कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
[बायाँ स्तम्भ]
और उसके नित्यत्व आदिका वर्णन किया गया है तथा कर्म- काण्डकी जो कुछ और जितनी भी प्रवृत्ति है, वह सब आत्मा और उसकी नित्यताका अवलम्बन लेकर ही है, तथापि वैदिक कर्मकाण्ड आदिके द्वारा आत्माकी नित्य, निरतिशय, आनन्द- मय, प्रकाशमय सर्वात्मरूपताका ज्ञान नहीं हो सकता । केवल आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन करनेमात्रसे कर्मकाण्डका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है । इसके सिवा आत्माकी सर्वात्मता और एकताका प्रतिपादन कर्मकाण्डके विरुद्ध भी पड़ता है । अतएव आत्माके एकत्वका प्रतिपादन करना भेदको औपाधिक बतलाना, जीवात्मा और परमात्मामें भी वास्तविक भेदका अभाव बतलाना, आत्माकी अखण्ड चिदानन्दैकरसरूपताका अनुभव कराना—आदि सब कुछ उपनिषदोंका कार्य है । इसीमें सारी उपनिषदोंका, विशेषतः 'ईशावास्य' से लेकर 'कैवल्य' पर्यन्त द्वादश उपनिषदोंका परम तात्पर्य है । आचार्य शङ्कर भगवत्पादने भी अपने भाष्यमें इसी अभिप्रायको अभिव्यक्त किया है—
सैन्धवघनवद् अनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं सर्वस्वासूपनिषत्सु प्रतिपिपादयिषितोऽर्थ ।****तथा सर्व- शाखोपनिषत्सु च ब्रह्मैकत्वविज्ञानं निश्चितोऽर्थः । (बृहदारण्यक० १।४।१०)
तथा—
इष्यते च सर्वोपनिषदा सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम् । (माण्डूक्य० १।३)
'ब्रह्म नमकके डलेके समान अन्तररहित (व्यवधानशून्य अविच्छिन्न) है, वह बाह्यभेदसे रहित है अर्थात् बाहरसे कुछ और भीतरसे कुछ—ऐसा नहीं है तथा सर्वदा एकरस है । सम्पूर्ण उपनिषद्मे इसी विज्ञानका प्रतिपादन करना अभीष्ट है।'
'इसी प्रकार सम्पूर्ण शाखाओंकी उपनिषदोंमें भी 'ब्रह्मकी एकताका विज्ञान' ही सिद्धान्तभूत अर्थ है।'
सारी उपनिषदें सबके आत्माकी एकताका ही प्रतिपादन करनेवाली हैं, यही मानना अभीष्ट है ।
इस भाष्यपर विवृत्ति लिखते हुए आनन्दगिरि कहते हैं—
उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिना सर्वासामुपनिषदां सर्वेषु देहेषु आत्मैक्यप्रतिपादनपरत्वमिष्टम् ।
'उपक्रम और उपसंहारकी एकरूपता आदि तात्पर्य- निर्णयके छ. हेतुओको दृष्टिमें रखते हुए यही मानना इष्ट है कि सम्पूर्ण उपनिषदें सब देहोंमें स्थित आत्माकी एकताका ही प्रतिपादन करनेमें तत्पर हैं।' इस विषयमें अर्थात् जीवात्मा
[दायाँ स्तम्भ]
और परमात्माकी एकता तथा सब जीवोकी परस्पर एकताके प्रतिपादनमे और आत्मा अखण्डानन्दरूप, चिन्मय एव एकरस है—इस तथ्यके वर्णनमे इन सभी उपनिषदोंका कण्ठस्वर एक है । इस विषयको लेकर उनमें तनिक भी मत- भेद नहीं है । यह बात नीचे उद्धृत किये हुए वचनोंसे स्पष्टतः जानी जा सकती है—
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ (ईश० ६)
'जो सब भूतोंको आत्मामे ही देखता है तथा सब भूतों- में आत्माको ही देखता है, वह इस सर्वात्मभावके दर्शनके कारण किसीसे भी घृणा नहीं करता।'
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ (केन० १।४)
'जो वाणीके द्वारा अभिव्यक्त नहीं होता । जिसके द्वारा वाणी अभिव्यक्त होती है, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । अज्ञानी- जन जिस देश कालादिसे परिच्छिन्न वस्तुकी उपासना करते हैं, यह ब्रह्म नहीं है।'
एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा य. करोति ।' तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ (कठ० २।२।१२)
'जो एक, सबको अपने वशमे रखनेवाला और सब प्राणियोंका अन्तरात्मा है तथा जो अपने एक रूपको ही नाना रूपोमे व्यक्त करता है—अपनी बुद्धिमे स्थित उस आत्मदेव को जो धीर (विवेकी) पुरुष देखते हैं, उन्हींको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है, दूसरोंको नही।'
अङ्गुष्ठमात्र पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्व. ॥ (कठ० २।१।१३)
'वह पुरुष अङ्गुष्ठमात्र तथा धूमविहीन ज्योतिके समान है । वह जो कुछ हुआ है तथा होनेवाला है, सबका शासक है, वही आज है और वही कल भी रहेगा।'
परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम- लोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । (प्रश्न० ४।१०)