भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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उपनिषद्का अमर उपदेश ( माननीय वायसराय चक्रवर्ती श्रीराजगोपालाचारी महोदय ) उपनिषद्के सार-तत्त्वको वेदान्त कहते हैं। ज्ञान, भक्ति और अपने सम्पूर्ण कर्मोंमें भगवच्छरणागति- का भाव—यही उपनिषदोंका मथितार्थ है। ज्ञानका अर्थ प्रचुर अध्ययनसे होनेवाला गम्भीर आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभव तथा गुरुजनोंके उपदेश एवं आचरणपर ध्यान देनेसे प्राप्त होनेवाली सम्यग् दृष्टि है। सत् क्या है और असत् क्या है, महान् क्या है और क्षुद्र क्या है, हमें क्या स्मरण रखना चाहिये और क्या भूल जाना चाहिये—इस बातको जानना आवश्यक है। इसीका नाम ज्ञान है और यह ज्ञान हमारी समस्त क्रियाओंका सूत्रधार होना चाहिये। इससे कर्ममें अनासक्तिका भाव आता है। हम कर्तव्यसे मुँह न मोड़ें, अपितु समस्त प्राप्त कर्म अनासक्त होकर तथा इस बातपर दृष्टि रखते हुए कि, किस बातमें जगत्‌का हित है और किसमे अहित है—करते रहे। हमारी क्रिया स्वार्थके लिये—अपने लाभके लिये न हो। भक्ति संकल्पकी दृढ़ता, विनयशीलता तथा श्रद्धाका वह समन्वित रूप है, जिसके द्वारा हमारा कर्म और हमारी उपासना दूसरोंके लिये तथा अपने लिये भी कल्याणकारक एवं सफल होते हैं। भक्ति- शून्य कर्म अहङ्कारका प्रतीक है और भक्तिरहित उपासना दम्भका नामान्तर है। भगवान्‌के शरण हुए बिना शोक एवं विफलतासे छुटकारा नहीं मिल सकता और न चित्तकी शान्ति ही सम्भव है। आनन्दकी प्राप्ति करानेवाला वेदान्तका यही अन्तिम उपदेश है।

दार्शनिक ज्ञानका मूल स्रोत ( माननीय पं० श्रीगोविन्दवल्लभजी पत, प्रधानमन्त्री युक्तप्रदेश ) उपनिषद् सनातन दार्शनिक ज्ञानके मूल स्रोत हैं। वे केवल प्रखरतम बुद्धिके ही परिणाम नहीं हैं अपितु प्राचीन ऋषियोंकी अनुभूतिके फल हैं। उपनिषदोंका जनतामें प्रचार करनेका आप जो प्रयत्न कर रहे हैं, उसकी सफलता सब प्रकारसे वाञ्छनीय है।

उपनिषदोंका आध्यात्मिक प्रभाव ( बिहारके गवर्नर माननीय श्री एम्० एस्० अणे महोदय ) पाठकोंको अनुवाद एवं व्याख्यासहित भेंट देनेवाले उपनिषत्सम्बन्धी 'कल्याण'के विशेषाङ्कका समस्त हिंदी पढ़नेवाली जनता स्वागत करेगी। उपनिषद् शान्ति और विश्वप्रेमका जो महान् संदेश देना चाहते हैं, उसे प्रस्तुत अङ्क गरीवोंकी झोंपड़ियोंतक पहुँचा देगा। शोपनहर-जैसे दार्शनिकको भी उपनिषदों- से शान्ति एवं आश्वासन प्राप्त हुआ है। जिनका चित्त अशान्त है, उन्हें चित्तकी सान्त्वनाके लिये उपनिषदोंसे बढ़कर कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं मिल सकता। इनके अध्ययनसे मनुष्यके विचार एवं हृद्गत भाव संयत होते हैं और सामान्यतः उनका मनुष्यपर महान् आध्यात्मिक प्रभाव पड़ता है। अतः आप एवं आपके सहयोगी इस विशेषाङ्कको निकालनेके लिये जो प्रयत्न कर रहे हैं, उसका मैं अत्यन्त आदर करता हूँ। मैं आपकी सर्वांशमें सफलता चाहता हूँ।