कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३३ समस्त जगत् उसकी अभिव्यक्ति है । ऐसी अवस्था में एक दुराचारको दूर करनेका, सतत अभ्यास करना होगा । अपनी वस्तुको पसंद करने और दूसरीको नापसद करनेका प्रश्न ही शारीरिक और बौद्धिक विभूतियोंको इस प्रयासमें लगाना ही नहीं उठ सकता । इसलिये जो कुछ यदृच्छया प्राप्त हो जाय, त्याग है। इस वल्लीका एक और मन्त्र कहता है— उसका त्यागके द्वारा असङ्ग भावसे उपभोग करना चाहिये । नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । त्याग सक्रिय भाव है । हम उसकी व्याख्या आगे चलकर नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ करेंगे । अन्तमें मन्त्र यह कहता है कि किसीके अर्थात् दूसरोंके (कठ० १।२।२४) धनकी लालच मत करो । यह सुननेमें बड़ी स्थूल सी बात प्रतीत 'जो दुश्चरितसे विरत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ होती है, परंतु इसका वास्तविक आशय यह है कि मनुष्यको वशमें नहीं हैं, जिसका चित्त समाधिमे स्थिर नहीं है, उसको चाहिये कि विषयोंकी, जो दूसरों अर्थात् इन्द्रियोंके धन हैं, इस सत् पदार्थका ज्ञान नहीं हो सकता।' केनोपनिषद्में कर्मको कामना न करे। यदि ध्यानसे देखा जाय तो सारी भगवद्गीता विद्याके आधारों—वर्तनोंमें परिगणित किया है । इन दोनों मन्त्रोंकी व्याख्यामात्र है । तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्य- कठोपनिषद्की दूसरी वल्लीने परम पुरुषार्थ और सदाचारके मायतनम् । (केन० खण्ड ४ मन्त्र ८) सम्बन्धमें एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही है। जिसके बारेमे भारतीय आचार्यों ने कर्मका क्षेत्र कभी भी मनुष्यतक पाश्चात्य विद्वानोंको भी बराबर विचार करते रहना पड़ता है । सीमित नहीं किया । इस जगत्में ब्रह्मदेवसे लेकर कीटाणुतक् अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । जितने भी प्राणी हैं, उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ हमारे ऊपर ऋण है, उन सबके ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोगसे (कठ० १।२।१) ही हमारा कल्याण हो रहा है। अतः उन सबके प्रति हमारा श्रेय प्रेयसे भिन्न है । इन दोनोंके अर्थ अर्थात् विषय कुछ-न-कुछ कर्तव्य है । न तो हम उन सबको पहचानते हैं, भिन्न हैं और ये मानो जीवको अलग-अलग प्रकारसे बाँधते जो निरन्तर हमारा उपकार कर रहे हैं और न उन सबकी हैं। जो श्रेयको चुनता है, उसका कल्याण होता है, परंतु जो किसी प्रकारकी सेवा ही कर सकते हैं, परंतु इस बातका प्रेयको चुनता है, वह पुरुषार्थसे दूर हो जाता है । इसके आगे अनुभव भी हमारे चरित्रको उठाता है कि हम पदे-पदे दूसरों- चलकर कहा गया है— के ऋणी हैं। 'तमक्रतुः पश्यति वीतशोको बृहदारण्यक-उपनिषद्के पहले अध्यायके चौथे ब्राह्मणका धातुप्रसादान्महिमानमात्मन ।' सोलहवाँ मन्त्र कहता है— (कठ० १।२।२०) अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति जो व्यक्ति फलकी कामनाको छोड़कर कर्म करता है, यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ जो शोकका अतिक्रमण कर गया है, वह धातुके प्रसादसे यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ आत्माकी महिमाका अनुभव करता है। यहाँ 'धातु'का तात्पर्य यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ अन्तःकरण और उसके उपकरणों अर्थात् इन्द्रियोंसे है । यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा अन्तःकरणके प्रसादकी प्राप्तिका उपाय पातञ्जलयोग-दर्शनमें वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषा लोको यथा ह वै इस प्रकार बताया गया है— स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवं हवैविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टि- 'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयेषु मिच्छन्ति । भावनातश्चित्तप्रसादनम्।' 'कर्ममें लगा हुआ यह आत्मा सब प्राणियोंका लोक चित्तका प्रसाद प्राप्त करनेके लिये सुखके प्रति मैत्रीका अर्थात् आश्रय है। अपने यज्ञ और पूजनसे वह देवोंका लोक अर्थात् ससारमें सुखकी मात्राको बढानेका, दुःखके प्रति होता है । अपने अध्ययन और अनुशिक्षणसे ऋषियोंका, करुणाका, अर्थात् ससारमें दुःखकी मात्रा घटानेका, पुण्यके पितरोंके लिये बलि देने और सन्तान छोड़ जानेकी इच्छा प्रति मुदिताका अर्थात् ससारमें पुण्यकी मात्रा बढानेका और करनेसे पितरोंका, मनुष्योंको भोजनादि देनेसे मनुष्योंका, अपुण्यके प्रति उपेक्षाका, अर्थात् दुराचारीसे द्वेष न करते हुए उ० अ० ५—