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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सर्प तो मिथ्या है, पर रस्सी सत्य है। जगत्के मिथ्यात्वका यही अर्थ है। जगत् जगत्-रूपसे असत्य है, ब्रह्मरूपसे सत्य है। ब्रह्म ईश्वर नहीं है। वह चेतन नहीं चित् है। न उसमें इच्छा है, न सङ्कल्प है। न उसमें कोई परिवर्तन होता है। न उसमें क्रिया करनेकी सम्भावना है। जिस अज्ञानके कारण उसमें जगत्की प्रतीति होती है, उसका दूर हो जाना मोक्ष है। भारतीय दर्शनमें 'पुनर्जन्म' सिद्धान्तका बहुत बड़ा स्थान है। अपने कर्म-संस्कारोंके कारण प्राणी एकके बाद दूसरे शरीरको धारण करता है। उसके सुख-दुःखका कारण किसी ईश्वरकी इच्छा नहीं, वर स्वयं उसका कर्म है। जब जीवनका सबसे बड़ा उद्देश्य, परम पुरुषार्थ मोक्ष है तो फिर किसी सर्वशक्तिमान् व्यक्तिकी खुशामद करनेकी किसी ईश्वरकी आँख बंदकर आज्ञा माननेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। वेदादि ग्रन्थ निश्चय ही विधि-निषेधकी घोषणा करते हैं, परंतु उनके आदेश उसी प्रकारके हैं, जैसे कि बड़ा भाई छोटे भाईको देता है। देवगण और ऋषिगण भी जीव हैं। वे भी नीचेसे ऊपर उठे हैं। जो जीव आज उनकी आज्ञाओंका पालन करता है, वह ज्ञानकी वृद्धिके साथ- साथ उन आज्ञाओंके औचित्यका स्वयं अनुभव करने लगेगा और एक दिन उस पदवीको प्राप्त कर लेगा, जब उसको किसी उपदेशककी आवश्यकता न रह जायगी। वह स्वयं परमर्षि महादेव हो जायेगा। उसके मन और शरीरसे सत्कर्म उसी प्रकार होंगे, जिस प्रकार कि बादलसे अनायास जलकी वृष्टि होती है। इसीलिये इस अवस्थाको धर्ममेघ कहते हैं। जिस परमात्माकी ओर इन शास्त्रोंमें संकेत है, वह अल्लाहसे बहुत भिन्न है। वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक होते हुए भी कर्मके अटल सिद्धान्तको किसी भी अंशमें बदल नहीं सकता। उसका दूसरा नाम मायाशबल ब्रह्म है। अर्थात् वह ब्रह्मका वह रूप है जिसकी अनुभूति मायाके झीने परदेके भीतरसे होती है। यह स्पष्ट है कि इस विचारशैलीमें प्रधान स्थान ज्ञान- विद्याका ही हो सकता है, क्योंकि अविद्याके दूर होनेसे ही मोक्ष हो सकता है अर्थात् जीव इस प्रतीयमान जगत्मे अपने जीवत्वके जीवेश्वर-भेदके ऊपर उठकर आत्मस्वरूप अर्थात् अखण्ड, अद्वय, सत्, चिन्मात्र, अनिर्वचनीय ब्रह्म- पदमें स्थिर हो सकता है। अविद्याका विनाश विद्यासे हो सकता है, कर्मसे नहीं। कर्म उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट क्यों न हो, वह द्वैतकी सत्ताको स्वीकार करके ही किया जा सकता है और इस दृष्टिसे जीव और मोक्षके बीचकी दीवारको दृढ़ करता है। शृङ्खला भले ही सोनेकी हो, परंतु कोई बुद्धिमान् उससे बँधना पसंद न करेगा। इसीलिये हमारे दर्शनोंमें कर्त्तव्यज्ञानको प्राधान्य नहीं दिया जा सकता। हम 'शिवम्'का नाम लेते भी हैं तो 'सत्यम्'के बाद। मोक्षानुभूति अर्थात् साक्षात्कार समाधिसे होता है और समाधिके लिये अभ्यास एवं वैराग्यकी आवश्यकता है। विक्षिप्त चित्त प्रतिक्षण इधर-उधर भटकता फिरता है। स्थिर सत्यका अनुभव नहीं कर सकता। ऐसे अनुभवके लिये चित्तको वासनाविरहित करना होगा । कठोपनिषद्के शब्दोंमें— 'यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवति ।' (२।३।१४) इसका तात्पर्य यह हुआ कि कर्म किये तो जायें परंतु निष्काम होकर, वासनाओंकी तृप्तिके लिये नहीं, वर उनके उपशमके लिये। भारतीय दर्शनमें यही सब कर्मदर्शनका उद्गम- स्थान है। ईशावास्योपनिषद् विशेषरूपसे विचारणीय है— ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ १-२ ॥ पहले द्वितीय मन्त्रको लीजिये। इस प्रकार कर्म करते हुए वह अर्थात् उनके द्वारा दुःख, बाधा भय आदिके संस्कार उसको क्लिष्ट न कर सकें। मनुष्य सौ वर्ष अर्थात् पूर्णांयु जीवे। शुक्ल यजुर्वेदके छत्तीसवें अध्यायका चौबीसवाँ मन्त्र इस सौ वर्षकी पूर्ण आयुका रूप बतलाता है— 'पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्।' 'हम सौ वर्षतक जीते रहे, हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सौ वर्षतक काम करती रहे । (वैदिक वाङ्मयमें चक्षुको सब ज्ञानेन्द्रियोंका और वाणीको सब कर्मेन्द्रियोंका उपलक्षण मानते हैं।) सौ वर्षतक ज्ञानका सञ्चय करते रहें (वेदको श्रुति कहते हैं इसलिये 'हम सुनते रहें' का अर्थ है हमको ज्ञानकी प्राप्ति होती रहे) और हम सौ वर्षतक अदीन रहें।' पहला मन्त्र यह बतलाता है कि किस प्रकारका आचरण करनेसे मनुष्य कर्म फलसे अलिप्त रह सकता है । समस्त जगत्को ईश्वरसे आच्छादित करना चाहिये । ऐसा मानना चाहिये कि समस्त जगत्में ईश्वर भीतर और बाहर व्याप्त है।

  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३३ समस्त जगत् उसकी अभिव्यक्ति है । ऐसी अवस्था में एक दुराचारको दूर करनेका, सतत अभ्यास करना होगा । अपनी वस्तुको पसंद करने और दूसरीको नापसद करनेका प्रश्न ही शारीरिक और बौद्धिक विभूतियोंको इस प्रयासमें लगाना ही नहीं उठ सकता । इसलिये जो कुछ यदृच्छया प्राप्त हो जाय, त्याग है। इस वल्लीका एक और मन्त्र कहता है— उसका त्यागके द्वारा असङ्ग भावसे उपभोग करना चाहिये । नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । त्याग सक्रिय भाव है । हम उसकी व्याख्या आगे चलकर नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ करेंगे । अन्तमें मन्त्र यह कहता है कि किसीके अर्थात् दूसरोंके (कठ० १।२।२४) धनकी लालच मत करो । यह सुननेमें बड़ी स्थूल सी बात प्रतीत 'जो दुश्चरितसे विरत नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ होती है, परंतु इसका वास्तविक आशय यह है कि मनुष्यको वशमें नहीं हैं, जिसका चित्त समाधिमे स्थिर नहीं है, उसको चाहिये कि विषयोंकी, जो दूसरों अर्थात् इन्द्रियोंके धन हैं, इस सत् पदार्थका ज्ञान नहीं हो सकता।' केनोपनिषद्में कर्मको कामना न करे। यदि ध्यानसे देखा जाय तो सारी भगवद्गीता विद्याके आधारों—वर्तनोंमें परिगणित किया है । इन दोनों मन्त्रोंकी व्याख्यामात्र है । तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्य- कठोपनिषद्‌की दूसरी वल्लीने परम पुरुषार्थ और सदाचारके मायतनम् । (केन० खण्ड ४ मन्त्र ८) सम्बन्धमें एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात कही है। जिसके बारेमे भारतीय आचार्यों ने कर्मका क्षेत्र कभी भी मनुष्यतक पाश्चात्य विद्वानोंको भी बराबर विचार करते रहना पड़ता है । सीमित नहीं किया । इस जगत्में ब्रह्मदेवसे लेकर कीटाणुतक् अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः । जितने भी प्राणी हैं, उन सबसे हमारा सम्बन्ध है, उन सबका तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ हमारे ऊपर ऋण है, उन सबके ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोगसे (कठ० १।२।१) ही हमारा कल्याण हो रहा है। अतः उन सबके प्रति हमारा श्रेय प्रेयसे भिन्न है । इन दोनोंके अर्थ अर्थात् विषय कुछ-न-कुछ कर्तव्य है । न तो हम उन सबको पहचानते हैं, भिन्न हैं और ये मानो जीवको अलग-अलग प्रकारसे बाँधते जो निरन्तर हमारा उपकार कर रहे हैं और न उन सबकी हैं। जो श्रेयको चुनता है, उसका कल्याण होता है, परंतु जो किसी प्रकारकी सेवा ही कर सकते हैं, परंतु इस बातका प्रेयको चुनता है, वह पुरुषार्थसे दूर हो जाता है । इसके आगे अनुभव भी हमारे चरित्रको उठाता है कि हम पदे-पदे दूसरों- चलकर कहा गया है— के ऋणी हैं। 'तमक्रतुः पश्यति वीतशोको बृहदारण्यक-उपनिषद्‌के पहले अध्यायके चौथे ब्राह्मणका धातुप्रसादान्महिमानमात्मन ।' सोलहवाँ मन्त्र कहता है— (कठ० १।२।२०) अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति जो व्यक्ति फलकी कामनाको छोड़कर कर्म करता है, यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ जो शोकका अतिक्रमण कर गया है, वह धातुके प्रसादसे यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ आत्माकी महिमाका अनुभव करता है। यहाँ 'धातु'का तात्पर्य यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ अन्तःकरण और उसके उपकरणों अर्थात् इन्द्रियोंसे है । यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा अन्तःकरणके प्रसादकी प्राप्तिका उपाय पातञ्जलयोग-दर्शनमें वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषा लोको यथा ह वै इस प्रकार बताया गया है— स्वाय लोकायारिष्टमिच्छेदेवं हवैविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टि- 'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयेषु मिच्छन्ति । भावनातश्चित्तप्रसादनम्।' 'कर्ममें लगा हुआ यह आत्मा सब प्राणियोंका लोक चित्तका प्रसाद प्राप्त करनेके लिये सुखके प्रति मैत्रीका अर्थात् आश्रय है। अपने यज्ञ और पूजनसे वह देवोंका लोक अर्थात् ससारमें सुखकी मात्राको बढानेका, दुःखके प्रति होता है । अपने अध्ययन और अनुशिक्षणसे ऋषियोंका, करुणाका, अर्थात् ससारमें दुःखकी मात्रा घटानेका, पुण्यके पितरोंके लिये बलि देने और सन्तान छोड़ जानेकी इच्छा प्रति मुदिताका अर्थात् ससारमें पुण्यकी मात्रा बढानेका और करनेसे पितरोंका, मनुष्योंको भोजनादि देनेसे मनुष्योंका, अपुण्यके प्रति उपेक्षाका, अर्थात् दुराचारीसे द्वेष न करते हुए उ० अ० ५—

३४ :: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति तृणोदक देनेसे पशुओंका तथा उन कुत्तों, चिड़ियों और चाटी आदि छोटे प्राणियोंका लोक हो जाता है, जो उसके घरमें रहते है और उसके सहारे जीते है । जिस प्रकार सब लोग अपने शरीरका भला चाहते हैं, इसी प्रकार सब प्राणी उसका भला चाहते हैं, जिसका ज्ञान और कर्म इस प्रकारका होता है।' जो मनुष्य जगत्में जलसे अलिप्त कमलके पत्तेके समान रहना चाहता है, उसके लिये पाँचवें अध्यायके दूसरे ब्राह्मणमे दी हुई कथा रोचक होनेके साथ ही बहुत ही उपदेशपूर्ण भी है। एक बार प्रजापतिके तीनो प्रकारके पुत्र अर्थात् देव, असुर और मनुष्य उनकी सेवामे उपस्थित हुए । उनकी दीर्घकालीन अर्च्चासे प्रजापति प्रसन्न हुए । उपासकोंको आकाशमे गम्भीर नादके रूपमे 'द' अक्षर सुन पड़ा । 'द' का अर्थ देवोके लिये दाम्यत 'दमन करो', मनुष्यके लिये दत्त 'दो' और असुरोके लिये दयध्वम् 'दया करो या। देव और असुर सौतेले भाई दोनो ही प्रजापतिकी सन्तान है, बलवान् हैं, तप कर सकते हैं अर्थात् विक्षेपको छोडकर किसी एक काममे अपनी सारी शक्ति लगा सकते हैं और जिस काममे लग जाते हैं, उसमें प्राय सफलता प्राप्त करके ही छोड़ते हे । दोनोंमें बराबर सघर्ष होता रहता है । बहुधा ऐसा भी होता है कि असुरगण देवगणको जीत लेते हैं । परन्तु पराशक्ति फिर देवो- को विजय प्रदान करती है। कभी कभी देवोंको ऐसी विजय- पर गर्व भी हो जाता है, परतु जैसा कि केनोपनिषद्‌का 'यक्षोपाख्यान' दिखलाता है, यह अभिमान नीचे गिरानेवाला है । ऐसा नम्रतापूर्वक समझ लेनेमें कि उनको पराशक्तिसे ही स्फूर्ति मिलती है, उनका कल्याण है । सप्तशतीमें इस बातकी ओर सङ्केत है कि असुरगण देवीके हाथों मारे तो जाते ह, परतु इस प्रक्रियासे पवित्र होकर उनको देवलोककी प्राप्ति होती है । यह तो स्पष्ट ही है कि ऐतिहासिक दृष्टिमे देव और असुर कोई भी रहे हों, परन्तु ऐसे दार्शनिक प्रसङ्गोंमें ये दोनो शब्द परार्थमूलक और स्वार्थमूलक प्रवृत्तियो और वासनाओं- के लिये प्रयुक्त होते हे । परार्थमूलक प्रवृत्तियाँ अच्छी है परंतु उनके ऊपर बुद्धिका अङ्कुश रहना चाहिये । अन्यथा भलाईके स्थानमें ससारका अहित हो सकता है। इसीलिये देवोंको 'दाम्यत' का उपदेश दिया गया । अपने स्वार्थकी सिद्धिमें कभी-कभी सैकड़ों और हजारों व्यक्तियोको घोर हानि पहुँचायी जाती है । उतने दामोंमें जो सुख मिलता है, उसका न मिलना ही अच्छा है । और फिर विषय सुख तो उस कडुवी वस्तुके समान होते हैं, जिसके ऊपर धोखा देनेके लिये चीनी लगी होती है । मुँहपर रखते ही मीठा स्वाद कडुवेपनमें बदल जाता हे, इसीलिये असुरोके प्रति 'दयध्वम्' कहा गया है । प्रवृत्त होनेके पहले यह सोच लें कि तुम्हारे द्वारा कर्त्ता तथा दूसरोंका कितना बड़ा अनिष्ट होगा । मनुष्यके लिये तो 'दत्त' से अच्छा उपदेश हो ही क्या सकता हे । तुम्हारा जो कुछ है, सब लोक मग्रहमे—परार्थ-सेवनमें अर्पित कर दो। देव-विजेता असुर देवीके हाथसे मारे जाकर देवलोकको प्राप्त हुए । इसका तात्पर्य यह हे कि जो प्रवृत्तियाँ मनुष्यको नीचे गिराती हे, यदि उनका दमन किया जाय तो वही पवित्र होकर मनुष्यको पावन बनानेमें सहायता देती हे । कामवासना स्वतः बुरी चीज हो सस्ती ह परतु उन्नमित काम कविक्री लेखनीमे चमत्कार ला देता हे और मीरा जैसे भक्त और गिरधरनागरके बीचमें सम्बन्धसूत्र बनता हे । इसीलिये शृङ्गार- को 'ब्रह्मानन्दसहोदर कहा जाता है। इसी बातको सामने रखकर बार-बार यह उपदेश दिया जाता है कि 'यज्ञभावसे कर्म करना चाहिये ।' यज्ञमे बलिमुखे देवता अवतरित होती है और बलिकर्मके वाद उनकी शक्ति यजमानमे प्रवेश कर जाती है । लोकसग्रह भावसे, ईशावास्य उपनिषद्‌के शब्दोंमें ईशसे आच्छादित करके कर्म करनेमे, अपनी दुष्प्रवृत्तियोंका सहार हो जाता है ओर जो शक्ति उनको तृप्त करनेमे लगती थी, वह जीवको ऊपर उठानेमें लग जाती है। जो अन्तःकरण इन्द्रियोके पीछे बहिर्मुख दौड़ता था, वही अन्तर्मुख होकर आत्मसाक्षात्कारका साधन बन जाता हे । उपनिषदोने कर्तव्योंकी सूची देनेका प्रयत्न नही किया है, फिर भी उन्होंने उन एक दो बातोपर बारबार जोर दिया है, जिनको हम सदाचारका मूल या प्रधान अङ्ग कह सकते ह । 'सत्य और 'ब्रह्मचर्य' की प्रशसामें सैकड़ों वाक्य मिलते हैं। छान्दोग्य उपनिषद्‌के शब्दोंमे 'यद यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्य- मेव तत्' जिसको यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है। इसी प्रकार मुण्डकोपनिषद्‌मे ऋषि सत्यकी इस प्रकार महिमा गाता है— सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयान । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ (३ । १ । ५-६)

