भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :

हम कालके अभावकी कल्पना करेंगे, वह भी काल ही होगा और कालके अभावकी कल्पनाको निवृत्त कर देगा । अभावरहित वस्तु निरंश होती है । गुणन अथवा विभाजन केवल सांश वस्तुमें हो सकता है, निरंशमें नहीं । इसलिये अभावरहित कालमें कला-काष्ठादिरूप अवयवके आधारपर भूत-भविष्यकी कल्पना करना निःसार है । तब ये जो भूत भविष्य मालूम पड़ते है, वे हे क्या ? संविन्मात्र है । कोई भी संविन्मात्र वस्तु संवित्को परिच्छिन्न नहीं बना सकती । इसलिये ज्ञान कालपरिच्छिन्न नहीं है ।

चौथी बात—ज्ञानमे देश-परिच्छेद भी नहीं है । ज्ञानमें कालपरिच्छेदका निषेध करते समय यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह जो धारा अथवा क्रमकी संवित् है, यह कालनिष्ठ नहीं है, संविन्मात्र ही है । जैसे स्वप्नके पचासो वर्ष कालके अवयव नहीं हैं, संविद्रूप ही ह, उनमे भूतकी स्मृति, भविष्यत्की कल्पना और ज्ञानके द्वितीयत्व सद्वितीयत्व की प्रतीति संविन्मात्र ही है, वैसे ही यह जो दैर्ध्य विस्तार की कल्पना हो रही है, सो भी संवित्मे भिन्न नहीं है ।

पूर्व, पश्चिम, उत्तर आदिके रूपमें प्रतीयमान देशभेद देशनिष्ठ हैं अथवा पृथ्वी, सूर्य, ध्रुव आदि ग्रहनक्षत्रनिष्ठ हैं ? यह स्पष्ट है कि इस भेद-कल्पनाका कारण ध्रुवादि ग्रहनक्षत्र है, देश नहीं । तब क्या अन्यगत भेदका अन्यपर आरोपित करना न्यायोचित है ? कदापि नहीं । कालके समान ही कहीं भी देशका अभाव नहीं है । जिस देशमे देशके अभाव की कल्पना की जायगी, वह भी देश ही होगा । अभावरहित देश ब्रह्म है । पूर्व, पश्चिम आदि एव दैर्ध्य विस्तार आदिकी कल्पना वस्तुनिष्ठ नहीं, संविन्मात्र है, ठीक वैसी ही जैसी स्वप्न-देशकी ल्वाई-चौड़ाई । स्वप्रकाश ज्ञानके द्वारा प्रकाशित देशभेद ज्ञानका भेदक नहीं हो सकता । इसलिये ज्ञान देश परिच्छेदसे रहित है ।

पाँचवीं बात—विषयपरिच्छेद भी ज्ञानका परिच्छेदक नहीं है, सबसे पहले तो यह विचार करनेयोग्य है कि विषय देश काल परिच्छेदके आश्रित है या नहीं ? जब भी कोई विषय प्रकाशित होगा, अपनेको किसी-न किसी काल और देशमे ही प्रकाशित करेगा । देश और कालभेदकी कल्पनाके बिना विषयकी प्रतीति ही नहीं हो सकती । ठीक इसी प्रकार विषयभेदके बिना देश और कालकी भी प्रतीति नहीं हो सकती । जब देश और कालके भेद ही कल्पित हैं, तब उनके आश्रयसे प्रतीत होनेवाले विषय अकल्पित कैसे हो सकते हैं ?

ये पृथक् पृथक् प्रतीयमान विषय सन्मात्र ही हे या और कुछ ? यदि ये सन्मात्र ही हैं तो इनमे भेदकी कल्पनाका क्या आधार है, फिर तो इन्हे त्रिकालाबाध्य सत्तासे भिन्न समझा ही नहीं जा सकता । और यदि ये सन्मात्रसे भिन्न हैं तो इन्हें नितान्त असत् कहनेमे क्या आपत्ति है ? सत् और असत् भाव और अभावका मिश्रण तो कभी हो ही नहीं सकता । अब यह कल्पना करे कि ये भिन्न भिन्न विषय सत्ताके विशेष विशेष रूप हैं, परन्तु यह बात भी निराधार है । बिन देश कालका भेद सिद्ध हुए सत्तामे भेद सिद्ध करनेकी कोई युक्ति नहीं ह । सत्ताका परिणाम स्वीकार करनेपर भी परिणाम की पूर्वावस्था, उत्तरावस्था, क्रम आदि अपेक्षित होंगे । इस प्रकार तो सत्ताका त्रिकालाबाध्यत्व ही कट जायगा और शून्य-वाद, क्षणिकविज्ञानवाद अथवा मर्मोच्छेदवादका प्रसङ्ग होगा । यदि यह कल्पना करें कि सत्ताका एक अंश तो स्थिर है और दूसरे अंशमे यह विपयोंका आरम्भ कर रही है या उनके रूपमे परिणत हो रही है तो यह अगभेदकी कल्पना सर्वथा उपहासास्पद होगी । जो वस्तु एक अगमे विदीर्ण हो रही है, वह दूसरे अगमे नित्य नहीं हो सकती । अशभेद तो असिद्ध है ही । इसलिये सत्तामे विशेष भी उत्पन्न नहीं होता । विषयो-की उत्पत्ति सत्से, असत्से, सदसत्मे अथवा उनमे भिन्नसे किसी भी प्रकार सगत नहीं है । जिनकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ही असिद्ध है, जिनका स्वयं अपने अधिष्ठानमे ही अत्यन्ताभाव है, ज्ञानके बिना जिनकी कल्पना ही नहीं हो सकती, ऐसे विपयोंके द्वारा भी ज्ञान परिच्छिन्न नहीं हो सकता ।

छठी बात—ज्ञानमे ज्ञातृत्व और ज्ञेयत्वका भेद भी औपाधिक ही है । देश काल और वस्तुभेदका निषेध हो जानेपर ज्ञानसे पृथक् ज्ञेयकी उपस्थिति अपने आप ही कट जाती है । ज्ञेयके बिना ज्ञातृत्वके व्यवहारकी सिद्धि नहीं हो सकती । ज्ञेय और ज्ञाता दोनो ही एक दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं, परंतु ज्ञान दोनोंकी, दोनोमेसे किसी एककी अथवा और किसी अन्यकी अपेक्षा रखे विना स्वत सिद्ध है । यदि ज्ञेयरूप विषय भी ज्ञानसे पूर्व सिद्ध है, ऐसा माना जाय तो अननुभूत होनेके कारण वह केवल कल्पना होगी । अनुभवके विना पदार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती । यह जो भिन्न भिन्न विषय और इनकी समष्टि ज्ञेयरूपसे पृथक् प्रतीत होती है, वह क्या ज्ञानसे बहिर्देशमें है अथवा ज्ञानके अन्तर्देशमें ? पहली बात तो यह है कि ज्ञानमें बहिर्देश और अन्तर्देशकी कल्पना नितान्त असगत है । दूसरी यह कि ज्ञेय विषयको बहिर्देशमें माननेपर उसके साथ