भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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ज्ञानका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता। यदि अन्तर्द्देशमे ही माने तो ज्ञानके साथ व्यापक व्याप्य-भाव सम्बन्ध स्वीकार करना पड़ेगा। यह सम्बन्ध भी ज्ञानको विषयका उपादान कारण माने बिना सम्भव नहीं है। तब क्या ज्ञान परिणामको प्राप्त होकर विषयका रूप ग्रहण करता है? ऐसी स्थितिमे परिणामकी एक धारा अथवा क्रम स्वीकार करना पड़ेगा। यह बात तभी स्वीकार की जा सकती है, जब कालकी क्षणिकताका आरोप उसके प्रकाशक ज्ञानपर किया जाय; परन्तु अध्यस्तके गुण-दोष अधिष्ठानका स्पर्श भी नहीं कर सकते। आदिरहित, अन्तरहित ज्ञानमे विषयकी उपस्थितिके लिये एक क्षण अथवा भिन्न-भिन्न क्षण ह ही नहीं। यह भी एक प्रश्न है कि विषय सम्पूर्ण ज्ञानमे हे अथवा ज्ञानके एक अशमे । ज्ञानमे अशता, पूर्णता आदि तो कल्पित हैं। फिर यदि ज्ञानका परिणाम माने भी तो क्या उसका कोई आकार है जो दूधसे दहीके समान रूपान्तरित होगा और क्या वह रूपान्तर भी ज्ञानस्वरूप नहीं होगा? ऐसी स्थितिमें प्रथमरूप द्वितीय रूपका भेद विचारहीनों- के द्वारा कल्पित एव केवल विवर्तमात्र होगा। ज्ञेय विषयका निराकरण हो जानेपर ज्ञातृत्वकी कल्पनाका कोई कारण ही नहीं है। सातवीं बात--ज्ञान हेतुफलात्मक नहीं है। ज्ञानकी उत्पत्ति स्वीकार करनेपर उसके प्रागभावकी अर्थात् उसकी उत्पत्तिके पहलेकी स्थिति बतानी पड़ेगी। परन्तु ज्ञानके बिना उसकी भी स्थिति नहीं बतलायी जा सकती। अभिप्राय यह है कि ज्ञानका जन्म नहीं होता। अन्तःकरणकी शुद्ध स्थिति अथवा निर्विषयता भी ज्ञानकी जननी नहीं है, विचारकी जननी है। विचारके द्वारा वृत्त्यात्मक ज्ञान परिपुष्ट होता है और दृढ होनेपर वह अज्ञानका नहीं, अज्ञान-भ्रान्तिका निवर्तक होता है। प्रक्रिया ग्रन्थोंके अनुसार यह वृत्त्यात्मक ज्ञान भी दूसरे क्षणमें नहीं रहता है। यह क्षणसहित वृत्तिको और अपने व्यक्तित्वको भी बाधित कर देता है। जब यह स्वय बाधित होता हे तब कोई अपना कार्य या फल छोड़कर बाधित हो और वह ज्ञान- वृत्तिकी निवृत्तिके अनन्तर रहे, तब तो द्वैत बना ही रहा। इसलिये हेतुता और फलनाकी कल्पना ही मिटती है। हेतु और फल तो कुछ है ही नहीं, जिनकी ज्ञानसे निवृत्ति होती हो। अज्ञान घटके उपादानकारण मृत्तिकाके समान जगत्‌का उपादान नहीं है। वह तो जगत्‌की व्यवस्थाकी सिद्धिके लिये कल्पित है। अज्ञान है--यह कल्पना भी ज्ञानका विवर्त ही है। इसलिये ज्ञानवृत्तिसे अज्ञानका ध्वंस नहीं होता, प्रत्युत कल्पना ही बाधित होती है। यह निवर्त्य-निवर्तक भावकी कल्पना अविचार दशामे ही है। ज्ञानदृष्टिसे हेतुफलात्मक भेद सर्वथा ही असिद्ध है। आठवीं बात-ज्ञानमे यथार्थ-अयथार्थ और परोक्ष- अपरोक्षका भेद भी नहीं है। व्यवहारसे जो ज्ञानमे यथार्थता आदि भेद किये जाते हे, यदि वास्तवमें विचार करके देखें तो कल्पित विषयगत भेद ही ज्ञानपर आरोपित होते हं। स्वप्नका हाथी झूठा है। परतु स्वप्नमे हाथीका देखना झूठा नहीं है। 'हाथी नहीं था' हमारी जाग्रत्कालीन स्मृतिका यही स्वरूप है। हाथी देखा ही नहीं था, यह नही। हाथीकी असत्ता ज्ञानकी असत्ताकी प्रयोजक नहीं हो सकती। अविचार दशामें हाथीकी अयथार्थताका आरोप ज्ञानपर कर दिया जाता है। इसी प्रकार ज्ञानकी परोक्षता भी विचारणीय है। परोक्ष- अपरोक्षका भेद घटादि पदार्थामे होता है या उनके ज्ञानसे ? क्या ज्ञान भी कभी अपनेसे दूर होता है। यदि ऐसा मान लें 'पृथ्वीपर घट है और अन्तःकरणमे ज्ञान' तब भी तो घट- ज्ञान अपने अन्तःकरणमे ही रहा। उसकी परोक्षता कहाँ हुई। घटगत परोक्षताका ही आरोप ज्ञानपर हुआ। यह तो छोटी बात है। आश्रयत्व, विषयत्व आदि विभागसे रहित अद्वितीय चित्स्वरूप ज्ञानमें अयथार्थता और परोक्षताकी कथा- का कोई प्रमंग ही नहीं है। नवीं बात-ज्ञान सर्वथा अवाध्य है। ज्ञानका कोई भी प्रतियोगी या विरोधी नहीं है। स्वयं अज्ञान भी ज्ञानके द्वारा ही प्रकाशित होता है। 'मैं अज्ञ हूँ' यह भाव भी एक प्रकारका ज्ञान ही है। ज्ञानमें यह प्रकारभेद भी विचार न करनेसे जान पड़ता है। कहनेका तात्पर्य यह है कि सन्निहीन होनेके कारण ज्ञान और अज्ञानका भेद कल्पित है। इसलिये अज्ञान ज्ञानका बाध नहीं कर सकता। ज्ञानके बाधकी कल्पना करनेपर यह प्रश्न होता है कि ज्ञानका बाध ज्ञात होगा या अज्ञात, वह ससाक्षिक होगा अथवा निःसाक्षिक। अज्ञात और असाक्षिक होनेपर ज्ञानका बाध होनेमें कोई प्रमाण नहीं है। ज्ञात और ससाक्षिक स्वीकार करनेपर ज्ञानकी सत्ता-ज्ञान- स्वरूप सत्, अक्षुण्ण एव अखण्ड सिद्ध हो जाता है। दसवीं बात-ज्ञानका स्वरूप अनिर्वचनीय है। जब हम किसी पदार्थका निर्वचन करने लगते हैं, तब उसमें दृश्यता, अन्यता आदिका आरोप अवश्य करते है। कोई भी निर्वचनार्ह वस्तु इदन्तासे आक्रान्त ही होगी। इसलिये मन-वाणीका विषय भी अवश्य होगी। ऐसी स्थितिमें विषय-विषयीभाव भी