भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 832 में से

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४८              • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति '

'भेदव्यपदेशाच्च'          ( १ । १ । १८ ) 'अधिकं तु भेदनिर्देशात् ।'      ( २ । १ । २१ ) जीव और ब्रह्म तत्त्वतः एक होकर भी, अंशांशी होकर भी वस्तुतः विभिन्न हैं, भावतः विभिन्न हैं । आत्मज्ञ, नैगुण्य निर्मुक्त जीव, सर्वभूतात्मभूतात्मा जीव भी देहपात होनेपर ब्रह्म नहीं हो जाता । श्रीबादरायणने ब्रह्मसूत्रमे इस तत्त्वपर स्पष्टरूपसे विचार किया है । मुक्त जीव ब्रह्म हो जाता है, इत्यादि बातोका उल्लेखमात्र भी न करके उन्होंने इस बातपर विचार किया है कि 'मुक्त जीवके देह रहती है या नहीं'--- 'तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ।' ( ४ । ४ । १३ ) ---मुक्त जीवका जीवन कभी स्वप्नवत् होता है, कभी जाग्रद्वत् । जब स्वप्नवत् होता है तब स्वरूपदेह अप्रकट रहता है और जब जाग्रद्वत् होता है तब प्रकट रहता है । 'भावे जाग्रद्वत्' ( ४ । ४ । १४ ) । ---श्रुतिके तात्पर्य को ब्रह्मसूत्रमे निश्चितरूपसे स्पष्टाक्षरोंमे लिपिबद्ध किया गया है । ब्रह्मसूत्रमे जगन्मिथ्यावादका खण्डन किया गया है-- 'आत्मकृते परिणामात् ।' ( १ । ४ । २६ ) 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्य' ( २ । १ । १४ ) ---इत्यादि सूत्र देखें । मृत्तिका जैसे घटका कारण है, सुवर्ण जैसे अलङ्कारका कारण है, वैसे ही ब्रह्म जगत्का कारण है । जब कारण सत्य है, तब कार्य भी सत्य है । ब्रह्म सत्य है । जगत् सत्य है । बौद्धोंने ब्रह्म एवं आत्माको असत्य समझा था, इसीलिये उनका जगत् भी असत्य--शून्यमय हो गया । 'शून्यं तत्त्वम् । भावो विनश्यति ।' ---उपनिषद्-दर्शन विशुद्धाद्वैतदर्शन है, इस बातको आचार्य श्रीशङ्करके अनुयायियोंके अतिरिक्त अन्य किसीने भी नहीं माना । आचार्य श्रीरामानुज विशिष्टाद्वैतवादी हे। परमेश्वर जीव और जड--परब्रह्म इन तीन वैभवोंसे सम्पन्न हैं । 'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ।' 'त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।' ---यही श्रुतिप्रतिपादित है । निम्बार्क द्वैताद्वैतवादी हैं। यह अति निर्मल निष्प्रपञ्च मतवाद है। श्रीमध्याचार्य और गौड़ीय वैष्णवोंने अचिन्त्यभेदाभेदवादकी स्थापना की । ब्रह्म, माया, जीव, कर्म और काल--ये पाँच तत्त्व भिन्न होकर भी अभिन्न हैं, अभिन्न होकर भी भिन्न हैं। यह चिन्तातीत विश्वरहस्य है। केनोपनिषद्में भी अनुसन्धान है। एक्सपेरिमेंन्ट है ।

यह पहले ही कहा जा चुका है । ईशोपनिषद् और श्वेता श्वतरोपनिषद् सम्पूर्ण सिद्धान्तके शैलशिखरपर समारूढ हैं । यहाँ समस्त समीक्षाओं का अन्वीक्षण आदि समाप्त हो गया है । ऋषिगण यहाँ ज्ञान-विज्ञानमच्छिन्नसंशय होकर तत्त्व- विमानपर विचरण करते हैं। वे तत्त्वज्ञानके सीमाज्ञेयपर आ पहुँचे हे। जो कुछ जाना जाता है, सब जान चुके हैं, प्राप्त कर चुके हैं, देख चुके हैं । ज्ञानाभियानकी समाप्ति कहाँ है, यह भी जान चुके हैं--- 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्' यह समझ चुके है-- 'यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद स' (केन० २ । ११) जो कहते हैं कि हम ब्रह्मतत्त्वको ठीक नहीं समझ सके हैं, वे ठीक समझ गये हैं, और जो कहते हैं कि हमने ठीक समझ लिया है, वे कुछ भी नहीं समझे हैं। यह ज्ञानीकी बात है । भगवद्विषय कुछ भी नहीं समझा जाता---यह मूर्खकी बात है। उसने भगवत्कृपाका स्पर्श नहीं पाया है । भगवद्विषय सारा समझा जा सकता है यह भी मिथ्या कथन है । 'अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्' (ईशोपनिषद ४) एव-- एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ (श्वेताश्वतर० ६ । ११) ---इत्यादि वचन ईशोपनिषद् और श्वेताश्वतरोपनिषद्में सर्वत्र हैं । उपनिषद्का ज्ञानाभियान यहाँ अन्वेषण समाप्त करके तत्त्वदर्शन और सिद्धान्तकी भूमिपर आरोहण कर चुका है । छान्दोग्यका-- 'अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच' (छान्दोग्य० १ । ९ । १) इत्यादि काल और भाव दोनोके ही दूरत्वसे बहुत दूर रह गये हैं । श्वेताश्वतरोपनिषद् अतुलनीय है । इसके अनेक कारण हैं । विशुद्ध अद्वैतवाद, मायावाद, जगन्मिथ्यावाद, जीव ब्रह्मवाद आदि समस्त कल्पनावाद श्वेताश्वतरके सुदृढ़ विज्ञानगात्रसे आहत होकर चूरमूर हो गये हैं। 'या ते रुद्र शिवा तनू' प्रभृति वाक्य उपनिषद्की ज्ञान-तरणीको पुराणके तटपर पहुँचा देते हैं । श्वेताश्वतरका ब्रह्म रुद्र, हर, गिरीश,

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