भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


[बायाँ स्तम्भ]

इतने भेद हैं, इतने द्वन्द्व हैं, इतने कार्यकारण-सम्बन्ध और इतनी नियम शृङ्खलाएँ हैं कि जिनका कहीं भी कोई अन्त नहीं मिलता, परंतु ऋषियोंकी अतीन्द्रिय और अतिमानस विशुद्ध चेतनाको दिखायी देता है कि यह विश्व-जगत् मूलतः या तत्त्वतः एक है, एक ही अखण्ड सत्ता विभिन्न सत्ताओंके रूपमें इन्द्रिय मनके सम्मुख प्रतीत होती है—इन्द्रिय-मनोगोचर जितने भी विभिन्न पदार्थ हैं, सब एक अद्वितीय नित्य सत्य निर्विकार तत्त्वके ही विभिन्न रूपों और विभिन्न नामोंमें आत्मप्रकाश हैं, एकहीसे सबका प्राकट्य है, एकके ही आश्रयसे सबकी स्थिति है, एककी सत्तासे ही सब नियन्त्रित हैं और परिणाममे सब एकमें ही विलीन हो जाते हैं, एकके अतिरिक्त दूसरा कोई स्वतन्त्र पदार्थ है ही नहीं। इस प्रकार वे स्थावर-जङ्गम सभी पदार्थोंमें नित्य सत्य एक अद्वितीय वस्तु-तत्त्वको देखते हैं। उनकी चेतनासे भेदज्ञान सर्वथा दूर हो जाता है। एक ही बहुका—अनन्तका यथार्थ स्वरूप है—यह उपनिषद्का प्रथम सत्य है।

द्वितीयतः हमारे ज्ञानमें जीव और जड़का—चेतन और अचेतनका भेद है। हम कभी इसका अतिक्रम नहीं कर सकते। पर ऋषियोंका अनुभव है कि यह विश्व-जगत् तत्त्वतः चैतन्यमय है। जिस एक अद्वितीय सद्वस्तुकी सत्तासे विश्व-जगत् सत्तावान् है, वही सद्वस्तु चित्-स्वरूप है—स्वयंप्रकाश है। दूसरेके प्रकाशसे जिसका प्रकाश हो, दूसरेके सम्बन्धसे ही जिसका परिचय हो और दूसरेके ज्ञानमें प्रतिभात होनेसे ही जिसकी सत्ता हो, उसीको 'जड' कहते हैं। चेतनके आश्रय और सत्तासे ही जड़का प्रकाश और सत्ता है। समस्त विश्व-जगत्के मूलमें जो एक वस्तु है, जिसका दूसरा कोई न आश्रय है और न प्रकाशक है, अपनी सत्तासे ही जिसकी सत्ता है, अपने प्रकाशसे ही जिसका प्रकाश है, जो अपनेको ही अपना अनन्त विभिन्नतामय विश्व-जगत्के रूपमें परिचय दे रहा है,—वह अद्वितीय तत्त्व निश्चय ही स्वप्रकाश चैतन्यमय है। ऋषि-चेतना सम्पूर्ण जड़में उस एक चैतन्यस्वरूपको ही देखती है। ऋषिगण, एक अद्वितीय नित्य चैतन्यमय सद्वस्तुको ही इन्द्रिय-मनके सम्मुख विभिन्न जीवों और जड़ पदार्थोंके रूपमें—चेतनाचेतन अनन्त विचित्र वस्तुओंके रूपमें लीला करते देखते हैं। चेतन ही जड़का यथार्थ स्वरूप है, यही उपनिषद्का द्वितीय सत्य है।

तृतीयतः हमारे साधारण ज्ञानमें सभी विषय ससीम, सादि (आदिवान्) और सान्त (अन्तवान्) हैं। इन्द्रिय-


[दायाँ स्तम्भ]

मनकी अधीनताके पाशमें बँधी हुई हमारी चेतनाके सम्मुख असीम, अनादि और अनन्त कभी वास्तविक सत्यके रूपमें प्रतीत होता ही नहीं। अपनी ज्ञानलब्ध ससीमता, सादित्व और सान्तत्वका निषेध करके हम असीमतत्त्व, अनादित्व और अनन्तत्वकी एक अभावात्मक कल्पना किया करते हे। इस कल्पित असीम, अनादि और अनन्तमे और वास्तविक ससीम, सादि और सान्तमे एक भारी भेद है, इस कल्पनाका भी हम अतिक्रमण नहीं कर पाते। अगणित देशकाल-परिच्छिन्न ससीम, सादि और सान्त पदार्थोंकी समष्टि कल्पना करनेपर हमारे लिये देश कालातीत असीम अनादि और अनन्तकी धारणा करना सम्भव नहीं होता। ऋषि-चेतनाकी अतीन्द्रिय अतिमानस अनुभूतिमे साधारण ज्ञानकी यह असमर्थता नहीं रहती। इस चेतनामे देशकालातीत असीम अनादि अनन्त एक अद्वितीय अपरिणामी तत्त्व समुज्ज्वल-रूपसे प्रकट रहता है—अभावरूपमें नहीं, भावरूपमें—ज्ञानगोचर वास्तवको निषेध करके नहीं, वास्तवसमूहको कल्पनासे समष्टिवद्ध करके भी नहीं, सर्वव्यापी, सबमें अनुस्यूत, सभी भावोंमे लीयमान, सर्वान्तरात्मा एक अखण्ड स्वप्रकाश वास्तवतम सत्यके रूपमे। असीम ही समस्त ससीमका पारमार्थिक तत्त्व है, अनादि-अनन्त ही सम्पूर्ण सादि सान्तका तात्त्विक स्वरूप है, देश कालातीत अपरिणामी निर्विकार एक अखण्ड चैतन्यमय परमात्मा ही देश कालाधीन परिणामी उत्पत्ति स्थिति विनाशशील प्रत्येक खण्डपदार्थ-मात्रके अदर विभिन्न विचित्र रूपोंमें लीला कर रहा है—इस अपरोक्ष अनुभूति—प्रत्यक्ष दर्शनसे ऋषि-चेतना भरपूर हो जाती है। उन्हें ससीममात्रमें एक असीम, सादिमात्रमे एक अनादि, सान्तमात्रमे एक अनन्त, परिणाम और विकार-मात्रमे एक नित्य सत्य, अपूर्णमात्रमे एक नित्य पूर्ण सर्वत्र सदा चमकता हुआ दिखलायी पडता है। ससीम और असीमका भेद, सादि और अनादिका भेद, सान्त और अनन्तका भेद, इस दिव्यज्ञानसे—औपनिषद ज्ञानमे—मानो मिथ्या हो जाता है,—वह ज्ञानके निम्नस्तरमे—इन्द्रिय और मनके स्तरमें ही पड़ा रह जाता है। देशकालातीत और देश कालाधीन असीम अनन्त एव ससीम सान्त—नित्य और अनित्यका यह पारमार्थिक ऐक्य दर्शन ही उपनिषद्का तृतीय सत्य है।

चतुर्थतः हमारा इन्द्रिय मनोगोचर साधारण ज्ञान आत्मा और अनात्माके भेदको—मैं और अन्यके भेदको—व्यक्ति