक होगा अथवा निःसाक्षिक। अज्ञात और असाक्षिक होनेपर ज्ञानका बाध होनेमें कोई प्रमाण नहीं है। ज्ञात और ससाक्षिक स्वीकार करनेपर ज्ञानकी सत्ता-ज्ञान- स्वरूप सत्, अक्षुण्ण एव अखण्ड सिद्ध हो जाता है। दसवीं बात-ज्ञानका स्वरूप अनिर्वचनीय है। जब हम किसी पदार्थका निर्वचन करने लगते हैं, तब उसमें दृश्यता, अन्यता आदिका आरोप अवश्य करते है। कोई भी निर्वचनार्ह वस्तु इदन्तासे आक्रान्त ही होगी। इसलिये मन-वाणीका विषय भी अवश्य होगी। ऐसी स्थितिमें विषय-विषयीभाव भी

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  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

अनिवार्य होगा । यही कारण है कि ज्ञानको उत्पाद्य अथवा आत्माका समवायी माननेवालोंने उसके जो-जो निर्वचन किये हैं, उन्हींकी रीतिसे वेदान्तीलोग उनका निषेध करते हैं । अनिर्वचनीयता भी परमत रीतिसे है । अनिर्वचनीयताका अभिप्राय केवल इतना ही है कि यह ज्ञानस्वरूपसे भिन्न नहीं है । अबाध्यता, स्वयंप्रकाशता, अपरिच्छिन्नता आदि जो लक्षण हैं, वे अन्य पदार्थमे, चाहे उसका नाम कुछ भी क्यों न रक्खें, पूरे नहीं उतर सकते । एक पर-रूप अपरिच्छिन्न स्वप्रकाश एव अबाध्य हो तथा दूसरा स्वस्वरूप, वह भी हो और मैं भी होऊँ, यह बात अनुभूतिका विश्लेषण करनेपर सिद्ध नहीं होती । अज्ञेय और अनिर्वचनीय शब्द पर्यायवाची नहीं है । विदित और अविदितसे विलक्षण अन्य नहीं हो सकता । इसलिये अनिर्वचनीय पद समस्त निर्वचनोंका निषेध करके अनिरुक्त स्वात्मामें ही विश्रान्ति लाभ करता है ।

ग्यारहवीं बात—सत्य, अहिंसा, ध्यान, उपासना, परत्व, कारणत्व आदि ज्ञानके ही उपलक्षण हैं । मुमुक्षु और मुक्तके व्यावहारिक भेदको सामने रखकर यदि सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणोंके स्वरूपपर विचार किया जाय तो किसी भी गुणमें सत् होनेका निर्देश सच्चित्स्वरूप आत्माके सामीप्यके कारण ही करते है । जितना जितना आत्म सामीप्य जिस जिस वृत्तिमें है, वह-वह वृत्ति उतना ही उतना अधिक शोधनद्वारा आत्मसाक्षात्कारका अथवा अज्ञान निवृत्तिका उपाय है । उदाहरणार्थ—सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणरूप वृत्तियोंको ही ले लीजिये । असत्य रूप दुर्गुण अनेकरूप होगा । उसके आचरण-भाषण आदिकी वृत्तियाँ भिन्न-भिन्न विषयोके एव चिन्ताके भारसे ग्रस्त होंगी । इसके विपरीत सत्य वृत्तिके लिये किसी चिन्ता—बनावट वा विषय चिन्तनकी आवश्यकता नही होगी । मुमुक्षुपुरुष सरल स्वभावसे विषयरहित सत्य वृत्तिमें स्थित रह सकेगा और वास्तवमें वह आत्मस्थिति ही होगी । अज्ञान निवृत्ति होनेपर स्थितिके लिये उसे किसी प्रयासकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी । इसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुणकी वृत्तियाँ भी सगर्भ एव सविषय ही होती हैं । किसके प्रति काम है, किसपर क्रोध है, क्या चाहिये–यह निश्चय करके तदाकार हुए विना इन दुर्गुणोंकी स्थिति नही हो सकती । इसके विपरीत निष्कामता, अक्रोध एव निर्लोभता आदि वृत्तियाँ यह अपेक्षा नहीं रखतीं कि हम किसके प्रति हैं । विषयहीन वृत्ति अपने आश्रयभूत प्रत्यगात्मासे अपनेको पृथक् नहीं दिखाती है—इसलिये आत्मविषयक अज्ञान-


[दायाँ स्तम्भ]

निवृत्तिकी प्रतिबन्धकतासे रहित होती है । सविषय स्थिति ही मुमुक्षुको मत्से भिन्न प्रतीत होती है । निर्विषय वृत्ति तो मद्रूप ही प्रतीत होती है—यही आत्म सामीप्य ज्ञानस्वरूप आत्माका उपलक्षण है । अभिप्राय यह है कि ये वृत्तियाँ भी असत्य, हिंसा आदिके अभावरूप होनेके कारण स्वतः भावरूप नहीं, ज्ञानरूप हैं, अनेक नहीं, अद्वितीय हैं। ध्यान, उपासना आदि भी अनेकविषयक वृत्तियोको व्यावृत्त करनेके लिये ही है, क्योंकि एक वस्तुमे एकतानता ही उनका स्वरूप है।

ज्ञानस्वरूप परमात्मामे कार्य-कारणकी कल्पना अथवा भोक्तृ भोग्य भेदभावनी कल्पना असगत है । श्रुतिने—

'न तस्य कश्चिजनिता' 'न तस्य कार्यम्' 'न तदृक्षास्ति कश्चन' 'न तद्भाति किञ्चन'

—आदि वाक्योके द्वारा इसी अर्थका प्रतिपादन किया है। इस बातको ध्यानमें रखकर जब कार्य-कारण भाव वर्णन करनेवाली श्रुतियोको पढते हैं, तब स्पष्ट रूपमे उनका अन्य अभिप्राय ज्ञात होता है । यथा—

१-दृश्य प्रपञ्चमे नित्यताकी भ्रान्ति निवारण करनेके लिये उसकी उत्पत्ति प्रपञ्चका वर्णन है ।

२-परमाणु, प्रकृति आदि अन्यकारणताका निषेध करनेके लिये ज्ञानस्वरूप परमात्मामे कारणत्वका अध्यास किया गया है।

३-निमित्तकारण और उपादानकारणका भेद मिटानेके लिये ऊर्णनाभि, विस्फुलिङ्ग आदिके दृष्टान्त हैं एव एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानकी उपपत्ति दिखायी गयी है । 'वही सब हो गया', 'म एकसे बहुत होऊँ' इत्यादि वचनोका अभिप्राय उपादान और निमित्त कारणके भेदकी निवृत्तिमात्र ही है, परिणाम नहीं ।

४-परिणामका निषेध करनेके लिये ही परमात्माके अद्वितीय अज-स्वरूपका वर्णन करते हुए 'स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः' अर्थात् जो कुछ बाह्यत्वेन अथवा आभ्यन्तरत्वेन प्रतीत हो रहा है वह अज ही है, ऐसा कहा गया है और दृश्य प्रपञ्चकी उपपत्तिका लिये परमात्मामे मायाका अध्यारोप किया गया है।

५-'न तु तद् द्वितीयमस्ति' 'विकल्पो न हि वस्तु' इन श्रुतियों से अध्यारोपित मायाका भी अपवाद कर देते हैं। 'सद्वेदं सर्वम्' 'चिद्वेदं सर्वम्' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियाँ परमात्मासे भिन्न और कुछ नही है—यह प्रतिपादन करती हैं।

  • मुक्तिके द्वार * २५ [बायाँ स्तम्भ] यह सब कारणत्व आदिका आरोप मुमुक्षुओंके हितार्थ अज्ञान-निवृत्तिके लिये ही किया गया है । इसलिये इन सबका अन्तिम पर्यवसान ज्ञानमे ही है । परत्व, आन्तरतमत्व आदिका अभिप्राय भी ज्ञानस्वरूप आत्मामें ही पर्यवसित होता है । इन्द्रियोंसे परे पञ्चतन्मात्रा, तन्मात्रासे परे मन, मनसे परे बुद्धि—इस प्रकार एककी अपेक्षा दूसरा आन्तर है । बाह्य-ग्राह्यका परित्याग करते-करते आन्तर-आन्तरके ज्ञानकी ओर अग्रसर होना ही इसका लक्ष्य है । बुद्धिसे परे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष—यही परत्व अथवा आन्तरतमत्वकी विश्रान्ति है, यही पराकाष्ठा और परागति है । इस पुरुषसे परे कुछ भी नहीं है । यह आत्माके एकत्वका एक उज्ज्वल उदाहरण है । उपनिषद्गत लयप्रक्रिया भी शान्त आत्माको ही लयकी अवधि बतलाती है । बारहवीं बात—अपरिच्छेद-रूप लक्षणके एकरूप होनेके कारण 'ज्ञान', 'आत्मा', 'ब्रह्म' और 'विश्व' आदि शब्द पर्यायवाची हैं और एक ही अर्थके बोधक हैं । यथा— १-‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ प्रज्ञान अपरिच्छिन्न ब्रह्म है । २-‘अयमात्मा ब्रह्म' यह आत्मा अपरिच्छिन्न ब्रह्म है । ३-‘ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्' यह सम्पूर्ण विश्व अपरिच्छिन्न ब्रह्म ही है । ४-‘सर्वं यदयमात्मा’ यह सब जो कुछ है, आत्मा ही है । ५-‘अहमेवेदं सर्वम्’ मैं ही यह सब हूँ । ६-‘प्रतिबोधविदितं मतम्’ प्रत्येक ज्ञान ही उसका ज्ञान है। ७-‘कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव' सम्पूर्ण प्रज्ञान घन ही है । ८-‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' विज्ञान और आनन्द ब्रह्म ही है। गीतामे 'ज्ञान ज्ञेयम्', श्रीमद्भागवतमें ‘विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति’, विष्णुपुराणमें 'ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतत्' इत्यादि वचनोंसे उपर्युक्त अर्थकी पुष्टि होती है । इस प्रकार उपनिषद्का प्रतिपाद्य अर्थ 'अहम्', 'इदम्', [दायाँ स्तम्भ] 'प्रत्यगात्मा' एवं 'विश्वम्' की ब्रह्मरूपता है । अब यह ब्रह्म क्या है, इसको उपनिषद्के मुखसे ही सुन लीजिये— ‘तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् । अयमात्मा ब्रह्म । सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ।’ इसका अभिप्राय है कि जो देश, काल, वस्तु-परिच्छेदसे रहित सर्वानुभवस्वरूप अपना आत्मा है वही ब्रह्म है । ‘यत् साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' 'अहं ब्रह्मास्मि' —इत्यादि अवान्तर वाक्य एवं महावाक्य दृश्य-द्रष्टा, तुम, मैं, वह आदिके रूपसे प्रतीयमान समस्त पद-पदार्थ एवं पदार्थ-ज्ञानको अपरिच्छिन्न ब्रह्म ही निरूपण करते हैं । परिच्छेद सामान्याभावोपलक्षित ब्रह्मतत्त्वमें दृश्यता, अनेकता, परिणामिता, अन्यता आदिका कथा-प्रसङ्ग स्वय ही अनुत्थान- पराहृत है । यह तत्त्वका ज्ञान नहीं है, तत्त्वरूप ज्ञान है । इसका वेत्ता ब्रह्मका वेत्ता नहीं, ब्रह्मरूप वेत्ता है । ज्ञानके इस स्वरूपके निरूपणसे वेद अथवा उपनिषद्की अपौरुषेयताका अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है । ज्ञान ज्ञान ही है, वह किसी पुरुषकी अनुभूति, भावना, स्मृति अथवा कल्पना नहीं है । ज्ञान स्वयंप्रकाश, सर्वानुभवस्वरूप, सृष्टि-प्रलय, समाधि-विक्षेप आदि समस्त प्रतीयमान व्यवहारोंका प्रकाशक, अखण्ड, अजन्मा एव स्वतःप्रमाण है । इसका सम्बन्ध भूत, भविष्य, वर्तमान, देश, वस्तु आदि किसीके साथ नहीं है और सब कुछ यही है । यह ज्ञान है, यह जानना है । कुछ भी जानना यही है, 'कुछ' नहीं जानना है, 'कुछ' भी यही है । ऐसे ज्ञानका प्रतिपादक, अस्मर्यमाण-कर्तृक, अनादि सम्प्रदायाविच्छेदसे प्राप्त नियतानुपूर्वीक जो ग्रन्थविशेष है उसे भी अपौरुषेय कहते हैं । वह एकार्थक है, एकात्मक है, एक वाक्य है, उसके अवान्तर तात्पर्यमें भले ही भेद जान पड़ते हों परंतु परम तात्पर्यमें कोई भेद नहीं है । वेद- पुरुषका शिरोभाग अर्थात् मस्तिष्क उपनिषद् है । वह शाखा- भेदसे पृथक् पृथक् प्रतीयमान होनेपर भी एक ही है । ज्ञान अद्वितीय है—यही अपौरुषेयताका अभिप्राय है । [निचला भाग - पद्य] मुक्तिके द्वार वेदोंके सुअंग प्रतिमूर्ति हैं परमात्माकी, -उपासनाके उत्तम अगार हैं । भरे हैं वेदान्तके सिद्धान्त भी इन्हींमें सब, पातक-विनाशनको भागीरथी-धार हैं ॥ मानवीय त्रयताप हरनेके हेतु तात ! विश्वमें ये स्वतः 'रमा' प्रणव-ओंकार हैं। पठन-मननसे है होता आत्मज्ञान सदा, अखिल उपनिषद् मुक्तिके ही द्वार हैं ॥ —लक्ष्मीप्रसाद मिश्री ‘रमा’

