भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45
  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेचक * ३१ क्षमा कर सकता है' परन्तु शिर्क और इनकार, उसके सिवा किसी और उपास्यकी सत्ताको मानना या स्वयं उसकी सत्ताको न मानना अक्षम्य अपराध है। यह तो इन धर्मोंका मूलरूप है। ईसाई-धर्मपर उसके शैशव-कालमे ही यूनानी दर्शनका प्रभाव पड़ा। इस समन्वयके कारण उसकी कट्टरता बहुत कुछ कम हो गयी। बाइबिलका वह भाग जिसमें ईसा और उनके शिष्य जॉन तथा सेंट पालके उपदेश अङ्कित हैं, उदार आत्मज्ञानमूलक वाक्योंसे परिपूर्ण है। जो ईसाई 'मैं आल्फा और ओमेगा—वर्णमालाका प्रथम और अन्तिम अक्षर हूँ' तथा 'मैं अपने पितासे अभिन्न हूँ'-जैसे वाक्योंके अर्थपर मनन करेगा वह विशिष्टाद्वैत अनुभूतिका निश्चय ही अधिकारी बन सकेगा। इस्लामपर भी यूनानी दर्शन और ईरान पहुँचनेपर भारतीय दर्शनका प्रभाव पड़ा। इसीके फलस्वरूप सूफी सम्प्रदायका जन्म हुआ। कोई सूफी कहता है 'हमः अजओस्त' सब कुछ उससे निकला है। उपनिषद्के शब्दोंमें 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च', जैसे मकड़ी अपने शरीरसे तन्तु निकालती है और फिर अपनेमें खींच लेती है। कोई सूफी इससे भी आगे जाता है। वह 'हमः ओस्त' सब कुछ वही है—कहता है। वह ऐसा मानता है कि 'हम बन्दः हम मौलास्तम्'— 'मैं सेवक भी हूँ और सेव्य भी हूँ।' परन्तु ईसाई और सूफी साधक इस बातको नहीं भूल सकता कि— सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्ग क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥ 'हे नाथ ! सचमुच भेद दूर होनेपर भी मैं आपका हूँ, आप मेरे नहीं। तरङ्ग समुद्रसे निकली है, कभी समुद्र तरङ्गसे नहीं निकलता।' वह उस पदकी बात नहीं करता, जहाँ सेवकके साथ-साथ सेव्यकी सत्ता भी किसी 'तत्' में विलीन हो जाती है। जिन विचारधाराओंमें प्रतीयमान जगत्का मूल कोई सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वर माना जाता है, उनमे स्वभावतः इस बातपर बहुत जोर दिया जाता है कि मनुष्यको ईश्वरकी आज्ञाका आँख बद करके पालन करना चाहिये। कविके लिये असह्य है कि कोई व्यक्ति उसकी कृतिको विकृत कर दे । अनन्त ज्ञानसम्पन्न ईश्वरने ऐसे नियम बनाये हैं, जिनके अनुसार मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है। यदि वह इन नियमोंका पालन नहीं करता, तो वह ईश्वरके काममे बाधा डालता है और दण्डका भागी बनता है। उसमे इतनी शक्ति नहीं है कि इन नियमोंको अपनी बुद्धिके बलसे ढूँढ निकाले। यह हो सकता है कि यदि वह प्रसन्न होकर ईश्वरकी शरण जाय तो उसकी बुद्धिमे ईश्वरकी बुद्धिकी छाया अवतरित हो और ईश्वरकी इच्छाकी झलक मिलती रहे; परन्तु यह सब तभी हो सकता है, जब कि वह ईश्वरचोदित विधि-निषेधकी परिधिके बाहर जानेका क्षण भरके लिये भी दुःसाहस न करे। सत्कर्मका अर्थ ईश्वराज्ञाका पालनमात्र रह जाता है। ईसाने कहा है—दूसरोंके साथ वैसा बर्ताव करो, जैसा बर्ताव तुम अपने लिये पसन्द करोगे। इस आदेशमें बुद्धिके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व आ जाता है, 'दूसरा' शब्दका क्या अर्थ है ? मैं अपने साथ कैसा बर्ताव पसन्द करता हूँ—का विशद रूप यह हो जाता है कि मुझे अपने साथ कैसा बर्ताव पसन्द करना चाहिये। ऐसे प्रश्नका यथार्थ उत्तर देनेके लिये बर्तावकी कोई-न-कोई कसौटी होनी चाहिये। यही कर्तव्यमीमांसाका उद्गम स्थान है। पाश्चात्य दर्शनशास्त्री बाइबिलकी व्याख्या भले ही न करते हो, परन्तु उनके ऊपर उस वातावरणका प्रभाव तो पड़ता ही है, जिसमे उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है। इसके सिवा उनके सामने यह प्रश्न तो बराबर ही रहता था और है कि समाजका सञ्चालन सुचारुरूपसे तभी हो सकता है, जब समाजके सब अङ्ग एक-दूसरेके साथ यथोचित आचरण करें। यथोचित आचरण क्या है, जाननेके लिये उनको सदाचरणकी कसौटी ढूँढनी पड़ी है। इस कसौटी- की खोजमें उनको जगत्‌के स्वरूपको पहचाननेका भी यत्न करना पड़ता है। इसीलिये वह 'The good' के बाद 'The true' 'शिव'के बाद 'सत्यम्'का नाम लेते हैं। भारतीय दर्शनका स्रोत इससे सर्वथा भिन्न और विपरीत है। भारतीय विचारक ऐसा मानता है कि मनुष्यकी सारी विपत्तियों, सारी कठिनाइयोंका मूल अविद्या—अज्ञान है। जहाँ विद्या है, वहीं शक्ति है। अतः वह ज्ञानकी खोज करता है। ज्ञानका क्षेत्र अनन्त है। जिस किसी पदार्थकी सत्ता है, वह ज्ञानका विषय है। यदि ईश्वरका अस्तित्व है तो वह भी ज्ञेय है। ज्ञेयत्वकी दृष्टिसे छोटे से-छोटे कीड़े- मकोड़ेका वही स्थान है, जो ईश्वरका है। विभिन्न विद्वानोंने अविद्या और ज्ञाता तथा ज्ञेयके स्वरूपका विभिन्न प्रकारसे वर्णन किया है। इन सबकी पराकाष्ठा शाङ्कर-अद्वैतवाद अर्थात् मायावाद है। इसके अनुसार जगत् मिथ्या है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जगत् असत् है। यदि किसीको पृथ्वीपर पड़ी रस्सी सर्प प्रतीत होती है तो यह प्रतीयमान