  • उपनिषद् और कर्तव्याकर्तव्य-विवेक * ३५ 'इस शुद्ध ज्योतिर्मय आत्माको, जिसको क्षीणदोष यति- लोग अपने भीतर देखते हैं, सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । सत्यकी ही विजय होती है, झूठकी नहीं । वह देवयान-मार्ग, जिससे आप्तकाम ऋषिगण सत्यके उस परम निधानपर पहुँचते हैं, सत्यके द्वारा ही खुलता है।' बार-बार यह कहा गया है—'सत्यप्रिया हि देवा.' देवोंको सत्य ही प्रिय है। किसी भी कर्मकी सिद्धि इस बात- पर निर्भर करती है कि उसके करनेमें कितनी सचाईसे काम लिया जाता है। सचाईके अभावमें अच्छा-से-अच्छा काम तामस-कर्म हो जाता है। इसीलिये ऋषियोंका आदेश था कि यज्ञात्मक कामोंके आरम्भमें यह सङ्कल्प किया जाय । 'इदमहममृतात्सत्यमुपैमि' 'यह मै झूठको छोड़कर सत्यको ग्रहण करता हूँ।' इस प्रकारके वाक्योंके अर्थपर मनन करनेसे यह बात समझमें आ जाती है कि भारतीय दर्शनमें कर्मका क्या स्थान है और किस प्रकारके आचरणको सदाचरण कहा जा सकता है, परतु अभीतक मैने स्पष्ट-रूपसे यह नहीं बतलाया कि भारतीय विचारधाराके अनुसार सत्कर्मकी कसौटी क्या हो सकती है । वह कौन-सा लक्षण होना चाहिये, जिसके अभावमें किसी कर्म-विशेषको सत्कर्म नही कहा जा सकता । अज्ञानके कारण आत्मा अपने स्वरूपको भुलाकर जीव बन रहा है। जिस प्रकार पानीमें गिरे हुए व्यक्तिको किनारेपर पहुँचनेके लिये पानीका उपयोग करना पड़ता है, उसी प्रकार अज्ञानसे छुटकारा पानेके लिये इस अज्ञानमूलक जगत्‌से काम लेना पड़ता है। कर्मसे तो नितान्त छुटकारा नहीं मिल सकता, परतु इस प्रकार कर्म करना श्रेयस्कर होगा कि अज्ञानका बन्धन क्षीण हो । जबतक अज्ञान है, तबतक नानात्वकी प्रतीति होती रहेगी । उपनिषद् पुकार-पुकारकर कहते हैं— 'नेह नानास्ति किञ्चन, द्वितीयाद्वै भय भवति' 'यहाँ जरा भी नानात्व नहीं है। द्वैतसे निश्चय ही भय होता है।' परतु केवल वाक्योंकी आवृत्ति करने या तर्क करनेसे अखण्ड एकरस अद्वय ब्रह्म सत्ताकी अनुभूति नहीं हो सकती। उसके लिये चित्तका समाहित होना अनिवार्यतया आवश्यक है । परतु योही देरतक पद्मादि आसन लगाकर बैठ जाने और प्राणायाम- मुद्रा आदिका अभ्यास करनेसे ही समाधिकी प्राप्ति नहीं हो सकती । उसके लिये तो जाग्रत् अवस्थामें भी प्रयत्नशील रहना चाहिये । दूसरे प्राणियोंसे अभेद स्थापित करना ही इस दिशामें यथार्थ प्रयत्न है। जिस हदतक कोई मनुष्य दूसरेके दुःख-सुखको अपना दुःख-सुख बना सकता है—उसके साथ सह-अनुभूति प्राप्त कर सकता है, उस हदतक वह अज्ञानकी निवृत्तिके पथपर अग्रसर होता है । माताको अपनी सन्तानके साथ और दम्पतिको एक दूसरेके साथ भी ऐसी सह-अनुभूति, ऐसी अभेद-भावना हो सकती है, परतु इस अभेद-भावनाके साथ एक प्रबल भेद-भावना भी लगी रहती है। जितना ही एकके साथ अभेद होता है, उतना ही दूसरोंके साथ भेद होता है। इसलिये इस भावनासे प्रेरित होकर जो कर्म किये जाते हैं, वे अज्ञानको दूर करनेमे सहायक नहीं हो सकते । परंतु जिस समय कोई व्यक्ति किसी डूबतेको या आगमें जलते हुएको बचानेके लिये कूद पड़ता है, उस समय उसको उसके साथ तादात्म्यका अनुभव तो होता है, परतु किसी औरके साथ भेदका अनुभव नहीं होता । उस क्षणमें उसके लिये भेदका अभाव हो जाता है और उसको उस आनन्द- की झलक मिलती है, जिसको योगी समाधिकी अवस्थामें प्राप्त करता है, समाधिका अभ्यास ऐसे कामोंकी ओर प्रवृत्ति होने- की प्रेरणा देता है और ऐसे कामोंमें लगना समाधिके लिये अधिकार प्रदान करता है। इसका फलितार्थ यह निकला कि जो काम अभेद भावनाकी ओर ले जाता है, वह सत्कर्म है, कर्तव्य है, करणीय है। जो काम भेद-भावनापर अवलम्बित है और भेद भावनाको पुष्ट करता है, वह अकरणीय है, दुष्कर्म है। पाश्चात्त्य विद्वानोंने सत्कर्मके जितने भी लक्षण बताये हैं, वे सब इसके अन्तर्गत आ जाते हैं। वेदको प्रमाण माननेवाले भारतीय दर्शनशास्त्रोंने उपनिषदोंको ही अपना आधार माना है। इसीलिये मैने यह दिखलानेका प्रयत्न किया है कि यद्यपि भारतीय दर्शनमें कर्मको ज्ञानकी अपेक्षा गौण स्थान ही दिया जा सकता है, परतु उपनिषदोंमें वे सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे दिये हुए हैं, जिनके आधारपर कोई भी विचारशील मनुष्य अपने लिये कर्तव्यका निश्चय कर सकता है। इस पथपर चलनेवाला अपने लिये तो निःश्रेयसका द्वार खोल ही लेगा, उसके तपःपूत व्यक्तित्वके प्रकाशमें मानव-समाज भी अभ्युदयके पथपर आरूढ़ हो सकेगा।

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उपनिषद्की दिव्य शिक्षा (लेखक—आचार्य श्रीअन्नदाकुमार वन्द्योपाध्याय, एम० ए०) मानव-चेतना स्वभावतः इन्द्रिय और मनके अनुगत होकर विश्व जगत्से परिचय प्राप्त करनेके लिये प्रवृत्त करती है। इससे मानव-चेतनाके क्रमशः विकासशील ज्ञानके सामने यह विश्व-जगत् देशकालाधीन शब्द-स्पर्श रूप-रस-गन्ध विशिष्ट नित्य परिवर्तनशील असंख्य खण्ड पदार्थोंके समष्टिरूपमें ही प्रतीत होता है। किंतु मानव-चेतनाकी अन्त'प्रवृत्तिमे, जाने क्या एक प्रेरणा है, जिसके कारण विश्व-जगत्के इस बाहरी परिचयमे वह तृप्त नहीं हो सकती। इन्द्रियसम्मूह और मन इस जगत्का जो परिचय मानव-चैतन्यके सामने उपस्थित करते हैं, वह मानो उसका सच्चा परिचय नहीं है, उसके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान नहीं है—इस प्रकारकी एक अनुभूति मानव-चेतनाको सदा-सर्वदा इस जगत्का और भी निगूढ, निगूढतर और निगूढतम ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उद्दीप्त करती रहती है। जगत्के इस वाह्य खण्ड-परिचयपर निर्भर करके मनुष्य कर्म और भोगमें प्रवृत्त होता है। पर इस प्रकारके कर्म और भोगसे उसे शान्ति नहीं मिलती। इसमें उसकी अबाध स्वाधीनताकी अनुभूति नहीं है, पूर्णताका आस्वादन नहीं है। इस प्रकारके ज्ञान, कर्म और भोगमे वह अपनेको पूर्णरूपसे उपलब्ध नहीं कर पाता उसकी चेतनामें सभी अवस्थाओमे अभावबोध, दुखबोध और अशान्तिक्री ज्वाला बनी रहती है। इस अभाव, दुख और अशान्तिको दूर करनेके लिये वह उच्चतर ज्ञानभूमि, कर्मभूमि और भोगभूमिका अनुसन्धान करता है, विश्व-जगत्के साथ निविडतर परिचयके लिये आग्रह- शील होता है। इन्द्रिय और मनका अनुवर्त्तन करके मानव-चैतन्य जितना ही अग्रसर होता है, उतना ही उसे अनुभव होता है कि इस मार्गमें ज्ञानकी, कर्मकी और आनन्दकी पूर्णता नहीं है। परतु इसी प्रवर्त्तके द्वारा चेतनाका क्रम विकास होता रहता है। मानव-चेतना जब पूर्णरूपसे विकसित हो जाती है, सम्यक्रूप- से जाग्रत् और प्रबुद्ध हो जाती है, तत्र वह अपने ज्ञान, कर्म और भोगको इन्द्रिय और मनकी अधीनतासे मुक्त करनेके लिये प्रयास करती है, अपने स्वरूपभूत चिन्-ज्योतिके प्रकाशसे इस विश्व-जगत्के यथार्थ स्वरूपका साक्षात् परिचय प्राप्त करने- में अपनेको सन्नग्न कर देती है। इन्द्रिय-मनोनिरपेक्ष सम्यक् प्रकारसे सम्बुद्ध मानव चेतनाके अपरोक्ष ज्ञानमें विश्व-जगत्का जो स्वरूप प्रत्यक्ष होता है, वही इस विश्व-जगत्‌का पारमार्थिक स्वरूप है। ऐसा उसे अनुभव होता है। इस ज्ञानमें मानव- चेतना और विश्व-जगत्‌के सारे भेद, व्यवधान और विसंवाद मिट जाते हैं। मानव-चेतनाकी अपूर्णताकी अनुभूति भी मिट जाती है, अपने साथ जगत्‌की एकात्मताका अनुभव करके वह अपने खण्ड, अपूर्ण और निरानन्दभावसे मुक्त हो जाती है एव कर्ममे स्वाधीन तथा सम्भोगमे आनन्दमग्न बन जाती है। यह जो इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त सम्यक् प्रबुद्ध मानव-चेतना है उसीका नाम 'ऋषिचेतना है। इस ऋषि- चेतनाके द्वारा विश्व-जगत्‌के अन्तर्निहित तत्त्वके सम्बन्धमें जो अपरोक्ष अनुभूति होती है उसीका नाम उपनिषद्-ज्ञान है। ऋषि चेतनामे जो सत्य प्रकाशित होता है, वही सम्पूर्ण जीव और जगत्‌का मूल-तत्त्व और यथार्थ स्वरूप है। वह ऋषिचेतना समस्त जीवों (चेतन)का और जडका अबाध मिलनक्षेत्र है। उस ऋषिचेतनाकी प्राप्ति होनेपर मनुष्यके ज्ञानकी, स्वाधीनता- की, आनन्दकी और कल्याणकी पूर्णता हो जाती है। मनुष्य- की चेतना उस समय देश-कालकी सीमाका अतिक्रमण कर, कार्य- कारण शृङ्खलाके बन्धनसे छूटकर राग-द्वेष भव-भावनासे ऊपर उठकर, सब प्रकारके आवरण और विक्षेपसे मुक्ति पाकर विश्व-जगत्‌के यथार्थ स्वरूपको देखती है और अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रतिष्ठित होती है। ऋषिगण जब इस अनुभूति- की बातें बताते हैं, उस समय इन्द्रिय मनकी शृङ्खलामे बँधे हुए ज्ञानपिपासु व्यक्ति बड़े आश्चर्यमे उन्हें सुनते हैं, परंतु वे सम्यक्रूपसे उनकी धारणा नहीं कर सकते। इन बातोंको वे अस्पष्ट भावसे जानके आदशंरूपमे अनुभव करते हैं और इस स्थितिको प्राप्त करनेके लिये इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे छूटनेकी साधना करते हैं। प्राचीन भारतमें जिन असाधारण महामानव पुरुषोंने ऋषिचेतना प्राप्त करके अतीन्द्रिय और अतिमानस ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जीव-जगत्‌के पारमार्थिक स्वरूपको प्रत्यक्ष देखा था जिनकी सम्यक्-सम्बुद्ध चेतनाके सामने परम सत्यने अनावृत और अविकृत रूपसे अपने स्वरूपको प्रकट कर दिया था, उनकी दिव्य वाणियाँ ही सकलित और सग्रथित होकर उपनिषद्-ग्रन्थके रूपमें मानव-समाजमे प्रचारित है। गुरु-शिष्य- परम्पराके क्रमसे उन वाणियोंका तत्त्व-ज्ञानके पिपासु साधक-