उपनिषद्का अमर उपदेश ( माननीय वायसराय चक्रवर्ती श्रीराजगोपालाचारी महोदय ) उपनिषद्के सार-तत्त्वको वेदान्त कहते हैं। ज्ञान, भक्ति और अपने सम्पूर्ण कर्मोंमें भगवच्छरणागति- का भाव—यही उपनिषदोंका मथितार्थ है। ज्ञानका अर्थ प्रचुर अध्ययनसे होनेवाला गम्भीर आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभव तथा गुरुजनोंके उपदेश एवं आचरणपर ध्यान देनेसे प्राप्त होनेवाली सम्यग् दृष्टि है। सत् क्या है और असत् क्या है, महान् क्या है और क्षुद्र क्या है, हमें क्या स्मरण रखना चाहिये और क्या भूल जाना चाहिये—इस बातको जानना आवश्यक है। इसीका नाम ज्ञान है और यह ज्ञान हमारी समस्त क्रियाओंका सूत्रधार होना चाहिये। इससे कर्ममें अनासक्तिका भाव आता है। हम कर्तव्यसे मुँह न मोड़ें, अपितु समस्त प्राप्त कर्म अनासक्त होकर तथा इस बातपर दृष्टि रखते हुए कि, किस बातमें जगत्‌का हित है और किसमे अहित है—करते रहे। हमारी क्रिया स्वार्थके लिये—अपने लाभके लिये न हो। भक्ति संकल्पकी दृढ़ता, विनयशीलता तथा श्रद्धाका वह समन्वित रूप है, जिसके द्वारा हमारा कर्म और हमारी उपासना दूसरोंके लिये तथा अपने लिये भी कल्याणकारक एवं सफल होते हैं। भक्ति- शून्य कर्म अहङ्कारका प्रतीक है और भक्तिरहित उपासना दम्भका नामान्तर है। भगवान्‌के शरण हुए बिना शोक एवं विफलतासे छुटकारा नहीं मिल सकता और न चित्तकी शान्ति ही सम्भव है। आनन्दकी प्राप्ति करानेवाला वेदान्तका यही अन्तिम उपदेश है।

दार्शनिक ज्ञानका मूल स्रोत ( माननीय पं० श्रीगोविन्दवल्लभजी पत, प्रधानमन्त्री युक्तप्रदेश ) उपनिषद् सनातन दार्शनिक ज्ञानके मूल स्रोत हैं। वे केवल प्रखरतम बुद्धिके ही परिणाम नहीं हैं अपितु प्राचीन ऋषियोंकी अनुभूतिके फल हैं। उपनिषदोंका जनतामें प्रचार करनेका आप जो प्रयत्न कर रहे हैं, उसकी सफलता सब प्रकारसे वाञ्छनीय है।

उपनिषदोंका आध्यात्मिक प्रभाव ( बिहारके गवर्नर माननीय श्री एम्० एस्० अणे महोदय ) पाठकोंको अनुवाद एवं व्याख्यासहित भेंट देनेवाले उपनिषत्सम्बन्धी 'कल्याण'के विशेषाङ्कका समस्त हिंदी पढ़नेवाली जनता स्वागत करेगी। उपनिषद् शान्ति और विश्वप्रेमका जो महान् संदेश देना चाहते हैं, उसे प्रस्तुत अङ्क गरीवोंकी झोंपड़ियोंतक पहुँचा देगा। शोपनहर-जैसे दार्शनिकको भी उपनिषदों- से शान्ति एवं आश्वासन प्राप्त हुआ है। जिनका चित्त अशान्त है, उन्हें चित्तकी सान्त्वनाके लिये उपनिषदोंसे बढ़कर कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं मिल सकता। इनके अध्ययनसे मनुष्यके विचार एवं हृद्गत भाव संयत होते हैं और सामान्यतः उनका मनुष्यपर महान् आध्यात्मिक प्रभाव पड़ता है। अतः आप एवं आपके सहयोगी इस विशेषाङ्कको निकालनेके लिये जो प्रयत्न कर रहे हैं, उसका मैं अत्यन्त आदर करता हूँ। मैं आपकी सर्वांशमें सफलता चाहता हूँ।

गीतोपनिषद्‌की श्रेष्ठता और उसके कारण ( लेखक—माननीय डा० श्रीकैलासनाथजी काटजू, गवर्नर, बगप्रान्त )

गीताप्रेसके द्वारा प्रकाशित होनेवाले 'उपनिषद्-अङ्क'मे बहुतसे विद्वान् एव गम्भीर चिन्तनामें लगे हुए लोगोंके निबन्ध रहेंगे। ये परम विज्ञ लेखक निश्चय ही इन महान् उपनिषदोंके सिद्धान्तोंकी श्रेष्ठताका विवेचन करेंगे। हिंदुओंके विचारका सर्वोच्च स्तर हमें उपनिषदोंमें प्राप्त होता है। उपनिषद् हमारे उत्कृष्ट भारतीय ज्ञानकी परिणति है। उन्होंने सभी देशोंके विद्वान् दार्शनिकोंका आदर एवं सम्मान सहज ही प्राप्त किया है, और गत दो हजार वर्षोंमें उपनिषदोंपर सैकड़ों टीकाएँ लिखी गयी हैं। अतीतकालमें हमारी जातिके जितने भी दार्शनिकों एव आचायोंने प्राचीन सिद्धान्तको विशुद्धरूपमें पुनः प्रतिष्ठित करनेका प्रयास किया है, उन सभीने एक या अधिक उपनिषदोंका आश्रय लेकर अपना तथा अपने मतका समर्थन करनेकी चेष्टा की है। उपनिषदोंमें हिंदूधर्मका निचोड़ है; हमारे धर्मकी ऊँची-से-ऊँची और उत्तम-से-उत्तम शिक्षा इनमें है। बहुधा इनकी भाषा सूत्रों- जैसी और इनकी वर्णनशैली गहन है। इसीलिये टीकाओंका लिखा जाना आवश्यक था और इसीलिये उनपर इतनी अधिक टीकाएँ लिखी गयीं। मेरे-जैसे व्यक्तिको, जो अपनी प्राचीन भाषा संस्कृतसे अनभिज्ञ है और जिसकी रुचि दर्शनशास्त्रकी अपेक्षा इतिहासके अध्ययनकी ओर अधिक रही है, उपनिषद् कभी- कभी गूढ एवं दुरूह प्रतीत होते हैं। मेरे लिये उपनिषदोंके सिद्धान्तोंको समझानेकी बात मनमें भी लाना अथवा उनके उच्च विचारोंके औदात्यकी प्रशंसा करना एक प्रकारसे धृष्टता ही होगी। यह कार्य ऐसा है, जिसे विभुत एव विज्ञ विद्वान् ही कर सकते हैं। मेरी जीवन-यात्राका बहुत बड़ा भाग बीत चुका है और हमारे उपनिषत्कालीन प्राचीन ऋषियोंने जिन विविध मागोंसे एक ही लक्ष्यको प्राप्त किया है, उन सबको बोधगम्य करनेमे शक्तिको व्यय करनेकी अपेक्षा मेरी चेष्टा उस लक्ष्यपर ही अपनी दृष्टिको केन्द्रित करनेकी रही है। भगवद्गीताको सभीने सम्पूर्ण वेदों एवं उपनिषदोंका सार कहकर उसका बखान किया है और मेरी चेष्टा यथाशक्ति गीताके मुख्य उपदेशपर ही अपनी दृष्टिको जमाये रखने एव उसे अपने जीवन-व्यवहारका आधार माननेकी रही है। मनुष्यके जीवनमें—यदि वह ज्ञान-प्राप्तिका सच्चा मार्ग पकड़े रहे—एक समय ऐसा आता है, जब कि केवल शास्त्र- ज्ञानके अर्जनकी ओरसे उसकी प्रवृत्ति हट जाती है। यह सिद्धान्त मुझे बहुत सत्य जँचा है। विभिन्न मतवादोंसे और कभी-कभी एक ही सिद्धान्तको अलग-अलग भाषामें व्यक्त करनेसे साधारण मनुष्यके चित्तमे संशय और भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है। इसलिये सार-वस्तुपर अपनी दृष्टि स्थिर रखना और उसी मुख्य सिद्धान्तके अनुसार अपने जीवनको कसना अधिक निरापद मार्ग है। इसी भावसे उपनिषदोंके साररूपमें मैं अपने करोड़ों हिंदू भाई बहिनोंके साथ गीताकी पूजा करता हूँ। उन्हींकी भाँति मेरी दृष्टिमें भी गीता अकेली ही हमारी जीवनयात्रामें प्रशस्त पथ दिखलानेके लिये पर्याप्त है। हमारे राष्ट्रीय इतिहासके प्रारम्भसे ही गीताको इस प्रकार उपनिषदोंके साररूपमें स्वीकार किया गया है। विगत दो सहस्राब्दियोंमें उसपर सचमुच सैकड़ों ही टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। दुर्भाग्यवश उनमेंसे अधिकांश इस समय सर्वथा लुप्त हो गयी हैं। उपलब्ध टीकाओंसे कुछ तो इस सुदीर्घ- कालकी सीमाको पार करके आयी हैं और उनमें इस महान् उपदेशकी जिस पटुता एव कौशलके साथ विभिन्न प्रकारसे व्याख्या की गयी है, उसे देखकर हमारे मनमें सात्विक ईर्ष्या एव श्रद्धा होती है । प्रत्येक मरजीवेने ज्ञानके इस महान् सागरमें गोता लगाया है और वह एक या एकसे अधिक अमूल्य रत्न निकालकर लाया है। अबतक भगवद्गीता विज्ञ पण्डितोंकी ही सम्पत्ति थी, परन्तु पिछले साठ वर्षोंमें इसके चमत्कारपूर्ण प्रचारका विस्तार हुआ है और आज भगवद्गीता प्रत्येक आस्तिक हिंदूकी बहुमूल्य निधि बन गयी है। राजप्रासादसे लेकर कृषककी कुटीरतकमैं उसका प्रवेश हो गया है, और करोड़ों हिंदुओंके दैनिक जीवनका यह मूलमन्त्र बन गयी है। यह सर्वश्रेष्ठ उपनिषद्, जो प्राच्य जगत्‌के पुरातन ज्ञान-भण्डारकी कुञ्जी है, आज भगवान्‌की कृपासे केवल भारतके ही नहीं, अपितु बाहरके भी अगणित नर- नारियोंके जीवनकी बागडोर बन गयी है। इस बीसवीं शताब्दीमें विचार-जगत्‌के अन्दर जो यह चमत्कार हुआ है, उसका क्या कारण है ? छोटे छोटे अठारह अध्यायोंके इस लघु-कलेवर ग्रन्थमें, जिसकी अवतारणा

