कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ :: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति तृणोदक देनेसे पशुओंका तथा उन कुत्तों, चिड़ियों और चाटी आदि छोटे प्राणियोंका लोक हो जाता है, जो उसके घरमें रहते है और उसके सहारे जीते है । जिस प्रकार सब लोग अपने शरीरका भला चाहते हैं, इसी प्रकार सब प्राणी उसका भला चाहते हैं, जिसका ज्ञान और कर्म इस प्रकारका होता है।' जो मनुष्य जगत्में जलसे अलिप्त कमलके पत्तेके समान रहना चाहता है, उसके लिये पाँचवें अध्यायके दूसरे ब्राह्मणमे दी हुई कथा रोचक होनेके साथ ही बहुत ही उपदेशपूर्ण भी है। एक बार प्रजापतिके तीनो प्रकारके पुत्र अर्थात् देव, असुर और मनुष्य उनकी सेवामे उपस्थित हुए । उनकी दीर्घकालीन अर्च्चासे प्रजापति प्रसन्न हुए । उपासकोंको आकाशमे गम्भीर नादके रूपमे 'द' अक्षर सुन पड़ा । 'द' का अर्थ देवोके लिये दाम्यत 'दमन करो', मनुष्यके लिये दत्त 'दो' और असुरोके लिये दयध्वम् 'दया करो या। देव और असुर सौतेले भाई दोनो ही प्रजापतिकी सन्तान है, बलवान् हैं, तप कर सकते हैं अर्थात् विक्षेपको छोडकर किसी एक काममे अपनी सारी शक्ति लगा सकते हैं और जिस काममे लग जाते हैं, उसमें प्राय सफलता प्राप्त करके ही छोड़ते हे । दोनोंमें बराबर सघर्ष होता रहता है । बहुधा ऐसा भी होता है कि असुरगण देवगणको जीत लेते हैं । परन्तु पराशक्ति फिर देवो- को विजय प्रदान करती है। कभी कभी देवोंको ऐसी विजय- पर गर्व भी हो जाता है, परतु जैसा कि केनोपनिषद्का 'यक्षोपाख्यान' दिखलाता है, यह अभिमान नीचे गिरानेवाला है । ऐसा नम्रतापूर्वक समझ लेनेमें कि उनको पराशक्तिसे ही स्फूर्ति मिलती है, उनका कल्याण है । सप्तशतीमें इस बातकी ओर सङ्केत है कि असुरगण देवीके हाथों मारे तो जाते ह, परतु इस प्रक्रियासे पवित्र होकर उनको देवलोककी प्राप्ति होती है । यह तो स्पष्ट ही है कि ऐतिहासिक दृष्टिमे देव और असुर कोई भी रहे हों, परन्तु ऐसे दार्शनिक प्रसङ्गोंमें ये दोनो शब्द परार्थमूलक और स्वार्थमूलक प्रवृत्तियो और वासनाओं- के लिये प्रयुक्त होते हे । परार्थमूलक प्रवृत्तियाँ अच्छी है परंतु उनके ऊपर बुद्धिका अङ्कुश रहना चाहिये । अन्यथा भलाईके स्थानमें ससारका अहित हो सकता है। इसीलिये देवोंको 'दाम्यत' का उपदेश दिया गया । अपने स्वार्थकी सिद्धिमें कभी-कभी सैकड़ों और हजारों व्यक्तियोको घोर हानि पहुँचायी जाती है । उतने दामोंमें जो सुख मिलता है, उसका न मिलना ही अच्छा है । और फिर विषय सुख तो उस कडुवी वस्तुके समान होते हैं, जिसके ऊपर धोखा देनेके लिये चीनी लगी होती है । मुँहपर रखते ही मीठा स्वाद कडुवेपनमें बदल जाता हे, इसीलिये असुरोके प्रति 'दयध्वम्' कहा गया है । प्रवृत्त होनेके पहले यह सोच लें कि तुम्हारे द्वारा कर्त्ता तथा दूसरोंका कितना बड़ा अनिष्ट होगा । मनुष्यके लिये तो 'दत्त' से अच्छा उपदेश हो ही क्या सकता हे । तुम्हारा जो कुछ है, सब लोक मग्रहमे—परार्थ-सेवनमें अर्पित कर दो। देव-विजेता असुर देवीके हाथसे मारे जाकर देवलोकको प्राप्त हुए । इसका तात्पर्य यह हे कि जो प्रवृत्तियाँ मनुष्यको नीचे गिराती हे, यदि उनका दमन किया जाय तो वही पवित्र होकर मनुष्यको पावन बनानेमें सहायता देती हे । कामवासना स्वतः बुरी चीज हो सस्ती ह परतु उन्नमित काम कविक्री लेखनीमे चमत्कार ला देता हे और मीरा जैसे भक्त और गिरधरनागरके बीचमें सम्बन्धसूत्र बनता हे । इसीलिये शृङ्गार- को 'ब्रह्मानन्दसहोदर कहा जाता है। इसी बातको सामने रखकर बार-बार यह उपदेश दिया जाता है कि 'यज्ञभावसे कर्म करना चाहिये ।' यज्ञमे बलिमुखे देवता अवतरित होती है और बलिकर्मके वाद उनकी शक्ति यजमानमे प्रवेश कर जाती है । लोकसग्रह भावसे, ईशावास्य उपनिषद्के शब्दोंमें ईशसे आच्छादित करके कर्म करनेमे, अपनी दुष्प्रवृत्तियोंका सहार हो जाता है ओर जो शक्ति उनको तृप्त करनेमे लगती थी, वह जीवको ऊपर उठानेमें लग जाती है। जो अन्तःकरण इन्द्रियोके पीछे बहिर्मुख दौड़ता था, वही अन्तर्मुख होकर आत्मसाक्षात्कारका साधन बन जाता हे । उपनिषदोने कर्तव्योंकी सूची देनेका प्रयत्न नही किया है, फिर भी उन्होंने उन एक दो बातोपर बारबार जोर दिया है, जिनको हम सदाचारका मूल या प्रधान अङ्ग कह सकते ह । 'सत्य और 'ब्रह्मचर्य' की प्रशसामें सैकड़ों वाक्य मिलते हैं। छान्दोग्य उपनिषद्के शब्दोंमे 'यद यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्य- मेव तत्' जिसको यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्मे ऋषि सत्यकी इस प्रकार महिमा गाता है— सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ (३ । १ । ५-६)