कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपौरुषेयताका अभिप्राय ( लेखक - स्वामीजी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज ) वेद शब्दका अर्थ ज्ञान है । वेद-पुरुषके शिरोभागको उपनिषद् कहते हैं । उप ( व्यवधानरहित ) नि ( सम्पूर्ण ) 'षद्' ( ज्ञान ) ही उसके अवयवार्थ हैं । अर्थात् वह सर्वोत्तम ज्ञान जो ज्ञेयसे अभिन्न एवं देश, काल, वस्तुके परिच्छेदसे रहित परिपूर्ण ब्रह्म है, 'उपनिषद्' पदका अभिप्रेत अर्थ । इसलिये जबतक ज्ञानके स्वरूपका ठीक-ठीक विचार न कर लिया जायगा, तबतक उपनिषद् क्या है, यह बात स्पष्ट नहीं हो सकेगी । पहली बात - ज्ञान स्वतः प्रमाण है, परतःप्रमाण नहीं । इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी पदार्थका यथार्थ निश्चय करनेमें ज्ञान ही अन्तिम निर्णायक होगा । सम्पूर्ण व्यवहार अपने ज्ञानके आधारपर ही चलता है । किसी भी विषयके होने एवं न होनेका निर्णय करनेमें ज्ञान ही अन्तिम कारण होगा । उदाहरणार्थ-विषयकी सत्ता इन्द्रियोंसे, इन्द्रियों- की मनसे, मनकी बुद्धिसे और बुद्धिकी ज्ञानस्वरूप आत्मासे निश्चित होती है । अज्ञानका अनुभव भी ज्ञान ही है, परंतु ज्ञानको प्रमाणित करनेके लिये क्या ज्ञानसे भिन्न पदार्थकी आवश्यकता होगी ? कदापि नहीं । प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेयकी त्रिपुटी ज्ञानके द्वारा ही प्रकाशित होती है । इसलिये ज्ञानकी सिद्धिके लिये उनकी कोई अपेक्षा नहीं है। यों भी कह सकते हैं कि इस त्रिपुटीके भाव और अभावका प्रकाशक ज्ञान ही है। वे रहें तब भी ज्ञान है और न रहे तब भी ज्ञान है । ज्ञानके बिना उन्हें अनुभव ही कौन करेगा । त्रिपुटीमें ज्ञानका अन्वय है और ज्ञान त्रिपुटीसे व्यतिरिक्त है। इसलिये ज्ञानकी सत्ता अखण्ड है । प्रमाणोंके द्वारा ज्ञानकी सिद्धि नहीं होती । ज्ञानसे ही समस्त प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं। तात्पर्य यह कि ज्ञानका प्रामाण्य स्वतः है, परतः नहीं । दूसरी बात - ज्ञान स्वयंप्रकाश है। यह कर्ता, करण, क्रिया एवं फलके अधीन नहीं है। कर्ता करोड़ प्रयत्न करके भी स्थाणु ज्ञानको पुरुष-ज्ञान नहीं बना सकता । मान्यता कर्ताके अधीन होती है। वह अपनी मानी हुई वस्तुको गणेश माने, सूर्य माने, बादमें फेरफार कर दे या बिल्कुल ही छोड़ दे-इन सब बातोंमें स्वतन्त्र होता है। परंतु यह ज्ञान नहीं है, यह तो कर्ताकी कृति है, जिसको वह स्वयं गढ़ता है और बादमे स्वतन्त्र मान लेता है। ये मान्यताएँ प्रत्येक कर्ताकी, सम्प्रदायकी, जातिकी और राष्ट्रकी अलग-अलग हो सकती हैं और होती हैं परंतु ज्ञान सबका एक होता है। स्थाणुको भिन्न भिन्न मनुष्य चोर, सिपाही अथवा भूतके रूपमे मान सकते हैं । परंतु ज्ञान सबका एक ही होगा कि यह स्थाणु है। पुरुष-भेदसे ज्ञानमें भेद नहीं हो सकता । क्योंकि किसी भी पुरुषके द्वारा अथवा पुरुषविशेषद्वारा ज्ञानका निर्माण अथवा रचना नहीं होती । यहाँतक कि ईश्वर भी ज्ञानका कर्ता नहीं होता । वह तो स्वयं ज्ञानस्वरूप है। यदि ईश्वर ज्ञानका कर्ता हो तो ज्ञानरूप कर्मके पूर्व ईश्वरमे ज्ञानका अभाव स्वीकार करना पड़ेगा । परंतु ज्ञानका अभाव किसी भी प्रमाण अथवा अनुभवसे सिद्ध नहीं हो सकता । वह प्रमाण या अनुभव भी तो ज्ञानरूप ही होगा। अभिप्राय यह है कि ज्ञान साधन-साध्य नहीं है, सिद्ध है। उसके कारण- के रूपमें अज्ञानकी अथवा ज्ञानान्तरकी कल्पना नितान्त असंगत है । इसलिये ज्ञान स्वयंप्रकाश है । तीसरी बात - ज्ञान काल-परिच्छिन्न नहीं है। जब हम यह सोचने लगते हैं कि यह ज्ञान भूत है और यह ज्ञान भविष्य है, तब हम मानो यह स्वीकार कर लेते हैं कि कालकी धारामे ज्ञानका उदय एवं विलय हुआ करता है अर्थात् ज्ञान क्षणिक है। परंतु यह क्षण ही क्या है जिसकी पृथक्ताका आरोप ज्ञानपर किया जाता है। प्रश्न यह है कि काल सावयव है अथवा निरवयव ? यदि निरवयव है तो उसमे भूत-भविष्य एवं कला-काष्ठा आदिके भेद ही सम्भव नहीं हैं, वह ब्रह्म ही है। यदि सावयव है तो ज्ञान उसके भिन्न-भिन्न अवयवोंका प्रकाशक मात्र होगा और प्रकाश्यगत भेद प्रकाशकपर आरोपित नहीं किया जा सकेगा। जैसे घट-पटादिके भिन्न-भिन्न होने- पर भी उनको प्रकाशित करनेवाले प्रकाशमें भेद-कल्पनाका कोई प्रसङ्ग नहीं है, ऐसे ही कला-काष्ठा आदिरूप कालके अवयवोंमें भेद होनेपर भी उनके प्रकाशक ज्ञानमे भेद- कल्पनाका अवसर नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि काल- भेदकी कल्पना ही निर्मूल है । कल्पना करें कि क्या कभी कालका अभाव था या कालका अभाव होगा, जिस कालमे १ गत्यर्थक षद् धातु ।