  • उपनिषद्की दिव्य शिक्षा * ३७ सम्प्रदायमें प्रसार हुआ है। इन्हीं सब वाणियोंका आश्रय लेकर ज्ञान-पिपासु, आनन्द-पिपासु और मुक्ति-पिपासु अगणित साधकोंने अपनी स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, कर्मशक्ति और चित्तवृत्तियोंका भलीभाँति नियन्त्रण करके अपनी चेतनाको इन्द्रिय मनकी अधीनतासे मुक्त किया है। और उस मुक्त चेतनाके द्वारा उन सब दिव्य वाणियोंके अनुसार अपरोक्ष अनुभव प्राप्त करके वे कृतकृत्य हुए हैं। उन साधकोंके जीवनकी कृतार्थताको देखकर समाजके सभी श्रेणीके नर- नारियोंको उन वाणियोंकी सत्यताके सम्बन्धमे सदेहरहित दृढ़ विश्वास हो गया। दार्शनिक आचायोंने इन्द्रिय-मनकी अधीनता-शृङ्खलामें बँधे हुए प्रत्यक्षादि सब प्रकारके लौकिक प्रमाणों और तदनुगत सम्मत युक्ति तर्कोंको परम तत्त्वके प्रकाशनमें असमर्थ पाकर, जीव जगत्‌को पारमार्थिक परिचय प्रदान करने- के लिये उपनिषद्‌-वाणीको ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना, और इन्हीं सब वाणियोंका तात्पर्य ढूँढ निकालनेमें उन्होंने प्रधानतया अपनी मनीषा और विचारशक्तिका बड़ी निपुणताके साथ प्रयोग किया। सम्बुद्ध चेतन तत्त्वदर्शी ऋषियोंकी अपरोक्षानुभूति- से उत्पन्न दिव्य वाणियोंको श्रद्धापूर्वक सुनकर ही जीव-जगत्- के यथार्थ स्वरूपका सच्चा ज्ञान प्राप्त करनेके लिये मनुष्यकी स्वाभाविक ज्ञानशक्तिको नियोजित करना पड़ेगा—इसी हेतुसे इसको 'श्रुतिप्रमाण' कहा जाता है। भारतके सर्वश्रेष्ठ मनीषियोंके द्वारा रचित और प्रचारित जितने भी स्मृति, पुराण, दर्शन, तन्त्र और महाकाव्य आदि हैं, सभी इस 'श्रुति'के द्वारा ही अनुप्राणित हैं और वे समाजके सभी स्तरोंम उस 'श्रुति' की भावधाराको ही वहन कर रहे हैं। कहना नहीं होगा कि इस प्रकार ऋषिचेतनाकी प्राप्ति और अतीन्द्रिय एवं अतिमानस सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार केवल प्राचीन भारतके ही कुछ अनन्यसाधारण महापुरुषोंको हुआ था, ऐसी बात नहीं है। सभी युगों और सभी देशोंमें सभी प्रकारकी पारिपार्श्विक अवस्था मे अनन्य सत्यपिपासु पुरुषोंके द्वारा सत्यका अपरोक्ष साक्षात्कार सम्भव है। भारत- में युग-युगान्तरसे ऐसे असंख्य ऋषियोंका आविर्भाव होता रहा है। उन सभीने अपनी-अपनी सत्यानुभूतिके द्वारा उपनिषद्- वाणियोंकी यथार्थताका समर्थन किया है और उसे विभिन्न भावोंसे विभिन्न भाषामें मानव-समाजमें प्रचारित किया है। सभी देशोंके अपरोक्षानुभूति सम्पन्न महापुरुषोंने ऐसा ही किया है। भारतीय संस्कृतिकी यह विशेषता है कि इस विशाल देशकी बहुमुखी साधना और सभ्यता उस ऋषिचेतना लब्ध तत्त्वानु- भूतिके ऊपर प्रतिष्ठित है। भारतका साहित्य और शिल्प, विज्ञान और दर्शन, कुल-धर्म, जाति-धर्म और समाज-धर्म, राष्ट्र-नीति, अर्थ-नीति, स्वास्थ्य नीति और व्यवहार-नीति- इन सभीका निर्माण और प्रसार उपनिषद्-ज्ञानको मानव- जीवनके परम आदर्शरूपमें मानकर ही हुआ है। उपनिषद् ही भारतीय संस्कृतिके प्राणस्वरूप है। इसीसे भारतीय संस्कृतिको 'आर्य-संस्कृति' कहा जाता है। समस्त वेदोंका अर्थात् समस्त ज्ञानका जो चरम सत्य है, वही उपनिषदोंमें समुज्ज्वल रूपमे प्रकट है, इसीसे उपनिषद्का प्रसिद्ध नाम वेदान्त (वेद या ज्ञानका अन्त अथवा शिरोभाग) है, एव वेदान्त ही सब प्रकारकी भारतीय साधनाओकी भित्ति है। इसीसे जगत्‌में भारतीय वेदान्ती-जातिके नामसे विख्यात हैं। राग द्वेषशून्य, हिंसा-घृणा-भय विरहित, देहेन्द्रिय-मनकी अधीनतासे मुक्त, जात्यभिमान-सम्प्रदायाभिमान प्रभृति सङ्कीर्णताओंसे अतीत, शुद्धहृदय, शुद्धबुद्धि, समाहितचित्त ऋषियोंकी भ्रम प्रमादादिशून्य दिव्य सत्यानुभूतिको केन्द्र बनाकर ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता युग-युगान्तरोंमें निर्मित हुई है। यही भारतीय संस्कृति और सभ्यताका प्रधान गौरव है। सहस्रों वर्षोंसे लगातार यह औपनिषद ज्ञान भारतीय साधनाक्षेत्रमे समस्त नर नारियोंके अशेष विचित्रता- मय जीवनमें सब प्रकारके जागतिक ज्ञान, लौकिक कर्म और हृदयगत भावप्रवाहको आश्चर्यजनक रूपसे अनुप्राणित करता आ रहा है। सभीपर इसका अक्षुण्ण शासन है। यहाँतक कि, इस देशके राग द्वेषादियुक्त देहेन्द्रिय मन बुद्धि-हृदयपर भी औपनिषद आदर्शका असीम प्रभाव है। भारतीय जीवनके सभी विभागोंमे उपनिषद् चिरञ्जीवी है। जान या अनजानमें प्रत्येक नर-नारीके जीवनपर इसका अचिन्त्य प्रभाव है। भारतका सम्पूर्ण वातावरण ही उपनिषदके ज्ञानादर्शके द्वारा सजीवित है। सभी युगोंकी सम्यक् प्रबुद्ध ऋषि-चेतनामें विश्व-जगत्‌का यथार्थ स्वरूप प्रतिभात होता है और इन कतिपय उपनिषद्- ग्रन्थोंम वाणीरूपमे वही स्वरूप प्रकट हुआ है, इस सम्बन्धमें किञ्चित् आभास इस लेखके द्वारा मिल सकता है। प्रथमतः हमारे इन्द्रिय मनके द्वारा उपलब्ध ज्ञानने इस विश्व-जगत्‌को अनन्त विषमताओंसे पूर्ण देख पाया है। उसने समझा है कि विभिन्न स्वभावयुक्त असंख्य पदार्थोंके सङ्घर्ष और समन्वयसे ही इस जगत्‌का संगठन हुआ है; इसमें

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* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


[बायाँ स्तम्भ]

इतने भेद हैं, इतने द्वन्द्व हैं, इतने कार्यकारण-सम्बन्ध और इतनी नियम शृङ्खलाएँ हैं कि जिनका कहीं भी कोई अन्त नहीं मिलता, परंतु ऋषियोंकी अतीन्द्रिय और अतिमानस विशुद्ध चेतनाको दिखायी देता है कि यह विश्व-जगत् मूलतः या तत्त्वतः एक है, एक ही अखण्ड सत्ता विभिन्न सत्ताओंके रूपमें इन्द्रिय मनके सम्मुख प्रतीत होती है—इन्द्रिय-मनोगोचर जितने भी विभिन्न पदार्थ हैं, सब एक अद्वितीय नित्य सत्य निर्विकार तत्त्वके ही विभिन्न रूपों और विभिन्न नामोंमें आत्मप्रकाश हैं, एकहीसे सबका प्राकट्य है, एकके ही आश्रयसे सबकी स्थिति है, एककी सत्तासे ही सब नियन्त्रित हैं और परिणाममे सब एकमें ही विलीन हो जाते हैं, एकके अतिरिक्त दूसरा कोई स्वतन्त्र पदार्थ है ही नहीं। इस प्रकार वे स्थावर-जङ्गम सभी पदार्थोंमें नित्य सत्य एक अद्वितीय वस्तु-तत्त्वको देखते हैं। उनकी चेतनासे भेदज्ञान सर्वथा दूर हो जाता है। एक ही बहुका—अनन्तका यथार्थ स्वरूप है—यह उपनिषद्का प्रथम सत्य है।

द्वितीयतः हमारे ज्ञानमें जीव और जड़का—चेतन और अचेतनका भेद है। हम कभी इसका अतिक्रम नहीं कर सकते। पर ऋषियोंका अनुभव है कि यह विश्व-जगत् तत्त्वतः चैतन्यमय है। जिस एक अद्वितीय सद्वस्तुकी सत्तासे विश्व-जगत् सत्तावान् है, वही सद्वस्तु चित्-स्वरूप है—स्वयंप्रकाश है। दूसरेके प्रकाशसे जिसका प्रकाश हो, दूसरेके सम्बन्धसे ही जिसका परिचय हो और दूसरेके ज्ञानमें प्रतिभात होनेसे ही जिसकी सत्ता हो, उसीको 'जड' कहते हैं। चेतनके आश्रय और सत्तासे ही जड़का प्रकाश और सत्ता है। समस्त विश्व-जगत्के मूलमें जो एक वस्तु है, जिसका दूसरा कोई न आश्रय है और न प्रकाशक है, अपनी सत्तासे ही जिसकी सत्ता है, अपने प्रकाशसे ही जिसका प्रकाश है, जो अपनेको ही अपना अनन्त विभिन्नतामय विश्व-जगत्के रूपमें परिचय दे रहा है,—वह अद्वितीय तत्त्व निश्चय ही स्वप्रकाश चैतन्यमय है। ऋषि-चेतना सम्पूर्ण जड़में उस एक चैतन्यस्वरूपको ही देखती है। ऋषिगण, एक अद्वितीय नित्य चैतन्यमय सद्वस्तुको ही इन्द्रिय-मनके सम्मुख विभिन्न जीवों और जड़ पदार्थोंके रूपमें—चेतनाचेतन अनन्त विचित्र वस्तुओंके रूपमें लीला करते देखते हैं। चेतन ही जड़का यथार्थ स्वरूप है, यही उपनिषद्का द्वितीय सत्य है।

तृतीयतः हमारे साधारण ज्ञानमें सभी विषय ससीम, सादि (आदिवान्) और सान्त (अन्तवान्) हैं। इन्द्रिय-


[दायाँ स्तम्भ]

मनकी अधीनताके पाशमें बँधी हुई हमारी चेतनाके सम्मुख असीम, अनादि और अनन्त कभी वास्तविक सत्यके रूपमें प्रतीत होता ही नहीं। अपनी ज्ञानलब्ध ससीमता, सादित्व और सान्तत्वका निषेध करके हम असीमतत्त्व, अनादित्व और अनन्तत्वकी एक अभावात्मक कल्पना किया करते हे। इस कल्पित असीम, अनादि और अनन्तमे और वास्तविक ससीम, सादि और सान्तमे एक भारी भेद है, इस कल्पनाका भी हम अतिक्रमण नहीं कर पाते। अगणित देशकाल-परिच्छिन्न ससीम, सादि और सान्त पदार्थोंकी समष्टि कल्पना करनेपर हमारे लिये देश कालातीत असीम अनादि और अनन्तकी धारणा करना सम्भव नहीं होता। ऋषि-चेतनाकी अतीन्द्रिय अतिमानस अनुभूतिमे साधारण ज्ञानकी यह असमर्थता नहीं रहती। इस चेतनामे देशकालातीत असीम अनादि अनन्त एक अद्वितीय अपरिणामी तत्त्व समुज्ज्वल-रूपसे प्रकट रहता है—अभावरूपमें नहीं, भावरूपमें—ज्ञानगोचर वास्तवको निषेध करके नहीं, वास्तवसमूहको कल्पनासे समष्टिवद्ध करके भी नहीं, सर्वव्यापी, सबमें अनुस्यूत, सभी भावोंमे लीयमान, सर्वान्तरात्मा एक अखण्ड स्वप्रकाश वास्तवतम सत्यके रूपमे। असीम ही समस्त ससीमका पारमार्थिक तत्त्व है, अनादि-अनन्त ही सम्पूर्ण सादि सान्तका तात्त्विक स्वरूप है, देश कालातीत अपरिणामी निर्विकार एक अखण्ड चैतन्यमय परमात्मा ही देश कालाधीन परिणामी उत्पत्ति स्थिति विनाशशील प्रत्येक खण्डपदार्थ-मात्रके अदर विभिन्न विचित्र रूपोंमें लीला कर रहा है—इस अपरोक्ष अनुभूति—प्रत्यक्ष दर्शनसे ऋषि-चेतना भरपूर हो जाती है। उन्हें ससीममात्रमें एक असीम, सादिमात्रमे एक अनादि, सान्तमात्रमे एक अनन्त, परिणाम और विकार-मात्रमे एक नित्य सत्य, अपूर्णमात्रमे एक नित्य पूर्ण सर्वत्र सदा चमकता हुआ दिखलायी पडता है। ससीम और असीमका भेद, सादि और अनादिका भेद, सान्त और अनन्तका भेद, इस दिव्यज्ञानसे—औपनिषद ज्ञानमे—मानो मिथ्या हो जाता है,—वह ज्ञानके निम्नस्तरमे—इन्द्रिय और मनके स्तरमें ही पड़ा रह जाता है। देशकालातीत और देश कालाधीन असीम अनन्त एव ससीम सान्त—नित्य और अनित्यका यह पारमार्थिक ऐक्य दर्शन ही उपनिषद्का तृतीय सत्य है।

चतुर्थतः हमारा इन्द्रिय मनोगोचर साधारण ज्ञान आत्मा और अनात्माके भेदको—मैं और अन्यके भेदको—व्यक्ति

