कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ५१ ‘हे सोम्य ! वह जो निश्चयपूर्वक उस तमोविहीन, शरीर- ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि रहित, लोहितादि गुणोंसे शून्य, शुद्ध एव अविनाशी पुरुष श्वेतकेतो। (छान्दोग्य० ६।८।७) (आत्मा) को जानता है, वह उस परम अक्षरब्रह्मको ही प्राप्त ‘हे श्वेतकेतु ! एतद्रूप ही यह सब कुछ है, यह सत्य है, होता है। वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।’ यह आत्मा है, वह तुम हो।’ हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (मुण्डक० २।२।९) (बृहदारण्यक० ४।४।१७) ‘वह निर्मल तथा निष्कल (अवयवरहित) ब्रह्म हिरण्मय तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म (ज्योतिर्मय) परम कोशमे स्थित है। वह शुद्ध तथा समस्त सर्वानुभूः। (बृहदारण्यक० २।५।१९) ज्योतिर्मय पदार्थोंका भी प्रकाशक है और वही परम तत्त्व ‘जिसमें पाँच पञ्चजन (गन्धर्व, पितर, देवता, असुर है, जिसे आत्मज्ञानी जानते हैं।’ और राक्षस अथवा ब्राह्मणादि वर्ण और निषाद) तथा नान्त प्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न अव्याकृत प्रकाश प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मै अमृत ब्रह्म प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यप- मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ।’ ‘वह देश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ यह ब्रह्म पूर्व और अपर—कारण और कार्यसे रहित है, अन्तर- मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय । (माण्डूक्य० ७) विजातीय द्रव्यसे शून्य है और अबाह्य है (बाह्य आदिके ‘वह अन्तःप्रज्ञ अर्थात् तैजसरूप नहीं है, बहिःप्रज्ञ भेदसे रहित है), यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला अर्थात् विश्वरूप भी नहीं है। अन्तर्बहिःप्रज्ञ अर्थात् जाग्रत् ब्रह्म है।’ और स्वप्नकी अन्तराल-अवस्थारूप भी नहीं है, प्रज्ञानघन निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अर्थात् सुषुप्तावस्थारूप नहीं है। प्रज्ञ अर्थात् एक साथ सब अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ विषयोंका प्रज्ञाता, निरा चेतनरूप नहीं है। अप्रज्ञ अर्थात् (श्वेताश्वतर० ६।१९) अचेतनरूप नहीं है। वह दृष्टिका विषय नहीं, व्यवहारका तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- विषय नहीं, उसे हाथोंद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ उसकी परिभाषा नहीं हो सकती। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय (श्वेताश्वतर० ६।१२) है, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एकात्म-प्रत्ययरूप है, प्रपञ्च- ‘जो कला अर्थात् अवयवरहित है, निष्क्रिय है, शान्त, कृत धर्मोंका वहाँ अभाव है, वह शान्त है, शिव है, अद्वैत निर्दोष और निर्लेप है, जो अमृतका सर्वोत्तम सेतु है और है—ऐसे उस परम तत्त्वको ज्ञानीजन परमात्माका चतुर्थ पाद जिसका ईंधन जल चुका है, उस धूमादिशून्य अग्निके समान मानते हैं। वही आत्मा है, वही जाननेयोग्य है।’ दीप्तिमान् है।’ ‘उसको जो धीर अपने आत्मा (अन्तःकरण) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। में स्थित देखते हैं उन्हीको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है, (तैत्तिरीय० २।८।५) दूसरोंको नहीं।’ ‘वह जो यह पुरुषमें (पञ्चकोशात्मक देहमें) है, और यत्पर ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतन महत्। वह जो आदित्यमें है—वह एक है।’ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्य स त्वमेव त्वमेव तत् ॥ यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं (कैवल्य० १।१६) तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा ‘जो परब्रह्म सबका आत्मा, विश्वका महान् आयतन, प्रज्ञान ब्रह्म। (ऐतरेय० ३।३) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और नित्य है, वह तुम्हीं हो, तुम्हीं ‘जो कुछ यह जङ्गम जीवसमुदाय है, जो पक्षी है, जो वह हो।’ यह स्थावर जगत् है, वह प्रज्ञानेत्र है अर्थात् प्रज्ञामे दृष्ट होता यहाँ इन थोडे-से वचनोंद्वारा दिग्दर्शनमात्र कराया गया है। प्रज्ञानमे ही प्रतिष्ठित है। लोक प्रज्ञानेत्र है, प्रज्ञा ही है। इन उपनिषदोंमे इस प्रकारके अर्थवाले सैकड़ों वचन हैं, उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।’ जिनका परम तात्पर्यस्वरूप एक ही अर्थ है—‘एकरस अखण्ड