भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

अनिवार्य होगा । यही कारण है कि ज्ञानको उत्पाद्य अथवा आत्माका समवायी माननेवालोंने उसके जो-जो निर्वचन किये हैं, उन्हींकी रीतिसे वेदान्तीलोग उनका निषेध करते हैं । अनिर्वचनीयता भी परमत रीतिसे है । अनिर्वचनीयताका अभिप्राय केवल इतना ही है कि यह ज्ञानस्वरूपसे भिन्न नहीं है । अबाध्यता, स्वयंप्रकाशता, अपरिच्छिन्नता आदि जो लक्षण हैं, वे अन्य पदार्थमे, चाहे उसका नाम कुछ भी क्यों न रक्खें, पूरे नहीं उतर सकते । एक पर-रूप अपरिच्छिन्न स्वप्रकाश एव अबाध्य हो तथा दूसरा स्वस्वरूप, वह भी हो और मैं भी होऊँ, यह बात अनुभूतिका विश्लेषण करनेपर सिद्ध नहीं होती । अज्ञेय और अनिर्वचनीय शब्द पर्यायवाची नहीं है । विदित और अविदितसे विलक्षण अन्य नहीं हो सकता । इसलिये अनिर्वचनीय पद समस्त निर्वचनोंका निषेध करके अनिरुक्त स्वात्मामें ही विश्रान्ति लाभ करता है ।

ग्यारहवीं बात—सत्य, अहिंसा, ध्यान, उपासना, परत्व, कारणत्व आदि ज्ञानके ही उपलक्षण हैं । मुमुक्षु और मुक्तके व्यावहारिक भेदको सामने रखकर यदि सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणोंके स्वरूपपर विचार किया जाय तो किसी भी गुणमें सत् होनेका निर्देश सच्चित्स्वरूप आत्माके सामीप्यके कारण ही करते है । जितना जितना आत्म सामीप्य जिस जिस वृत्तिमें है, वह-वह वृत्ति उतना ही उतना अधिक शोधनद्वारा आत्मसाक्षात्कारका अथवा अज्ञान निवृत्तिका उपाय है । उदाहरणार्थ—सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणरूप वृत्तियोंको ही ले लीजिये । असत्य रूप दुर्गुण अनेकरूप होगा । उसके आचरण-भाषण आदिकी वृत्तियाँ भिन्न-भिन्न विषयोके एव चिन्ताके भारसे ग्रस्त होंगी । इसके विपरीत सत्य वृत्तिके लिये किसी चिन्ता—बनावट वा विषय चिन्तनकी आवश्यकता नही होगी । मुमुक्षुपुरुष सरल स्वभावसे विषयरहित सत्य वृत्तिमें स्थित रह सकेगा और वास्तवमें वह आत्मस्थिति ही होगी । अज्ञान निवृत्ति होनेपर स्थितिके लिये उसे किसी प्रयासकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी । इसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ आदि दुर्गुणकी वृत्तियाँ भी सगर्भ एव सविषय ही होती हैं । किसके प्रति काम है, किसपर क्रोध है, क्या चाहिये–यह निश्चय करके तदाकार हुए विना इन दुर्गुणोंकी स्थिति नही हो सकती । इसके विपरीत निष्कामता, अक्रोध एव निर्लोभता आदि वृत्तियाँ यह अपेक्षा नहीं रखतीं कि हम किसके प्रति हैं । विषयहीन वृत्ति अपने आश्रयभूत प्रत्यगात्मासे अपनेको पृथक् नहीं दिखाती है—इसलिये आत्मविषयक अज्ञान-


[दायाँ स्तम्भ]

निवृत्तिकी प्रतिबन्धकतासे रहित होती है । सविषय स्थिति ही मुमुक्षुको मत्से भिन्न प्रतीत होती है । निर्विषय वृत्ति तो मद्रूप ही प्रतीत होती है—यही आत्म सामीप्य ज्ञानस्वरूप आत्माका उपलक्षण है । अभिप्राय यह है कि ये वृत्तियाँ भी असत्य, हिंसा आदिके अभावरूप होनेके कारण स्वतः भावरूप नहीं, ज्ञानरूप हैं, अनेक नहीं, अद्वितीय हैं। ध्यान, उपासना आदि भी अनेकविषयक वृत्तियोको व्यावृत्त करनेके लिये ही है, क्योंकि एक वस्तुमे एकतानता ही उनका स्वरूप है।

ज्ञानस्वरूप परमात्मामे कार्य-कारणकी कल्पना अथवा भोक्तृ भोग्य भेदभावनी कल्पना असगत है । श्रुतिने—

'न तस्य कश्चिजनिता' 'न तस्य कार्यम्' 'न तदृक्षास्ति कश्चन' 'न तद्भाति किञ्चन'

—आदि वाक्योके द्वारा इसी अर्थका प्रतिपादन किया है। इस बातको ध्यानमें रखकर जब कार्य-कारण भाव वर्णन करनेवाली श्रुतियोको पढते हैं, तब स्पष्ट रूपमे उनका अन्य अभिप्राय ज्ञात होता है । यथा—

१-दृश्य प्रपञ्चमे नित्यताकी भ्रान्ति निवारण करनेके लिये उसकी उत्पत्ति प्रपञ्चका वर्णन है ।

२-परमाणु, प्रकृति आदि अन्यकारणताका निषेध करनेके लिये ज्ञानस्वरूप परमात्मामे कारणत्वका अध्यास किया गया है।

३-निमित्तकारण और उपादानकारणका भेद मिटानेके लिये ऊर्णनाभि, विस्फुलिङ्ग आदिके दृष्टान्त हैं एव एक विज्ञानसे सर्व विज्ञानकी उपपत्ति दिखायी गयी है । 'वही सब हो गया', 'म एकसे बहुत होऊँ' इत्यादि वचनोका अभिप्राय उपादान और निमित्त कारणके भेदकी निवृत्तिमात्र ही है, परिणाम नहीं ।

४-परिणामका निषेध करनेके लिये ही परमात्माके अद्वितीय अज-स्वरूपका वर्णन करते हुए 'स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः' अर्थात् जो कुछ बाह्यत्वेन अथवा आभ्यन्तरत्वेन प्रतीत हो रहा है वह अज ही है, ऐसा कहा गया है और दृश्य प्रपञ्चकी उपपत्तिका लिये परमात्मामे मायाका अध्यारोप किया गया है।

५-'न तु तद् द्वितीयमस्ति' 'विकल्पो न हि वस्तु' इन श्रुतियों से अध्यारोपित मायाका भी अपवाद कर देते हैं। 'सद्वेदं सर्वम्' 'चिद्वेदं सर्वम्' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियाँ परमात्मासे भिन्न और कुछ नही है—यह प्रतिपादन करती हैं।