कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[स्तम्भ १]
है । ऋषि परमपुरुषके सृष्टिलीला-तत्त्वको देख रहे हैं । विराट् पुरुषके आविर्भावको देख रहे हैं।
'सोऽद्भ्य एव पुरुष समुद्धृत्यामूर्छयत् ।' ( ऐतरेय ० १ । ३ )
परम पुरुषकी इच्छाके प्रभावसे अखिल वेद-विद्या विभावित अखिल सृष्टि शक्तिसमन्वित विराट् पुरुष अनन्त विस्तारवाले कारण-सलिलसे आविर्भूत होकर मूर्त्तिमान् हो गया है । यह अन्वेषणकी बात नहीं है, आविष्कारकी बात है । ज्ञानकी बात है । अनुमानकी बात नहीं है, प्रत्यक्षकी बात है । भूतेन्द्रिय देवतामयी त्रिविध सृष्टि है । अग्नि वाक् मुख, वायु-प्राण-नासिका, आदित्य दृष्टिशक्ति-चक्षु इत्यादि क्रमसे समष्टि पुरुषके अङ्ग-प्रत्यङ्गकी उत्पत्ति होती है । विश्वमे चक्षुशक्ति एक है । वही शक्ति सभी चक्षुओंकी—सभी आँखोंकी सृष्टि करती है । इसी प्रकार श्रवणशक्ति, घ्राणशक्ति, वाक्शक्ति प्रभृति एक-एक शक्ति समष्टि-रूपिणी है । शक्तिमात्र ही व्यक्ति और देवता है । समष्टिशक्ति, व्यष्टिशक्ति, इन्द्रियादिको उद्भावित करती है । ऋषिने धीरे-धीरे मन-बुद्धि हृदयका प्राकट्य देखा । तदनन्तर हृदय और मनसे आत्माका आभास प्राप्त किया । पश्चात् आत्मज्योतिने जिन-जिन भावों--रूपोंमे आत्मप्रकाश किया उसको भी देखा । बस, अज्ञान दूर हो गया । अथ संज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, धृति, मति, मनीषा, स्मृति, सङ्कल्प, क्रतु और काम आदि आत्माकी रश्मियाँ दृष्टिगोचर होने लगीं ।
छान्दोग्यके ऋषिने सुदूर दर्शनदृष्टिसे नक्षत्र नभोमण्डलमे शिशुका जन्म देखा था, ऐतरेयके वैज्ञानिकने पृथिवीके घर घरमें शिशुका जन्म देखा । केवल गर्भ नहीं, माताकी गोदमें कुमार-का हँसता हुआ मुख देखा । दम्पतिकी प्रीति देखी ।
'सा भावयित्री भावयितव्या भवति ।' ( ऐतरेय ० ४ । ३ )
परंतु उनकी ब्रह्मदृष्टि वैसी ही बनी है । ब्रह्मसूत्रके रचयिता श्रीबादरायण कहते हैं—
'ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ।' ( ४ । १ । ५ )
—इस ऋषिके अन्तरमें भी यही बात है—
'यत्किञ्चेद प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावर सर्वं तत्प्रज्ञानेत्र प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं •••• प्रज्ञानं ब्रह्म ।' ( ऐतरेय ० ५ । ३ )
प्रश्नोपनिषद्में मिलती है एक ओर जिज्ञासा और दूसरी ओर ज्ञान विज्ञान । दोनोंका सम्मिलन है । प्रश्नके बाद प्रश्न, उत्तरके बाद उत्तर है । जीवगण कहाँसे आते हैं ? प्रजापतिने
[स्तम्भ २]
सर्वप्रथम रयि और प्राणकी सृष्टि की । प्राण आदित्य है या आदित्यमे है । रयि चन्द्रमा है या चन्द्रमामे है । उत्पत्तिकी बात संक्षेपसे कहकर ऋषिने उत्क्रमणकी अर्थात् जीवनान्तमें जीवगतिकी बात कही । दूसरा प्रश्न है—प्रजाकी रक्षा कौन करता है ? जीवनी शक्ति कौन देता है ? इन्द्रियाधिपति देवता हैं । प्राणाधिपति सत्रमें श्रेष्ठ है। सभी प्राणके अधीन हैं । आदित्य, वायु, अग्नि, इन्द्र, वरुणादि देवता जीव-जीवनकी रक्षा करते हैं । प्राण कहाँसे आता है ? जीव देहमें किस प्रकारमे रहता है ? प्राणमें कौन-कौन-सी क्रियाएँ हैं ? प्राण अपान समान-उदान व्यान कौन क्या करता है ? नाड़ीजालके साथ प्राणका घनिष्ठ सम्बन्ध है । तदनन्तर जागरण, स्वप्न, सुषुप्तिका प्रसङ्ग है । ऋषिकी दृष्टि सदा ही सुदूरगामिनी है ।
मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदान स एन यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति । ( प्रश्न ० ४ । ४ )
इसके पश्चात् ओंकारका प्रसङ्ग है और तद्भावनाके द्वारा किस प्रकार कौन कौनसे लोक जय किये जाते हैं ।
माण्डूक्योपनिषद्मे विज्ञान और भी अन्तरतर और अन्तर्मुखी है । ॐकार एव आत्माकी बात है ।
'सर्वमोङ्कार एव ।' 'सर्व ह्येतद्ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म । सोऽयमात्मा चतुष्पात् ।' 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञ. ।' 'स्वप्न-स्थानोऽन्तःप्रज्ञ ।' 'सुषुप्तस्थान' एकीभूत प्रज्ञानघन ।' 'नान्तःप्रज्ञं न बहि प्रज्ञं न प्रज्ञानघनम् ।' 'एकात्मप्रत्ययसार प्रपञ्चोपशम शान्तं शिवमद्वैत चतुर्थम् ।'
आत्माकी यह तुरीयावस्था है । छान्दोग्यके उद्दालक श्वेतकेतु-संवाद और नारद सनत्कुमार-संवादमे जिस आत्म तत्त्वपर विचार किया गया है वह दिग्दिगन्तव्यापिनी समीक्षासे युक्त है । अविरत एक्सपेरीमेंटका प्रवाह चल रहा है । अभ्युपगम सिद्धान्तको ग्रहण करके महर्षिगण सुदूरगामी अनुमान प्रमाणके पथपर चल रहे हैं । बहिर्जगत्, अन्तर्जगत् और तदन्तर्गत जो कुछ भी है, सबकी पूरी पूरी खोज की है और तत्तद्रूपसे आत्मतत्त्व—ब्रह्मतत्त्वको समझा है । उन-उन सिद्धान्तोंके साथ माण्डूक्यादिके सिद्धान्तमे बडा भेद है । छान्दोग्यके—
स य एषोऽणिमा ऐतदात्म्यमिद सर्वम् । तत् सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो । ( छान्दोग्य ० ६ । ८ । ७ )
'वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है । यह सत्य है, आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है ।'
इस सिद्धान्तकी प्रकृति माण्डूक्यके इस सिद्धान्तकी प्रकृतिसे भिन्न है—