भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63
  • उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ४९ शिव हो गया है। गीता-उपनिषद्का भी श्वेताश्वतरसे घनिष्ठ है। यह श्रीरामोपासनाका ग्रन्थ है। साधन-भजनके उपदेशसे सम्बन्ध है। गीताके भाव, तत्त्व, विन्यासविधि, 'सर्वेन्द्रिय- पूर्ण है। मन्त्रमयी उपनिषद् है। इसका पथनिर्देश तन्त्रकी ओर है। गुणाभासम्' आदि वाक्य एव तत्त्वदर्शन अधिकांशमें श्वेताश्वतर- से अभिन्न हैं। श्वेताश्वतरमें सर्वप्रथम सांख्यदर्शनकी भूमिका वैदिक साधना देवता-विज्ञानात्मिका है। सकाम याग-यज्ञ है। 'तमेकनेमिम्' श्लोक और— क्रियामयी है। औपनिषदिक साधना विश्वप्रपञ्चमें सगुण- 'स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति।' निर्गुण-द्वैताद्वैत-ब्रह्मानुसन्धानात्मिका है। पौराणिक साधना ( श्वेताश्वतर० ५। १२) भगवद्भावना भगवदनुरागमयी भक्तिसाधना है, अमृतरूप -इत्यादि सांख्यतत्त्व है। श्वेताश्वतरके द्वितीय अध्यायमें रसकी साधना है। वह चिन्मयी सत्ताके, परमानन्दवस्तु- पातञ्जलयोग-दर्शन एव गीताके ध्यानयोगका आभास है। सत्ताके, नित्य-प्रेम-सुखमय सत्य-साम्राज्यके प्रवेशपथका भक्तिके बिना कोई भी ज्ञान अन्तरमें उद्भासित नही होता, अनुसन्धान करनेमें संलग्न है। तन्त्र प्रधानतः शक्ति-साधनामयी विद्या है। तन्त्रमे अध्यात्म, योग, कर्म, ज्ञान, भक्ति, मुक्ति यह महावाक्य श्वेताश्वतरमें ही सर्वप्रथम ध्वनित हुआ है। सभी कुछ हैं। तन्त्र सिद्धिकामी है। तान्त्रिक शक्तिसाधक कौषीतकि-उपनिषद्के उज्ज्वल राज्यमें प्रवेश करनेपर है—मन्त्रतत्त्वविद् है । हिंदू-शास्त्र—हिंदू-धर्म आश्चर्य प्रतीत होता है कि पुराणका शोभा-सौन्दर्यसमन्वित असीम अपरिमेय है, इसका आदि-अन्त नहीं है। यह अगाध अपार देश अब अधिक दूर नहीं है। गोपालतापनी और कृष्णोप- ज्ञान-विज्ञान-दर्शन-प्रेम भक्ति पारावार है। यदि पुण्य-मरण प्राप्त निषद् श्रीमद्भागवत और विष्णुपुराणादिकी ओर मार्ग खोल करना चाहते हो तो आओ, कूद पड़ो इस दिव्य सुधा-सलिल- देते हैं। रामतापनी उपनिषद्का उद्देश्य ज्ञान नहीं है, भक्ति सागरमें। यही अमृत-मरण है ! उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा ( लेखक—महामहोपाध्याय शास्त्ररत्नाकर पं० श्रीप्र० चिन्नास्वामी शास्त्री ) जगत्स्थितिलयोद्भूतिहेतवे निखिलात्मने । समान मानकर आत्मज्ञानको ही सर्वोत्कृष्ट जान उसकी प्राप्ति- सच्चिदानन्दरूपाय परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥ के लिये ही निरन्तर यत्न करते रहते थे। 'संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारण तथा सबके इस समय भी ऐसे अनेकों श्रेष्ठ पुरुष हैं जो आज भी आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मको नमस्कार है।' उसी वेदादि शास्त्रानुमोदित महर्षियोंके द्वारा संसेवित प्राचीन- इस जगत्में सभी सुख चाहते हैं, दुःखके त्यागकी इच्छा तम मार्गका विशेषरूपसे समादर करते हैं । महर्षिलोग लौकिक करते है। उसमें भी निरतिशय सुखमे सबका अधिक प्रेम विषयोंके विज्ञानकी अपेक्षा परम पुरुषार्थके साधनरूप पारमार्थिक होता है। यद्यपि आधुनिक समयमें जिस किसी प्रकारसे भी आत्मज्ञानको अत्यन्त उत्कृष्ट मानते थे । इसीके द्वारा उन्होंने की हुई इन्द्रिय-तृप्तिको ही वर्तमान जन्मकी परम सफलता सम्पूर्ण स्वर्गादि लोकोंपर विजय प्राप्त की थी और परम माननेवाले तथा इस इन्द्रिय तृप्तिके साधनभूत विषयोंके उपभोग- श्रेय अर्थात् मुक्तिको प्राप्त किया था। अपनी उत्प्रेक्षा शक्ति में ही मनको लगाये रखनेवाले मनुष्य उन विषयोंकी प्राप्ति ( अत्यन्त विवेकशील बुद्धि)के द्वारा प्राप्त तेजसे परम कल्याणके करानेवाली अति महान् धनराशिका किसी भी उपायसे अर्जन पथपर, जहाँतक वे पहुँच सके थे, दूसरे लोग उसकी कल्पना करना ही आत्यन्तिक पुरुषार्थ समझते हैं और उससे बढकर करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते । इस बातको पाश्चात्य देशों- दूसरी कोई वस्तु नहीं है, ऐसा मानते हैं। धनी तथा अधिकारी के विद्वानोंने भी आश्चर्यचकित चित्तसे मुक्तकण्ठ हो स्वीकार पुरुष ही समाजमें गिना जाता है, वही सब जगह अगुआ हो जाता किया है । इस प्रकारका आत्मज्ञानजनित गौरव, जो हम है । उसकी कही हुई सभी बातें समीचीन ही मानी जाती हैं। भारतीयोंको प्राप्त हो सका था, हमारे उपनिषद्-ग्रन्थोंके उसका सारा मत ही सर्वोत्तम मत है—ऐसा लोग मानते हैं; अनुशीलनसे ही उपलब्ध हुआ था। परन्तु प्राचीन कालमें हमारे महर्षिगण विषय-भोगको अति यद्यपि वेदोंके पूर्वकाण्ड (कर्मकाण्ड) में तथा वेदोंका -तुच्छ समझते थे तथा उसके साधनभूत धन-अधिकारादिको तृणके ही आश्रय लेकर चलनेवाली दूसरी विद्याओंमें भी आत्मस्वरूप