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१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कुरुक्षेत्रकी अनोखी रणभूमिमें हुई, ऐसी कौन-सी बात है, जिसे अखिल विश्वके नर-नारी इस संसाररूप पहेलीकी कुञ्जीके रूपमें उत्तरोत्तर अधिक संख्यामे स्वीकार कर रहे हैं ? सर्वसाधारणकी बुद्धि सूक्ष्म विचारोंको ग्रहण नहीं कर सकती । वह केवल मुख्य बातोंको पकड़ती है और उनसे दृढ़तापूर्वक चिपट जाती है । कभी कभी थोड़े समयके लिये उन्हे लुभावने एव भ्रामक वाक्योंद्वारा बहकाया जा सकता है। परंतु अन्ततोगत्वा वह सदा सत्य वस्तुओंपर और सम्पूर्ण सन्सिद्धान्तोंके सार- तत्त्वपर ही स्थिर हो जाती है । उपनिषदोंके भी महान् उपनिषद् इस गीतामें ऐसी क्या वस्तु है, जिसे हमारे इस भारतवर्षमें तथा उत्तरोत्तर बढती संख्यामें भारतवर्षके बाहर भी सर्वसाधारणकी बुद्धिने जीवनके तत्त्वरूपमे आग्रहपूर्वक ग्रहण किया है ? मेरा विनीत मत यह है कि साधारण हिंदू जनता, जिसमें मै भी अन्तर्भूत हूँ, गीतासे दो सिद्धान्तोको उत्तरोत्तर अधिक संख्यामें ग्रहण कर रही है । पहला सिद्धान्त मृत्युसे अभय हो जाना है । मृत्यु अनिवार्य है, जिसने भी जन्म लिया है उसका अवसान मृत्यु ही है । शरीर नश्वर है परतु आत्मा अमर है, अतः जीवनके प्रति सम्पूर्ण आसक्ति और मृत्युका सारा भय ऐसी भूल है जिससे सदा बचे रहना चाहिये । एक महान् शिक्षा तो यह है । दूसरी शिक्षा यह है कि एकाकी ध्यान अथवा भक्तिपूर्ण उपासनाके मार्गका अनुसरण करनेसे चित्तकी आन्तरिक शान्ति—वह शान्ति जिसे पाकर मनुष्य सारे मात्रास्पशों एव बाह्य सुख दुःखोंसे अलिप्त रहता है, अवश्य मिल सकती है, परंतु सर्वश्रेष्ठ मार्ग सर्वभूतहितके लिये निरन्तर निष्कामभावसे कर्ममें लगे रहना है । यहाँ यह कहा जा सकता है कि इस कर्मके मार्गपर चलना कभी कभी जलमें रहते हुए उससे अलग रहनेके समान कठिन हो जाता है। यह मार्ग सङ्कीर्ण अवश्य है, परतु साथ ही श्रेष्ठ भी है । यही शिक्षा आज हिंदुओंके मनपर अधिकार कर रही है, जिस शिक्षाके अनुसार मानव-जातिके कल्याणके लिये कर्मफलकी आसक्तिको त्यागकर कर्म करना सर्वोत्तम योग है। मैं इसे जीता-जागता चमत्कार मानता हूँ, क्योंकि हम भारतीयोंको इस कर्मयोगके सिद्धान्तकी नितान्त आवश्यकता है । इस उपदेशको भुला देनेसे ही हमने अपनी स्वाधीनता और स्वतन्त्रता खो दी थी । हिंदुओंकी बुद्धि जन्म-मरणके इस चक्रसे, जो देखनेमें शाश्वत प्रतीत होता है, छूटनेका साधन निरन्तर खोजती रहती है । हमलोग इस चक्रको भेदकर उससे मुक्त होना चाहते हैं, और कुछ काल पूर्वतक सर्वसाधारण हिंदू जनता इस भ्रममे थी कि यह छुटकारा ससारसे अलग हो जानेपर ही सम्भव है । चाहे आप ध्यानयोगका आश्रय लेकर अथवा ईश्वरकी उपासनामें लगकर और उन्हें अपने हृदयके आसनपर बिठाकर अलग हों, आप अलग तो होते ही हैं और इस मुक्तिकी खोजमे ससारकी प्रत्येक वस्तु नगण्य हो जाती है, और इस दृष्टिकोणको ग्रहण करनेमे भय यह है कि देशकी पराधीनता अथवा स्वाधीनताका प्रश्न भी बहुत कुछ गौण हो जा सकता है, परंतु इस समय भगवद्गीताने सर्वसाधारण हिंदूकी बुद्धिको खींचकर सर्वथा एक दूसरे ही नवीन मार्गमें लगा दिया है । ध्येय वही का वही है—मुक्तिकी प्राप्ति, जन्म-मृत्युके उस शाश्वत प्रतीत होनेवाले चक्रका भेदन । परतु आप उस व्यक्तिगत ध्येयको संसारमें बने रहकर अनवरत निष्काम कर्ममे लगे रहकर प्राप्त कर सकते हैं । मुझे गीताके अन्य महान् सिद्धान्तोंका विवेचन करनेकी आवश्यकता नहीं है । गौतम बुद्धने पता लगाया कि जीवनकी वासना, जीनेरी कामना ही दुखका मूल है । 'कामनाओंको जीत लो, और तुम दुःसपर विजय पा लोगे' यह बुद्धका कहना है । उसी महान् सत्यको गीताके दृढतापूर्ण किंतु सुसम्बद्ध शब्दोंमे बार-बार कहा गया है । भगवान्का भक्त वही है जो आसक्ति एवं कामनामे मुक्त है और जिसका अहङ्कार सर्वथा नष्ट हो गया है । साथ ही भगवान् एक और अखण्ड हैं तथा समस्त रूपों एव आकृतियोंमे प्रकट हैं । इस बातको गीताने उदात्त एवं सुन्दर भाषामें व्यक्त किया है। सच पूछिये तो गीतामे जीवनके एक सर्वाङ्गपूर्ण दार्शनिक सिद्धान्तका समावेश हुआ है, परंतु गीताके उपदेशका मूल मन्त्र है—कर्म और अविराम कर्म । आलस्य एवं दीर्घसूत्रताका पापकी भाँति परित्याग कर देना चाहिये । कर्मयोग ही हमारे सामने आदर्शके रूपमे रक्खा गया है, और मैं फिर कहता हूँ कि कर्मका ही अन्तःकरणकी शुद्धि एव परमपुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूपमे विधान किया गया है, उस पुरुषार्थको हम मुक्ति कहें, कल्याण कहे अथवा निर्वाण । गीता न होती तो हिंदुओंकी प्रवृत्ति कर्ममात्रको प्रलोभनका कारण, सासारिक बन्धनका हेतु और इस प्रकार आध्यात्मिक उन्नतिका बड़ा विघ्न कहकर उससे घृणा करनेकी होती । विश्वके समस्त धर्मग्रन्थोंमें, जिनसे मेरा परिचय है, एकमात्र गीताने ही इस प्रश्नपर यथार्थ दृष्टिसे विचार किया है और हमें बतलाया- है

