भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 832 में से

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उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक ( लेखक- माननीय बाबू श्रीसम्पूर्णानन्दजी, शिक्षा-सचिव, युक्तप्रान्त )

भारतीय दर्शनके पाश्चात्त्य आलोचकोंने इस बातकी ओर बराबर ध्यान आकृष्ट किया है कि उन विचार-शास्त्रोंमें, जो वेदमूलक हैं, कर्तव्याकर्तव्यकी विवेचना नहीं की गयी है। इस दृष्टिसे भारतीय होते हुए भी बौद्धदर्शनकी परम्परा भिन्न है। उसमें जिस मध्यम मार्गका प्रतिपादन किया गया है, वह यूरोपीय विचारकोंको स्वभावतः अपनी ओर खींचता है। उनको उसमें चरित्रनिर्माण और समाज-संव्यूहनका वह बीजक मिलता है, जिसके सहारे आजके परितप्त जगत्‌को शान्ति दी जा सकती है। जिस समय बुद्धदेव भारतीय जगत्में अवतरित हुए थे, उन दिनों सद्धर्मका एक प्रकारसे लोप हो गया था। सहस्र-संख्यक निरीह पशुओंके आलम्भन और तामस तपसे समाजका आत्मा क्षुब्ध हो उठा था। इसकी ही प्रतिक्रियाके स्वरूपमें मध्यम मार्गकी प्रतिष्ठा लोकसम्मत हुई। उस प्रारम्भिक कालमें न तो ऐसे मन्दिर थे, न किन्हीं देव देवियोंकी पूजा होती थी। इसलिये भी मध्यम मार्गके उपदेशकोंको प्रश्रय मिला। बादमें तो उसका नाममात्र अवशिष्ट रह गया, क्योंकि महायान सम्प्रदायने आध्यात्मिक जगत्में इतने बुद्धों, बोधि- सत्त्वों, देवों और देवियोंको ला बिठाया था कि किसीको मध्यम मार्गपर चलनेका कष्ट करनेकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी। इसके विपरीत यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वैदिक विचारधारा में चरित्रशुद्धि और कृत्याकृत्यविवेकको कभी भी महत्त्वका स्थान नहीं दिया गया। पूर्वमीमांसा कर्मशास्त्र तो है, परंतु उसको भी पाश्चात्य ईथिक्स विषयक ग्रन्थोंकी भाँति कर्तव्यशास्त्र नहीं कह सकते। 'कर्तव्य' और 'धर्म' शब्दोंको समानार्थक मान लेनेपर भी काम नहीं चलता। जैमिनिके अनुसार 'चोदनालक्षणोऽर्थः धर्मः' इसके आगे वह कहते है, 'तद्वचनादाम्नायस्यप्रामाण्यम्' इसका तात्पर्य यह हुआ कि जिसकी चोदना, घोषणा, विधि वेदने की गयी हो, वह धर्म है। इसीमें वेदकी प्रामाणिकता है। यह परिभाषा चाहे व्यवहारदृष्टिसे उपयोगी भी हो परंतु दार्शनिक दृष्टिसे सन्तोषजनक नहीं है। जिन कामोंको वेदने वैध ठहराया है, उनके सम्बन्धमें यह प्रश्न बराबर हो सकता है कि उनको क्यों किया जाय। भले ही वेद अपौरुषेय हों, ईश्वरकृत हों, परंतु ईश्वरकी आज्ञा क्यों मानी जाय? यह हो सकता है कि

ईश्वरमें निग्रहानुग्रहकी शक्ति हो, परंतु पुरस्कारकी आशा या दण्डके भयसे किया गया काम वस्तुतः उत्कृष्ट नहीं होता। लोकमें भी ऐसे काम प्रशस्त नहीं माने जाते। कर्मविशेषकी करणीयता या अकरणीयताका निर्णय उसके स्वरूपके आधारपर होना चाहिये न कि कर्ताके अतिरिक्त किसी शक्तिशाली व्यक्तिकी इच्छापर। कणादने इससे अच्छी परिभाषा की है। वे कहते हैं— 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । 'जिस कर्मसे अभ्युदय—इहलोक और परलोकमें कल्याण और मोक्षकी सिद्धि हो, वह धर्म है।' इससे धर्माचरण के परिणामका परिचय तो मिलता है, परंतु परखनेकी कसौटी नहीं दी गयी। बादके विद्वानोंने तो इतना भी विचार नहीं किया है। जगत् सम्बन्धी अनेक सूक्ष्म और स्थूल प्रश्नोंकी समीक्षा की गयी, परंतु कर्मके सम्बन्धमें केवल इतना ही कह दिया जाता था कि जो आचरण वेदविहित है, वह करणीय है और जो निषिद्ध है वह अकरणीय है। यदि किसी विद्वान्‌को किसी ऐसे कृत्यके विषयमें व्यवस्था देनी होती थी जिसका स्पष्ट उल्लेख श्रुतिमें नहीं मिलता तो वह इसी बातका प्रयत्न करता था कि उसको स्वरूप-साम्यके आधारपर वेदमें दी हुई किसी न किसी कर्मसूचीमे बिठा दे। इसको स्वतन्त्र विचार नहीं कह सकते। ऐसी आलोचनाका प्रभाव भारतीयोंपर पड़ना स्वाभाविक है। आलोचनाका उत्तर देनेकी सामग्री भी उसके पास नहीं थी। विदेशी शासनके प्रभावने उनके आत्मविश्वासको लुप्तप्राय कर दिया था। अतः जिस किसी वस्तुकी शिकायत विदेशी करते थे, वह उनकी आँखोंमें भी खटकने लगती थी। यह बिल्कुल ठीक है कि भारतीय दर्शनमे सत्कर्म- मीमांसाको वह स्थान नहीं दिया गया है जो उसे पश्चिममें प्राप्त है, परंतु इसमें लज्जित होनेकी कोई बात नहीं। यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म एकेश्वरवादी ही नहीं, प्रत्युत एकोपास्यवादी है। ईश्वर जगत्‌का स्रष्टा, पालक और संहर्ता है। जगत् उसकी इच्छाकी अभिव्यक्ति, उसकी लीला है। वह सर्वथा 'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्' समर्थ है। किसी और- की उपासना उसके लिये असह्य है। उसने मूसासे स्वयं कहा था कि 'मैं तेरा ईश्वर ईर्ष्यालु हूँ।' वह और सब अपराधोंको