कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद्-रहस्य * ४७ संलग्न है। उपनिषद्में त्रिपाद्विभूतिका प्राकट्य नहीं है। उपनिषद्में त्रिपाद्विभूतिके किसी भी भावका आविष्कार नहीं हुआ है। धाम, लीला, परिकर आदि कुछ भी स्पष्टतया उपनिषद्में नहीं है । कौषीतकि-उपनिषद्मे ब्रह्मलोकका अर्थात् हिरण्यगर्भलोकका अपूर्व सुन्दर वर्णन है, किंतु वह भी एकपाद्विभूतिके अन्तर्गत है। वह अतीन्द्रिय विश्वकी सर्वोत्तम सम्पदा है तथापि त्रिपाद्विभूति नहीं है। स्वयं लीला-पुरुषोत्तम गीताके वक्ता हैं, पर गीता भी एकपाद्- विभूतिकी सीमाके अन्तर्गत ही है। कारण, गीता उपनिषद् है। भगवान् स्वयं ही महायोगेश्वर हरि होकर भी अमृताक्षर हर हो गये हैं। इस रहस्यको गोपन नही रक्खा गया है। वे कहते हैं—'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्' अतएव श्रीकृष्ण नहीं हैं। विश्वव्यापारसे और जीव-हृदयके अन्तरतम प्रदेशमें ब्रह्मका अन्वेषण करनेमें उपनिषद् नित्य संलग्न है । पुराणका प्रतिपाद्य है त्रिपाद्विभूति । एकपाद्विभूति अर्थात् विश्व- व्यापार भी पुराणमें है; किंतु पुराणका लक्ष्य है—लीला, धाम, परिकर अर्थात् त्रिपाद्विभूति, भक्तानुग्रह, नीति-धर्म, जीव-जीवनका कर्तव्य, भक्तितत्त्व और मोक्षविज्ञान । उपनिषद्में जिसका आभास प्राप्त होता है, पुराणमे वह विस्तारित और विकसित हो गया है। उपनिषद्मे— य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगा- द्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । ( श्वेताश्वतर० ४।१) उपनिषद्में वह प्रधानतः अवर्ग है। उसने जो विश्वमे और परव्योममें शत-सहस्र वर्णविलसित व्यापारका विधान किया है, उसका इतिहास और विवरण समस्त पुराणोंमें है। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।' ( श्वेताश्वतर० ४।१०) और— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् (श्वेताश्वतर० ४।५) —प्रभृति आभासमात्र उपनिषद्मे है। मार्कण्डेय-चण्डी आदिमें हम पाते हैं इस विषयका विशाल विस्तार और विज्ञान-विभावना ! ऐतरेय उपनिषद्ने सृष्टितत्त्वकी जो संक्षिप्त व्यञ्जना दी है, श्रीमद्भागवतके तृतीय स्कन्धके पञ्चम- षष्ठ आदि अध्यायोंमें उसीका सुविस्तृत वैज्ञानिक वर्णन है । पाश्चात्य वैज्ञानिकोंको इधर ध्यान देना चाहिये । पुराण माइथोलॉजी (Mythology) नहीं है। पुराण उपनिषद्का उच्चतर विकासस्तर है । कुसंस्कार सर्वत्र छाया है। ज्ञान, विज्ञान और दर्शनके राज्यमें भी सर्वत्र ही कुसस्कार है—वहाँ भी भ्रान्ति-भूतका भय है। 'उपनिषद्की दृष्टिमे ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जगत् मिथ्या है।' ऐसी जो एक धारणा है यह एक बुरा कुसंस्कार है। बृहत् मिथ्या है। जगत् मिथ्या है—यह बात उपनिषद्के ऋषिने कभी भ्रमसे भी नहीं लिखी । परमेश्वर परब्रह्मने निज सत्तासे, अपनी अव्यय भाववस्तुसे विश्वका सृजन किया है । इसके अतिरिक्त कोई दूसरी बात श्रुति देवियोंने कभी नहीं सुनी। उपनिषद्से आँखें मूँदकर इसके सैकड़ों प्रमाण दिये जा सकते हैं— 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश सम्भूत०×× ।' 'स तपस्तप्त्वा इद५ सर्वमसृजत यदिद किञ्च । तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । ××सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च ।' (तैत्तिरीय० २।६।२) 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' । 'तज्जलानिति शान्त उपासीत ।' ( छान्दोग्य० ३।१४।१) 'तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा ।' ( श्वेताश्वतर० ४।२) इस प्रकार सैकड़ों महलों श्रुति-वचन जगत्की सत्यताकी साक्षी दे रहे हैं। जगत् मिथ्या है, यह बात श्रुति नहीं कहती । महान् आचार्य श्रीशङ्कराचार्यके मायावादकी आलोचना- का यहाँ स्थान नहीं है। आचार्यकी अपनी वाक्चावलीमे ही मायावाद-खण्डनके अस्त्र भरे पड़े है। पण्डितोका दूसरा यह कुसस्कार है कि 'केवल जगत् ही मिथ्या नहीं है, जीवात्मा भी मिथ्या है' । यह एक उत्कट मिथ्या है। 'तत्त्वमसि'—एव 'नामरूपे विहाय×××परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।' ( मुण्डकेोपनिषद् ४ । ८) —इत्यादि श्रुति-वाक्योंके दोनों प्रकारके अर्थ हो सकते है किंतु जीव और ब्रह्मका पार्थक्य अर्थात् द्वैत, उपनिषद्मे सर्वत्र अत्यन्त परिस्कृत रूपमे पुनः-पुन. उपदिष्ट है । 'पृथगात्मानं प्रेरितार च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥' (१।६) 'भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्त त्रिविध ब्रह्ममेतत् ।' (१।१२) ( श्वेताश्वतर० ) भोग्य जगत्, भोक्ता जीव और प्रेरककर्ता परमात्मा परब्रह्म—ये तीन विभाव ब्रह्मके ही हैं। श्रीबादरायणने वेदान्तसूत्रमें सनिव्रंणरूपसे पुन.-पुनः घोषणा की है कि जीव और ब्रह्म एक नहीं हैं ।