  • चित्त ही संसार है * २९ कि कर्म बुरा नहीं है, कर्ममें और कर्मफलमें आसक्ति तथा फलकी कामना ही—जिस फलको प्राप्त करनेके लिये मनुष्यमात्र लालायित रहता है, दोषका कारण है । कर्मको कर्मफलसे अलग करते ही आप अनुभव करेंगे कि कर्म स्वरूपतः व्यक्तिको ही नहीं, अपितु समाजको भी ऊपर उठाता है । कहा जाता है कि सभी भगवत्प्राप्त पुरुष जन्म-मृत्युका उल्लङ्घन करनेके पश्चात् भी, मनुष्यमात्रको संसाररूप इस महान् बन्धनसे मुक्त करनेके लिये स्वेच्छासे जीवनके साथ लगे हुए बड़े-से-बड़े क्लेशोंको सहन करना स्वीकार करते हैं । गीता ही कर्मको आध्यात्मिक उन्नतिका सर्वश्रेष्ठ साधन कहकर उसकी प्रशंसा करती है और मेरा विश्वास है हमारे इस प्रिय भारतवर्षका भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है। इसका एक अत्यन्त सुदृढ प्रमाण यह है कि निष्काम कर्मयोगका यह सिद्धान्त सर्वसाधारण हिंदूकी बुद्धिमें व्यापकरूपसे प्रवेश कर रहा है । जिस किसी परिस्थितिमें हम हों, सम्पूर्ण व्यक्तिगत हेतुओं, यहाँतक कि जीवनतकका विचार छोड़कर अपने कर्तव्यका पालन करना ही चाहिये । यह सिद्धान्त निश्चय ही हमारे लिये सबसे बड़ा रक्षाका साधन प्रमाणित होगा । ध्यान रहे कि यह कर्मयोग सङ्ग्राममें जूझनेवाले सैनिकके लिये ही नहीं है अपितु प्रत्येक नर-नारीके लिये, जिस किसी परिस्थितिमें वह हो, जीवनभर साधन करनेका है । निष्कामकर्म हमारे राष्ट्रका प्राण बन जाना चाहिये और जबतक हमारे शरीरमें यह प्राण रहेगा तबतक हमारी मृत्यु नहीं हो सकती । उपनिषदोंमें सनातन सत्य ( माननीय पं० श्रीरविशङ्करजी शुक्ल, प्रधानमन्त्री मध्यप्रान्त-बरार ) ‘कल्याण'की सेवाओंसे प्रत्येक भारतीय कृतार्थ हुआ है। ‘कल्याण’के विशेषाङ्क भारतीय साहित्य और विचार-जगत्‌की एक महत्त्वपूर्ण घटना होते हैं। उपनिषद् हमारे युग-युगोंकी सबसे मूल्यवान् धरोहर हैं। मुझे विश्वास है ‘कल्याण’का ‘उपनिषद्-अङ्क’ प्रत्येक घरमें एक सम्माननीय स्थान प्राप्त करेगा और सनातन सत्यका प्रकाश फैलाकर यथार्थमें कल्याणदायी सिद्ध होगा। चित्त ही संसार है चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत् सनातनम् ॥ चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमक्षयमश्नुते ॥ समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरम् । यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ ( मैत्रेयी० ५-७ ) चित्त ही संसार है, अतः प्रयत्नपूर्वक उसको शुद्ध करना चाहिये। जिसका जैसा चित्त होता है, वैसा ही वह बन जाता है। यह सनातन रहस्य है। चित्तके प्रशान्त हो जानेपर शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं, और प्रशान्त मनवाला पुरुष जब आत्मामें स्थितिलाभ करता है, तब उसे अक्षय आनन्दकी प्राप्ति होती है। मनुष्यका चित्त जितना इन्द्रियोंके विषयोंमें समासक्त होता है, उतना यदि परब्रह्ममें हो जाय तो बन्धनसे कौन न मुक्त हो जाय ।

उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक ( लेखक- माननीय बाबू श्रीसम्पूर्णानन्दजी, शिक्षा-सचिव, युक्तप्रान्त )

भारतीय दर्शनके पाश्चात्त्य आलोचकोंने इस बातकी ओर बराबर ध्यान आकृष्ट किया है कि उन विचार-शास्त्रोंमें, जो वेदमूलक हैं, कर्तव्याकर्तव्यकी विवेचना नहीं की गयी है। इस दृष्टिसे भारतीय होते हुए भी बौद्धदर्शनकी परम्परा भिन्न है। उसमें जिस मध्यम मार्गका प्रतिपादन किया गया है, वह यूरोपीय विचारकोंको स्वभावतः अपनी ओर खींचता है। उनको उसमें चरित्रनिर्माण और समाज-संव्यूहनका वह बीजक मिलता है, जिसके सहारे आजके परितप्त जगत्‌को शान्ति दी जा सकती है। जिस समय बुद्धदेव भारतीय जगत्में अवतरित हुए थे, उन दिनों सद्धर्मका एक प्रकारसे लोप हो गया था। सहस्र-संख्यक निरीह पशुओंके आलम्भन और तामस तपसे समाजका आत्मा क्षुब्ध हो उठा था। इसकी ही प्रतिक्रियाके स्वरूपमें मध्यम मार्गकी प्रतिष्ठा लोकसम्मत हुई। उस प्रारम्भिक कालमें न तो ऐसे मन्दिर थे, न किन्हीं देव देवियोंकी पूजा होती थी। इसलिये भी मध्यम मार्गके उपदेशकोंको प्रश्रय मिला। बादमें तो उसका नाममात्र अवशिष्ट रह गया, क्योंकि महायान सम्प्रदायने आध्यात्मिक जगत्में इतने बुद्धों, बोधि- सत्त्वों, देवों और देवियोंको ला बिठाया था कि किसीको मध्यम मार्गपर चलनेका कष्ट करनेकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी। इसके विपरीत यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वैदिक विचारधारा में चरित्रशुद्धि और कृत्याकृत्यविवेकको कभी भी महत्त्वका स्थान नहीं दिया गया। पूर्वमीमांसा कर्मशास्त्र तो है, परंतु उसको भी पाश्चात्य ईथिक्स विषयक ग्रन्थोंकी भाँति कर्तव्यशास्त्र नहीं कह सकते। 'कर्तव्य' और 'धर्म' शब्दोंको समानार्थक मान लेनेपर भी काम नहीं चलता। जैमिनिके अनुसार 'चोदनालक्षणोऽर्थः धर्मः' इसके आगे वह कहते है, 'तद्वचनादाम्नायस्यप्रामाण्यम्' इसका तात्पर्य यह हुआ कि जिसकी चोदना, घोषणा, विधि वेदने की गयी हो, वह धर्म है। इसीमें वेदकी प्रामाणिकता है। यह परिभाषा चाहे व्यवहारदृष्टिसे उपयोगी भी हो परंतु दार्शनिक दृष्टिसे सन्तोषजनक नहीं है। जिन कामोंको वेदने वैध ठहराया है, उनके सम्बन्धमें यह प्रश्न बराबर हो सकता है कि उनको क्यों किया जाय। भले ही वेद अपौरुषेय हों, ईश्वरकृत हों, परंतु ईश्वरकी आज्ञा क्यों मानी जाय? यह हो सकता है कि

ईश्वरमें निग्रहानुग्रहकी शक्ति हो, परंतु पुरस्कारकी आशा या दण्डके भयसे किया गया काम वस्तुतः उत्कृष्ट नहीं होता। लोकमें भी ऐसे काम प्रशस्त नहीं माने जाते। कर्मविशेषकी करणीयता या अकरणीयताका निर्णय उसके स्वरूपके आधारपर होना चाहिये न कि कर्ताके अतिरिक्त किसी शक्तिशाली व्यक्तिकी इच्छापर। कणादने इससे अच्छी परिभाषा की है। वे कहते हैं— 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । 'जिस कर्मसे अभ्युदय—इहलोक और परलोकमें कल्याण और मोक्षकी सिद्धि हो, वह धर्म है।' इससे धर्माचरण के परिणामका परिचय तो मिलता है, परंतु परखनेकी कसौटी नहीं दी गयी। बादके विद्वानोंने तो इतना भी विचार नहीं किया है। जगत् सम्बन्धी अनेक सूक्ष्म और स्थूल प्रश्नोंकी समीक्षा की गयी, परंतु कर्मके सम्बन्धमें केवल इतना ही कह दिया जाता था कि जो आचरण वेदविहित है, वह करणीय है और जो निषिद्ध है वह अकरणीय है। यदि किसी विद्वान्‌को किसी ऐसे कृत्यके विषयमें व्यवस्था देनी होती थी जिसका स्पष्ट उल्लेख श्रुतिमें नहीं मिलता तो वह इसी बातका प्रयत्न करता था कि उसको स्वरूप-साम्यके आधारपर वेदमें दी हुई किसी न किसी कर्मसूचीमे बिठा दे। इसको स्वतन्त्र विचार नहीं कह सकते। ऐसी आलोचनाका प्रभाव भारतीयोंपर पड़ना स्वाभाविक है। आलोचनाका उत्तर देनेकी सामग्री भी उसके पास नहीं थी। विदेशी शासनके प्रभावने उनके आत्मविश्वासको लुप्तप्राय कर दिया था। अतः जिस किसी वस्तुकी शिकायत विदेशी करते थे, वह उनकी आँखोंमें भी खटकने लगती थी। यह बिल्कुल ठीक है कि भारतीय दर्शनमे सत्कर्म- मीमांसाको वह स्थान नहीं दिया गया है जो उसे पश्चिममें प्राप्त है, परंतु इसमें लज्जित होनेकी कोई बात नहीं। यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म एकेश्वरवादी ही नहीं, प्रत्युत एकोपास्यवादी है। ईश्वर जगत्‌का स्रष्टा, पालक और संहर्ता है। जगत् उसकी इच्छाकी अभिव्यक्ति, उसकी लीला है। वह सर्वथा 'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्' समर्थ है। किसी और- की उपासना उसके लिये असह्य है। उसने मूसासे स्वयं कहा था कि 'मैं तेरा ईश्वर ईर्ष्यालु हूँ।' वह और सब अपराधोंको

