कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 832 में से
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१८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * कुरुक्षेत्रकी अनोखी रणभूमिमें हुई, ऐसी कौन-सी बात है, जिसे अखिल विश्वके नर-नारी इस संसाररूप पहेलीकी कुञ्जीके रूपमें उत्तरोत्तर अधिक संख्यामे स्वीकार कर रहे हैं ? सर्वसाधारणकी बुद्धि सूक्ष्म विचारोंको ग्रहण नहीं कर सकती । वह केवल मुख्य बातोंको पकड़ती है और उनसे दृढ़तापूर्वक चिपट जाती है । कभी कभी थोड़े समयके लिये उन्हे लुभावने एव भ्रामक वाक्योंद्वारा बहकाया जा सकता है। परंतु अन्ततोगत्वा वह सदा सत्य वस्तुओंपर और सम्पूर्ण सन्सिद्धान्तोंके सार- तत्त्वपर ही स्थिर हो जाती है । उपनिषदोंके भी महान् उपनिषद् इस गीतामें ऐसी क्या वस्तु है, जिसे हमारे इस भारतवर्षमें तथा उत्तरोत्तर बढती संख्यामें भारतवर्षके बाहर भी सर्वसाधारणकी बुद्धिने जीवनके तत्त्वरूपमे आग्रहपूर्वक ग्रहण किया है ? मेरा विनीत मत यह है कि साधारण हिंदू जनता, जिसमें मै भी अन्तर्भूत हूँ, गीतासे दो सिद्धान्तोको उत्तरोत्तर अधिक संख्यामें ग्रहण कर रही है । पहला सिद्धान्त मृत्युसे अभय हो जाना है । मृत्यु अनिवार्य है, जिसने भी जन्म लिया है उसका अवसान मृत्यु ही है । शरीर नश्वर है परतु आत्मा अमर है, अतः जीवनके प्रति सम्पूर्ण आसक्ति और मृत्युका सारा भय ऐसी भूल है जिससे सदा बचे रहना चाहिये । एक महान् शिक्षा तो यह है । दूसरी शिक्षा यह है कि एकाकी ध्यान अथवा भक्तिपूर्ण उपासनाके मार्गका अनुसरण करनेसे चित्तकी आन्तरिक शान्ति—वह शान्ति जिसे पाकर मनुष्य सारे मात्रास्पशों एव बाह्य सुख दुःखोंसे अलिप्त रहता है, अवश्य मिल सकती है, परंतु सर्वश्रेष्ठ मार्ग सर्वभूतहितके लिये निरन्तर निष्कामभावसे कर्ममें लगे रहना है । यहाँ यह कहा जा सकता है कि इस कर्मके मार्गपर चलना कभी कभी जलमें रहते हुए उससे अलग रहनेके समान कठिन हो जाता है। यह मार्ग सङ्कीर्ण अवश्य है, परतु साथ ही श्रेष्ठ भी है । यही शिक्षा आज हिंदुओंके मनपर अधिकार कर रही है, जिस शिक्षाके अनुसार मानव-जातिके कल्याणके लिये कर्मफलकी आसक्तिको त्यागकर कर्म करना सर्वोत्तम योग है। मैं इसे जीता-जागता चमत्कार मानता हूँ, क्योंकि हम भारतीयोंको इस कर्मयोगके सिद्धान्तकी नितान्त आवश्यकता है । इस उपदेशको भुला देनेसे ही हमने अपनी स्वाधीनता और स्वतन्त्रता खो दी थी । हिंदुओंकी बुद्धि जन्म-मरणके इस चक्रसे, जो देखनेमें शाश्वत प्रतीत होता है, छूटनेका साधन निरन्तर खोजती रहती है । हमलोग इस चक्रको भेदकर उससे मुक्त होना चाहते हैं, और कुछ काल पूर्वतक सर्वसाधारण हिंदू जनता इस भ्रममे थी कि यह छुटकारा ससारसे अलग हो जानेपर ही सम्भव है । चाहे आप ध्यानयोगका आश्रय लेकर अथवा ईश्वरकी उपासनामें लगकर और उन्हें अपने हृदयके आसनपर बिठाकर अलग हों, आप अलग तो होते ही हैं और इस मुक्तिकी खोजमे ससारकी प्रत्येक वस्तु नगण्य हो जाती है, और इस दृष्टिकोणको ग्रहण करनेमे भय यह है कि देशकी पराधीनता अथवा स्वाधीनताका प्रश्न भी बहुत कुछ गौण हो जा सकता है, परंतु इस समय भगवद्गीताने सर्वसाधारण हिंदूकी बुद्धिको खींचकर सर्वथा एक दूसरे ही नवीन मार्गमें लगा दिया है । ध्येय वही का वही है—मुक्तिकी प्राप्ति, जन्म-मृत्युके उस शाश्वत प्रतीत होनेवाले चक्रका भेदन । परतु आप उस व्यक्तिगत ध्येयको संसारमें बने रहकर अनवरत निष्काम कर्ममे लगे रहकर प्राप्त कर सकते हैं । मुझे गीताके अन्य महान् सिद्धान्तोंका विवेचन करनेकी आवश्यकता नहीं है । गौतम बुद्धने पता लगाया कि जीवनकी वासना, जीनेरी कामना ही दुखका मूल है । 'कामनाओंको जीत लो, और तुम दुःसपर विजय पा लोगे' यह बुद्धका कहना है । उसी महान् सत्यको गीताके दृढतापूर्ण किंतु सुसम्बद्ध शब्दोंमे बार-बार कहा गया है । भगवान्का भक्त वही है जो आसक्ति एवं कामनामे मुक्त है और जिसका अहङ्कार सर्वथा नष्ट हो गया है । साथ ही भगवान् एक और अखण्ड हैं तथा समस्त रूपों एव आकृतियोंमे प्रकट हैं । इस बातको गीताने उदात्त एवं सुन्दर भाषामें व्यक्त किया है। सच पूछिये तो गीतामे जीवनके एक सर्वाङ्गपूर्ण दार्शनिक सिद्धान्तका समावेश हुआ है, परंतु गीताके उपदेशका मूल मन्त्र है—कर्म और अविराम कर्म । आलस्य एवं दीर्घसूत्रताका पापकी भाँति परित्याग कर देना चाहिये । कर्मयोग ही हमारे सामने आदर्शके रूपमे रक्खा गया है, और मैं फिर कहता हूँ कि कर्मका ही अन्तःकरणकी शुद्धि एव परमपुरुषार्थकी प्राप्तिके साधनरूपमे विधान किया गया है, उस पुरुषार्थको हम मुक्ति कहें, कल्याण कहे अथवा निर्वाण । गीता न होती तो हिंदुओंकी प्रवृत्ति कर्ममात्रको प्रलोभनका कारण, सासारिक बन्धनका हेतु और इस प्रकार आध्यात्मिक उन्नतिका बड़ा विघ्न कहकर उससे घृणा करनेकी होती । विश्वके समस्त धर्मग्रन्थोंमें, जिनसे मेरा परिचय है, एकमात्र गीताने ही इस प्रश्नपर यथार्थ दृष्टिसे विचार किया है और हमें बतलाया- है