कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
- उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा * ५१ ‘हे सोम्य ! वह जो निश्चयपूर्वक उस तमोविहीन, शरीर- ऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि रहित, लोहितादि गुणोंसे शून्य, शुद्ध एव अविनाशी पुरुष श्वेतकेतो। (छान्दोग्य० ६।८।७) (आत्मा) को जानता है, वह उस परम अक्षरब्रह्मको ही प्राप्त ‘हे श्वेतकेतु ! एतद्रूप ही यह सब कुछ है, यह सत्य है, होता है। वह सर्वज्ञ और सर्वरूप हो जाता है।’ यह आत्मा है, वह तुम हो।’ हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्। यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। यच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (मुण्डक० २।२।९) (बृहदारण्यक० ४।४।१७) ‘वह निर्मल तथा निष्कल (अवयवरहित) ब्रह्म हिरण्मय तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म (ज्योतिर्मय) परम कोशमे स्थित है। वह शुद्ध तथा समस्त सर्वानुभूः। (बृहदारण्यक० २।५।१९) ज्योतिर्मय पदार्थोंका भी प्रकाशक है और वही परम तत्त्व ‘जिसमें पाँच पञ्चजन (गन्धर्व, पितर, देवता, असुर है, जिसे आत्मज्ञानी जानते हैं।’ और राक्षस अथवा ब्राह्मणादि वर्ण और निषाद) तथा नान्त प्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञ नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघन न अव्याकृत प्रकाश प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मै अमृत ब्रह्म प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यप- मानता हूँ। उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ।’ ‘वह देश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ यह ब्रह्म पूर्व और अपर—कारण और कार्यसे रहित है, अन्तर- मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेय । (माण्डूक्य० ७) विजातीय द्रव्यसे शून्य है और अबाह्य है (बाह्य आदिके ‘वह अन्तःप्रज्ञ अर्थात् तैजसरूप नहीं है, बहिःप्रज्ञ भेदसे रहित है), यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला अर्थात् विश्वरूप भी नहीं है। अन्तर्बहिःप्रज्ञ अर्थात् जाग्रत् ब्रह्म है।’ और स्वप्नकी अन्तराल-अवस्थारूप भी नहीं है, प्रज्ञानघन निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अर्थात् सुषुप्तावस्थारूप नहीं है। प्रज्ञ अर्थात् एक साथ सब अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥ विषयोंका प्रज्ञाता, निरा चेतनरूप नहीं है। अप्रज्ञ अर्थात् (श्वेताश्वतर० ६।१९) अचेतनरूप नहीं है। वह दृष्टिका विषय नहीं, व्यवहारका तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- विषय नहीं, उसे हाथोंद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ उसकी परिभाषा नहीं हो सकती। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय (श्वेताश्वतर० ६।१२) है, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एकात्म-प्रत्ययरूप है, प्रपञ्च- ‘जो कला अर्थात् अवयवरहित है, निष्क्रिय है, शान्त, कृत धर्मोंका वहाँ अभाव है, वह शान्त है, शिव है, अद्वैत निर्दोष और निर्लेप है, जो अमृतका सर्वोत्तम सेतु है और है—ऐसे उस परम तत्त्वको ज्ञानीजन परमात्माका चतुर्थ पाद जिसका ईंधन जल चुका है, उस धूमादिशून्य अग्निके समान मानते हैं। वही आत्मा है, वही जाननेयोग्य है।’ दीप्तिमान् है।’ ‘उसको जो धीर अपने आत्मा (अन्तःकरण) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः। में स्थित देखते हैं उन्हीको शाश्वत सुखकी प्राप्ति होती है, (तैत्तिरीय० २।८।५) दूसरोंको नहीं।’ ‘वह जो यह पुरुषमें (पञ्चकोशात्मक देहमें) है, और यत्पर ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतन महत्। वह जो आदित्यमें है—वह एक है।’ सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्य स त्वमेव त्वमेव तत् ॥ यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं (कैवल्य० १।१६) तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा ‘जो परब्रह्म सबका आत्मा, विश्वका महान् आयतन, प्रज्ञान ब्रह्म। (ऐतरेय० ३।३) सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और नित्य है, वह तुम्हीं हो, तुम्हीं ‘जो कुछ यह जङ्गम जीवसमुदाय है, जो पक्षी है, जो वह हो।’ यह स्थावर जगत् है, वह प्रज्ञानेत्र है अर्थात् प्रज्ञामे दृष्ट होता यहाँ इन थोडे-से वचनोंद्वारा दिग्दर्शनमात्र कराया गया है। प्रज्ञानमे ही प्रतिष्ठित है। लोक प्रज्ञानेत्र है, प्रज्ञा ही है। इन उपनिषदोंमे इस प्रकारके अर्थवाले सैकड़ों वचन हैं, उसकी प्रतिष्ठा है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।’ जिनका परम तात्पर्यस्वरूप एक ही अर्थ है—‘एकरस अखण्ड
