कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- चित्त ही संसार है * २९ कि कर्म बुरा नहीं है, कर्ममें और कर्मफलमें आसक्ति तथा फलकी कामना ही—जिस फलको प्राप्त करनेके लिये मनुष्यमात्र लालायित रहता है, दोषका कारण है । कर्मको कर्मफलसे अलग करते ही आप अनुभव करेंगे कि कर्म स्वरूपतः व्यक्तिको ही नहीं, अपितु समाजको भी ऊपर उठाता है । कहा जाता है कि सभी भगवत्प्राप्त पुरुष जन्म-मृत्युका उल्लङ्घन करनेके पश्चात् भी, मनुष्यमात्रको संसाररूप इस महान् बन्धनसे मुक्त करनेके लिये स्वेच्छासे जीवनके साथ लगे हुए बड़े-से-बड़े क्लेशोंको सहन करना स्वीकार करते हैं । गीता ही कर्मको आध्यात्मिक उन्नतिका सर्वश्रेष्ठ साधन कहकर उसकी प्रशंसा करती है और मेरा विश्वास है हमारे इस प्रिय भारतवर्षका भविष्य बहुत ही उज्ज्वल है। इसका एक अत्यन्त सुदृढ प्रमाण यह है कि निष्काम कर्मयोगका यह सिद्धान्त सर्वसाधारण हिंदूकी बुद्धिमें व्यापकरूपसे प्रवेश कर रहा है । जिस किसी परिस्थितिमें हम हों, सम्पूर्ण व्यक्तिगत हेतुओं, यहाँतक कि जीवनतकका विचार छोड़कर अपने कर्तव्यका पालन करना ही चाहिये । यह सिद्धान्त निश्चय ही हमारे लिये सबसे बड़ा रक्षाका साधन प्रमाणित होगा । ध्यान रहे कि यह कर्मयोग सङ्ग्राममें जूझनेवाले सैनिकके लिये ही नहीं है अपितु प्रत्येक नर-नारीके लिये, जिस किसी परिस्थितिमें वह हो, जीवनभर साधन करनेका है । निष्कामकर्म हमारे राष्ट्रका प्राण बन जाना चाहिये और जबतक हमारे शरीरमें यह प्राण रहेगा तबतक हमारी मृत्यु नहीं हो सकती । उपनिषदोंमें सनातन सत्य ( माननीय पं० श्रीरविशङ्करजी शुक्ल, प्रधानमन्त्री मध्यप्रान्त-बरार ) ‘कल्याण'की सेवाओंसे प्रत्येक भारतीय कृतार्थ हुआ है। ‘कल्याण’के विशेषाङ्क भारतीय साहित्य और विचार-जगत्की एक महत्त्वपूर्ण घटना होते हैं। उपनिषद् हमारे युग-युगोंकी सबसे मूल्यवान् धरोहर हैं। मुझे विश्वास है ‘कल्याण’का ‘उपनिषद्-अङ्क’ प्रत्येक घरमें एक सम्माननीय स्थान प्राप्त करेगा और सनातन सत्यका प्रकाश फैलाकर यथार्थमें कल्याणदायी सिद्ध होगा। चित्त ही संसार है चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत् सनातनम् ॥ चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमक्षयमश्नुते ॥ समासक्तं यदा चित्तं जन्तोर्विषयगोचरम् । यद्येवं ब्रह्मणि स्यात्तत्को न मुच्येत बन्धनात् ॥ ( मैत्रेयी० ५-७ ) चित्त ही संसार है, अतः प्रयत्नपूर्वक उसको शुद्ध करना चाहिये। जिसका जैसा चित्त होता है, वैसा ही वह बन जाता है। यह सनातन रहस्य है। चित्तके प्रशान्त हो जानेपर शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं, और प्रशान्त मनवाला पुरुष जब आत्मामें स्थितिलाभ करता है, तब उसे अक्षय आनन्दकी प्राप्ति होती है। मनुष्यका चित्त जितना इन्द्रियोंके विषयोंमें समासक्त होता है, उतना यदि परब्रह्ममें हो जाय तो बन्धनसे कौन न मुक्त हो जाय ।