भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

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उपनिषद्की दिव्य शिक्षा (लेखक—आचार्य श्रीअन्नदाकुमार वन्द्योपाध्याय, एम० ए०) मानव-चेतना स्वभावतः इन्द्रिय और मनके अनुगत होकर विश्व जगत्से परिचय प्राप्त करनेके लिये प्रवृत्त करती है। इससे मानव-चेतनाके क्रमशः विकासशील ज्ञानके सामने यह विश्व-जगत् देशकालाधीन शब्द-स्पर्श रूप-रस-गन्ध विशिष्ट नित्य परिवर्तनशील असंख्य खण्ड पदार्थोंके समष्टिरूपमें ही प्रतीत होता है। किंतु मानव-चेतनाकी अन्त'प्रवृत्तिमे, जाने क्या एक प्रेरणा है, जिसके कारण विश्व-जगत्के इस बाहरी परिचयमे वह तृप्त नहीं हो सकती। इन्द्रियसम्मूह और मन इस जगत्का जो परिचय मानव-चैतन्यके सामने उपस्थित करते हैं, वह मानो उसका सच्चा परिचय नहीं है, उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान नहीं है—इस प्रकारकी एक अनुभूति मानव-चेतनाको सदा-सर्वदा इस जगत्का और भी निगूढ, निगूढतर और निगूढतम ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उद्दीप्त करती रहती है। जगत्के इस वाह्य खण्ड-परिचयपर निर्भर करके मनुष्य कर्म और भोगमें प्रवृत्त होता है। पर इस प्रकारके कर्म और भोगसे उसे शान्ति नहीं मिलती। इसमें उसकी अबाध स्वाधीनताकी अनुभूति नहीं है, पूर्णताका आस्वादन नहीं है। इस प्रकारके ज्ञान, कर्म और भोगमे वह अपनेको पूर्णरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाता उसकी चेतनामें सभी अवस्थाओमे अभावबोध, दुखबोध और अशान्तिक्री ज्वाला बनी रहती है। इस अभाव, दुख और अशान्तिको दूर करनेके लिये वह उच्चतर ज्ञानभूमि, कर्मभूमि और भोगभूमिका अनुसन्धान करता है, विश्व-जगत्के साथ निविडतर परिचयके लिये आग्रह- शील होता है। इन्द्रिय और मनका अनुवर्त्तन करके मानव-चैतन्य जितना ही अग्रसर होता है, उतना ही उसे अनुभव होता है कि इस मार्गमें ज्ञानकी, कर्मकी और आनन्दकी पूर्णता नहीं है। परतु इसी प्रवर्त्तके द्वारा चेतनाका क्रम विकास होता रहता है। मानव-चेतना जब पूर्णरूपसे विकसित हो जाती है, सम्यक्रूप- से जाग्रत् और प्रबुद्ध हो जाती है, तत्र वह अपने ज्ञान, कर्म और भोगको इन्द्रिय और मनकी अधीनतासे मुक्त करनेके लिये प्रयास करती है, अपने स्वरूपभूत चिन्-ज्योतिके प्रकाशसे इस विश्व-जगत्के यथार्थ स्वरूपका साक्षात् परिचय प्राप्त करने- में अपनेको सन्नग्न कर देती है। इन्द्रिय-मनोनिरपेक्ष सम्यक् प्रकारसे सम्बुद्ध मानव चेतनाके अपरोक्ष ज्ञानमें विश्व-जगत्का जो स्वरूप प्रत्यक्ष होता है, वही इस विश्व-जगत्‌का पारमार्थिक स्वरूप है। ऐसा उसे अनुभव होता है। इस ज्ञानमें मानव- चेतना और विश्व-जगत्‌के सारे भेद, व्यवधान और विसंवाद मिट जाते हैं। मानव-चेतनाकी अपूर्णताकी अनुभूति भी मिट जाती है, अपने साथ जगत्‌की एकात्मताका अनुभव करके वह अपने खण्ड, अपूर्ण और निरानन्दभावसे मुक्त हो जाती है एव कर्ममे स्वाधीन तथा सम्भोगमे आनन्दमग्न बन जाती है। यह जो इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त सम्यक् प्रबुद्ध मानव-चेतना है उसीका नाम 'ऋषिचेतना है। इस ऋषि- चेतनाके द्वारा विश्व-जगत्‌के अन्तर्निहित तत्त्वके सम्बन्धमें जो अपरोक्ष अनुभूति होती है उसीका नाम उपनिषद्-ज्ञान है। ऋषि चेतनामे जो सत्य प्रकाशित होता है, वही सम्पूर्ण जीव और जगत्‌का मूल-तत्त्व और यथार्थ स्वरूप है। वह ऋषिचेतना समस्त जीवों (चेतन)का और जडका अबाध मिलनक्षेत्र है। उस ऋषिचेतनाकी प्राप्ति होनेपर मनुष्यके ज्ञानकी, स्वाधीनता- की, आनन्दकी और कल्याणकी पूर्णता हो जाती है। मनुष्य- की चेतना उस समय देश-कालकी सीमाका अतिक्रमण कर, कार्य- कारण शृङ्खलाके बन्धनसे छूटकर राग-द्वेष भव-भावनासे ऊपर उठकर, सब प्रकारके आवरण और विक्षेपसे मुक्ति पाकर विश्व-जगत्‌के यथार्थ स्वरूपको देखती है और अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रतिष्ठित होती है। ऋषिगण जब इस अनुभूति- की बातें बताते हैं, उस समय इन्द्रिय मनकी शृङ्खलामे बँधे हुए ज्ञानपिपासु व्यक्ति बड़े आश्चर्यमे उन्हें सुनते हैं, परंतु वे सम्यक्रूपसे उनकी धारणा नहीं कर सकते। इन बातोंको वे अस्पष्ट भावसे जानके आदशंरूपमे अनुभव करते हैं और इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे छूटनेकी साधना करते हैं। प्राचीन भारतमें जिन असाधारण महामानव पुरुषोंने ऋषिचेतना प्राप्त करके अतीन्द्रिय और अतिमानस ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जीव-जगत्‌के पारमार्थिक स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा था जिनकी सम्यक्-सम्बुद्ध चेतनाके सामने परम सत्यने अनावृत और अविकृत रूपसे अपने स्वरूपको प्रकट कर दिया था, उनकी दिव्य वाणियाँ ही सकलित और सग्रथित होकर उपनिषद्-ग्रन्थके रूपमें मानव-समाजमे प्रचारित है। गुरु-शिष्य- परम्पराके क्रमसे उन वाणियोंका तत्त्व-ज्ञानके पिपासु साधक-