  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेचक * ३१ क्षमा कर सकता है' परन्तु शिर्क और इनकार, उसके सिवा किसी और उपास्यकी सत्ताको मानना या स्वयं उसकी सत्ताको न मानना अक्षम्य अपराध है। यह तो इन धर्मोंका मूलरूप है। ईसाई-धर्मपर उसके शैशव-कालमे ही यूनानी दर्शनका प्रभाव पड़ा। इस समन्वयके कारण उसकी कट्टरता बहुत कुछ कम हो गयी। बाइबिलका वह भाग जिसमें ईसा और उनके शिष्य जॉन तथा सेंट पालके उपदेश अङ्कित हैं, उदार आत्मज्ञानमूलक वाक्योंसे परिपूर्ण है। जो ईसाई 'मैं आल्फा और ओमेगा—वर्णमालाका प्रथम और अन्तिम अक्षर हूँ' तथा 'मैं अपने पितासे अभिन्न हूँ'-जैसे वाक्योंके अर्थपर मनन करेगा वह विशिष्टाद्वैत अनुभूतिका निश्चय ही अधिकारी बन सकेगा। इस्लामपर भी यूनानी दर्शन और ईरान पहुँचनेपर भारतीय दर्शनका प्रभाव पड़ा। इसीके फलस्वरूप सूफी सम्प्रदायका जन्म हुआ। कोई सूफी कहता है 'हमः अजओस्त' सब कुछ उससे निकला है। उपनिषद्के शब्दोंमें 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च', जैसे मकड़ी अपने शरीरसे तन्तु निकालती है और फिर अपनेमें खींच लेती है। कोई सूफी इससे भी आगे जाता है। वह 'हमः ओस्त' सब कुछ वही है—कहता है। वह ऐसा मानता है कि 'हम बन्दः हम मौलास्तम्'— 'मैं सेवक भी हूँ और सेव्य भी हूँ।' परन्तु ईसाई और सूफी साधक इस बातको नहीं भूल सकता कि— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ 'हे नाथ ! सचमुच भेद दूर होनेपर भी मैं आपका हूँ, आप मेरे नहीं। तरङ्ग समुद्रसे निकली है, कभी समुद्र तरङ्गसे नहीं निकलता।' वह उस पदकी बात नहीं करता, जहाँ सेवकके साथ-साथ सेव्यकी सत्ता भी किसी 'तत्' में विलीन हो जाती है। जिन विचारधाराओंमें प्रतीयमान जगत्का मूल कोई सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वर माना जाता है, उनमे स्वभावतः इस बातपर बहुत जोर दिया जाता है कि मनुष्यको ईश्वरकी आज्ञाका आँख बद करके पालन करना चाहिये। कविके लिये असह्य है कि कोई व्यक्ति उसकी कृतिको विकृत कर दे । अनन्त ज्ञानसम्पन्न ईश्वरने ऐसे नियम बनाये हैं, जिनके अनुसार मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है। यदि वह इन नियमोंका पालन नहीं करता, तो वह ईश्वरके काममे बाधा डालता है और दण्डका भागी बनता है। उसमे इतनी शक्ति नहीं है कि इन नियमोंको अपनी बुद्धिके बलसे ढूँढ निकाले। यह हो सकता है कि यदि वह प्रसन्न होकर ईश्वरकी शरण जाय तो उसकी बुद्धिमे ईश्वरकी बुद्धिकी छाया अवतरित हो और ईश्वरकी इच्छाकी झलक मिलती रहे; परन्तु यह सब तभी हो सकता है, जब कि वह ईश्वरचोदित विधि-निषेधकी परिधिके बाहर जानेका क्षण भरके लिये भी दुःसाहस न करे। सत्कर्मका अर्थ ईश्वराज्ञाका पालनमात्र रह जाता है। ईसाने कहा है—दूसरोंके साथ वैसा बर्ताव करो, जैसा बर्ताव तुम अपने लिये पसन्द करोगे। इस आदेशमें बुद्धिके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व आ जाता है, 'दूसरा' शब्दका क्या अर्थ है ? मैं अपने साथ कैसा बर्ताव पसन्द करता हूँ—का विशद रूप यह हो जाता है कि मुझे अपने साथ कैसा बर्ताव पसन्द करना चाहिये। ऐसे प्रश्नका यथार्थ उत्तर देनेके लिये बर्तावकी कोई-न-कोई कसौटी होनी चाहिये। यही कर्तव्यमीमांसाका उद्गम स्थान है। पाश्चात्य दर्शनशास्त्री बाइबिलकी व्याख्या भले ही न करते हो, परन्तु उनके ऊपर उस वातावरणका प्रभाव तो पड़ता ही है, जिसमे उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है। इसके सिवा उनके सामने यह प्रश्न तो बराबर ही रहता था और है कि समाजका सञ्चालन सुचारुरूपसे तभी हो सकता है, जब समाजके सब अङ्ग एक-दूसरेके साथ यथोचित आचरण करें। यथोचित आचरण क्या है, जाननेके लिये उनको सदाचरणकी कसौटी ढूँढनी पड़ी है। इस कसौटी- की खोजमें उनको जगत्‌के स्वरूपको पहचाननेका भी यत्न करना पड़ता है। इसीलिये वह 'The good' के बाद 'The true' 'शिव'के बाद 'सत्यम्'का नाम लेते हैं। भारतीय दर्शनका स्रोत इससे सर्वथा भिन्न और विपरीत है। भारतीय विचारक ऐसा मानता है कि मनुष्यकी सारी विपत्तियों, सारी कठिनाइयोंका मूल अविद्या—अज्ञान है। जहाँ विद्या है, वहीं शक्ति है। अतः वह ज्ञानकी खोज करता है। ज्ञानका क्षेत्र अनन्त है। जिस किसी पदार्थकी सत्ता है, वह ज्ञानका विषय है। यदि ईश्वरका अस्तित्व है तो वह भी ज्ञेय है। ज्ञेयत्वकी दृष्टिसे छोटे से-छोटे कीड़े- मकोड़ेका वही स्थान है, जो ईश्वरका है। विभिन्न विद्वानोंने अविद्या और ज्ञाता तथा ज्ञेयके स्वरूपका विभिन्न प्रकारसे वर्णन किया है। इन सबकी पराकाष्ठा शाङ्कर-अद्वैतवाद अर्थात् मायावाद है। इसके अनुसार जगत् मिथ्या है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जगत् असत् है। यदि किसीको पृथ्वीपर पड़ी रस्सी सर्प प्रतीत होती है तो यह प्रतीयमान

३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सर्प तो मिथ्या है, पर रस्सी सत्य है। जगत्के मिथ्यात्वका यही अर्थ है। जगत् जगत्-रूपसे असत्य है, ब्रह्मरूपसे सत्य है। ब्रह्म ईश्वर नहीं है। वह चेतन नहीं चित् है। न उसमें इच्छा है, न सङ्कल्प है। न उसमें कोई परिवर्तन होता है। न उसमें क्रिया करनेकी सम्भावना है। जिस अज्ञानके कारण उसमें जगत्की प्रतीति होती है, उसका दूर हो जाना मोक्ष है। भारतीय दर्शनमें 'पुनर्जन्म' सिद्धान्तका बहुत बड़ा स्थान है। अपने कर्म-संस्कारोंके कारण प्राणी एकके बाद दूसरे शरीरको धारण करता है। उसके सुख-दुःखका कारण किसी ईश्वरकी इच्छा नहीं, वर स्वयं उसका कर्म है। जब जीवनका सबसे बड़ा उद्देश्य, परम पुरुषार्थ मोक्ष है तो फिर किसी सर्वशक्तिमान् व्यक्तिकी खुशामद करनेकी किसी ईश्वरकी आँख बंदकर आज्ञा माननेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। वेदादि ग्रन्थ निश्चय ही विधि-निषेधकी घोषणा करते हैं, परंतु उनके आदेश उसी प्रकारके हैं, जैसे कि बड़ा भाई छोटे भाईको देता है। देवगण और ऋषिगण भी जीव हैं। वे भी नीचेसे ऊपर उठे हैं। जो जीव आज उनकी आज्ञाओंका पालन करता है, वह ज्ञानकी वृद्धिके साथ- साथ उन आज्ञाओंके औचित्यका स्वयं अनुभव करने लगेगा और एक दिन उस पदवीको प्राप्त कर लेगा, जब उसको किसी उपदेशककी आवश्यकता न रह जायगी। वह स्वयं परमर्षि महादेव हो जायेगा। उसके मन और शरीरसे सत्कर्म उसी प्रकार होंगे, जिस प्रकार कि बादलसे अनायास जलकी वृष्टि होती है। इसीलिये इस अवस्थाको धर्ममेघ कहते हैं। जिस परमात्माकी ओर इन शास्त्रोंमें संकेत है, वह अल्लाहसे बहुत भिन्न है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक होते हुए भी कर्मके अटल सिद्धान्तको किसी भी अंशमें बदल नहीं सकता। उसका दूसरा नाम मायाशबल ब्रह्म है। अर्थात् वह ब्रह्मका वह रूप है जिसकी अनुभूति मायाके झीने परदेके भीतरसे होती है। यह स्पष्ट है कि इस विचारशैलीमें प्रधान स्थान ज्ञान- विद्याका ही हो सकता है, क्योंकि अविद्याके दूर होनेसे ही मोक्ष हो सकता है अर्थात् जीव इस प्रतीयमान जगत्मे अपने जीवत्वके जीवेश्वर-भेदके ऊपर उठकर आत्मस्वरूप अर्थात् अखण्ड, अद्वय, सत्, चिन्मात्र, अनिर्वचनीय ब्रह्म- पदमें स्थिर हो सकता है। अविद्याका विनाश विद्यासे हो सकता है, कर्मसे नहीं। कर्म उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट क्यों न हो, वह द्वैतकी सत्ताको स्वीकार करके ही किया जा सकता है और इस दृष्टिसे जीव और मोक्षके बीचकी दीवारको दृढ़ करता है। शृङ्खला भले ही सोनेकी हो, परंतु कोई बुद्धिमान् उससे बँधना पसंद न करेगा। इसीलिये हमारे दर्शनोंमें कर्त्तव्यज्ञानको प्राधान्य नहीं दिया जा सकता। हम 'शिवम्'का नाम लेते भी हैं तो 'सत्यम्'के बाद। मोक्षानुभूति अर्थात् साक्षात्कार समाधिसे होता है और समाधिके लिये अभ्यास एवं वैराग्यकी आवश्यकता है। विक्षिप्त चित्त प्रतिक्षण इधर-उधर भटकता फिरता है। स्थिर सत्यका अनुभव नहीं कर सकता। ऐसे अनुभवके लिये चित्तको वासनाविरहित करना होगा । कठोपनिषद्के शब्दोंमें— 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवति ।' (२।३।१४) इसका तात्पर्य यह हुआ कि कर्म किये तो जायें परंतु निष्काम होकर, वासनाओंकी तृप्तिके लिये नहीं, वर उनके उपशमके लिये। भारतीय दर्शनमें यही सब कर्मदर्शनका उद्गम- स्थान है। ईशावास्योपनिषद् विशेषरूपसे विचारणीय है— ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ १-२ ॥ पहले द्वितीय मन्त्रको लीजिये। इस प्रकार कर्म करते हुए वह अर्थात् उनके द्वारा दुःख, बाधा भय आदिके संस्कार उसको क्लिष्ट न कर सकें। मनुष्य सौ वर्ष अर्थात् पूर्णांयु जीवे। शुक्ल यजुर्वेदके छत्तीसवें अध्यायका चौबीसवाँ मन्त्र इस सौ वर्षकी पूर्ण आयुका रूप बतलाता है— 'पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्।' 'हम सौ वर्षतक जीते रहे, हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सौ वर्षतक काम करती रहे । (वैदिक वाङ्मयमें चक्षुको सब ज्ञानेन्द्रियोंका और वाणीको सब कर्मेन्द्रियोंका उपलक्षण मानते हैं।) सौ वर्षतक ज्ञानका सञ्चय करते रहें (वेदको श्रुति कहते हैं इसलिये 'हम सुनते रहें' का अर्थ है हमको ज्ञानकी प्राप्ति होती रहे) और हम सौ वर्षतक अदीन रहें।' पहला मन्त्र यह बतलाता है कि किस प्रकारका आचरण करनेसे मनुष्य कर्म फलसे अलिप्त रह सकता है । समस्त जगत्को ईश्वरसे आच्छादित करना चाहिये । ऐसा मानना चाहिये कि समस्त जगत्में ईश्वर भीतर और बाहर व्याप्त है।