  • उपनिषद्‌की दिव्य शिक्षा * ३९ और विश्वके भेदको—ज्ञाता और भोक्ता एवं ज्ञेय और भोग्य जगत्‌के भेदको तथा विभिन्न व्यक्तियोंके पारस्परिक भेदको कभी अतिक्रमण नहीं करता, परंतु ऋषि-चेतना अपने आत्मामें और अन्य समस्त मनुष्य तथा प्राणीमात्रके आत्मामें एव समग्र विश्व-जगत्‌के आत्मामे पारमार्थिक एकत्वकी उपलब्धि करती है। वह अपनेको सभी मनुष्य, सभी प्राणी और समस्त विश्व-प्रपञ्चमें, और सब मनुष्यों, सब प्राणियों और सम्पूर्ण विश्व-प्रपञ्चको अपनेमें देखती है। एक आत्मा ही विभिन्न स्थावर-जङ्गम शरीरोंमें विभिन्न नाम- रूपोंमें, विभिन्न आकृति प्रकृतिमे प्रतिभात हो रहा है। प्रबुद्ध ऋषि-चेतना इस सत्यका प्रत्यक्ष अनुभव करती है। अतएव इस चेतनामें अभिमान और ममता, राग और द्वेष, शत्रु-मित्रका भेदबोध, अपने-परायेका भेदभाव, हिंसा-घृणा- भय और विषय-विशेषके प्रति कामना प्रभृति कुछ भी नहीं रह सकते। इस अनुभूतिका फलस्वरूप सबके प्रति अहैतुक प्रेम और सबके प्रति आत्मबोध स्वभावसिद्ध हो जाता है। यह विश्वात्मभाव और सर्वात्मभाव उपनिषद्‌का चतुर्थ सत्य है। जिस किसी देशमें, जिस किसी कालमें, जिस किसी पारिपार्श्विक अवस्थामें, जो कोई भी व्यक्ति राग-द्वेष-कुसंस्कारादि- से रहित होकर उपयुक्त साधनाके द्वारा इन्द्रिय-मनकी अधीनतासे अपनेको छुड़ा लेता है, उसीकी विशुद्ध चेतनाके सम्मुख विश्व-जगत्‌का और अपना यह पारमार्थिक सत्यस्वरूप प्रकट हो जाता है। यह सत्य ही सनातन सत्य है और इस सत्य-दृष्टिका अनुवर्तन करनेके लिये मनुष्यके व्यष्टि-जीवन और समष्टि-जीवनको भीतर तथा बाहरसे जिस प्रणालीके अनुसार सुनियन्त्रित होना चाहिये, उस प्रणालीका नाम ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म विश्वजनीन है, विश्वमानवका धर्म है,—विश्वके सभी श्रेणीके नर-नारियोंको सत्यदृष्टिमें प्रतिष्ठित करानेवाला धर्म है। यह विश्वजनीन सनातन सत्य और सनातन धर्म ही विभिन्न सम्यक् सम्बुद्ध ऋषियोंके मुखोंसे विभिन्न छन्दों—विचित्र कवित्वपूर्ण गम्भीर्यार्यव्यञ्जक भाषाके द्वारा उपनिषद्-ग्रन्थोंमें प्रकाशित है। इन्द्रिय-मन- शृङ्खलित बुद्धिके ऊर्ध्व स्तरमें विशुद्ध चेतनाकी तत्त्वानु- भूतिको इन्द्रिय-मन-बुद्धिके स्तरकी भाषामें व्यक्त किया गया है। जो सत्यपिपासु लोग इन उपनिषद्-वाणियोंके गूढ तात्पर्यके अनुसन्धान पथपर चलना चाहते हैं, उन्हें अपनी चेतनाको इन्द्रिय-मन-बुद्धिके स्तरसे ऊपर ले जानेकी चेष्टा करनी पड़ेगी और ऊपर ले जाकर ही इन वाणियोंके यथार्थ तात्पर्यको समझना होगा। केवल शाब्दिक अर्थ एव युक्ति- तकौँके वलपर उपनिषद्‌की वाणियोंके तात्पर्यको कभी हृदयङ्गम नहीं किया जा सकता। सम्यक्-प्रबुद्ध ऋषि-चेतनामें प्रतिभात चरम सत्यको ही उपनिषदोंके ऋषियोंने 'ब्रह्म' कहा है। 'ब्रह्म' शब्दका शाब्दिक अर्थ है—'बृहत्तम' (बहुत बड़ा), जिससे बृहत्तरकी कोई कल्पना ही नहीं हो सकती। देशगत, काल- गत, गुणगत, शक्तिगत, सत्तागत और अवस्थागत किसी भी प्रकारकी सीमा, परिधि या क्षेत्रकी, जिसके सम्बन्धमें कोई कल्पना नहीं की जा सकती, पाश्चात्त्य दर्शनमें जिसको Infinite Eternal Absolute कहा जाता है,— उसीका नाम 'ब्रह्म' है। 'ब्रह्म' मानवकी बौद्ध-चेतना (Intellectual Conciousness) का चरम आदर्श है, समस्त दार्शनिक ज्ञान (Philosophical Knowledge) का चरम अनुसन्धेय है। जबतक इस ब्रह्मको ज्ञानगोचर नहीं कर लिया जाता, तबतक बुद्धि कभी तृप्त नहीं हो सकती, दार्शनिक-विद्याका अनुशीलन कभी चरम सिद्धिको प्राप्त नहीं हो सकता। अथ च, बुद्धि (Intellect) स्वभावतः ही ब्रह्मका कभी साक्षात्कार नहीं कर सकती, दार्शनिक युक्तितर्क निःसन्दिग्ध‌रूपसे कभी भी इस ब्रह्मको ज्ञानमे प्रतिष्ठित नही कर सकते, परंतु मानव-चेतनामें सामर्थ्य है—वह युक्तितर्कके अतीत—बुद्धिके अतीत— पारमार्थिक ज्ञानभूमिकामें उपनीत होकर ब्रह्मका साक्षात्कार कर सकती है। उस इन्द्रिय-मन-बुद्धिसे अतीत ज्ञानभूमिकी अनुभूतिका, उस ब्रह्मोपलब्धिकी भाषामयी मूर्तिका ही उपनिषदोंकी वाणीमें सग्रह किया गया है। उपनिषदोंके ऋषियोंने यह उपलब्ध किया कि 'ब्रह्म' केवल बुद्धिका एक अनधिगम्य चरम आदर्श नहीं है, एक अवाङ्मनसगोचर अज्ञेय, किंतु आकाङ्क्षणीय तत्त्वमात्र ही नहीं है;—ब्रह्म प्रत्यक्ष सत्य है। यही नहीं, ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। इन्द्रिय-मनोबुद्धि-गोचर विश्व-जगत् और तदङ्गीभूत समस्त चेतनाचेतन पदार्थोंका ('यत् किञ्च जगत्यां जगत्') एक- मात्र यथार्थ स्वरूप ही है—ब्रह्म। ऋषियोंने प्रत्यक्ष अनुभव- के वलसे वलवान् होकर ही दृढताके साथ यह घोषणा की— ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’। विश्वनिवासी नर-नारीमात्रको ऊँचे स्वरसे पुकारकर उपनिषद्‌के ऋषियोंने कहा—‘शृण्वन्तु

४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विश्वे अमृतस्य पुत्रा ' देखो, तुम जिस जगत्मे निवास करते हो, उसका यथार्थ स्वरूप देखो— ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ( मुण्डक० २ । २ । ११ ) अमृतस्वरूप (मृत्युरहित, विकाररहित, दुःखदैन्यरहित, नित्यसत्य परमानन्दघन ) ब्रह्म ही इस विश्वके रूपमें लीला करता हुआ हमारे सामने, पीछे, दाहिने, बायें, ऊपर नीचे सर्वत्र प्रसारित हो रहा है । ब्रह्म ही इस विश्वका यथार्थ स्वरूप है और ब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ वरणीय (जीवनका आराध्यतम आकाङ्क्षणीयतम सत्य ) है । समस्त विश्वमे ब्रह्मस्वरूप- की साक्षात् उपलब्धि करनेसे ही मानव जीवन परम कल्याणमें प्रतिष्ठित होता है । ऋषि जब अपनी ओर देखते हैं तब अनुभव करते हैं—'अहं ब्रह्मास्मि' ( मै ब्रह्म हूँ ।) अर्थात् मे क्षुद्र देह- विशिष्ट, दुर्बलमनोविशिष्ट, सुख-दु खसमन्वित, देश काला- वस्थापरिच्छिन्न एक जीवमात्र नहीं हूँ, मै तत्त्वतः ब्रह्म हूँ, मेरी चित्त सत्ता विश्वव्यापी है, सभी मनुष्यों, सभी जीवों और सभी जड पदार्थोंकी सत्ता मेरी सत्ताके साथ नित्य एकीकृत है । मेरा भागीदार कोई नहीं है, मुझसे बड़ा या छोटा कोई नहीं है, सभी मेरी सत्ताकी कुक्षिमें हैं, कोई सुख-दुःख, जय-पराजय और अभाव अभियोग मेरा स्पर्श नहीं कर सकता । मैं नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव हूँ । सम्यक् सम्बुद्धचेतन उपनिषदनुभूतिसम्पन्न महामानव समस्त विश्व-जगत्‌के साथ अपनी चैतन्यमयी एकताका अनुभव करके आत्माके परम गौरवकी प्रतिष्ठा करता है । उपनिषदने मानवात्माकी इस गौरव वाणीका समस्त विश्वके मानवोंमें प्रचार किया है । ऋषियोंने जैसे अपनेको ब्रह्मस्वरूप अनुभव किया, वैसे ही सभी मनुष्यों और सभी जीवोंमें ब्रह्मका दर्शन करके प्रत्येकको प्रकटरूपसे उन्होंने यही कहा—'तत्त्वमसि' ( तुम वही ब्रह्म हो ) । उन्होंने मानवमात्रके चित्तमे ब्रह्म चेतना- को जाग्रत् करनेका प्रयास किया । ब्रह्म-चेतनाके जाग्रत् होनेपर मनुष्योंमें परस्पर भेद विसंवाद नहीं रह सकता । सभी शरीरोमे एक ही आत्माकी अनुभूति होनेपर मन बुद्धि- हृदय अभेदज्ञान एव प्रेमसे भर जाते हैं । जाति भेद, सम्प्रदाय- भेद, उच्च-नीच-भेद, हेयोपादेय-भेद सभी मनसे मिट जाते हैं । समस्त विश्व ब्रह्मधाम, सच्चिदानन्दधाम, सौन्दर्य-माधुर्य- सिन्धु बनकर आस्वाद्य हो जाता है । उपनिषद् विश्वके सभी नर नारियोंको ब्रह्मभावसे भावित होकर प्रेमानन्दमय ब्रह्मधामके निवासी होनेके लिये आह्वान कर रहे है । प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक जीव, प्रत्येक पदार्थ और भूत- भविष्य वर्तमानके समस्त मनुष्य, सभी प्राणी और सभी पदार्थके समष्टिभूत विश्व-जगत्‌के यथार्थ तात्त्विक स्वरूपको उपनिषदोंने जैसे 'सत्य ज्ञानमनन्तम्' ( सत्य, ज्ञान और अनन्त ) बतलाया है, वैसे ही उसे 'रसमय' मानकर आस्वादन किया है,—'रसो वै स ।' ब्रह्म रसरूप है, परमास्वाद्य- स्वरूप है, परम सौन्दर्य-माधुर्य-निकेतन है, परम प्रेमास्पद है । यह रसरूप ब्रह्म ही वैचित्र्यमय जगत्‌मे विभिन्न रूपोंमें प्रकट होकर अनादि-अनन्तकाल आत्मरमण, आत्मविलास, आत्म- रसास्वादन कर रहा है । विश्व जगत्‌मे सर्वत्र ही रसका विश्राम है, सर्वत्र ही आनन्दकी क्रीड़ा है । विश्वमे जितने भी सङ्घर्ष, जीवन सङ्ग्राम, घात प्रतिघात और आपात-बीभत्सतामय युद्ध विग्रह प्रभृति होते है, उन सबमें भी एक अनन्त चैतन्य घन रसरूप ब्रह्मका ही विचित्र रसविलास चलता है— उसीका रस-प्रवाह बहता है । उपनिषद्की दृष्टिमे सभी रस- मय हैं, सभी सुन्दर है, सभी आस्वाद्य है । आनन्दरूपमें, विज्ञानरूपमे, मनरूपमे, प्राणरूपमे, अन्न या भोग्य जड पदार्थरूपमे भी एक रसामृतसिन्धु ब्रह्मकी ही आत्माभिव्यक्ति और आत्मास्वादन हो रहा है ( 'आनन्द ब्रह्म' 'विज्ञान ब्रह्म,' 'मनो ब्रह्म,' 'प्राणो ब्रह्म,' 'अन्न ब्रह्म' ) सम्बुद्ध मानव चेतनाकी अनुभूतिमें समस्त विश्व-जगत् ही प्रेम और आनन्द के सहित आस्वाद्य है । संसारमें ऐसे दो प्रकारके पुरुष बिरले ही होते हैं १—जिसने जो माँगा, उसको वही दे देनेवाले । २—स्वयं कभी किसीसे कुछ भी न माँगनेवाले ।

उपनिषद्-रहस्य ( लेखक—आचार्य श्रीक्षेत्रकाल साहा, एम० ए० ) हमलोग पाश्चात्त्य विज्ञानकी बातें सोच-सोचकर आश्चर्यमें डूब जाते हैं। इसीसे आज पाश्चात्य वैज्ञानिकोंके गौरव-गानसे भारतका गगनमण्डल मुखरित है । सैकड़ों सहस्रों परीक्षालय और सैकड़ों-सहस्रों लेबोरेटरियाँ बनी हैं, अपूर्व अगणित यन्त्रसमूह, सुन्दर-सुन्दर एपरेटस स्थान-स्थानपर सजे रक्खे हैं, विचित्र विद्युदाधार, विपुल रासायनिक सामग्रियाँ, प्रकाण्ड दूरवीक्षणयन्त्र, निपुणनिर्मित अणु-वीक्षणयन्त्र—सारांश यह कि चारों ओर विशाल विज्ञान-समारोह है। महान् आयोजन है। इस विज्ञानयज्ञके धूम्रसे, धूमर छायासे और इसके अकल्याणमय आलोकसे संसार परिपूर्ण है, और साथ ही भारतवर्ष भी । इस अमङ्गल-विज्ञान-व्यापारके विपरीत एक महान् व्यापार प्राचीन कालके भारतवर्षमें था और अब भी है। यह भी एक सुमहान् विज्ञान-आयोजन है। ज्ञान-विज्ञानकी अति महती सामग्री-सज्जा है । महान् गभीर विज्ञान- विद्यानुशीलन—दिग्दिगन्तव्यापी विज्ञानाभियान है। जल-स्थल, जड़-चेतन, चर-अचर, अनिल-अनल, सरित्-सागर, ग्रह-नक्षत्र, विद्युत्-नीहारिका, तरु-लता, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग, प्राण-मन, मस्तिष्क-हृदय, यहाँतक कि शरीरके प्रत्येक स्नायुमें यह विशाल विज्ञान-अनुसन्धान प्रचलित था, अब भी समाप्त नहीं हुआ है—इस भारतवर्षमें । इस अनुसन्धानके और इस अनुसन्धानसे उपलब्ध ज्ञान- विज्ञान और प्रज्ञानराज्यके जीवन्त, ज्वलन्त, अनन्त इतिहास, आख्यान, व्याख्यान, वितर्क-विचार, विवरण-विश्लेषण हैं— भारतके वेद, उपनिषद्, पुराण, तन्त्र और दर्शनादि शास्त्र । पाश्चात्य विज्ञान है—जड़विज्ञान, प्रपञ्च-विज्ञान और वाह्य जगत्का विज्ञान । तथाकथित मनोविज्ञान, प्राणविज्ञान आदि जो कुछ है, सभी वह वाह्य विज्ञान—जड़विज्ञान है, जिसका निश्चित फल है—अन्धकारमें प्रवेश, अन्तरके समस्त अमृत- आलोकका निर्वाण एव नित्य मृत्युके दासत्वकी प्राप्ति । वही बाइबिल-कथित ज्ञानवृक्षका फल है । जो खायेगा, उसीको मृत्युका किङ्कर बनना पड़ेगा ! परंतु भारतवर्षकी जो असंख्य प्रवाहमयी विज्ञानविद्या है, वह जडविज्ञान नहीं है; वह है चिद्विज्ञान, वाह्य वस्तु- विज्ञान नहीं है, वह है—आध्यात्मिक विज्ञान, नित्य तत्त्व- विज्ञान, सच्चिदानन्द-विज्ञान, अमृत-विज्ञान, आत्म-विज्ञान, ब्रह्म-विज्ञान और भगवद्-विज्ञान । वह है—सृष्टि-स्थिति, प्रलय, भूर्भुवःस्वरादि लोक, देव-दानव-गन्धर्वादि जीव-जाति, जन्म जरा-मृत्यु, सुख-दुःख, पाप-पुण्य और भगवत्स्वरूप- धाम लीला-परिकर आदिका परमाश्रर्य-विज्ञान, एव वह है इन उपनिषद्-पुराणादि शास्त्रोंमें । यहाँ जो 'विज्ञान' शब्दका व्यवहार किया गया है, सो यह शब्दमात्र नहीं है। फिजिक्स, केमेस्ट्री आदि जिस अर्थमें. विज्ञान हैं, उपनिषद्-पुराण- तन्त्रादि भी उसी अर्थमें विज्ञान हैं। यह कल्पना नहीं है, स्वप्न नहीं है। यह सत्य है, अभ्रान्त सत्य है। यह परीक्षित वस्तुसत्ताकी अव्यभिचारिता है, जिसका न व्यत्यय है, न व्यतिक्रम है। जिसकी नीति-प्रणालीमे भी अन्यथा नहीं है। नियमित नित्यतावद्ध विषय है। यही विज्ञानका अर्थ है। गभीर भावमे विचार करनेपर भारतीय अध्यात्म-विज्ञान इसी अर्थसे युक्त है। श्रीमद्भागवतमें वेदको ‘प्रपञ्चनिर्माणविधि' बतलाया गया है। अर्थात् वेदमे प्रकृतिके नियमोंका विचार-विवेचन भरा है। अतएव वेदादि शास्त्र विज्ञानशास्त्र हैं । पाश्चात्य-विज्ञान-परीक्षागार ‘यन्त्रयोग’को अर्थात् एवस- पेरिमेण्टको लेकर चलता है और यह भारतीय विज्ञान विशोधित चित्तागार ‘योगयन्त्र'को अर्थात् यम-नियम-आसन- प्राणायाम प्रत्याहार-ध्यान-धारणा-समाधिके उस आश्चर्यमय अव्यर्थ एक्सपेरिमेन्टको लेकर चलता है, जो अपने निर्मल आलोकसे दसों दिशाओंको उद्भासित करके अचिन्तितपूर्व सत्यसमूहको प्रकाशित करता है—समस्त भ्रान्तियोंको दूर करता है। पाश्चात्य विज्ञान प्रपञ्च-सर्वस्व है अर्थात् इस दृश्यमान जगत्के अतिरिक्त अन्य किसीके अस्तित्वको स्वीकार नहीं करता । कठोपनिषद्की भाषामे वह— ‘अयं लोको नास्ति पर इति मानी’ ( १ । २ । ६ ) —है । भारतीय विज्ञान इस विश्व-जगत्‌को तामसिक सत्य मानता है, तम समझता है, प्रकाश होनेपर भी यह अनाद्यन्त ज्योतिकी तुलनामे तमोवत् है । यथार्थ सत्य और ज्योतिर्मय जगत् इस तमोयवनिकासे आच्छन्न है।— • 'आदित्यवर्णं तमस_परस्तात् ।' ( श्वेताश्वतर० ३ । ८ ) —उस सहस्रो सूर्यमदृश ज्योतिकी एक किरणमात्र भी दीख जाती है तो मर्त्य जीव अमृत हो जाता है। उ० अं० ६—

