कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- मुक्तिके द्वार * २५ [बायाँ स्तम्भ] यह सब कारणत्व आदिका आरोप मुमुक्षुओंके हितार्थ अज्ञान-निवृत्तिके लिये ही किया गया है । इसलिये इन सबका अन्तिम पर्यवसान ज्ञानमे ही है । परत्व, आन्तरतमत्व आदिका अभिप्राय भी ज्ञानस्वरूप आत्मामें ही पर्यवसित होता है । इन्द्रियोंसे परे पञ्चतन्मात्रा, तन्मात्रासे परे मन, मनसे परे बुद्धि—इस प्रकार एककी अपेक्षा दूसरा आन्तर है । बाह्य-ग्राह्यका परित्याग करते-करते आन्तर-आन्तरके ज्ञानकी ओर अग्रसर होना ही इसका लक्ष्य है । बुद्धिसे परे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे परे अव्यक्त और अव्यक्तसे परे पुरुष—यही परत्व अथवा आन्तरतमत्वकी विश्रान्ति है, यही पराकाष्ठा और परागति है । इस पुरुषसे परे कुछ भी नहीं है । यह आत्माके एकत्वका एक उज्ज्वल उदाहरण है । उपनिषद्गत लयप्रक्रिया भी शान्त आत्माको ही लयकी अवधि बतलाती है । बारहवीं बात—अपरिच्छेद-रूप लक्षणके एकरूप होनेके कारण 'ज्ञान', 'आत्मा', 'ब्रह्म' और 'विश्व' आदि शब्द पर्यायवाची हैं और एक ही अर्थके बोधक हैं । यथा— १-‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ प्रज्ञान अपरिच्छिन्न ब्रह्म है । २-‘अयमात्मा ब्रह्म' यह आत्मा अपरिच्छिन्न ब्रह्म है । ३-‘ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्' यह सम्पूर्ण विश्व अपरिच्छिन्न ब्रह्म ही है । ४-‘सर्वं यदयमात्मा’ यह सब जो कुछ है, आत्मा ही है । ५-‘अहमेवेदं सर्वम्’ मैं ही यह सब हूँ । ६-‘प्रतिबोधविदितं मतम्’ प्रत्येक ज्ञान ही उसका ज्ञान है। ७-‘कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव' सम्पूर्ण प्रज्ञान घन ही है । ८-‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' विज्ञान और आनन्द ब्रह्म ही है। गीतामे 'ज्ञान ज्ञेयम्', श्रीमद्भागवतमें ‘विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति’, विष्णुपुराणमें 'ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतत्' इत्यादि वचनोंसे उपर्युक्त अर्थकी पुष्टि होती है । इस प्रकार उपनिषद्का प्रतिपाद्य अर्थ 'अहम्', 'इदम्', [दायाँ स्तम्भ] 'प्रत्यगात्मा' एवं 'विश्वम्' की ब्रह्मरूपता है । अब यह ब्रह्म क्या है, इसको उपनिषद्के मुखसे ही सुन लीजिये— ‘तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम् । अयमात्मा ब्रह्म । सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ।’ इसका अभिप्राय है कि जो देश, काल, वस्तु-परिच्छेदसे रहित सर्वानुभवस्वरूप अपना आत्मा है वही ब्रह्म है । ‘यत् साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' 'अहं ब्रह्मास्मि' —इत्यादि अवान्तर वाक्य एवं महावाक्य दृश्य-द्रष्टा, तुम, मैं, वह आदिके रूपसे प्रतीयमान समस्त पद-पदार्थ एवं पदार्थ-ज्ञानको अपरिच्छिन्न ब्रह्म ही निरूपण करते हैं । परिच्छेद सामान्याभावोपलक्षित ब्रह्मतत्त्वमें दृश्यता, अनेकता, परिणामिता, अन्यता आदिका कथा-प्रसङ्ग स्वय ही अनुत्थान- पराहृत है । यह तत्त्वका ज्ञान नहीं है, तत्त्वरूप ज्ञान है । इसका वेत्ता ब्रह्मका वेत्ता नहीं, ब्रह्मरूप वेत्ता है । ज्ञानके इस स्वरूपके निरूपणसे वेद अथवा उपनिषद्की अपौरुषेयताका अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है । ज्ञान ज्ञान ही है, वह किसी पुरुषकी अनुभूति, भावना, स्मृति अथवा कल्पना नहीं है । ज्ञान स्वयंप्रकाश, सर्वानुभवस्वरूप, सृष्टि-प्रलय, समाधि-विक्षेप आदि समस्त प्रतीयमान व्यवहारोंका प्रकाशक, अखण्ड, अजन्मा एव स्वतःप्रमाण है । इसका सम्बन्ध भूत, भविष्य, वर्तमान, देश, वस्तु आदि किसीके साथ नहीं है और सब कुछ यही है । यह ज्ञान है, यह जानना है । कुछ भी जानना यही है, 'कुछ' नहीं जानना है, 'कुछ' भी यही है । ऐसे ज्ञानका प्रतिपादक, अस्मर्यमाण-कर्तृक, अनादि सम्प्रदायाविच्छेदसे प्राप्त नियतानुपूर्वीक जो ग्रन्थविशेष है उसे भी अपौरुषेय कहते हैं । वह एकार्थक है, एकात्मक है, एक वाक्य है, उसके अवान्तर तात्पर्यमें भले ही भेद जान पड़ते हों परंतु परम तात्पर्यमें कोई भेद नहीं है । वेद- पुरुषका शिरोभाग अर्थात् मस्तिष्क उपनिषद् है । वह शाखा- भेदसे पृथक् पृथक् प्रतीयमान होनेपर भी एक ही है । ज्ञान अद्वितीय है—यही अपौरुषेयताका अभिप्राय है । [निचला भाग - पद्य] मुक्तिके द्वार वेदोंके सुअंग प्रतिमूर्ति हैं परमात्माकी, -उपासनाके उत्तम अगार हैं । भरे हैं वेदान्तके सिद्धान्त भी इन्हींमें सब, पातक-विनाशनको भागीरथी-धार हैं ॥ मानवीय त्रयताप हरनेके हेतु तात ! विश्वमें ये स्वतः 'रमा' प्रणव-ओंकार हैं। पठन-मननसे है होता आत्मज्ञान सदा, अखिल उपनिषद् मुक्तिके ही द्वार हैं ॥ —लक्ष्मीप्रसाद मिश्री ‘रमा’