कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- उपनिषद्-रहस्य * ४५
सुषुप्तस्थानः •• प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक चेतोमुखः । (माण्डूक्य० ५) 'सुषुप्तस्थान प्रज्ञानघन है, एकमात्र आनन्दमय ही है, प्रकाशमुख है और आनन्दका भोक्ता है।' और प्रश्नोपनिषद्मे तो है— एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः स परे अक्षरे आत्मनि संप्रतिष्ठते । (प्रश्न० ४ । ९) 'वह देखनेवाला, स्पर्श करनेवाला, सुननेवाला, सूँघने- वाला, स्वाद चखनेवाला, मनन करनेवाला, जाननेवाला, कर्म करनेवाला विज्ञानात्मा पुरुष है । वह अविनाशी परमात्मामें प्रतिष्ठित है।' विज्ञानाभियान अनुमान उपमान-शब्द-प्रमाणादिके पथमे खोज-खोजकर—देख-देखकर बहुत दूर अग्रसर हो आया है, तब भी अनुसन्धान चल रहा है समीपमें, अन्तर्देशमे । तैत्तिरीयोपनिषद्में इसका अनुभव प्राप्त होता है। पहले ही देखनेमें आता है कि ऋषि अपनी उपलब्धि-लब्ध सम्पदाओंको सजा-सजाकर विशेषरूपसे समझ ले रहे हैं। Realization हो चुका है। Recapitulation हो रहा है। शिक्षावल्लीके शेषमें श्रुति सहसा दिव्यज्ञानके व्योमयानपर चढ़कर असीम आकाशमें एक चक्कर लगाने हैं। अपूर्व सुन्दर है। 'आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्मा प्राणारामं मन- आनन्दम् । शान्तिसमृद्धिममृतम् ।' (तैत्तिरीय० १ । ६ । ३) द्वितीय वल्लीमे ऐसी ही और भी मनोरम बात कहते हैं— 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' (तैत्तिरीय० २ । १ । १) छान्दोग्योपनिषद्मे वेदान्त-विद्याका शुभ आरम्भ है। श्रीमद्भागवतमें उसकी परम पवित्र परिसमाप्ति है। इस बातको जिन्होंने नहीं समझा है, उनका वेदान्त-अध्ययन अपूर्ण ही रह गया है। वेदान्तवर्त्म सहस्रयोजनव्यापी है। काल-क्रमानुसार विज्ञान-विकास-विवर्तकी आनुमानिक अग्र- गतिके प्रसङ्गमें यहाँ पाँच उपनिषदोंकी यत्किञ्चित् आलोचना की गयी है। तैत्तिरीयकी बात चल रही है। इसके बाद है कठ; फिर केन, तदनन्तर ईश, तत्पश्चात् क्रमशः मुण्डक, श्वेताश्वतर और कौषीतकि । काल तथा तत्त्वोपलब्धि- के क्रमसे ये बारह हैं। खूब सम्भव है ये सबसे प्राचीन हैं। क्रमशः ये नाना मार्गोंमे श्रीमद्भागवतके राज्यकी-ओर अग्रसर हुए हैं। इनके अतिरिक्त जो रामतापनी, गोपालतापनी, नारायणोप- निषद्, रामरहस्योपनिषद्, कालाग्निरुद्रोपनिषद्, पञ्चब्रह्मोपनिषद्, कृष्णोपनिषद्, सूर्योपनिषद्, दत्तात्रेयोपनिषद्, बृहज्जावालोप- निषद्, मुक्तिकोपनिषद्, गर्भोपनिषद् आदि उपनिषद् हैं, उनके कालक्रम या क्रमविकासधाराका निरूपण करना बहुत कठिन है। छान्दोग्य, ऐतरेय और गर्भ—इन तीन उपनिषदोंम गर्भ- विषयक ज्ञानका क्रमविकास स्पष्ट है। इन सब उपनिषदोंको साम्प्रदायिक समझकर जो लोग इनकी अवज्ञा करते है उनके अतिपाण्डित्यकी प्रशंसा हम नहीं करते। सभी उपनिषद् स्वाभाविक विकासकी वागको पकड़कर चले हैं। ये उपनिषद् नाना प्रकारके विशाल पुराण साहित्यकी उप- क्रमणिका और भूमिका बने हुए हैं। पुराण और उपनिषद्का सम्बन्ध आगे चलकर दिखाया जायगा। तैत्तिरीय-उपनिषद्मे मिलना है— 'सोऽश्नुते सर्वान् कामान सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।' (२ । १ । १) उपनिषद्में यह नयी बात है। आत्मचित् निर्गुण निर्विकार निर्विकल्प आत्मा हो जाता है। 'ब्रह्मवित् ब्रह्मैव भवति ।' 'शान्तं शिवमद्वैतम्' तत्त्व हो जाता है। 'निरञ्जन. परम साम्य- मुपैति ।' परन्तु श्रुति यहाँ दूसरी ही बात कह रही है। परब्रह्म- के साथ मिलकर व समस्त कामनाओंके काम्यका उपभोग करते हैं, जिन्होंने इसी जीवनमे परब्रह्मको हृदयङ्गम किया हैं; किंतु क्षण-कालके लिये कौन जानता है कि शुद्ध ब्रह्म- ज्योतिके राज्यम बैठकर ऋषिने रूपब्रह्मके रसराज्यकी एक झलकको किस शुभक्षणमें देख पाया था। मुण्डकोपनिषद्- में है— 'तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ।' (२ । २ । ७) जिसके अमृत आनन्दरूपका दर्शन ऋषि कर रहे हैं वह अवाङ्मनसगोचर अवर्ण ब्रह्म नहीं है, रूपवर्ण-रसमय भगवान् हैं। तैत्तिरीय श्रुतिने इस रसब्रह्मके आभासको और भी स्पष्ट कर दिया है। 'रसो वै स.। रस ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति ।' (२ । ७) परब्रह्म रसब्रह्म है। रसब्रह्म रूपब्रह्म है। जिस ब्रह्मम रूप-रस हैं, वह अनन्तकालतक आनन्द-प्रेममय जीवनयापन