४२ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति ।' (श्वेताश्वतर० ३ । ८)

—भारतीय विज्ञान इस अमृत ज्योतिर्जगत्‌को लेकर चलता है । कम से कम दस सहस्र वर्ष हो गये—शत सहस्र कहे तो भी क्षति नहीं है । पाश्चात्य इतिहासकी दृष्टि तो अत्यन्त ह्रस्व है ।

अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मि-न्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति । (छान्दोग्य० ८ । १ । १)

'यह मानव-शरीर ब्रह्मपुर है । इसके भीतर एक क्षुद्र कमलकुसुमाकार गृह है । उसके भीतर एक छोटा-सा आकाश है । उसके अन्दर एक निगूढ रहस्य है, उसीको जानना होगा । उसीका अन्वेषण करना होगा ।' यह अनुसन्धान उपनिषद्में सर्वत्र है । यह है सत्यानुसन्धान, तत्त्वानुसन्धान, ब्रह्मानुसन्धान या आत्मानुसन्धान । छान्दोग्यकी प्रणाली केवल प्रतिलोम—इडक्टिव ही है । इसके पश्चात् सर्वत्र प्रतिलोम अनुलोम, इडक्टिव डिडक्टिव मिश्रित है, किंतु अनुलोम प्रधान है ।

इस उपनिषद्-निबन्धके लिये यह यत्किञ्चित् भूमिका है । हाँ उपनिषद्के काल निर्णयकी कोई चेष्टा नहीं की जायगी, क्योंकि यह बहुत बडा विषय है । एक वृहत् ग्रन्थमें भी उसकी यत्किञ्चित् ही आलोचना हो सकती है । उपनिषदें इतनी प्राचीन हैं कि वे ऐतिहासिक भावनाके अतीत हैं । चपलचित्त पण्डित जो कुछ भी कहे । समग्रतः उपनिषदोंके पन्ने उलटनेपर उनमें एक सुदीर्घ विकास-विवर्त्तधारा दृष्टिगोचर होती है । एक महान् एवोल्यूशन है । विशाल विज्ञानपट है । एक विचित्र चित्रविद्या चित्रपट धीरे धीरे खुल रहा है । इसका आरम्भ होता है छान्दोग्योपनिषद्से । छान्दोग्योपनिषद् ही समस्त उपनिषद्-शास्त्रकी भित्तिभूमि है । उपनिषद्का क्या उद्देश्य है, औपनिषदिक अध्यात्म-अनुसन्धानकी कौन-कौन-सी प्रणाली-पद्धति है, उपनिषद्-विज्ञानसे उपलब्ध अर्थनियम किस प्रकारके हैं, और उपनिषद्की अन्वेषणविधि किस प्रकार आगे चलती है—छान्दोग्योपनिषद्के अध्ययनसे हम इन समस्त विषयोकी प्रत्यक्ष धारणा कर सकते हैं । छान्दोग्यकी प्रणाली विशेषरूपसे प्रतिलोम-प्रणाली है । यह ग्रन्थ एक उत्कृष्ट Inductive Spiritual Science है ।

छान्दोग्यके पश्चात् छान्दोग्यके समीपवर्ती राज्यमे बृहदारण्यक है ।

आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधःxxx (१ । ४ । १) स वै नैव रेमेxxस द्वितीयमैच्छत्xx । (१ । ४ । ३) द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं चxxx (२ । ३ । १) 'तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथारन्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत् ।' (२ । ३ । ६)

'सृष्टिसे पूर्व यह विश्व पुरुषरूपमे था । पुरुष बिल्कुल अकेला था । अकेलेमे उसे कोई आनन्द नहीं था, उसने दूसरेके सगकी कामना की । परब्रह्मके दो रूप हैं—मूर्त और अमूर्त । अर्थात् दृश्य और अदृश्य । परब्रह्म पुरुषका रूप है जैसे उज्ज्वल पीतवर्ण, उसका परिधान है पाण्डुवर्ण, कभी वह इन्द्रगोप (लाल रंगका एक कीट) कीटके सदृश लाल वर्णका प्रतीत होता है । कभी अग्निकी ज्वालाके वर्णका, कभी कमल वर्णका और फिर कभी अचञ्चल बिजलीके समान चमकदार' ।'

एषा भूताना पृथिवी रस । पृथिव्या आपो रस । अपामोषधयो रस । (छान्दोग्य० १ । १ । २)

इस प्रकार अनुसन्धान आरम्भ होता है और यह अनुसन्धान समाप्त होता है—

श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शवलाच्छ्याम प्रपद्ये— (छान्दोग्य० ८ । १३ । १)

—इत्यादिमें जाकर । पृथिवीके जल-वायु तरु लताको ढूँढ-ढूँढकर, बार-बार निरीक्षण कर, चित्रपटकी लैबोरेटरीमें पुनः पुनः एक्सपेरीमेंट कर, आकाश वायु-मेघ विद्युत्-चन्द्र-सूर्य-ग्रह नक्षत्र, जीवके देह इन्द्रिय-मन प्राणके कोने-कोनेमें घूम घूमकर अन्तरके अन्तस्तलमे श्यामवर्ण परब्रह्म परमात्माके दर्शन किये थे छान्दोग्यके ऋषि-वैज्ञानिकने ।

उनका क्या उद्देश्य था, वे क्या आविष्कार करना चाहते थे, इसपर उन्होंने स्पष्ट कहा है—

दीर्घकालव्यापी अनुसन्धानके बाद जो सन्धान प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं, वे ही इस प्रकारका स्पष्ट वर्णन कर सकते हैं । छान्दोग्यके परवर्ती बृहदारण्यककी ब्रह्मोपलब्धि का यह परिचय है । अन्वेषणके तीन स्तर हैं—अनुसन्धान, अनुभव और उपलब्धि । ज्ञानाकाङ्क्षा, ज्ञान और विज्ञान । कभी-कभी तीनों वृत्तियाँ एक साथ ही चलती हैं—


१ ऋषिको क्या श्रीराधाकृष्णके रूपका दूराभास हो रहा था ? बिल्वमङ्गल कहते हैं—'मार स्वय नु मधुरद्युतिमण्डलु नु माधुर्यमेव नु मनो नयनामृत नु ।'

  • उपनिषद्-रहस्य * ४३

अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मधु । अस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु । यश्चायं अस्मिन् वायौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमय पुरुषः । अयमेव स योऽयमात्मा । इदममृतम् । इदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ (२।५।४)

'वायु समस्त भूतोंका मधु है । समस्त भूत इस वायुके मधु हैं । इस वायुके अंदर एक तेजोमय पुरुष विराजित हैं; उनके अन्तरतममें एक तेजोमय अमृतमय पुरुष विद्यमान हैं । उनके भी प्राणस्वरूप एक तेजोमय अमृतमय पुरुष हैं, वे ही आत्मा हैं, वे ही अमृत हैं, वे ही ब्रह्म हैं, वे ही सब हैं ।'

ऐसी बात नहीं है कि छान्दोग्यमें स्पष्ट प्रकाश नहीं है- परन्तु साधारणतः छान्दोग्यकी किरणें कुछ छायासे ढकी हैं । किञ्चित् परोक्ष-भावापन्न हैं । ऋषि और परब्रह्म परमात्माके बीचमें जगत्-प्रपञ्चकी यवनिका है । यवनिकाका आवरण सूक्ष्म और स्वच्छ हो गया है । ब्रह्मज्योतिकी रश्मिराजि यवनिकाका भेद करके ऋषिके नेत्रोंमें घन-घन प्रकाशित होती है । यवनिका उठी तो है ही नहीं, कहीं तनिक-सी फटी भी नहीं है । इसीसे ब्रह्मका कोई भी वैभव साक्षात् रूपमें नहीं दिखायी देता है । केवल प्रकाश, अस्फुट स्फटिकीकृत जगत्से विकीर्ण आभाससमूह ही चारों ओर चमक रहा है ।

ऋषि देख रहे हैं कि सूर्य देवताओंका मधुभाण्ड है । किरणें मधुकोष (छत्ते) हैं जो पूर्व दिशासे विच्छुरित हो रही हैं । ऋक्‌के मन्त्र मधुमक्षिका हैं । ऋग्वेदोक्त यज्ञ मधुपूरर्ण पुष्प हैं । यज्ञसे उत्पन्न शक्ति, यश, तेज, वीर्य आदिकी उज्ज्वल छटाको ऋषियोंने देखा सूर्यके लोहितरूपमें । दक्षिण दिशाकी किरणराशि दक्षिणका मधुकोष है । यजुःके मन्त्र मधुमक्षिका हैं । यजुर्वेदोक्त यज्ञ मधुपूरर्ण पुष्प हैं । सूर्यकी शुक्ल ज्योतिवृद्धि ऋषियोंके देह-मन-प्राणकी दीप्ति है । यज्ञसम्पादनजनित ब्रह्मवर्चस् है । पश्चिम दिशामें सूर्य-किरणोंकी कृष्ण प्रभा है । उत्तरमें और भी घनतर कृष्ण वर्ण है । (छान्दोग्य० ३ । १ । ४) । सूर्य-ज्योति अमृतमय है । वसुगण सूर्यका लोहित वर्ण अमृत-रस पान करते हैं । देवगण अमृतको देखकर ही तृप्त होते हैं । आदित्यगण सूर्यकी कृष्णवर्ण किरणोंमें परिप्लुत अमृतका पान करते हैं । मरुद्गण घन-कृष्णज्योति अमृत पान करते हैं । इस प्रकार विभिन्न रूपसे नाना प्रकारसे प्रतिबिम्बित, विकीर्ण, विच्छुरित और विक्षिप्त हुई ब्रह्मज्योति ऋषियोंके देह-मन-प्राण और अन्तर्हृदयमें अविरत झाँकी दे रही है । यह कल्पना नहीं है, कवित्व नहीं है । ज्ञानघन विज्ञानांदत अनुभव है । दिव्य उपलब्धि है ।

ऋषियोंने ब्रह्मप्रतिविम्ब-प्रभाको, सुगम्य अतीन्द्रियग्राह्य इन्द्रधनुक्री वर्णच्छटाको जैसा-जैसा देखा है, वैसा-वैसा ही लिखा है । यह सब तत्त्व प्राकृत इन्द्रियगोचर नहीं होता । ध्यान-धारणा और समाधिके मार्गमें प्राप्त होता है—

ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ॥ (श्वेताश्वतर० १ । ३)

दिव्यशक्ति आत्मशक्ति ब्रह्मशक्ति त्रिगुणमय भूतसमुदायके द्वारा आच्छादित हो रही है । उसीकी विच्छुरित विभाको ध्यानदृष्टिके द्वारा ऋषियोंने देखा था ।

हम उपनिषत्-साहित्यविज्ञानके क्रम-विकासकी बात कहते हैं। छान्दोग्यके बाद बृहदारण्यक है । बीचमें 'ऐतरेय' और 'प्रश्न' हैं । छान्दोग्यकी दृष्टि समष्टि-दृष्टि है, विश्व-दृष्टि है, अखण्ड ज्ञानसम्मत, अविभक्त भाव वैभव है । उद्गीथोपासना, सामोपासना, प्राणोपासना, मधुविद्या, गायत्रीविद्या, पञ्चाहुतिविद्या, दहरविद्या—इस प्रकार छान्दोग्यके ऋषिने जिस किसी भी विज्ञान-विषयका अवलम्बन किया है, उसीमें समग्रता ला दी है । उसीको विश्वग्राही बना दिया है । मातृ-गर्भसे जो सन्तानकी उत्पत्ति होती है, उसके पीछे जो ब्रह्मभाव है, उसके अनुभवके लिये महर्षिने एक विराट् भावशृङ्खलाका आविष्कार किया है ।

निगूढ सम्बन्धयुक्त पाँच यज्ञ हैं, पाँच आहुति हैं । नक्षत्रलोक अग्नि है, सूर्य उसका समिध् है । देवगण श्रद्धापूर्वक सूक्ष्माहुति रसपूर्ण स्निग्ध अमृतके द्वारा यज्ञसम्पादन करते हैं । सोमराज चन्द्रका अर्थात् रसाधिदेवताका जन्म होता है । पर्जन्य अर्थात् सलिल शोषणशक्ति अग्नि हैं, वायु उसका समिध्—यज्ञकाष्ठ है । देवतागण उसमें राजा सोमकी—जो चन्द्रशक्ति है उसीकी आहुति देते हैं, वही वृष्टिका कारण होता है । पृथिवी अग्नि है, संवत्सर अर्थात् षड्ऋतु समिध् है । देवता वर्षाकी आहुति देकर यज्ञ करते हैं । उससे अन्नकी उत्पत्ति होती है । पुरुष अग्नि है । वाक् समिध् है; देवतागण अन्नकी आहुति देकर यज्ञ करते हैं । स्त्री अग्नि है । पुरुष समिध् है । देवतागण शुक्रसिद्धानरूप आहुति देकर यज्ञ करते हैं, उससे शिशुकी उत्पत्ति होती है । (५ । ५–८) यह दर्शन, विज्ञान और कवित्व है ।

