कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सर्प तो मिथ्या है, पर रस्सी सत्य है। जगत्के मिथ्यात्वका यही अर्थ है। जगत् जगत्-रूपसे असत्य है, ब्रह्मरूपसे सत्य है। ब्रह्म ईश्वर नहीं है। वह चेतन नहीं चित् है। न उसमें इच्छा है, न सङ्कल्प है। न उसमें कोई परिवर्तन होता है। न उसमें क्रिया करनेकी सम्भावना है। जिस अज्ञानके कारण उसमें जगत्की प्रतीति होती है, उसका दूर हो जाना मोक्ष है। भारतीय दर्शनमें 'पुनर्जन्म' सिद्धान्तका बहुत बड़ा स्थान है। अपने कर्म-संस्कारोंके कारण प्राणी एकके बाद दूसरे शरीरको धारण करता है। उसके सुख-दुःखका कारण किसी ईश्वरकी इच्छा नहीं, वर स्वयं उसका कर्म है। जब जीवनका सबसे बड़ा उद्देश्य, परम पुरुषार्थ मोक्ष है तो फिर किसी सर्वशक्तिमान् व्यक्तिकी खुशामद करनेकी किसी ईश्वरकी आँख बंदकर आज्ञा माननेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। वेदादि ग्रन्थ निश्चय ही विधि-निषेधकी घोषणा करते हैं, परंतु उनके आदेश उसी प्रकारके हैं, जैसे कि बड़ा भाई छोटे भाईको देता है। देवगण और ऋषिगण भी जीव हैं। वे भी नीचेसे ऊपर उठे हैं। जो जीव आज उनकी आज्ञाओंका पालन करता है, वह ज्ञानकी वृद्धिके साथ- साथ उन आज्ञाओंके औचित्यका स्वयं अनुभव करने लगेगा और एक दिन उस पदवीको प्राप्त कर लेगा, जब उसको किसी उपदेशककी आवश्यकता न रह जायगी। वह स्वयं परमर्षि महादेव हो जायेगा। उसके मन और शरीरसे सत्कर्म उसी प्रकार होंगे, जिस प्रकार कि बादलसे अनायास जलकी वृष्टि होती है। इसीलिये इस अवस्थाको धर्ममेघ कहते हैं। जिस परमात्माकी ओर इन शास्त्रोंमें संकेत है, वह अल्लाहसे बहुत भिन्न है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक होते हुए भी कर्मके अटल सिद्धान्तको किसी भी अंशमें बदल नहीं सकता। उसका दूसरा नाम मायाशबल ब्रह्म है। अर्थात् वह ब्रह्मका वह रूप है जिसकी अनुभूति मायाके झीने परदेके भीतरसे होती है। यह स्पष्ट है कि इस विचारशैलीमें प्रधान स्थान ज्ञान- विद्याका ही हो सकता है, क्योंकि अविद्याके दूर होनेसे ही मोक्ष हो सकता है अर्थात् जीव इस प्रतीयमान जगत्मे अपने जीवत्वके जीवेश्वर-भेदके ऊपर उठकर आत्मस्वरूप अर्थात् अखण्ड, अद्वय, सत्, चिन्मात्र, अनिर्वचनीय ब्रह्म- पदमें स्थिर हो सकता है। अविद्याका विनाश विद्यासे हो सकता है, कर्मसे नहीं। कर्म उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट क्यों न हो, वह द्वैतकी सत्ताको स्वीकार करके ही किया जा सकता है और इस दृष्टिसे जीव और मोक्षके बीचकी दीवारको दृढ़ करता है। शृङ्खला भले ही सोनेकी हो, परंतु कोई बुद्धिमान् उससे बँधना पसंद न करेगा। इसीलिये हमारे दर्शनोंमें कर्त्तव्यज्ञानको प्राधान्य नहीं दिया जा सकता। हम 'शिवम्'का नाम लेते भी हैं तो 'सत्यम्'के बाद। मोक्षानुभूति अर्थात् साक्षात्कार समाधिसे होता है और समाधिके लिये अभ्यास एवं वैराग्यकी आवश्यकता है। विक्षिप्त चित्त प्रतिक्षण इधर-उधर भटकता फिरता है। स्थिर सत्यका अनुभव नहीं कर सकता। ऐसे अनुभवके लिये चित्तको वासनाविरहित करना होगा । कठोपनिषद्के शब्दोंमें— 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवति ।' (२।३।१४) इसका तात्पर्य यह हुआ कि कर्म किये तो जायें परंतु निष्काम होकर, वासनाओंकी तृप्तिके लिये नहीं, वर उनके उपशमके लिये। भारतीय दर्शनमें यही सब कर्मदर्शनका उद्गम- स्थान है। ईशावास्योपनिषद् विशेषरूपसे विचारणीय है— ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ १-२ ॥ पहले द्वितीय मन्त्रको लीजिये। इस प्रकार कर्म करते हुए वह अर्थात् उनके द्वारा दुःख, बाधा भय आदिके संस्कार उसको क्लिष्ट न कर सकें। मनुष्य सौ वर्ष अर्थात् पूर्णांयु जीवे। शुक्ल यजुर्वेदके छत्तीसवें अध्यायका चौबीसवाँ मन्त्र इस सौ वर्षकी पूर्ण आयुका रूप बतलाता है— 'पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्।' 'हम सौ वर्षतक जीते रहे, हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सौ वर्षतक काम करती रहे । (वैदिक वाङ्मयमें चक्षुको सब ज्ञानेन्द्रियोंका और वाणीको सब कर्मेन्द्रियोंका उपलक्षण मानते हैं।) सौ वर्षतक ज्ञानका सञ्चय करते रहें (वेदको श्रुति कहते हैं इसलिये 'हम सुनते रहें' का अर्थ है हमको ज्ञानकी प्राप्ति होती रहे) और हम सौ वर्षतक अदीन रहें।' पहला मन्त्र यह बतलाता है कि किस प्रकारका आचरण करनेसे मनुष्य कर्म फलसे अलिप्त रह सकता है । समस्त जगत्को ईश्वरसे आच्छादित करना चाहिये । ऐसा मानना चाहिये कि समस्त जगत्में ईश्वर भीतर और बाहर व्याप्त है।