५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
आनन्दस्वरूप ब्रह्म और आत्माकी एकताका निरूपण करना।' उनमें ध्यानयोग उपासनादि तथा सृष्टिमें अनुप्रवेशादि अन्य विषय भी प्रतिपादित हुए हैं, परंतु उनका मुख्यतः प्रतिपादन नहीं हुआ है, प्रकृत अर्थको अभिव्यञ्जित करनेके लिये ही उनका प्रतिपादन हुआ है। इनका मुख्य प्रयोजन है—भेद- बुद्धिका निवारण करना।
यद्यपि लोकमें एक सौ आठ उपनिषदें प्रचलित हैं और मुक्तिकोपनिषद्में भी वे नाम ले लेकर गिनी गयी हैं तथापि उनमें उपर्युक्त बारह उपनिषदोंकी ही प्रधानता तथा सर्वापादेयता है। इनमें बतलाये हुए अर्थका ही बहुतेरी उपनिषदें अनुवाद करती हैं। दूसरी कुछ उपनिषदें ऐसी भी हैं जो देवता- विशेषका नाम लेकर उसके स्वरूप-माहात्म्यादिका निरूपण करती हैं, परंतु वे समयाचारके प्रतिपादक (साम्प्रदायिक) ग्रन्थोंकी कोटिमें आकर सर्वत्र तथा सर्वजनोंमें आदर नहीं प्राप्त करतीं, परंतु ये द्वादश उपनिषदें साम्प्रदायिक विषयोंमें तनिक भी न पड़कर सबके लिये उपादेय बनती हैं। केवल अखण्डैकरस, निर्गुण, क्रियाकारकसे शून्य, पर, एक, सर्वात्मा, सच्चिदानन्दघनमें परम तात्पर्य रखना ही इनकी सर्वोच्चमता और सर्वादरणीयताका मुख्य कारण है। वस्तुतः अखण्ड- आनन्दैकरसस्वरूप ब्रह्म ही उपनिषद्-प्रतिपादित तत्त्व है, ऐसा श्रुतिने ही कहा है। बृहदारण्यक-उपनिषद्में कथा है कि महाराज जनकने 'कौन सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता है' यह जाननेके लिये एक सहस्र गोदानकी शर्त की। उस समय भगवान् याज्ञवल्क्यने उन सहस्रों गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, इसपर राजसभामें बैठे हुए विद्वान् कुपित होकर उनसे अनेक प्रकारके प्रश्न करने लगे। उनमें एक शाकल्य भी था। उसके अनेक प्रश्नोंका उत्तर देनेके पश्चात् अन्तमें महर्षि याज्ञवल्क्यने भी उससे पूछा—
'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि, तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति।' (बृहदारण्यक० ३।९।२६)
'शाकल्य ! मैं तुमसे उस उपनिषद् प्रतिपादित पुरुषको पूछता हूँ, यदि मुझसे उसको नहीं बतलाओगे तो तुम्हारा सिर गिर जायगा।'
शाकल्य इसका उत्तर नहीं जानता था, अतः उससे उत्तर न बन पड़ा, इस कारण उसका सिर गिर गया। इस आख्यायिका- को कहकर अन्तमें औपनिषद पदके अर्थको श्रुतिने स्वय ही खोला है।
'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्।' (बृहदारण्यक० ३।९।२८)
'ब्रह्म विज्ञानानन्दस्वरूप है, वह धन देनेवाले यजमानकी परम गति है।' यहाँ भगवान् शङ्कराचार्यजी अपने भाष्यमें कहते हैं—
"अतिक्रान्तवानुपाधिधर्म हृदयाद्यात्मस्थ स्वेनैवात्मना व्यवस्थितो य औपनिषद पुरुष. अशनायादिवर्जित. उपनिषत्स्वेव विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्य तं त्वां विद्याभिमानिनं पुरुषं पृच्छामि इति ।"
"विज्ञानं विज्ञप्तिः विज्ञानं तच्चानन्द न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम् । किं तर्हि प्रसन्नं शिवमतुममनायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थ ।"
'हृदयादिको ही आत्मा माननेरूप जो उपाधि-धर्म है, उसको अतिक्रान्त करनेवाला अपने आत्मरूपमे ही व्यवस्थित, क्षुधा-पिपासा आदि धर्म.से वर्जित, उपनिषदोंमे ही जाननेयोग्य तथा दूसरे प्रमाणोंके द्वारा जाननेमें नहीं आ सकनेवाला जो औपनिषद पुरुष है, उस पुरुषके विषयमें मे विद्याका अभिमान रखनेवाले तुमसे पूछता हूँ।'
'विज्ञप्ति (बोध) का ही नाम विज्ञान हे, वही आनन्द भी है। ब्रह्म विज्ञान विषय विज्ञानकी भाँति दुःखमे व्याप्त नहीं है। तो फिर कैसा है? प्रसन्न, कल्याणमय, अनुपम, आयास रहित, नित्यतृप्त और एकरस हे। ऐसा इसका तात्पर्य है।'
