भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 53
  • उपनिषद्‌की दिव्य शिक्षा * ३९ और विश्वके भेदको—ज्ञाता और भोक्ता एवं ज्ञेय और भोग्य जगत्‌के भेदको तथा विभिन्न व्यक्तियोंके पारस्परिक भेदको कभी अतिक्रमण नहीं करता, परंतु ऋषि-चेतना अपने आत्मामें और अन्य समस्त मनुष्य तथा प्राणीमात्रके आत्मामें एव समग्र विश्व-जगत्‌के आत्मामे पारमार्थिक एकत्वकी उपलब्धि करती है। वह अपनेको सभी मनुष्य, सभी प्राणी और समस्त विश्व-प्रपञ्चमें, और सब मनुष्यों, सब प्राणियों और सम्पूर्ण विश्व-प्रपञ्चको अपनेमें देखती है। एक आत्मा ही विभिन्न स्थावर-जङ्गम शरीरोंमें विभिन्न नाम- रूपोंमें, विभिन्न आकृति प्रकृतिमे प्रतिभात हो रहा है। प्रबुद्ध ऋषि-चेतना इस सत्यका प्रत्यक्ष अनुभव करती है। अतएव इस चेतनामें अभिमान और ममता, राग और द्वेष, शत्रु-मित्रका भेदबोध, अपने-परायेका भेदभाव, हिंसा-घृणा- भय और विषय-विशेषके प्रति कामना प्रभृति कुछ भी नहीं रह सकते। इस अनुभूतिका फलस्वरूप सबके प्रति अहैतुक प्रेम और सबके प्रति आत्मबोध स्वभावसिद्ध हो जाता है। यह विश्वात्मभाव और सर्वात्मभाव उपनिषद्‌का चतुर्थ सत्य है। जिस किसी देशमें, जिस किसी कालमें, जिस किसी पारिपार्श्विक अवस्थामें, जो कोई भी व्यक्ति राग-द्वेष-कुसंस्कारादि- से रहित होकर उपयुक्त साधनाके द्वारा इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे अपनेको छुड़ा लेता है, उसीकी विशुद्ध चेतनाके सम्मुख विश्व-जगत्‌का और अपना यह पारमार्थिक सत्यस्वरूप प्रकट हो जाता है। यह सत्य ही सनातन सत्य है और इस सत्य-दृष्टिका अनुवर्तन करनेके लिये मनुष्यके व्यष्टि-जीवन और समष्टि-जीवनको भीतर तथा बाहरसे जिस प्रणालीके अनुसार सुनियन्त्रित होना चाहिये, उस प्रणालीका नाम ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म विश्वजनीन है, विश्वमानवका धर्म है,—विश्वके सभी श्रेणीके नर-नारियोंको सत्यदृष्टिमें प्रतिष्ठित करानेवाला धर्म है। यह विश्वजनीन सनातन सत्य और सनातन धर्म ही विभिन्न सम्यक् सम्बुद्ध ऋषियोंके मुखोंसे विभिन्न छन्दों—विचित्र कवित्वपूर्ण गम्भीर्यार्यव्यञ्जक भाषाके द्वारा उपनिषद्-ग्रन्थोंमें प्रकाशित है। इन्द्रिय-मन- शृङ्खलित बुद्धिके ऊर्ध्व स्तरमें विशुद्ध चेतनाकी तत्त्वानु- भूतिको इन्द्रिय-मन-बुद्धिके स्तरकी भाषामें व्यक्त किया गया है। जो सत्यपिपासु लोग इन उपनिषद्-वाणियोंके गूढ तात्पर्यके अनुसन्धान पथपर चलना चाहते हैं, उन्हें अपनी चेतनाको इन्द्रिय-मन-बुद्धिके स्तरसे ऊपर ले जानेकी चेष्टा करनी पड़ेगी और ऊपर ले जाकर ही इन वाणियोंके यथार्थ तात्पर्यको समझना होगा। केवल शाब्दिक अर्थ एव युक्ति- तकौँके वलपर उपनिषद्‌की वाणियोंके तात्पर्यको कभी हृदयङ्गम नहीं किया जा सकता। सम्यक्-प्रबुद्ध ऋषि-चेतनामें प्रतिभात चरम सत्यको ही उपनिषदोंके ऋषियोंने 'ब्रह्म' कहा है। 'ब्रह्म' शब्दका शाब्दिक अर्थ है—'बृहत्तम' (बहुत बड़ा), जिससे बृहत्तरकी कोई कल्पना ही नहीं हो सकती। देशगत, काल- गत, गुणगत, शक्तिगत, सत्तागत और अवस्थागत किसी भी प्रकारकी सीमा, परिधि या क्षेत्रकी, जिसके सम्बन्धमें कोई कल्पना नहीं की जा सकती, पाश्चात्त्य दर्शनमें जिसको Infinite Eternal Absolute कहा जाता है,— उसीका नाम 'ब्रह्म' है। 'ब्रह्म' मानवकी बौद्ध-चेतना (Intellectual Conciousness) का चरम आदर्श है, समस्त दार्शनिक ज्ञान (Philosophical Knowledge) का चरम अनुसन्धेय है। जबतक इस ब्रह्मको ज्ञानगोचर नहीं कर लिया जाता, तबतक बुद्धि कभी तृप्त नहीं हो सकती, दार्शनिक-विद्याका अनुशीलन कभी चरम सिद्धिको प्राप्त नहीं हो सकता। अथ च, बुद्धि (Intellect) स्वभावतः ही ब्रह्मका कभी साक्षात्कार नहीं कर सकती, दार्शनिक युक्तितर्क निःसन्दिग्ध‌रूपसे कभी भी इस ब्रह्मको ज्ञानमे प्रतिष्ठित नही कर सकते, परंतु मानव-चेतनामें सामर्थ्य है—वह युक्तितर्कके अतीत—बुद्धिके अतीत— पारमार्थिक ज्ञानभूमिकामें उपनीत होकर ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकती है। उस इन्द्रिय-मन-बुद्धिसे अतीत ज्ञानभूमिकी अनुभूतिका, उस ब्रह्मोपलब्धिकी भाषामयी मूर्तिका ही उपनिषदोंकी वाणीमें सग्रह किया गया है। उपनिषदोंके ऋषियोंने यह उपलब्ध किया कि 'ब्रह्म' केवल बुद्धिका एक अनधिगम्य चरम आदर्श नहीं है, एक अवाङ्मनसगोचर अज्ञेय, किंतु आकाङ्क्षणीय तत्त्वमात्र ही नहीं है;—ब्रह्म प्रत्यक्ष सत्य है। यही नहीं, ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। इन्द्रिय-मनोबुद्धि-गोचर विश्व-जगत् और तदङ्गीभूत समस्त चेतनाचेतन पदार्थोंका ('यत् किञ्च जगत्यां जगत्') एक- मात्र यथार्थ स्वरूप ही है—ब्रह्म। ऋषियोंने प्रत्यक्ष अनुभव- के वलसे वलवान् होकर ही दृढताके साथ यह घोषणा की— ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’। विश्वनिवासी नर-नारीमात्रको ऊँचे स्वरसे पुकारकर उपनिषद्‌के ऋषियोंने कहा—‘शृण्वन्तु