ऐतरेय उपनिषद्का ब्रह्मज्ञान असीम आकाशसे उतरकर नीचे नहीं आता । यहाँ दृष्टिका दिङ्मण्डल सीमाबद्ध हो गया

४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


[स्तम्भ १]

है । ऋषि परमपुरुषके सृष्टिलीला-तत्त्वको देख रहे हैं । विराट् पुरुषके आविर्भावको देख रहे हैं।

'सोऽद्भ्य एव पुरुष समुद्धृत्यामूर्छयत् ।' ( ऐतरेय ० १ । ३ )

परम पुरुषकी इच्छाके प्रभावसे अखिल वेद-विद्या विभावित अखिल सृष्टि शक्तिसमन्वित विराट् पुरुष अनन्त विस्तारवाले कारण-सलिलसे आविर्भूत होकर मूर्त्तिमान् हो गया है । यह अन्वेषणकी बात नहीं है, आविष्कारकी बात है । ज्ञानकी बात है । अनुमानकी बात नहीं है, प्रत्यक्षकी बात है । भूतेन्द्रिय देवतामयी त्रिविध सृष्टि है । अग्नि वाक् मुख, वायु-प्राण-नासिका, आदित्य दृष्टिशक्ति-चक्षु इत्यादि क्रमसे समष्टि पुरुषके अङ्ग-प्रत्यङ्गकी उत्पत्ति होती है । विश्वमे चक्षुशक्ति एक है । वही शक्ति सभी चक्षुओंकी—सभी आँखोंकी सृष्टि करती है । इसी प्रकार श्रवणशक्ति, घ्राणशक्ति, वाक्शक्ति प्रभृति एक-एक शक्ति समष्टि-रूपिणी है । शक्तिमात्र ही व्यक्ति और देवता है । समष्टिशक्ति, व्यष्टिशक्ति, इन्द्रियादिको उद्भावित करती है । ऋषिने धीरे-धीरे मन-बुद्धि हृदयका प्राकट्य देखा । तदनन्तर हृदय और मनसे आत्माका आभास प्राप्त किया । पश्चात् आत्मज्योतिने जिन-जिन भावों--रूपोंमे आत्मप्रकाश किया उसको भी देखा । बस, अज्ञान दूर हो गया । अथ संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, धृति, मति, मनीषा, स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु और काम आदि आत्माकी रश्मियाँ दृष्टिगोचर होने लगीं ।

छान्दोग्यके ऋषिने सुदूर दर्शनदृष्टिसे नक्षत्र नभोमण्डलमे शिशुका जन्म देखा था, ऐतरेयके वैज्ञानिकने पृथिवीके घर घरमें शिशुका जन्म देखा । केवल गर्भ नहीं, माताकी गोदमें कुमार-का हँसता हुआ मुख देखा । दम्पतिकी प्रीति देखी ।

'सा भावयित्री भावयितव्या भवति ।' ( ऐतरेय ० ४ । ३ )

परंतु उनकी ब्रह्मदृष्टि वैसी ही बनी है । ब्रह्मसूत्रके रचयिता श्रीबादरायण कहते हैं—

'ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ।' ( ४ । १ । ५ )

—इस ऋषिके अन्तरमें भी यही बात है—

'यत्किञ्चेद प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावर सर्वं तत्प्रज्ञानेत्र प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं •••• प्रज्ञानं ब्रह्म ।' ( ऐतरेय ० ५ । ३ )

प्रश्नोपनिषद्में मिलती है एक ओर जिज्ञासा और दूसरी ओर ज्ञान विज्ञान । दोनोंका सम्मिलन है । प्रश्नके बाद प्रश्न, उत्तरके बाद उत्तर है । जीवगण कहाँसे आते हैं ? प्रजापतिने


[स्तम्भ २]

सर्वप्रथम रयि और प्राणकी सृष्टि की । प्राण आदित्य है या आदित्यमे है । रयि चन्द्रमा है या चन्द्रमामे है । उत्पत्तिकी बात संक्षेपसे कहकर ऋषिने उत्क्रमणकी अर्थात् जीवनान्तमें जीवगतिकी बात कही । दूसरा प्रश्न है—प्रजाकी रक्षा कौन करता है ? जीवनी शक्ति कौन देता है ? इन्द्रियाधिपति देवता हैं । प्राणाधिपति सत्रमें श्रेष्ठ है। सभी प्राणके अधीन हैं । आदित्य, वायु, अग्नि, इन्द्र, वरुणादि देवता जीव-जीवनकी रक्षा करते हैं । प्राण कहाँसे आता है ? जीव देहमें किस प्रकारमे रहता है ? प्राणमें कौन-कौन-सी क्रियाएँ हैं ? प्राण अपान समान-उदान व्यान कौन क्या करता है ? नाड़ीजालके साथ प्राणका घनिष्ठ सम्बन्ध है । तदनन्तर जागरण, स्वप्न, सुषुप्तिका प्रसङ्ग है । ऋषिकी दृष्टि सदा ही सुदूरगामिनी है ।

मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदान स एन यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति । ( प्रश्न ० ४ । ४ )

इसके पश्चात् ओंकारका प्रसङ्ग है और तद्भावनाके द्वारा किस प्रकार कौन कौनसे लोक जय किये जाते हैं ।

माण्डूक्योपनिषद्मे विज्ञान और भी अन्तरतर और अन्तर्मुखी है । ॐकार एव आत्माकी बात है ।

'सर्वमोङ्कार एव ।' 'सर्व ह्येतद्ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म । सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।' 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञ. ।' 'स्वप्न-स्थानोऽन्तःप्रज्ञ ।' 'सुषुप्तस्थान' एकीभूत प्रज्ञानघन ।' 'नान्तःप्रज्ञं न बहि प्रज्ञं न प्रज्ञानघनम् ।' 'एकात्मप्रत्ययसार प्रपञ्चोपशम शान्तं शिवमद्वैत चतुर्थम् ।'

आत्माकी यह तुरीयावस्था है । छान्दोग्यके उद्दालक श्वेतकेतु-संवाद और नारद सनत्कुमार-संवादमे जिस आत्म तत्त्वपर विचार किया गया है वह दिग्दिगन्तव्यापिनी समीक्षासे युक्त है । अविरत एक्सपेरीमेंटका प्रवाह चल रहा है । अभ्युपगम सिद्धान्तको ग्रहण करके महर्षिगण सुदूरगामी अनुमान प्रमाणके पथपर चल रहे हैं । बहिर्जगत्, अन्तर्जगत् और तदन्तर्गत जो कुछ भी है, सबकी पूरी पूरी खोज की है और तत्तद्रूपसे आत्मतत्त्व—ब्रह्मतत्त्वको समझा है । उन-उन सिद्धान्तोंके साथ माण्डूक्यादिके सिद्धान्तमे बडा भेद है । छान्दोग्यके—

स य एषोऽणिमा ऐतदात्म्यमिद सर्वम् । तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो । ( छान्दोग्य ० ६ । ८ । ७ )

'वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है । यह सत्य है, आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है ।'

इस सिद्धान्तकी प्रकृति माण्डूक्यके इस सिद्धान्तकी प्रकृतिसे भिन्न है—

  • उपनिषद्-रहस्य * ४५

सुषुप्तस्थानः •• प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक चेतोमुखः । (माण्डूक्य० ५) 'सुषुप्तस्थान प्रज्ञानघन है, एकमात्र आनन्दमय ही है, प्रकाशमुख है और आनन्दका भोक्ता है।' और प्रश्नोपनिषद्मे तो है— एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परे अक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते । (प्रश्न० ४ । ९) 'वह देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघने- वाला, स्वाद चखनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला, कर्म करनेवाला विज्ञानात्मा पुरुष है । वह अविनाशी परमात्मामें प्रतिष्ठित है।' विज्ञानाभियान अनुमान उपमान-शब्द-प्रमाणादिके पथमे खोज-खोजकर—देख-देखकर बहुत दूर अग्रसर हो आया है, तब भी अनुसन्धान चल रहा है समीपमें, अन्तर्देशमे । तैत्तिरीयोपनिषद्में इसका अनुभव प्राप्त होता है। पहले ही देखनेमें आता है कि ऋषि अपनी उपलब्धि-लब्ध सम्पदाओंको सजा-सजाकर विशेषरूपसे समझ ले रहे हैं। Realization हो चुका है। Recapitulation हो रहा है। शिक्षावल्लीके शेषमें श्रुति सहसा दिव्यज्ञानके व्योमयानपर चढ़कर असीम आकाशमें एक चक्कर लगाने हैं। अपूर्व सुन्दर है। 'आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्मा प्राणारामं मन- आनन्दम् । शान्तिसमृद्धिममृतम् ।' (तैत्तिरीय० १ । ६ । ३) द्वितीय वल्लीमे ऐसी ही और भी मनोरम बात कहते हैं— 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' (तैत्तिरीय० २ । १ । १) छान्दोग्योपनिषद्मे वेदान्त-विद्याका शुभ आरम्भ है। श्रीमद्भागवतमें उसकी परम पवित्र परिसमाप्ति है। इस बातको जिन्होंने नहीं समझा है, उनका वेदान्त-अध्ययन अपूर्ण ही रह गया है। वेदान्तवर्त्म सहस्रयोजनव्यापी है। काल-क्रमानुसार विज्ञान-विकास-विवर्तकी आनुमानिक अग्र- गतिके प्रसङ्गमें यहाँ पाँच उपनिषदोंकी यत्किञ्चित् आलोचना की गयी है। तैत्तिरीयकी बात चल रही है। इसके बाद है कठ; फिर केन, तदनन्तर ईश, तत्पश्चात् क्रमशः मुण्डक, श्वेताश्वतर और कौषीतकि । काल तथा तत्त्वोपलब्धि- के क्रमसे ये बारह हैं। खूब सम्भव है ये सबसे प्राचीन हैं। क्रमशः ये नाना मार्गोंमे श्रीमद्भागवतके राज्यकी-ओर अग्रसर हुए हैं। इनके अतिरिक्त जो रामतापनी, गोपालतापनी, नारायणोप- निषद्, रामरहस्योपनिषद्, कालाग्निरुद्रोपनिषद्, पञ्चब्रह्मोपनिषद्, कृष्णोपनिषद्, सूर्योपनिषद्, दत्तात्रेयोपनिषद्, बृहज्जावालोप- निषद्, मुक्तिकोपनिषद्, गर्भोपनिषद् आदि उपनिषद् हैं, उनके कालक्रम या क्रमविकासधाराका निरूपण करना बहुत कठिन है। छान्दोग्य, ऐतरेय और गर्भ—इन तीन उपनिषदोंम गर्भ- विषयक ज्ञानका क्रमविकास स्पष्ट है। इन सब उपनिषदोंको साम्प्रदायिक समझकर जो लोग इनकी अवज्ञा करते है उनके अतिपाण्डित्यकी प्रशंसा हम नहीं करते। सभी उपनिषद् स्वाभाविक विकासकी वागको पकड़कर चले हैं। ये उपनिषद् नाना प्रकारके विशाल पुराण साहित्यकी उप- क्रमणिका और भूमिका बने हुए हैं। पुराण और उपनिषद्का सम्बन्ध आगे चलकर दिखाया जायगा। तैत्तिरीय-उपनिषद्मे मिलना है— 'सोऽश्नुते सर्वान् कामान सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' (२ । १ । १) उपनिषद्में यह नयी बात है। आत्मचित् निर्गुण निर्विकार निर्विकल्प आत्मा हो जाता है। 'ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति ।' 'शान्तं शिवमद्वैतम्' तत्त्व हो जाता है। 'निरञ्जन. परम साम्य- मुपैति ।' परन्तु श्रुति यहाँ दूसरी ही बात कह रही है। परब्रह्म- के साथ मिलकर व समस्त कामनाओंके काम्यका उपभोग करते हैं, जिन्होंने इसी जीवनमे परब्रह्मको हृदयङ्गम किया हैं; किंतु क्षण-कालके लिये कौन जानता है कि शुद्ध ब्रह्म- ज्योतिके राज्यम बैठकर ऋषिने रूपब्रह्मके रसराज्यकी एक झलकको किस शुभक्षणमें देख पाया था। मुण्डकोपनिषद्- में है— 'तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ।' (२ । २ । ७) जिसके अमृत आनन्दरूपका दर्शन ऋषि कर रहे हैं वह अवाङ्मनसगोचर अवर्ण ब्रह्म नहीं है, रूपवर्ण-रसमय भगवान् हैं। तैत्तिरीय श्रुतिने इस रसब्रह्मके आभासको और भी स्पष्ट कर दिया है। 'रसो वै स.। रस ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ।' (२ । ७) परब्रह्म रसब्रह्म है। रसब्रह्म रूपब्रह्म है। जिस ब्रह्मम रूप-रस हैं, वह अनन्तकालतक आनन्द-प्रेममय जीवनयापन

४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।

करता है। उसका सीमाहीन धाम है। चिदानन्दमय सुख-दुःख है अर्थात् लीला है। वह लीला पुरुषोत्तम है।

किंतु ऋषिका चित्त 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' भावनामय है। अत वे विश्वयवनिकाको छिन्न नही कर पाते हैं। सच्चिदानन्दमयकी स्वरूप शक्तिके तरङ्गविलासु वैचित्र्यकी वर्णच्छटा देखकर भी वे उसे हृदयमे धारण नहीं कर पाते हैं, किंतु पूर्ण दर्शन या नित्य दर्शनकी आशाका भी त्याग नहीं करते हैं। कठोपनिषदमे कहा है— यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ (१।२।२०)

'मेरी अपनी कुछ भी सामर्थ्य नहीं है। वे कृपा करके यदि मुझे वरण कर लेते हैं, यदि कृपा करके उस सकल सुन्दर सन्निवेश अमृतोज्ज्वल तनूको मेरे नेत्रोंमे प्रकाशित कर देते है तो मै कृतार्थ हो जाता हूँ।' ऋषिका यही मनोभाव है। कठोपनिषदके शेषमें (२।२।१३) एक गूढार्थपूर्ण बात है— नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।

इसे देखकर रासपञ्चाध्यायीका एक श्लोक स्मरण हो आता है— कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः । रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ॥ (१०।३३।२०)

ब्रह्मज्ञानानुशीलनसे ऋषियोंका चित्त जितना ही स्वच्छ होता चला जा रहा है, उतनी ही चिदानन्दलीलाराज्यसे रस रश्मियाँ आ आकर उनके नेत्रोंमे झलक दिखला जा रही हैं।

केवल ज्ञानसे उस रागरञ्जित आकाशका आभास नहीं मिलता। अनुरागका स्पर्श आवश्यक है। ऋषियोंके हृदय कभी भी अनुरागशून्य नहीं हैं। केनोपनिषद्के ब्रह्मानुसन्धानमें अनुरागका रङ्ग लग गया है। श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । (१।१)