  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३३ समस्त जगत् उसकी अभिव्यक्ति है । ऐसी अवस्था में एक दुराचारको दूर करनेका, सतत अभ्यास करना होगा । अपनी वस्तुको पसंद करने और दूसरीको नापसद करनेका प्रश्न ही शारीरिक और बौद्धिक विभूतियोंको इस प्रयासमें लगाना ही नहीं उठ सकता । इसलिये जो कुछ यदृच्छया प्राप्त हो जाय, त्याग है। इस वल्लीका एक और मन्त्र कहता है— उसका त्यागके द्वारा असङ्ग भावसे उपभोग करना चाहिये । नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । त्याग सक्रिय भाव है । हम उसकी व्याख्या आगे चलकर नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ करेंगे । अन्तमें मन्त्र यह कहता है कि किसीके अर्थात् दूसरोंके (कठ० १।२।२४) धनकी लालच मत करो । यह सुननेमें बड़ी स्थूल सी बात प्रतीत 'जो दुश्चरितसे विरत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ होती है, परंतु इसका वास्तविक आशय यह है कि मनुष्यको वशमें नहीं हैं, जिसका चित्त समाधिमे स्थिर नहीं है, उसको चाहिये कि विषयोंकी, जो दूसरों अर्थात् इन्द्रियोंके धन हैं, इस सत् पदार्थका ज्ञान नहीं हो सकता।' केनोपनिषद्में कर्मको कामना न करे। यदि ध्यानसे देखा जाय तो सारी भगवद्गीता विद्याके आधारों—वर्तनोंमें परिगणित किया है । इन दोनों मन्त्रोंकी व्याख्यामात्र है । तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्य- कठोपनिषद्‌की दूसरी वल्लीने परम पुरुषार्थ और सदाचारके मायतनम् । (केन० खण्ड ४ मन्त्र ८) सम्बन्धमें एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही है। जिसके बारेमे भारतीय आचार्यों ने कर्मका क्षेत्र कभी भी मनुष्यतक पाश्चात्य विद्वानोंको भी बराबर विचार करते रहना पड़ता है । सीमित नहीं किया । इस जगत्में ब्रह्मदेवसे लेकर कीटाणुतक् अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । जितने भी प्राणी हैं, उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ हमारे ऊपर ऋण है, उन सबके ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोगसे (कठ० १।२।१) ही हमारा कल्याण हो रहा है। अतः उन सबके प्रति हमारा श्रेय प्रेयसे भिन्न है । इन दोनोंके अर्थ अर्थात् विषय कुछ-न-कुछ कर्तव्य है । न तो हम उन सबको पहचानते हैं, भिन्न हैं और ये मानो जीवको अलग-अलग प्रकारसे बाँधते जो निरन्तर हमारा उपकार कर रहे हैं और न उन सबकी हैं। जो श्रेयको चुनता है, उसका कल्याण होता है, परंतु जो किसी प्रकारकी सेवा ही कर सकते हैं, परंतु इस बातका प्रेयको चुनता है, वह पुरुषार्थसे दूर हो जाता है । इसके आगे अनुभव भी हमारे चरित्रको उठाता है कि हम पदे-पदे दूसरों- चलकर कहा गया है— के ऋणी हैं। 'तमक्रतुः पश्यति वीतशोको बृहदारण्यक-उपनिषद्‌के पहले अध्यायके चौथे ब्राह्मणका धातुप्रसादान्महिमानमात्मन ।' सोलहवाँ मन्त्र कहता है— (कठ० १।२।२०) अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति जो व्यक्ति फलकी कामनाको छोड़कर कर्म करता है, यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ जो शोकका अतिक्रमण कर गया है, वह धातुके प्रसादसे यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ आत्माकी महिमाका अनुभव करता है। यहाँ 'धातु'का तात्पर्य यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ अन्तःकरण और उसके उपकरणों अर्थात् इन्द्रियोंसे है । यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा अन्तःकरणके प्रसादकी प्राप्तिका उपाय पातञ्जलयोग-दर्शनमें वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषा लोको यथा ह वै इस प्रकार बताया गया है— स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवं हवैविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टि- 'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयेषु मिच्छन्ति । भावनातश्चित्तप्रसादनम्।' 'कर्ममें लगा हुआ यह आत्मा सब प्राणियोंका लोक चित्तका प्रसाद प्राप्त करनेके लिये सुखके प्रति मैत्रीका अर्थात् आश्रय है। अपने यज्ञ और पूजनसे वह देवोंका लोक अर्थात् ससारमें सुखकी मात्राको बढानेका, दुःखके प्रति होता है । अपने अध्ययन और अनुशिक्षणसे ऋषियोंका, करुणाका, अर्थात् ससारमें दुःखकी मात्रा घटानेका, पुण्यके पितरोंके लिये बलि देने और सन्तान छोड़ जानेकी इच्छा प्रति मुदिताका अर्थात् ससारमें पुण्यकी मात्रा बढानेका और करनेसे पितरोंका, मनुष्योंको भोजनादि देनेसे मनुष्योंका, अपुण्यके प्रति उपेक्षाका, अर्थात् दुराचारीसे द्वेष न करते हुए उ० अ० ५—

३४ :: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति तृणोदक देनेसे पशुओंका तथा उन कुत्तों, चिड़ियों और चाटी आदि छोटे प्राणियोंका लोक हो जाता है, जो उसके घरमें रहते है और उसके सहारे जीते है । जिस प्रकार सब लोग अपने शरीरका भला चाहते हैं, इसी प्रकार सब प्राणी उसका भला चाहते हैं, जिसका ज्ञान और कर्म इस प्रकारका होता है।' जो मनुष्य जगत्में जलसे अलिप्त कमलके पत्तेके समान रहना चाहता है, उसके लिये पाँचवें अध्यायके दूसरे ब्राह्मणमे दी हुई कथा रोचक होनेके साथ ही बहुत ही उपदेशपूर्ण भी है। एक बार प्रजापतिके तीनो प्रकारके पुत्र अर्थात् देव, असुर और मनुष्य उनकी सेवामे उपस्थित हुए । उनकी दीर्घकालीन अर्च्चासे प्रजापति प्रसन्न हुए । उपासकोंको आकाशमे गम्भीर नादके रूपमे 'द' अक्षर सुन पड़ा । 'द' का अर्थ देवोके लिये दाम्यत 'दमन करो', मनुष्यके लिये दत्त 'दो' और असुरोके लिये दयध्वम् 'दया करो या। देव और असुर सौतेले भाई दोनो ही प्रजापतिकी सन्तान है, बलवान् हैं, तप कर सकते हैं अर्थात् विक्षेपको छोडकर किसी एक काममे अपनी सारी शक्ति लगा सकते हैं और जिस काममे लग जाते हैं, उसमें प्राय सफलता प्राप्त करके ही छोड़ते हे । दोनोंमें बराबर सघर्ष होता रहता है । बहुधा ऐसा भी होता है कि असुरगण देवगणको जीत लेते हैं । परन्तु पराशक्ति फिर देवो- को विजय प्रदान करती है। कभी कभी देवोंको ऐसी विजय- पर गर्व भी हो जाता है, परतु जैसा कि केनोपनिषद्‌का 'यक्षोपाख्यान' दिखलाता है, यह अभिमान नीचे गिरानेवाला है । ऐसा नम्रतापूर्वक समझ लेनेमें कि उनको पराशक्तिसे ही स्फूर्ति मिलती है, उनका कल्याण है । सप्तशतीमें इस बातकी ओर सङ्केत है कि असुरगण देवीके हाथों मारे तो जाते ह, परतु इस प्रक्रियासे पवित्र होकर उनको देवलोककी प्राप्ति होती है । यह तो स्पष्ट ही है कि ऐतिहासिक दृष्टिमे देव और असुर कोई भी रहे हों, परन्तु ऐसे दार्शनिक प्रसङ्गोंमें ये दोनो शब्द परार्थमूलक और स्वार्थमूलक प्रवृत्तियो और वासनाओं- के लिये प्रयुक्त होते हे । परार्थमूलक प्रवृत्तियाँ अच्छी है परंतु उनके ऊपर बुद्धिका अङ्कुश रहना चाहिये । अन्यथा भलाईके स्थानमें ससारका अहित हो सकता है। इसीलिये देवोंको 'दाम्यत' का उपदेश दिया गया । अपने स्वार्थकी सिद्धिमें कभी-कभी सैकड़ों और हजारों व्यक्तियोको घोर हानि पहुँचायी जाती है । उतने दामोंमें जो सुख मिलता है, उसका न मिलना ही अच्छा है । और फिर विषय सुख तो उस कडुवी वस्तुके समान होते हैं, जिसके ऊपर धोखा देनेके लिये चीनी लगी होती है । मुँहपर रखते ही मीठा स्वाद कडुवेपनमें बदल जाता हे, इसीलिये असुरोके प्रति 'दयध्वम्' कहा गया है । प्रवृत्त होनेके पहले यह सोच लें कि तुम्हारे द्वारा कर्त्ता तथा दूसरोंका कितना बड़ा अनिष्ट होगा । मनुष्यके लिये तो 'दत्त' से अच्छा उपदेश हो ही क्या सकता हे । तुम्हारा जो कुछ है, सब लोक मग्रहमे—परार्थ-सेवनमें अर्पित कर दो। देव-विजेता असुर देवीके हाथसे मारे जाकर देवलोकको प्राप्त हुए । इसका तात्पर्य यह हे कि जो प्रवृत्तियाँ मनुष्यको नीचे गिराती हे, यदि उनका दमन किया जाय तो वही पवित्र होकर मनुष्यको पावन बनानेमें सहायता देती हे । कामवासना स्वतः बुरी चीज हो सस्ती ह परतु उन्नमित काम कविक्री लेखनीमे चमत्कार ला देता हे और मीरा जैसे भक्त और गिरधरनागरके बीचमें सम्बन्धसूत्र बनता हे । इसीलिये शृङ्गार- को 'ब्रह्मानन्दसहोदर कहा जाता है। इसी बातको सामने रखकर बार-बार यह उपदेश दिया जाता है कि 'यज्ञभावसे कर्म करना चाहिये ।' यज्ञमे बलिमुखे देवता अवतरित होती है और बलिकर्मके वाद उनकी शक्ति यजमानमे प्रवेश कर जाती है । लोकसग्रह भावसे, ईशावास्य उपनिषद्‌के शब्दोंमें ईशसे आच्छादित करके कर्म करनेमे, अपनी दुष्प्रवृत्तियोंका सहार हो जाता है ओर जो शक्ति उनको तृप्त करनेमे लगती थी, वह जीवको ऊपर उठानेमें लग जाती है। जो अन्तःकरण इन्द्रियोके पीछे बहिर्मुख दौड़ता था, वही अन्तर्मुख होकर आत्मसाक्षात्कारका साधन बन जाता हे । उपनिषदोने कर्तव्योंकी सूची देनेका प्रयत्न नही किया है, फिर भी उन्होंने उन एक दो बातोपर बारबार जोर दिया है, जिनको हम सदाचारका मूल या प्रधान अङ्ग कह सकते ह । 'सत्य और 'ब्रह्मचर्य' की प्रशसामें सैकड़ों वाक्य मिलते हैं। छान्दोग्य उपनिषद्‌के शब्दोंमे 'यद यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्य- मेव तत्' जिसको यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्‌मे ऋषि सत्यकी इस प्रकार महिमा गाता है— सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ (३ । १ । ५-६)

