कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।
करता है। उसका सीमाहीन धाम है। चिदानन्दमय सुख-दुःख है अर्थात् लीला है। वह लीला पुरुषोत्तम है।
किंतु ऋषिका चित्त 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' भावनामय है। अत वे विश्वयवनिकाको छिन्न नही कर पाते हैं। सच्चिदानन्दमयकी स्वरूप शक्तिके तरङ्गविलासु वैचित्र्यकी वर्णच्छटा देखकर भी वे उसे हृदयमे धारण नहीं कर पाते हैं, किंतु पूर्ण दर्शन या नित्य दर्शनकी आशाका भी त्याग नहीं करते हैं। कठोपनिषदमे कहा है— यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ (१।२।२०)
'मेरी अपनी कुछ भी सामर्थ्य नहीं है। वे कृपा करके यदि मुझे वरण कर लेते हैं, यदि कृपा करके उस सकल सुन्दर सन्निवेश अमृतोज्ज्वल तनूको मेरे नेत्रोंमे प्रकाशित कर देते है तो मै कृतार्थ हो जाता हूँ।' ऋषिका यही मनोभाव है। कठोपनिषदके शेषमें (२।२।१३) एक गूढार्थपूर्ण बात है— नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
इसे देखकर रासपञ्चाध्यायीका एक श्लोक स्मरण हो आता है— कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः । रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया ॥ (१०।३३।२०)
ब्रह्मज्ञानानुशीलनसे ऋषियोंका चित्त जितना ही स्वच्छ होता चला जा रहा है, उतनी ही चिदानन्दलीलाराज्यसे रस रश्मियाँ आ आकर उनके नेत्रोंमे झलक दिखला जा रही हैं।
केवल ज्ञानसे उस रागरञ्जित आकाशका आभास नहीं मिलता। अनुरागका स्पर्श आवश्यक है। ऋषियोंके हृदय कभी भी अनुरागशून्य नहीं हैं। केनोपनिषद्के ब्रह्मानुसन्धानमें अनुरागका रङ्ग लग गया है। श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । (१।१)
यह अनुरागकी भाषा है। केनोपनिषद्का ज्ञान 'विशुद्ध केवल ज्ञानम्' नहीं है। ज्ञानकी शुभ्र वाष्पपर प्रेमकी रविरश्मि पड़ जानेके कारण यहाँ इन्द्रधनुषका वर्ण प्रस्फुटित हो उठा है। ब्रह्म अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस नहीं है। ब्रह्म यहाँ ब्रह्मवादी देवताओंके नयनगोचर होता है। इतनेपर भी वह अपूर्व, अज्ञेय है। तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव। तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति। (केन० ३।२)
यह लीलाकी प्रभात किरण है। उपनिषद् पुराणके उस स्वर्गकी ओर अव्याहत गतिमे बढ़ा चला जा रहा है जहाँ शुष्क ज्ञान शोभा-सुषमामय दिव्य जीवन तरङ्गोंमे उछलता रहता है।
ब्रह्म आभास देकर देवताओको मुग्ध करके अन्तर्धान हो जाता है; परंतु ब्रह्मकी योगमायाशक्ति अपनी रूप-लावण्यमयी मूर्तिको प्रकट करके देवताओके अज्ञानान्धकारको दूर कर देती है। इन्द्र देखते हैं— तस्मिन्नेवाकाशे ×× बहुशोभमानाम् उमा हैमवतीम् । (३।१२)
दुर्गासप्तशतीमे चण्ड-मुण्ड अम्बिकाके सुमनोहर रूपको देखते हैं— ततोऽम्बिका परं रूपं बिभ्राणा सुमनोहरम् । ददर्श चण्डो मुण्डश्च .. .. ॥ (५।८९)
पुराण उपनिषदका ही विकसित रूप है। उपनिषद् सतेज तरुण सुन्दर ब्रह्मज्ञान महीरुह है और पुराण विवृद्ध श्यामशाखाप्रतान पल्लवित पुष्पित फलित प्रेमभक्ति-कल्पतरु है। उसमें भारतका ज्ञान विज्ञान-दर्शन भक्ति, प्रेम-साधना अखण्ड और अव्याहत है। जो लोग पुराणको अधःपतित युगका साहित्य समझते हैं वे वस्तुतः ज्ञानहीन और कुसंस्काराच्छन्न हैं। इस कुसस्कारका तत्त्व और इतिहास हम जानते हैं।
छान्दोग्य-उपनिषद् गायत्री नामक कार्य ब्रह्मके प्रसङ्गमें कहता है— तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (३।१२।६)
उपनिषद् और पुराणका सम्बन्ध-रहस्य इस मन्त्रमें छिपा है। परब्रह्मका एक पाद यह विश्वभुवन है और शेष तीन पाद उसके स्वरूपान्तर्गत है, उसकी त्रिपाद्विभूति हैं। एकपाद-विभूति त्रिपाद्विभूतिके आकाशमे सूक्ष्म वाष्पकी भाँति लहरा रही है। उपनिषद् एकपादविभूतिभूत विश्वमण्डलमें त्रिपाद्विभूतिके छिटके हुए किरण-कणोके अनुसन्धानमें