भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 832 में से

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पृष्ठ 49
  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३५ 'इस शुद्ध ज्योतिर्मय आत्माको, जिसको क्षीणदोष यति- लोग अपने भीतर देखते हैं, सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं । वह देवयान-मार्ग, जिससे आप्तकाम ऋषिगण सत्यके उस परम निधानपर पहुँचते हैं, सत्यके द्वारा ही खुलता है।' बार-बार यह कहा गया है—'सत्यप्रिया हि देवा.' देवोंको सत्य ही प्रिय है। किसी भी कर्मकी सिद्धि इस बात- पर निर्भर करती है कि उसके करनेमें कितनी सचाईसे काम लिया जाता है। सचाईके अभावमें अच्छा-से-अच्छा काम तामस-कर्म हो जाता है। इसीलिये ऋषियोंका आदेश था कि यज्ञात्मक कामोंके आरम्भमें यह सङ्कल्प किया जाय । 'इदमहममृतात्सत्यमुपैमि' 'यह मै झूठको छोड़कर सत्यको ग्रहण करता हूँ।' इस प्रकारके वाक्योंके अर्थपर मनन करनेसे यह बात समझमें आ जाती है कि भारतीय दर्शनमें कर्मका क्या स्थान है और किस प्रकारके आचरणको सदाचरण कहा जा सकता है, परतु अभीतक मैने स्पष्ट-रूपसे यह नहीं बतलाया कि भारतीय विचारधाराके अनुसार सत्कर्मकी कसौटी क्या हो सकती है । वह कौन-सा लक्षण होना चाहिये, जिसके अभावमें किसी कर्म-विशेषको सत्कर्म नही कहा जा सकता । अज्ञानके कारण आत्मा अपने स्वरूपको भुलाकर जीव बन रहा है। जिस प्रकार पानीमें गिरे हुए व्यक्तिको किनारेपर पहुँचनेके लिये पानीका उपयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार अज्ञानसे छुटकारा पानेके लिये इस अज्ञानमूलक जगत्‌से काम लेना पड़ता है। कर्मसे तो नितान्त छुटकारा नहीं मिल सकता, परतु इस प्रकार कर्म करना श्रेयस्कर होगा कि अज्ञानका बन्धन क्षीण हो । जबतक अज्ञान है, तबतक नानात्वकी प्रतीति होती रहेगी । उपनिषद् पुकार-पुकारकर कहते हैं— 'नेह नानास्ति किञ्चन, द्वितीयाद्वै भय भवति' 'यहाँ जरा भी नानात्व नहीं है। द्वैतसे निश्चय ही भय होता है।' परतु केवल वाक्योंकी आवृत्ति करने या तर्क करनेसे अखण्ड एकरस अद्वय ब्रह्म सत्ताकी अनुभूति नहीं हो सकती। उसके लिये चित्तका समाहित होना अनिवार्यतया आवश्यक है । परतु योही देरतक पद्मादि आसन लगाकर बैठ जाने और प्राणायाम- मुद्रा आदिका अभ्यास करनेसे ही समाधिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । उसके लिये तो जाग्रत् अवस्थामें भी प्रयत्नशील रहना चाहिये । दूसरे प्राणियोंसे अभेद स्थापित करना ही इस दिशामें यथार्थ प्रयत्न है। जिस हदतक कोई मनुष्य दूसरेके दुःख-सुखको अपना दुःख-सुख बना सकता है—उसके साथ सह-अनुभूति प्राप्त कर सकता है, उस हदतक वह अज्ञानकी निवृत्तिके पथपर अग्रसर होता है । माताको अपनी सन्तानके साथ और दम्पतिको एक दूसरेके साथ भी ऐसी सह-अनुभूति, ऐसी अभेद-भावना हो सकती है, परतु इस अभेद-भावनाके साथ एक प्रबल भेद-भावना भी लगी रहती है। जितना ही एकके साथ अभेद होता है, उतना ही दूसरोंके साथ भेद होता है। इसलिये इस भावनासे प्रेरित होकर जो कर्म किये जाते हैं, वे अज्ञानको दूर करनेमे सहायक नहीं हो सकते । परंतु जिस समय कोई व्यक्ति किसी डूबतेको या आगमें जलते हुएको बचानेके लिये कूद पड़ता है, उस समय उसको उसके साथ तादात्म्यका अनुभव तो होता है, परतु किसी औरके साथ भेदका अनुभव नहीं होता । उस क्षणमें उसके लिये भेदका अभाव हो जाता है और उसको उस आनन्द- की झलक मिलती है, जिसको योगी समाधिकी अवस्थामें प्राप्त करता है, समाधिका अभ्यास ऐसे कामोंकी ओर प्रवृत्ति होने- की प्रेरणा देता है और ऐसे कामोंमें लगना समाधिके लिये अधिकार प्रदान करता है। इसका फलितार्थ यह निकला कि जो काम अभेद भावनाकी ओर ले जाता है, वह सत्कर्म है, कर्तव्य है, करणीय है। जो काम भेद-भावनापर अवलम्बित है और भेद भावनाको पुष्ट करता है, वह अकरणीय है, दुष्कर्म है। पाश्चात्त्य विद्वानोंने सत्कर्मके जितने भी लक्षण बताये हैं, वे सब इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। वेदको प्रमाण माननेवाले भारतीय दर्शनशास्त्रोंने उपनिषदोंको ही अपना आधार माना है। इसीलिये मैने यह दिखलानेका प्रयत्न किया है कि यद्यपि भारतीय दर्शनमें कर्मको ज्ञानकी अपेक्षा गौण स्थान ही दिया जा सकता है, परतु उपनिषदोंमें वे सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे दिये हुए हैं, जिनके आधारपर कोई भी विचारशील मनुष्य अपने लिये कर्तव्यका निश्चय कर सकता है। इस पथपर चलनेवाला अपने लिये तो निःश्रेयसका द्वार खोल ही लेगा, उसके तपःपूत व्यक्तित्वके प्रकाशमें मानव-समाज भी अभ्युदयके पथपर आरूढ़ हो सकेगा।
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