भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 51
  • उपनिषद्की दिव्य शिक्षा * ३७ सम्प्रदायमें प्रसार हुआ है। इन्हीं सब वाणियोंका आश्रय लेकर ज्ञान-पिपासु, आनन्द-पिपासु और मुक्ति-पिपासु अगणित साधकोंने अपनी स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, कर्मशक्ति और चित्तवृत्तियोंका भलीभाँति नियन्त्रण करके अपनी चेतनाको इन्द्रिय मनकी अधीनतासे मुक्त किया है। और उस मुक्त चेतनाके द्वारा उन सब दिव्य वाणियोंके अनुसार अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करके वे कृतकृत्य हुए हैं। उन साधकोंके जीवनकी कृतार्थताको देखकर समाजके सभी श्रेणीके नर- नारियोंको उन वाणियोंकी सत्यताके सम्बन्धमे सदेहरहित दृढ़ विश्वास हो गया। दार्शनिक आचायोंने इन्द्रिय-मनकी अधीनता-शृङ्खलामें बँधे हुए प्रत्यक्षादि सब प्रकारके लौकिक प्रमाणों और तदनुगत सम्मत युक्ति तर्कोंको परम तत्त्वके प्रकाशनमें असमर्थ पाकर, जीव जगत्‌को पारमार्थिक परिचय प्रदान करने- के लिये उपनिषद्‌-वाणीको ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना, और इन्हीं सब वाणियोंका तात्पर्य ढूँढ निकालनेमें उन्होंने प्रधानतया अपनी मनीषा और विचारशक्तिका बड़ी निपुणताके साथ प्रयोग किया। सम्बुद्ध चेतन तत्त्वदर्शी ऋषियोंकी अपरोक्षानुभूति- से उत्पन्न दिव्य वाणियोंको श्रद्धापूर्वक सुनकर ही जीव-जगत्- के यथार्थ स्वरूपका सच्चा ज्ञान प्राप्त करनेके लिये मनुष्यकी स्वाभाविक ज्ञानशक्तिको नियोजित करना पड़ेगा—इसी हेतुसे इसको 'श्रुतिप्रमाण' कहा जाता है। भारतके सर्वश्रेष्ठ मनीषियोंके द्वारा रचित और प्रचारित जितने भी स्मृति, पुराण, दर्शन, तन्त्र और महाकाव्य आदि हैं, सभी इस 'श्रुति'के द्वारा ही अनुप्राणित हैं और वे समाजके सभी स्तरोंम उस 'श्रुति' की भावधाराको ही वहन कर रहे हैं। कहना नहीं होगा कि इस प्रकार ऋषिचेतनाकी प्राप्ति और अतीन्द्रिय एवं अतिमानस सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार केवल प्राचीन भारतके ही कुछ अनन्यसाधारण महापुरुषोंको हुआ था, ऐसी बात नहीं है। सभी युगों और सभी देशोंमें सभी प्रकारकी पारिपार्श्विक अवस्था मे अनन्य सत्यपिपासु पुरुषोंके द्वारा सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार सम्भव है। भारत- में युग-युगान्तरसे ऐसे असंख्य ऋषियोंका आविर्भाव होता रहा है। उन सभीने अपनी-अपनी सत्यानुभूतिके द्वारा उपनिषद्- वाणियोंकी यथार्थताका समर्थन किया है और उसे विभिन्न भावोंसे विभिन्न भाषामें मानव-समाजमें प्रचारित किया है। सभी देशोंके अपरोक्षानुभूति सम्पन्न महापुरुषोंने ऐसा ही किया है। भारतीय संस्कृतिकी यह विशेषता है कि इस विशाल देशकी बहुमुखी साधना और सभ्यता उस ऋषिचेतना लब्ध तत्त्वानु- भूतिके ऊपर प्रतिष्ठित है। भारतका साहित्य और शिल्प, विज्ञान और दर्शन, कुल-धर्म, जाति-धर्म और समाज-धर्म, राष्ट्र-नीति, अर्थ-नीति, स्वास्थ्य नीति और व्यवहार-नीति- इन सभीका निर्माण और प्रसार उपनिषद्-ज्ञानको मानव- जीवनके परम आदर्शरूपमें मानकर ही हुआ है। उपनिषद् ही भारतीय संस्कृतिके प्राणस्वरूप है। इसीसे भारतीय संस्कृतिको 'आर्य-संस्कृति' कहा जाता है। समस्त वेदोंका अर्थात् समस्त ज्ञानका जो चरम सत्य है, वही उपनिषदोंमें समुज्ज्वल रूपमे प्रकट है, इसीसे उपनिषद्का प्रसिद्ध नाम वेदान्त (वेद या ज्ञानका अन्त अथवा शिरोभाग) है, एव वेदान्त ही सब प्रकारकी भारतीय साधनाओकी भित्ति है। इसीसे जगत्‌में भारतीय वेदान्ती-जातिके नामसे विख्यात हैं। राग द्वेषशून्य, हिंसा-घृणा-भय विरहित, देहेन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त, जात्यभिमान-सम्प्रदायाभिमान प्रभृति सङ्कीर्णताओंसे अतीत, शुद्धहृदय, शुद्धबुद्धि, समाहितचित्त ऋषियोंकी भ्रम प्रमादादिशून्य दिव्य सत्यानुभूतिको केन्द्र बनाकर ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता युग-युगान्तरोंमें निर्मित हुई है। यही भारतीय संस्कृति और सभ्यताका प्रधान गौरव है। सहस्रों वर्षोंसे लगातार यह औपनिषद ज्ञान भारतीय साधनाक्षेत्रमे समस्त नर नारियोंके अशेष विचित्रता- मय जीवनमें सब प्रकारके जागतिक ज्ञान, लौकिक कर्म और हृदयगत भावप्रवाहको आश्चर्यजनक रूपसे अनुप्राणित करता आ रहा है। सभीपर इसका अक्षुण्ण शासन है। यहाँतक कि, इस देशके राग द्वेषादियुक्त देहेन्द्रिय मन बुद्धि-हृदयपर भी औपनिषद आदर्शका असीम प्रभाव है। भारतीय जीवनके सभी विभागोंमे उपनिषद् चिरञ्जीवी है। जान या अनजानमें प्रत्येक नर-नारीके जीवनपर इसका अचिन्त्य प्रभाव है। भारतका सम्पूर्ण वातावरण ही उपनिषदके ज्ञानादर्शके द्वारा सजीवित है। सभी युगोंकी सम्यक् प्रबुद्ध ऋषि-चेतनामें विश्व-जगत्‌का यथार्थ स्वरूप प्रतिभात होता है और इन कतिपय उपनिषद्- ग्रन्थोंम वाणीरूपमे वही स्वरूप प्रकट हुआ है, इस सम्बन्धमें किञ्चित् आभास इस लेखके द्वारा मिल सकता है। प्रथमतः हमारे इन्द्रिय मनके द्वारा उपलब्ध ज्ञानने इस विश्व-जगत्‌को अनन्त विषमताओंसे पूर्ण देख पाया है। उसने समझा है कि विभिन्न स्वभावयुक्त असंख्य पदार्थोंके सङ्घर्ष और समन्वयसे ही इस जगत्‌का संगठन हुआ है; इसमें