  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३५ 'इस शुद्ध ज्योतिर्मय आत्माको, जिसको क्षीणदोष यति- लोग अपने भीतर देखते हैं, सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं । वह देवयान-मार्ग, जिससे आप्तकाम ऋषिगण सत्यके उस परम निधानपर पहुँचते हैं, सत्यके द्वारा ही खुलता है।' बार-बार यह कहा गया है—'सत्यप्रिया हि देवा.' देवोंको सत्य ही प्रिय है। किसी भी कर्मकी सिद्धि इस बात- पर निर्भर करती है कि उसके करनेमें कितनी सचाईसे काम लिया जाता है। सचाईके अभावमें अच्छा-से-अच्छा काम तामस-कर्म हो जाता है। इसीलिये ऋषियोंका आदेश था कि यज्ञात्मक कामोंके आरम्भमें यह सङ्कल्प किया जाय । 'इदमहममृतात्सत्यमुपैमि' 'यह मै झूठको छोड़कर सत्यको ग्रहण करता हूँ।' इस प्रकारके वाक्योंके अर्थपर मनन करनेसे यह बात समझमें आ जाती है कि भारतीय दर्शनमें कर्मका क्या स्थान है और किस प्रकारके आचरणको सदाचरण कहा जा सकता है, परतु अभीतक मैने स्पष्ट-रूपसे यह नहीं बतलाया कि भारतीय विचारधाराके अनुसार सत्कर्मकी कसौटी क्या हो सकती है । वह कौन-सा लक्षण होना चाहिये, जिसके अभावमें किसी कर्म-विशेषको सत्कर्म नही कहा जा सकता । अज्ञानके कारण आत्मा अपने स्वरूपको भुलाकर जीव बन रहा है। जिस प्रकार पानीमें गिरे हुए व्यक्तिको किनारेपर पहुँचनेके लिये पानीका उपयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार अज्ञानसे छुटकारा पानेके लिये इस अज्ञानमूलक जगत्‌से काम लेना पड़ता है। कर्मसे तो नितान्त छुटकारा नहीं मिल सकता, परतु इस प्रकार कर्म करना श्रेयस्कर होगा कि अज्ञानका बन्धन क्षीण हो । जबतक अज्ञान है, तबतक नानात्वकी प्रतीति होती रहेगी । उपनिषद् पुकार-पुकारकर कहते हैं— 'नेह नानास्ति किञ्चन, द्वितीयाद्वै भय भवति' 'यहाँ जरा भी नानात्व नहीं है। द्वैतसे निश्चय ही भय होता है।' परतु केवल वाक्योंकी आवृत्ति करने या तर्क करनेसे अखण्ड एकरस अद्वय ब्रह्म सत्ताकी अनुभूति नहीं हो सकती। उसके लिये चित्तका समाहित होना अनिवार्यतया आवश्यक है । परतु योही देरतक पद्मादि आसन लगाकर बैठ जाने और प्राणायाम- मुद्रा आदिका अभ्यास करनेसे ही समाधिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । उसके लिये तो जाग्रत् अवस्थामें भी प्रयत्नशील रहना चाहिये । दूसरे प्राणियोंसे अभेद स्थापित करना ही इस दिशामें यथार्थ प्रयत्न है। जिस हदतक कोई मनुष्य दूसरेके दुःख-सुखको अपना दुःख-सुख बना सकता है—उसके साथ सह-अनुभूति प्राप्त कर सकता है, उस हदतक वह अज्ञानकी निवृत्तिके पथपर अग्रसर होता है । माताको अपनी सन्तानके साथ और दम्पतिको एक दूसरेके साथ भी ऐसी सह-अनुभूति, ऐसी अभेद-भावना हो सकती है, परतु इस अभेद-भावनाके साथ एक प्रबल भेद-भावना भी लगी रहती है। जितना ही एकके साथ अभेद होता है, उतना ही दूसरोंके साथ भेद होता है। इसलिये इस भावनासे प्रेरित होकर जो कर्म किये जाते हैं, वे अज्ञानको दूर करनेमे सहायक नहीं हो सकते । परंतु जिस समय कोई व्यक्ति किसी डूबतेको या आगमें जलते हुएको बचानेके लिये कूद पड़ता है, उस समय उसको उसके साथ तादात्म्यका अनुभव तो होता है, परतु किसी औरके साथ भेदका अनुभव नहीं होता । उस क्षणमें उसके लिये भेदका अभाव हो जाता है और उसको उस आनन्द- की झलक मिलती है, जिसको योगी समाधिकी अवस्थामें प्राप्त करता है, समाधिका अभ्यास ऐसे कामोंकी ओर प्रवृत्ति होने- की प्रेरणा देता है और ऐसे कामोंमें लगना समाधिके लिये अधिकार प्रदान करता है। इसका फलितार्थ यह निकला कि जो काम अभेद भावनाकी ओर ले जाता है, वह सत्कर्म है, कर्तव्य है, करणीय है। जो काम भेद-भावनापर अवलम्बित है और भेद भावनाको पुष्ट करता है, वह अकरणीय है, दुष्कर्म है। पाश्चात्त्य विद्वानोंने सत्कर्मके जितने भी लक्षण बताये हैं, वे सब इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। वेदको प्रमाण माननेवाले भारतीय दर्शनशास्त्रोंने उपनिषदोंको ही अपना आधार माना है। इसीलिये मैने यह दिखलानेका प्रयत्न किया है कि यद्यपि भारतीय दर्शनमें कर्मको ज्ञानकी अपेक्षा गौण स्थान ही दिया जा सकता है, परतु उपनिषदोंमें वे सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे दिये हुए हैं, जिनके आधारपर कोई भी विचारशील मनुष्य अपने लिये कर्तव्यका निश्चय कर सकता है। इस पथपर चलनेवाला अपने लिये तो निःश्रेयसका द्वार खोल ही लेगा, उसके तपःपूत व्यक्तित्वके प्रकाशमें मानव-समाज भी अभ्युदयके पथपर आरूढ़ हो सकेगा।