यह अनुरागकी भाषा है। केनोपनिषद्का ज्ञान 'विशुद्ध केवल ज्ञानम्' नहीं है। ज्ञानकी शुभ्र वाष्पपर प्रेमकी रविरश्मि पड़ जानेके कारण यहाँ इन्द्रधनुषका वर्ण प्रस्फुटित हो उठा है। ब्रह्म अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस नहीं है। ब्रह्म यहाँ ब्रह्मवादी देवताओंके नयनगोचर होता है। इतनेपर भी वह अपूर्व, अज्ञेय है। तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव। तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति। (केन० ३।२)

यह लीलाकी प्रभात किरण है। उपनिषद् पुराणके उस स्वर्गकी ओर अव्याहत गतिमे बढ़ा चला जा रहा है जहाँ शुष्क ज्ञान शोभा-सुषमामय दिव्य जीवन तरङ्गोंमे उछलता रहता है।

ब्रह्म आभास देकर देवताओको मुग्ध करके अन्तर्धान हो जाता है; परंतु ब्रह्मकी योगमायाशक्ति अपनी रूप-लावण्यमयी मूर्तिको प्रकट करके देवताओके अज्ञानान्धकारको दूर कर देती है। इन्द्र देखते हैं— तस्मिन्नेवाकाशे ×× बहुशोभमानाम् उमा हैमवतीम् । (३।१२)

दुर्गासप्तशतीमे चण्ड-मुण्ड अम्बिकाके सुमनोहर रूपको देखते हैं— ततोऽम्बिका परं रूपं बिभ्राणा सुमनोहरम् । ददर्श चण्डो मुण्डश्च .. .. ॥ (५।८९)

पुराण उपनिषदका ही विकसित रूप है। उपनिषद् सतेज तरुण सुन्दर ब्रह्मज्ञान महीरुह है और पुराण विवृद्ध श्यामशाखाप्रतान पल्लवित पुष्पित फलित प्रेमभक्ति-कल्पतरु है। उसमें भारतका ज्ञान विज्ञान-दर्शन भक्ति, प्रेम-साधना अखण्ड और अव्याहत है। जो लोग पुराणको अधःपतित युगका साहित्य समझते हैं वे वस्तुतः ज्ञानहीन और कुसंस्काराच्छन्न हैं। इस कुसस्कारका तत्त्व और इतिहास हम जानते हैं।

छान्दोग्य-उपनिषद् गायत्री नामक कार्य ब्रह्मके प्रसङ्गमें कहता है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (३।१२।६)

उपनिषद् और पुराणका सम्बन्ध-रहस्य इस मन्त्रमें छिपा है। परब्रह्मका एक पाद यह विश्वभुवन है और शेष तीन पाद उसके स्वरूपान्तर्गत है, उसकी त्रिपाद्विभूति हैं। एकपाद-विभूति त्रिपाद्विभूतिके आकाशमे सूक्ष्म वाष्पकी भाँति लहरा रही है। उपनिषद् एकपादविभूतिभूत विश्वमण्डलमें त्रिपाद्विभूतिके छिटके हुए किरण-कणोके अनुसन्धानमें

उपनिषद्-रहस्य * ४७ संलग्न है। उपनिषद्में त्रिपाद्विभूतिका प्राकट्य नहीं है। उपनिषद्में त्रिपाद्विभूतिके किसी भी भावका आविष्कार नहीं हुआ है। धाम, लीला, परिकर आदि कुछ भी स्पष्टतया उपनिषद्में नहीं है । कौषीतकि-उपनिषद्मे ब्रह्मलोकका अर्थात् हिरण्यगर्भलोकका अपूर्व सुन्दर वर्णन है, किंतु वह भी एकपाद्विभूतिके अन्तर्गत है। वह अतीन्द्रिय विश्वकी सर्वोत्तम सम्पदा है तथापि त्रिपाद्विभूति नहीं है। स्वयं लीला-पुरुषोत्तम गीताके वक्ता हैं, पर गीता भी एकपाद्- विभूतिकी सीमाके अन्तर्गत ही है। कारण, गीता उपनिषद् है। भगवान् स्वयं ही महायोगेश्वर हरि होकर भी अमृताक्षर हर हो गये हैं। इस रहस्यको गोपन नही रक्खा गया है। वे कहते हैं—'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्' अतएव श्रीकृष्ण नहीं हैं। विश्वव्यापारसे और जीव-हृदयके अन्तरतम प्रदेशमें ब्रह्मका अन्वेषण करनेमें उपनिषद् नित्य संलग्न है । पुराणका प्रतिपाद्य है त्रिपाद्विभूति । एकपाद्विभूति अर्थात् विश्व- व्यापार भी पुराणमें है; किंतु पुराणका लक्ष्य है—लीला, धाम, परिकर अर्थात् त्रिपाद्विभूति, भक्तानुग्रह, नीति-धर्म, जीव-जीवनका कर्तव्य, भक्तितत्त्व और मोक्षविज्ञान । उपनिषद्में जिसका आभास प्राप्त होता है, पुराणमे वह विस्तारित और विकसित हो गया है। उपनिषद्मे— य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगा- द्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । ( श्वेताश्वतर० ४।१) उपनिषद्में वह प्रधानतः अवर्ग है। उसने जो विश्वमे और परव्योममें शत-सहस्र वर्णविलसित व्यापारका विधान किया है, उसका इतिहास और विवरण समस्त पुराणोंमें है। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' ( श्वेताश्वतर० ४।१०) और— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् (श्वेताश्वतर० ४।५) —प्रभृति आभासमात्र उपनिषद्मे है। मार्कण्डेय-चण्डी आदिमें हम पाते हैं इस विषयका विशाल विस्तार और विज्ञान-विभावना ! ऐतरेय उपनिषद्ने सृष्टितत्त्वकी जो संक्षिप्त व्यञ्जना दी है, श्रीमद्भागवतके तृतीय स्कन्धके पञ्चम- षष्ठ आदि अध्यायोंमें उसीका सुविस्तृत वैज्ञानिक वर्णन है । पाश्चात्य वैज्ञानिकोंको इधर ध्यान देना चाहिये । पुराण माइथोलॉजी (Mythology) नहीं है। पुराण उपनिषद्का उच्चतर विकासस्तर है । कुसंस्कार सर्वत्र छाया है। ज्ञान, विज्ञान और दर्शनके राज्यमें भी सर्वत्र ही कुसस्कार है—वहाँ भी भ्रान्ति-भूतका भय है। 'उपनिषद्की दृष्टिमे ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत् मिथ्या है।' ऐसी जो एक धारणा है यह एक बुरा कुसंस्कार है। बृहत् मिथ्या है। जगत् मिथ्या है—यह बात उपनिषद्‌के ऋषि‌ने कभी भ्रमसे भी नहीं लिखी । परमेश्वर परब्रह्मने निज सत्तासे, अपनी अव्यय भाववस्तुसे विश्वका सृजन किया है । इसके अतिरिक्त कोई दूसरी बात श्रुति देवियोंने कभी नहीं सुनी। उपनिषद्से आँखें मूँदकर इसके सैकड़ों प्रमाण दिये जा सकते हैं— 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत०×× ।' 'स तपस्तप्त्वा इद५ सर्वमसृजत यदिद किञ्च । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । ××सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च ।' (तैत्तिरीय० २।६।२) 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' । 'तज्जलानिति शान्त उपासीत ।' ( छान्दोग्य० ३।१४।१) 'तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा ।' ( श्वेताश्वतर० ४।२) इस प्रकार सैकड़ों महलों श्रुति-वचन जगत्‌की सत्यताकी साक्षी दे रहे हैं। जगत् मिथ्या है, यह बात श्रुति नहीं कहती । महान् आचार्य श्रीशङ्कराचार्यके मायावादकी आलोचना- का यहाँ स्थान नहीं है। आचार्यकी अपनी वाक्चावलीमे ही मायावाद-खण्डनके अस्त्र भरे पड़े है। पण्डितोका दूसरा यह कुसस्कार है कि 'केवल जगत् ही मिथ्या नहीं है, जीवात्मा भी मिथ्या है' । यह एक उत्कट मिथ्या है। 'तत्त्वमसि'—एव 'नामरूपे विहाय×××परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।' ( मुण्डकेोपनिषद् ४ । ८) —इत्यादि श्रुति-वाक्योंके दोनों प्रकारके अर्थ हो सकते है किंतु जीव और ब्रह्मका पार्थक्य अर्थात् द्वैत, उपनिषद्‌मे सर्वत्र अत्यन्त परिस्कृत रूपमे पुनः-पुन. उपदिष्ट है । 'पृथगात्मानं प्रेरितार च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥' (१।६) 'भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्त त्रिविध ब्रह्ममेतत् ।' (१।१२) ( श्वेताश्वतर० ) भोग्य जगत्, भोक्ता जीव और प्रेरककर्ता परमात्मा परब्रह्म—ये तीन विभाव ब्रह्मके ही हैं। श्रीबादरायणने वेदान्तसूत्रमें सनिव्रंणरूपसे पुन.-पुनः घोषणा की है कि जीव और ब्रह्म एक नहीं हैं ।

४८              • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति '

'भेदव्यपदेशाच्च'          ( १ । १ । १८ ) 'अधिकं तु भेदनिर्देशात् ।'      ( २ । १ । २१ ) जीव और ब्रह्म तत्त्वतः एक होकर भी, अंशांशी होकर भी वस्तुतः विभिन्न हैं, भावतः विभिन्न हैं । आत्मज्ञ, नैगुण्य निर्मुक्त जीव, सर्वभूतात्मभूतात्मा जीव भी देहपात होनेपर ब्रह्म नहीं हो जाता । श्रीबादरायणने ब्रह्मसूत्रमे इस तत्त्वपर स्पष्टरूपसे विचार किया है । मुक्त जीव ब्रह्म हो जाता है, इत्यादि बातोका उल्लेखमात्र भी न करके उन्होंने इस बातपर विचार किया है कि 'मुक्त जीवके देह रहती है या नहीं'--- 'तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ।' ( ४ । ४ । १३ ) ---मुक्त जीवका जीवन कभी स्वप्नवत् होता है, कभी जाग्रद्वत् । जब स्वप्नवत् होता है तब स्वरूपदेह अप्रकट रहता है और जब जाग्रद्वत् होता है तब प्रकट रहता है । 'भावे जाग्रद्वत्' ( ४ । ४ । १४ ) । ---श्रुतिके तात्पर्य को ब्रह्मसूत्रमे निश्चितरूपसे स्पष्टाक्षरोंमे लिपिबद्ध किया गया है । ब्रह्मसूत्रमे जगन्मिथ्यावादका खण्डन किया गया है-- 'आत्मकृते परिणामात् ।' ( १ । ४ । २६ ) 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य' ( २ । १ । १४ ) ---इत्यादि सूत्र देखें । मृत्तिका जैसे घटका कारण है, सुवर्ण जैसे अलङ्कारका कारण है, वैसे ही ब्रह्म जगत्का कारण है । जब कारण सत्य है, तब कार्य भी सत्य है । ब्रह्म सत्य है । जगत् सत्य है । बौद्धोंने ब्रह्म एवं आत्माको असत्य समझा था, इसीलिये उनका जगत् भी असत्य--शून्यमय हो गया । 'शून्यं तत्त्वम् । भावो विनश्यति ।' ---उपनिषद्-दर्शन विशुद्धाद्वैतदर्शन है, इस बातको आचार्य श्रीशङ्करके अनुयायियोंके अतिरिक्त अन्य किसीने भी नहीं माना । आचार्य श्रीरामानुज विशिष्टाद्वैतवादी हे। परमेश्वर जीव और जड--परब्रह्म इन तीन वैभवोंसे सम्पन्न हैं । 'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ।' 'त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।' ---यही श्रुतिप्रतिपादित है । निम्बार्क द्वैताद्वैतवादी हैं। यह अति निर्मल निष्प्रपञ्च मतवाद है। श्रीमध्याचार्य और गौड़ीय वैष्णवोंने अचिन्त्यभेदाभेदवादकी स्थापना की । ब्रह्म, माया, जीव, कर्म और काल--ये पाँच तत्त्व भिन्न होकर भी अभिन्न हैं, अभिन्न होकर भी भिन्न हैं। यह चिन्तातीत विश्वरहस्य है। केनोपनिषद्में भी अनुसन्धान है। एक्सपेरिमेंन्ट है ।

यह पहले ही कहा जा चुका है । ईशोपनिषद् और श्वेता श्वतरोपनिषद् सम्पूर्ण सिद्धान्तके शैलशिखरपर समारूढ हैं । यहाँ समस्त समीक्षाओं का अन्वीक्षण आदि समाप्त हो गया है । ऋषिगण यहाँ ज्ञान-विज्ञानमच्छिन्नसंशय होकर तत्त्व- विमानपर विचरण करते हैं। वे तत्त्वज्ञानके सीमाज्ञेयपर आ पहुँचे हे। जो कुछ जाना जाता है, सब जान चुके हैं, प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं । ज्ञानाभियानकी समाप्ति कहाँ है, यह भी जान चुके हैं--- 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' यह समझ चुके है-- 'यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद स' (केन० २ । ११) जो कहते हैं कि हम ब्रह्मतत्त्वको ठीक नहीं समझ सके हैं, वे ठीक समझ गये हैं, और जो कहते हैं कि हमने ठीक समझ लिया है, वे कुछ भी नहीं समझे हैं। यह ज्ञानीकी बात है । भगवद्विषय कुछ भी नहीं समझा जाता---यह मूर्खकी बात है। उसने भगवत्कृपाका स्पर्श नहीं पाया है । भगवद्विषय सारा समझा जा सकता है यह भी मिथ्या कथन है । 'अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्' (ईशोपनिषद ४) एव-- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ (श्वेताश्वतर० ६ । ११) ---इत्यादि वचन ईशोपनिषद् और श्वेताश्वतरोपनिषद्में सर्वत्र हैं । उपनिषद्का ज्ञानाभियान यहाँ अन्वेषण समाप्त करके तत्त्वदर्शन और सिद्धान्तकी भूमिपर आरोहण कर चुका है । छान्दोग्यका-- 'अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच' (छान्दोग्य० १ । ९ । १) इत्यादि काल और भाव दोनोके ही दूरत्वसे बहुत दूर रह गये हैं । श्वेताश्वतरोपनिषद् अतुलनीय है । इसके अनेक कारण हैं । विशुद्ध अद्वैतवाद, मायावाद, जगन्मिथ्यावाद, जीव ब्रह्मवाद आदि समस्त कल्पनावाद श्वेताश्वतरके सुदृढ़ विज्ञानगात्रसे आहत होकर चूरमूर हो गये हैं। 'या ते रुद्र शिवा तनू' प्रभृति वाक्य उपनिषद्की ज्ञान-तरणीको पुराणके तटपर पहुँचा देते हैं । श्वेताश्वतरका ब्रह्म रुद्र, हर, गिरीश,

  • उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ४९ शिव हो गया है। गीता-उपनिषद्का भी श्वेताश्वतरसे घनिष्ठ है। यह श्रीरामोपासनाका ग्रन्थ है। साधन-भजनके उपदेशसे सम्बन्ध है। गीताके भाव, तत्त्व, विन्यासविधि, 'सर्वेन्द्रिय- पूर्ण है। मन्त्रमयी उपनिषद् है। इसका पथनिर्देश तन्त्रकी ओर है। गुणाभासम्' आदि वाक्य एव तत्त्वदर्शन अधिकांशमें श्वेताश्वतर- से अभिन्न हैं। श्वेताश्वतरमें सर्वप्रथम सांख्यदर्शनकी भूमिका वैदिक साधना देवता-विज्ञानात्मिका है। सकाम याग-यज्ञ है। 'तमेकनेमिम्' श्लोक और— क्रियामयी है। औपनिषदिक साधना विश्वप्रपञ्चमें सगुण- 'स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति।' निर्गुण-द्वैताद्वैत-ब्रह्मानुसन्धानात्मिका है। पौराणिक साधना ( श्वेताश्वतर० ५। १२) भगवद्भावना भगवदनुरागमयी भक्तिसाधना है, अमृतरूप -इत्यादि सांख्यतत्त्व है। श्वेताश्वतरके द्वितीय अध्यायमें रसकी साधना है। वह चिन्मयी सत्ताके, परमानन्दवस्तु- पातञ्जलयोग-दर्शन एव गीताके ध्यानयोगका आभास है। सत्ताके, नित्य-प्रेम-सुखमय सत्य-साम्राज्यके प्रवेशपथका भक्तिके बिना कोई भी ज्ञान अन्तरमें उद्भासित नही होता, अनुसन्धान करनेमें संलग्न है। तन्त्र प्रधानतः शक्ति-साधनामयी विद्या है। तन्त्रमे अध्यात्म, योग, कर्म, ज्ञान, भक्ति, मुक्ति यह महावाक्य श्वेताश्वतरमें ही सर्वप्रथम ध्वनित हुआ है। सभी कुछ हैं। तन्त्र सिद्धिकामी है। तान्त्रिक शक्तिसाधक कौषीतकि-उपनिषद्के उज्ज्वल राज्यमें प्रवेश करनेपर है—मन्त्रतत्त्वविद् है । हिंदू-शास्त्र—हिंदू-धर्म आश्चर्य प्रतीत होता है कि पुराणका शोभा-सौन्दर्यसमन्वित असीम अपरिमेय है, इसका आदि-अन्त नहीं है। यह अगाध अपार देश अब अधिक दूर नहीं है। गोपालतापनी और कृष्णोप- ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-प्रेम भक्ति पारावार है। यदि पुण्य-मरण प्राप्त निषद् श्रीमद्भागवत और विष्णुपुराणादिकी ओर मार्ग खोल करना चाहते हो तो आओ, कूद पड़ो इस दिव्य सुधा-सलिल- देते हैं। रामतापनी उपनिषद्का उद्देश्य ज्ञान नहीं है, भक्ति सागरमें। यही अमृत-मरण है ! उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा ( लेखक—महामहोपाध्याय शास्त्ररत्नाकर पं० श्रीप्र० चिन्नास्वामी शास्त्री ) जगत्स्थितिलयोद्भूतिहेतवे निखिलात्मने । समान मानकर आत्मज्ञानको ही सर्वोत्कृष्ट जान उसकी प्राप्ति- सच्चिदानन्दरूपाय परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥ के लिये ही निरन्तर यत्न करते रहते थे। 'संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारण तथा सबके इस समय भी ऐसे अनेकों श्रेष्ठ पुरुष हैं जो आज भी आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मको नमस्कार है।' उसी वेदादि शास्त्रानुमोदित महर्षियोंके द्वारा संसेवित प्राचीन- इस जगत्में सभी सुख चाहते हैं, दुःखके त्यागकी इच्छा तम मार्गका विशेषरूपसे समादर करते हैं । महर्षिलोग लौकिक करते है। उसमें भी निरतिशय सुखमे सबका अधिक प्रेम विषयोंके विज्ञानकी अपेक्षा परम पुरुषार्थके साधनरूप पारमार्थिक होता है। यद्यपि आधुनिक समयमें जिस किसी प्रकारसे भी आत्मज्ञानको अत्यन्त उत्कृष्ट मानते थे । इसीके द्वारा उन्होंने की हुई इन्द्रिय-तृप्तिको ही वर्तमान जन्मकी परम सफलता सम्पूर्ण स्वर्गादि लोकोंपर विजय प्राप्त की थी और परम माननेवाले तथा इस इन्द्रिय तृप्तिके साधनभूत विषयोंके उपभोग- श्रेय अर्थात् मुक्तिको प्राप्त किया था। अपनी उत्प्रेक्षा शक्ति में ही मनको लगाये रखनेवाले मनुष्य उन विषयोंकी प्राप्ति ( अत्यन्त विवेकशील बुद्धि)के द्वारा प्राप्त तेजसे परम कल्याणके करानेवाली अति महान् धनराशिका किसी भी उपायसे अर्जन पथपर, जहाँतक वे पहुँच सके थे, दूसरे लोग उसकी कल्पना करना ही आत्यन्तिक पुरुषार्थ समझते हैं और उससे बढकर करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते । इस बातको पाश्चात्य देशों- दूसरी कोई वस्तु नहीं है, ऐसा मानते हैं। धनी तथा अधिकारी के विद्वानोंने भी आश्चर्यचकित चित्तसे मुक्तकण्ठ हो स्वीकार पुरुष ही समाजमें गिना जाता है, वही सब जगह अगुआ हो जाता किया है । इस प्रकारका आत्मज्ञानजनित गौरव, जो हम है । उसकी कही हुई सभी बातें समीचीन ही मानी जाती हैं। भारतीयोंको प्राप्त हो सका था, हमारे उपनिषद्-ग्रन्थोंके उसका सारा मत ही सर्वोत्तम मत है—ऐसा लोग मानते हैं; अनुशीलनसे ही उपलब्ध हुआ था। परन्तु प्राचीन कालमें हमारे महर्षिगण विषय-भोगको अति यद्यपि वेदोंके पूर्वकाण्ड (कर्मकाण्ड) में तथा वेदोंका -तुच्छ समझते थे तथा उसके साधनभूत धन-अधिकारादिको तृणके ही आश्रय लेकर चलनेवाली दूसरी विद्याओंमें भी आत्मस्वरूप

काण्डकी जो कुछ और जितनी भी प्रवृत्ति है, वह सब आत्मा

५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

[बायाँ स्तम्भ]

और उसके नित्यत्व आदिका वर्णन किया गया है तथा कर्म- काण्डकी जो कुछ और जितनी भी प्रवृत्ति है, वह सब आत्मा और उसकी नित्यताका अवलम्बन लेकर ही है, तथापि वैदिक कर्मकाण्ड आदिके द्वारा आत्माकी नित्य, निरतिशय, आनन्द- मय, प्रकाशमय सर्वात्मरूपताका ज्ञान नहीं हो सकता । केवल आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन करनेमात्रसे कर्मकाण्डका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है । इसके सिवा आत्माकी सर्वात्मता और एकताका प्रतिपादन कर्मकाण्डके विरुद्ध भी पड़ता है । अतएव आत्माके एकत्वका प्रतिपादन करना भेदको औपाधिक बतलाना, जीवात्मा और परमात्मामें भी वास्तविक भेदका अभाव बतलाना, आत्माकी अखण्ड चिदानन्दैकरसरूपताका अनुभव कराना—आदि सब कुछ उपनिषदोंका कार्य है । इसीमें सारी उपनिषदोंका, विशेषतः 'ईशावास्य' से लेकर 'कैवल्य' पर्यन्त द्वादश उपनिषदोंका परम तात्पर्य है । आचार्य शङ्कर भगवत्पादने भी अपने भाष्यमें इसी अभिप्रायको अभिव्यक्त किया है—

सैन्धवघनवद् अनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं सर्वस्वासूपनिषत्सु प्रतिपिपादयिषितोऽर्थ ।****तथा सर्व- शाखोपनिषत्सु च ब्रह्मैकत्वविज्ञानं निश्चितोऽर्थः । (बृहदारण्यक० १।४।१०)

तथा—

इष्यते च सर्वोपनिषदा सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम् । (माण्डूक्य० १।३)

'ब्रह्म नमकके डलेके समान अन्तररहित (व्यवधानशून्य अविच्छिन्न) है, वह बाह्यभेदसे रहित है अर्थात् बाहरसे कुछ और भीतरसे कुछ—ऐसा नहीं है तथा सर्वदा एकरस है । सम्पूर्ण उपनिषद्मे इसी विज्ञानका प्रतिपादन करना अभीष्ट है।'

'इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंकी उपनिषदोंमें भी 'ब्रह्मकी एकताका विज्ञान' ही सिद्धान्तभूत अर्थ है।'

सारी उपनिषदें सबके आत्माकी एकताका ही प्रतिपादन करनेवाली हैं, यही मानना अभीष्ट है ।

इस भाष्यपर विवृत्ति लिखते हुए आनन्दगिरि कहते हैं—

उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिना सर्वासामुपनिषदां सर्वेषु देहेषु आत्मैक्यप्रतिपादनपरत्वमिष्टम् ।

'उपक्रम और उपसंहारकी एकरूपता आदि तात्पर्य- निर्णयके छ. हेतुओको दृष्टिमें रखते हुए यही मानना इष्ट है कि सम्पूर्ण उपनिषदें सब देहोंमें स्थित आत्माकी एकताका ही प्रतिपादन करनेमें तत्पर हैं।' इस विषयमें अर्थात् जीवात्मा


[दायाँ स्तम्भ]

और परमात्माकी एकता तथा सब जीवोकी परस्पर एकताके प्रतिपादनमे और आत्मा अखण्डानन्दरूप, चिन्मय एव एकरस है—इस तथ्यके वर्णनमे इन सभी उपनिषदोंका कण्ठस्वर एक है । इस विषयको लेकर उनमें तनिक भी मत- भेद नहीं है । यह बात नीचे उद्धृत किये हुए वचनोंसे स्पष्टतः जानी जा सकती है—

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ (ईश० ६)

'जो सब भूतोंको आत्मामे ही देखता है तथा सब भूतों- में आत्माको ही देखता है, वह इस सर्वात्मभावके दर्शनके कारण किसीसे भी घृणा नहीं करता।'

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ (केन० १।४)

'जो वाणीके द्वारा अभिव्यक्त नहीं होता । जिसके द्वारा वाणी अभिव्यक्त होती है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । अज्ञानी- जन जिस देश कालादिसे परिच्छिन्न वस्तुकी उपासना करते हैं, यह ब्रह्म नहीं है।'

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य. करोति ।' तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २।२।१२)

'जो एक, सबको अपने वशमे रखनेवाला और सब प्राणियोंका अन्तरात्मा है तथा जो अपने एक रूपको ही नाना रूपोमे व्यक्त करता है—अपनी बुद्धिमे स्थित उस आत्मदेव को जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं, उन्हींको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है, दूसरोंको नही।'

अङ्गुष्ठमात्र पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व. ॥ (कठ० २।१।१३)

'वह पुरुष अङ्गुष्ठमात्र तथा धूमविहीन ज्योतिके समान है । वह जो कुछ हुआ है तथा होनेवाला है, सबका शासक है, वही आज है और वही कल भी रहेगा।'

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम- लोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । (प्रश्न० ४।१०)

  • उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ५१ ‘हे सोम्य ! वह जो निश्चयपूर्वक उस तमोविहीन, शरीर- ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि रहित, लोहितादि गुणोंसे शून्य, शुद्ध एव अविनाशी पुरुष श्वेतकेतो। (छान्दोग्य० ६।८।७) (आत्मा) को जानता है, वह उस परम अक्षरब्रह्मको ही प्राप्त ‘हे श्वेतकेतु ! एतद्रूप ही यह सब कुछ है, यह सत्य है, होता है। वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।’ यह आत्मा है, वह तुम हो।’ हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (मुण्डक० २।२।९) (बृहदारण्यक० ४।४।१७) ‘वह निर्मल तथा निष्कल (अवयवरहित) ब्रह्म हिरण्मय तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म (ज्योतिर्मय) परम कोशमे स्थित है। वह शुद्ध तथा समस्त सर्वानुभूः। (बृहदारण्यक० २।५।१९) ज्योतिर्मय पदार्थोंका भी प्रकाशक है और वही परम तत्त्व ‘जिसमें पाँच पञ्चजन (गन्धर्व, पितर, देवता, असुर है, जिसे आत्मज्ञानी जानते हैं।’ और राक्षस अथवा ब्राह्मणादि वर्ण और निषाद) तथा नान्त प्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न अव्याकृत प्रकाश प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मै अमृत ब्रह्म प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यप- मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ।’ ‘वह देश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ यह ब्रह्म पूर्व और अपर—कारण और कार्यसे रहित है, अन्तर- मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय । (माण्डूक्य० ७) विजातीय द्रव्यसे शून्य है और अबाह्य है (बाह्य आदिके ‘वह अन्तःप्रज्ञ अर्थात् तैजसरूप नहीं है, बहिःप्रज्ञ भेदसे रहित है), यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला अर्थात् विश्वरूप भी नहीं है। अन्तर्बहिःप्रज्ञ अर्थात् जाग्रत् ब्रह्म है।’ और स्वप्नकी अन्तराल-अवस्थारूप भी नहीं है, प्रज्ञानघन निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अर्थात् सुषुप्तावस्थारूप नहीं है। प्रज्ञ अर्थात् एक साथ सब अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ विषयोंका प्रज्ञाता, निरा चेतनरूप नहीं है। अप्रज्ञ अर्थात् (श्वेताश्वतर० ६।१९) अचेतनरूप नहीं है। वह दृष्टिका विषय नहीं, व्यवहारका तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- विषय नहीं, उसे हाथोंद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ उसकी परिभाषा नहीं हो सकती। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय (श्वेताश्वतर० ६।१२) है, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एकात्म-प्रत्ययरूप है, प्रपञ्च- ‘जो कला अर्थात् अवयवरहित है, निष्क्रिय है, शान्त, कृत धर्मोंका वहाँ अभाव है, वह शान्त है, शिव है, अद्वैत निर्दोष और निर्लेप है, जो अमृतका सर्वोत्तम सेतु है और है—ऐसे उस परम तत्त्वको ज्ञानीजन परमात्माका चतुर्थ पाद जिसका ईंधन जल चुका है, उस धूमादिशून्य अग्निके समान मानते हैं। वही आत्मा है, वही जाननेयोग्य है।’ दीप्तिमान् है।’ ‘उसको जो धीर अपने आत्मा (अन्तःकरण) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। में स्थित देखते हैं उन्हीको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है, (तैत्तिरीय० २।८।५) दूसरोंको नहीं।’ ‘वह जो यह पुरुषमें (पञ्चकोशात्मक देहमें) है, और यत्पर ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतन महत्। वह जो आदित्यमें है—वह एक है।’ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्य स त्वमेव त्वमेव तत् ॥ यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं (कैवल्य० १।१६) तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा ‘जो परब्रह्म सबका आत्मा, विश्वका महान् आयतन, प्रज्ञान ब्रह्म। (ऐतरेय० ३।३) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और नित्य है, वह तुम्हीं हो, तुम्हीं ‘जो कुछ यह जङ्गम जीवसमुदाय है, जो पक्षी है, जो वह हो।’ यह स्थावर जगत् है, वह प्रज्ञानेत्र है अर्थात् प्रज्ञामे दृष्ट होता यहाँ इन थोडे-से वचनोंद्वारा दिग्दर्शनमात्र कराया गया है। प्रज्ञानमे ही प्रतिष्ठित है। लोक प्रज्ञानेत्र है, प्रज्ञा ही है। इन उपनिषदोंमे इस प्रकारके अर्थवाले सैकड़ों वचन हैं, उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।’ जिनका परम तात्पर्यस्वरूप एक ही अर्थ है—‘एकरस अखण्ड