भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 832 में से

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पृष्ठ 41

गीतोपनिषद्‌की श्रेष्ठता और उसके कारण ( लेखक—माननीय डा० श्रीकैलासनाथजी काटजू, गवर्नर, बगप्रान्त )

गीताप्रेसके द्वारा प्रकाशित होनेवाले 'उपनिषद्-अङ्क'मे बहुतसे विद्वान् एव गम्भीर चिन्तनामें लगे हुए लोगोंके निबन्ध रहेंगे। ये परम विज्ञ लेखक निश्चय ही इन महान् उपनिषदोंके सिद्धान्तोंकी श्रेष्ठताका विवेचन करेंगे। हिंदुओंके विचारका सर्वोच्च स्तर हमें उपनिषदोंमें प्राप्त होता है। उपनिषद् हमारे उत्कृष्ट भारतीय ज्ञानकी परिणति है। उन्होंने सभी देशोंके विद्वान् दार्शनिकोंका आदर एवं सम्मान सहज ही प्राप्त किया है, और गत दो हजार वर्षोंमें उपनिषदोंपर सैकड़ों टीकाएँ लिखी गयी हैं। अतीतकालमें हमारी जातिके जितने भी दार्शनिकों एव आचायोंने प्राचीन सिद्धान्तको विशुद्धरूपमें पुनः प्रतिष्ठित करनेका प्रयास किया है, उन सभीने एक या अधिक उपनिषदोंका आश्रय लेकर अपना तथा अपने मतका समर्थन करनेकी चेष्टा की है। उपनिषदोंमें हिंदूधर्मका निचोड़ है; हमारे धर्मकी ऊँची-से-ऊँची और उत्तम-से-उत्तम शिक्षा इनमें है। बहुधा इनकी भाषा सूत्रों- जैसी और इनकी वर्णनशैली गहन है। इसीलिये टीकाओंका लिखा जाना आवश्यक था और इसीलिये उनपर इतनी अधिक टीकाएँ लिखी गयीं। मेरे-जैसे व्यक्तिको, जो अपनी प्राचीन भाषा संस्कृतसे अनभिज्ञ है और जिसकी रुचि दर्शनशास्त्रकी अपेक्षा इतिहासके अध्ययनकी ओर अधिक रही है, उपनिषद् कभी- कभी गूढ एवं दुरूह प्रतीत होते हैं। मेरे लिये उपनिषदोंके सिद्धान्तोंको समझानेकी बात मनमें भी लाना अथवा उनके उच्च विचारोंके औदात्यकी प्रशंसा करना एक प्रकारसे धृष्टता ही होगी। यह कार्य ऐसा है, जिसे विभुत एव विज्ञ विद्वान् ही कर सकते हैं। मेरी जीवन-यात्राका बहुत बड़ा भाग बीत चुका है और हमारे उपनिषत्कालीन प्राचीन ऋषियोंने जिन विविध मागोंसे एक ही लक्ष्यको प्राप्त किया है, उन सबको बोधगम्य करनेमे शक्तिको व्यय करनेकी अपेक्षा मेरी चेष्टा उस लक्ष्यपर ही अपनी दृष्टिको केन्द्रित करनेकी रही है। भगवद्गीताको सभीने सम्पूर्ण वेदों एवं उपनिषदोंका सार कहकर उसका बखान किया है और मेरी चेष्टा यथाशक्ति गीताके मुख्य उपदेशपर ही अपनी दृष्टिको जमाये रखने एव उसे अपने जीवन-व्यवहारका आधार माननेकी रही है। मनुष्यके जीवनमें—यदि वह ज्ञान-प्राप्तिका सच्चा मार्ग पकड़े रहे—एक समय ऐसा आता है, जब कि केवल शास्त्र- ज्ञानके अर्जनकी ओरसे उसकी प्रवृत्ति हट जाती है। यह सिद्धान्त मुझे बहुत सत्य जँचा है। विभिन्न मतवादोंसे और कभी-कभी एक ही सिद्धान्तको अलग-अलग भाषामें व्यक्त करनेसे साधारण मनुष्यके चित्तमे संशय और भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती है। इसलिये सार-वस्तुपर अपनी दृष्टि स्थिर रखना और उसी मुख्य सिद्धान्तके अनुसार अपने जीवनको कसना अधिक निरापद मार्ग है। इसी भावसे उपनिषदोंके साररूपमें मैं अपने करोड़ों हिंदू भाई बहिनोंके साथ गीताकी पूजा करता हूँ। उन्हींकी भाँति मेरी दृष्टिमें भी गीता अकेली ही हमारी जीवनयात्रामें प्रशस्त पथ दिखलानेके लिये पर्याप्त है। हमारे राष्ट्रीय इतिहासके प्रारम्भसे ही गीताको इस प्रकार उपनिषदोंके साररूपमें स्वीकार किया गया है। विगत दो सहस्राब्दियोंमें उसपर सचमुच सैकड़ों ही टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। दुर्भाग्यवश उनमेंसे अधिकांश इस समय सर्वथा लुप्त हो गयी हैं। उपलब्ध टीकाओंसे कुछ तो इस सुदीर्घ- कालकी सीमाको पार करके आयी हैं और उनमें इस महान् उपदेशकी जिस पटुता एव कौशलके साथ विभिन्न प्रकारसे व्याख्या की गयी है, उसे देखकर हमारे मनमें सात्विक ईर्ष्या एव श्रद्धा होती है । प्रत्येक मरजीवेने ज्ञानके इस महान् सागरमें गोता लगाया है और वह एक या एकसे अधिक अमूल्य रत्न निकालकर लाया है। अबतक भगवद्गीता विज्ञ पण्डितोंकी ही सम्पत्ति थी, परन्तु पिछले साठ वर्षोंमें इसके चमत्कारपूर्ण प्रचारका विस्तार हुआ है और आज भगवद्गीता प्रत्येक आस्तिक हिंदूकी बहुमूल्य निधि बन गयी है। राजप्रासादसे लेकर कृषककी कुटीरतकमैं उसका प्रवेश हो गया है, और करोड़ों हिंदुओंके दैनिक जीवनका यह मूलमन्त्र बन गयी है। यह सर्वश्रेष्ठ उपनिषद्, जो प्राच्य जगत्‌के पुरातन ज्ञान-भण्डारकी कुञ्जी है, आज भगवान्‌की कृपासे केवल भारतके ही नहीं, अपितु बाहरके भी अगणित नर- नारियोंके जीवनकी बागडोर बन गयी है। इस बीसवीं शताब्दीमें विचार-जगत्‌के अन्दर जो यह चमत्कार हुआ है, उसका क्या कारण है ? छोटे छोटे अठारह अध्यायोंके इस लघु-कलेवर ग्रन्थमें, जिसकी अवतारणा