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उपनिषद्की दिव्य शिक्षा (लेखक—आचार्य श्रीअन्नदाकुमार वन्द्योपाध्याय, एम० ए०) मानव-चेतना स्वभावतः इन्द्रिय और मनके अनुगत होकर विश्व जगत्से परिचय प्राप्त करनेके लिये प्रवृत्त करती है। इससे मानव-चेतनाके क्रमशः विकासशील ज्ञानके सामने यह विश्व-जगत् देशकालाधीन शब्द-स्पर्श रूप-रस-गन्ध विशिष्ट नित्य परिवर्तनशील असंख्य खण्ड पदार्थोंके समष्टिरूपमें ही प्रतीत होता है। किंतु मानव-चेतनाकी अन्त'प्रवृत्तिमे, जाने क्या एक प्रेरणा है, जिसके कारण विश्व-जगत्के इस बाहरी परिचयमे वह तृप्त नहीं हो सकती। इन्द्रियसम्मूह और मन इस जगत्का जो परिचय मानव-चैतन्यके सामने उपस्थित करते हैं, वह मानो उसका सच्चा परिचय नहीं है, उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान नहीं है—इस प्रकारकी एक अनुभूति मानव-चेतनाको सदा-सर्वदा इस जगत्का और भी निगूढ, निगूढतर और निगूढतम ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उद्दीप्त करती रहती है। जगत्के इस वाह्य खण्ड-परिचयपर निर्भर करके मनुष्य कर्म और भोगमें प्रवृत्त होता है। पर इस प्रकारके कर्म और भोगसे उसे शान्ति नहीं मिलती। इसमें उसकी अबाध स्वाधीनताकी अनुभूति नहीं है, पूर्णताका आस्वादन नहीं है। इस प्रकारके ज्ञान, कर्म और भोगमे वह अपनेको पूर्णरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाता उसकी चेतनामें सभी अवस्थाओमे अभावबोध, दुखबोध और अशान्तिक्री ज्वाला बनी रहती है। इस अभाव, दुख और अशान्तिको दूर करनेके लिये वह उच्चतर ज्ञानभूमि, कर्मभूमि और भोगभूमिका अनुसन्धान करता है, विश्व-जगत्के साथ निविडतर परिचयके लिये आग्रह- शील होता है। इन्द्रिय और मनका अनुवर्त्तन करके मानव-चैतन्य जितना ही अग्रसर होता है, उतना ही उसे अनुभव होता है कि इस मार्गमें ज्ञानकी, कर्मकी और आनन्दकी पूर्णता नहीं है। परतु इसी प्रवर्त्तके द्वारा चेतनाका क्रम विकास होता रहता है। मानव-चेतना जब पूर्णरूपसे विकसित हो जाती है, सम्यक्रूप- से जाग्रत् और प्रबुद्ध हो जाती है, तत्र वह अपने ज्ञान, कर्म और भोगको इन्द्रिय और मनकी अधीनतासे मुक्त करनेके लिये प्रयास करती है, अपने स्वरूपभूत चिन्-ज्योतिके प्रकाशसे इस विश्व-जगत्के यथार्थ स्वरूपका साक्षात् परिचय प्राप्त करने- में अपनेको सन्नग्न कर देती है। इन्द्रिय-मनोनिरपेक्ष सम्यक् प्रकारसे सम्बुद्ध मानव चेतनाके अपरोक्ष ज्ञानमें विश्व-जगत्का जो स्वरूप प्रत्यक्ष होता है, वही इस विश्व-जगत्‌का पारमार्थिक स्वरूप है। ऐसा उसे अनुभव होता है। इस ज्ञानमें मानव- चेतना और विश्व-जगत्‌के सारे भेद, व्यवधान और विसंवाद मिट जाते हैं। मानव-चेतनाकी अपूर्णताकी अनुभूति भी मिट जाती है, अपने साथ जगत्‌की एकात्मताका अनुभव करके वह अपने खण्ड, अपूर्ण और निरानन्दभावसे मुक्त हो जाती है एव कर्ममे स्वाधीन तथा सम्भोगमे आनन्दमग्न बन जाती है। यह जो इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त सम्यक् प्रबुद्ध मानव-चेतना है उसीका नाम 'ऋषिचेतना है। इस ऋषि- चेतनाके द्वारा विश्व-जगत्‌के अन्तर्निहित तत्त्वके सम्बन्धमें जो अपरोक्ष अनुभूति होती है उसीका नाम उपनिषद्-ज्ञान है। ऋषि चेतनामे जो सत्य प्रकाशित होता है, वही सम्पूर्ण जीव और जगत्‌का मूल-तत्त्व और यथार्थ स्वरूप है। वह ऋषिचेतना समस्त जीवों (चेतन)का और जडका अबाध मिलनक्षेत्र है। उस ऋषिचेतनाकी प्राप्ति होनेपर मनुष्यके ज्ञानकी, स्वाधीनता- की, आनन्दकी और कल्याणकी पूर्णता हो जाती है। मनुष्य- की चेतना उस समय देश-कालकी सीमाका अतिक्रमण कर, कार्य- कारण शृङ्खलाके बन्धनसे छूटकर राग-द्वेष भव-भावनासे ऊपर उठकर, सब प्रकारके आवरण और विक्षेपसे मुक्ति पाकर विश्व-जगत्‌के यथार्थ स्वरूपको देखती है और अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रतिष्ठित होती है। ऋषिगण जब इस अनुभूति- की बातें बताते हैं, उस समय इन्द्रिय मनकी शृङ्खलामे बँधे हुए ज्ञानपिपासु व्यक्ति बड़े आश्चर्यमे उन्हें सुनते हैं, परंतु वे सम्यक्रूपसे उनकी धारणा नहीं कर सकते। इन बातोंको वे अस्पष्ट भावसे जानके आदशंरूपमे अनुभव करते हैं और इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे छूटनेकी साधना करते हैं। प्राचीन भारतमें जिन असाधारण महामानव पुरुषोंने ऋषिचेतना प्राप्त करके अतीन्द्रिय और अतिमानस ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जीव-जगत्‌के पारमार्थिक स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा था जिनकी सम्यक्-सम्बुद्ध चेतनाके सामने परम सत्यने अनावृत और अविकृत रूपसे अपने स्वरूपको प्रकट कर दिया था, उनकी दिव्य वाणियाँ ही सकलित और सग्रथित होकर उपनिषद्-ग्रन्थके रूपमें मानव-समाजमे प्रचारित है। गुरु-शिष्य- परम्पराके क्रमसे उन वाणियोंका तत्त्व-ज्ञानके पिपासु साधक-

  • उपनिषद्की दिव्य शिक्षा * ३७ सम्प्रदायमें प्रसार हुआ है। इन्हीं सब वाणियोंका आश्रय लेकर ज्ञान-पिपासु, आनन्द-पिपासु और मुक्ति-पिपासु अगणित साधकोंने अपनी स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, कर्मशक्ति और चित्तवृत्तियोंका भलीभाँति नियन्त्रण करके अपनी चेतनाको इन्द्रिय मनकी अधीनतासे मुक्त किया है। और उस मुक्त चेतनाके द्वारा उन सब दिव्य वाणियोंके अनुसार अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करके वे कृतकृत्य हुए हैं। उन साधकोंके जीवनकी कृतार्थताको देखकर समाजके सभी श्रेणीके नर- नारियोंको उन वाणियोंकी सत्यताके सम्बन्धमे सदेहरहित दृढ़ विश्वास हो गया। दार्शनिक आचायोंने इन्द्रिय-मनकी अधीनता-शृङ्खलामें बँधे हुए प्रत्यक्षादि सब प्रकारके लौकिक प्रमाणों और तदनुगत सम्मत युक्ति तर्कोंको परम तत्त्वके प्रकाशनमें असमर्थ पाकर, जीव जगत्‌को पारमार्थिक परिचय प्रदान करने- के लिये उपनिषद्‌-वाणीको ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना, और इन्हीं सब वाणियोंका तात्पर्य ढूँढ निकालनेमें उन्होंने प्रधानतया अपनी मनीषा और विचारशक्तिका बड़ी निपुणताके साथ प्रयोग किया। सम्बुद्ध चेतन तत्त्वदर्शी ऋषियोंकी अपरोक्षानुभूति- से उत्पन्न दिव्य वाणियोंको श्रद्धापूर्वक सुनकर ही जीव-जगत्- के यथार्थ स्वरूपका सच्चा ज्ञान प्राप्त करनेके लिये मनुष्यकी स्वाभाविक ज्ञानशक्तिको नियोजित करना पड़ेगा—इसी हेतुसे इसको 'श्रुतिप्रमाण' कहा जाता है। भारतके सर्वश्रेष्ठ मनीषियोंके द्वारा रचित और प्रचारित जितने भी स्मृति, पुराण, दर्शन, तन्त्र और महाकाव्य आदि हैं, सभी इस 'श्रुति'के द्वारा ही अनुप्राणित हैं और वे समाजके सभी स्तरोंम उस 'श्रुति' की भावधाराको ही वहन कर रहे हैं। कहना नहीं होगा कि इस प्रकार ऋषिचेतनाकी प्राप्ति और अतीन्द्रिय एवं अतिमानस सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार केवल प्राचीन भारतके ही कुछ अनन्यसाधारण महापुरुषोंको हुआ था, ऐसी बात नहीं है। सभी युगों और सभी देशोंमें सभी प्रकारकी पारिपार्श्विक अवस्था मे अनन्य सत्यपिपासु पुरुषोंके द्वारा सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार सम्भव है। भारत- में युग-युगान्तरसे ऐसे असंख्य ऋषियोंका आविर्भाव होता रहा है। उन सभीने अपनी-अपनी सत्यानुभूतिके द्वारा उपनिषद्- वाणियोंकी यथार्थताका समर्थन किया है और उसे विभिन्न भावोंसे विभिन्न भाषामें मानव-समाजमें प्रचारित किया है। सभी देशोंके अपरोक्षानुभूति सम्पन्न महापुरुषोंने ऐसा ही किया है। भारतीय संस्कृतिकी यह विशेषता है कि इस विशाल देशकी बहुमुखी साधना और सभ्यता उस ऋषिचेतना लब्ध तत्त्वानु- भूतिके ऊपर प्रतिष्ठित है। भारतका साहित्य और शिल्प, विज्ञान और दर्शन, कुल-धर्म, जाति-धर्म और समाज-धर्म, राष्ट्र-नीति, अर्थ-नीति, स्वास्थ्य नीति और व्यवहार-नीति- इन सभीका निर्माण और प्रसार उपनिषद्-ज्ञानको मानव- जीवनके परम आदर्शरूपमें मानकर ही हुआ है। उपनिषद् ही भारतीय संस्कृतिके प्राणस्वरूप है। इसीसे भारतीय संस्कृतिको 'आर्य-संस्कृति' कहा जाता है। समस्त वेदोंका अर्थात् समस्त ज्ञानका जो चरम सत्य है, वही उपनिषदोंमें समुज्ज्वल रूपमे प्रकट है, इसीसे उपनिषद्का प्रसिद्ध नाम वेदान्त (वेद या ज्ञानका अन्त अथवा शिरोभाग) है, एव वेदान्त ही सब प्रकारकी भारतीय साधनाओकी भित्ति है। इसीसे जगत्‌में भारतीय वेदान्ती-जातिके नामसे विख्यात हैं। राग द्वेषशून्य, हिंसा-घृणा-भय विरहित, देहेन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त, जात्यभिमान-सम्प्रदायाभिमान प्रभृति सङ्कीर्णताओंसे अतीत, शुद्धहृदय, शुद्धबुद्धि, समाहितचित्त ऋषियोंकी भ्रम प्रमादादिशून्य दिव्य सत्यानुभूतिको केन्द्र बनाकर ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता युग-युगान्तरोंमें निर्मित हुई है। यही भारतीय संस्कृति और सभ्यताका प्रधान गौरव है। सहस्रों वर्षोंसे लगातार यह औपनिषद ज्ञान भारतीय साधनाक्षेत्रमे समस्त नर नारियोंके अशेष विचित्रता- मय जीवनमें सब प्रकारके जागतिक ज्ञान, लौकिक कर्म और हृदयगत भावप्रवाहको आश्चर्यजनक रूपसे अनुप्राणित करता आ रहा है। सभीपर इसका अक्षुण्ण शासन है। यहाँतक कि, इस देशके राग द्वेषादियुक्त देहेन्द्रिय मन बुद्धि-हृदयपर भी औपनिषद आदर्शका असीम प्रभाव है। भारतीय जीवनके सभी विभागोंमे उपनिषद् चिरञ्जीवी है। जान या अनजानमें प्रत्येक नर-नारीके जीवनपर इसका अचिन्त्य प्रभाव है। भारतका सम्पूर्ण वातावरण ही उपनिषदके ज्ञानादर्शके द्वारा सजीवित है। सभी युगोंकी सम्यक् प्रबुद्ध ऋषि-चेतनामें विश्व-जगत्‌का यथार्थ स्वरूप प्रतिभात होता है और इन कतिपय उपनिषद्- ग्रन्थोंम वाणीरूपमे वही स्वरूप प्रकट हुआ है, इस सम्बन्धमें किञ्चित् आभास इस लेखके द्वारा मिल सकता है। प्रथमतः हमारे इन्द्रिय मनके द्वारा उपलब्ध ज्ञानने इस विश्व-जगत्‌को अनन्त विषमताओंसे पूर्ण देख पाया है। उसने समझा है कि विभिन्न स्वभावयुक्त असंख्य पदार्थोंके सङ्घर्ष और समन्वयसे ही इस जगत्‌का संगठन हुआ है; इसमें