इस सन्दर्भके द्वारा यह स्पष्टरूपसे ज्ञात होता है कि पूर्वनिर्दिष्ट आत्मस्वरूप एकमात्र उपनिषदोंके द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है। अतएव उसको औपनिषद पुरुष कहते हैं।
यहाँ 'शिव' शब्द सगुणब्रह्मका वाचक नहीं है, बल्कि माण्डूक्योपनिषद्में उल्लिखित 'शान्त शिवमद्वैत चतुर्थं मन्यन्ते' इस वाक्यगत शिवका ही पुनः निर्देश यहाँ भाष्य कारने किया है। वहाँ माण्डूक्योपनिषद्में 'शिवम्' पदके द्वारा सगुणब्रह्मके उपादानकी लेशमात्र भी गन्ध नहीं है। क्योंकि 'वह अद्वैत है' यह बात आगे स्पष्टरूपसे कही गयी है। इसका विवरणभाष्य करते हुए कहा गया है—'शिवं परिशुद्धं परमानन्दबोधम्' अर्थात् 'शिव'का अभिप्राय 'परिशुद्ध परम आनन्दमय बोध।'
इस प्रकार इन मुख्य मुख्य उपनिषदोंका स्वतः प्रतीत होनेवाला अभिप्राय नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, निर्गुण, एकरस, निरतिशय अखण्ड-आनन्दस्वरूप, अद्वैत आत्माका बोध कराना ही है। कहीं कहीं द्वैत-सगुण आदि तथा अन्यत्र भी जो इनकी प्रवृत्ति दीख पड़ती है, वह भी अद्वैततत्त्वके साधन रूपमें ही ह, न कि परम तात्पर्यरूपमें । अतएव किसी अग्रगण्य विद्वान्ने कहा है—
ॐ उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा ॐ ५३ 'तस्माद् बहून् पश्यन्त्या बहुभिर्भाष्यमाणाया अपि पति- व्रताया हृदयं स्वपताविव बहुभिर्वचनैरितस्ततो नीयमाना- नामपि भगवतीनामुपनिषदां नित्यनिरतिशयाखण्डानन्द- चिद्धनरूपामैक्य एव हृदयमवतिष्ठते' इति। 'जिस प्रकार बहुतसे पुरुषोंकी ओर देखती और बहुतोंसे बातें करती रहनेपर भी पतिव्रता स्त्रीका हृदय अपने पतिमें ही लीन रहता है; उसी प्रकार अनेकों वाक्योंद्वारा इधर-उधर लगायी जानेपर भी भगवती उपनिषद्-विद्याका हृदय नित्य, निरतिशय अखण्ड-आनन्द-चिद्धनरूप आत्मैकत्वमें ही स्थित रहता है।' उस प्रकारकी एकात्मरूपमें जो अवस्थिति है, वही मोक्ष है । उसीको ब्रह्मसाक्षात्कार कहते हैं । और वही अपुनरावृत्तिरूप परम पुरुषार्थ है। उसी स्थितिको लक्ष्य करके भगवान् वासुदेवने भी कहा है— सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन ॥ (गीता ६।२९) 'सर्वत्र समदृष्टि रखनेवाला योगयुक्त पुरुष सब भूतोंमें आत्माको और आत्मामें सब भूतोंको देखता है।' और उसी सर्वात्मभावमें स्थित होकर महर्षि वामदेव अपनेको सर्वरूप देखते हैं—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' मैं मनु हो गया और सूर्य हो गया। न केवल एक महर्षि वामदेवको ही ऐसा ज्ञान हुआ, बल्कि अन्य महर्षियों तथा साधारण मनुष्योंमें भी जिसको ऐसा ज्ञान हुआ है, उसने भी अपनी सर्वात्मताका ही दर्शन किया है। आज भी वैसा ज्ञानी पुरुष वैसी ही स्थितिमें आ सकता है। यह बात भगवती श्रुति ही आग्रहपूर्वक कह रही है— तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद सर्वं भवति। (बृहदारण्यक० १।४।१०) "इस समय भी जो इसको इस प्रकार जानता है अर्थात् 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा जो अनुभव करता है वह यह सर्वरूप हो जाता है।' गीताके आचार्य भगवान् श्रीकृष्ण भी कहते हैं— बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता ॥ (गीता ४।१०) 'ज्ञान और तपस्यासे पवित्र हुए बहुतेरे महात्माजन मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं।' इस प्रकारके आत्मसाक्षात्कारकी प्राप्तिसे ही पूर्वकालमें महर्षिलोग सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके सन्यास ग्रहण करते थे। यह श्रुति ही कहती है— एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणा पुत्रैषणायाश्च वित्तै- षणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति । (बृहदारण्यक० ३।५।१) तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमास्मि परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्यतृप्तम्' इति। (शाङ्करभाष्य) "शोक-मोह-जरा-मृत्यु-भूख-प्यास आदिसे रहित उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणासे ऊपर उठकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं—भिक्षाजीवी संन्यासी हो जाते हैं उस इस आत्माको—अपने तात्त्विक स्वरूपको सदा संपूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्मके रूपमें जानकर 'यह मैं हूँ'—ऐसा समझकर—ऐसा 'तमात्मानं विदित्वा' पर श्रीशङ्कर भगवत्पादका भाष्य है। भगवान् याज्ञवल्क्यने इसी आत्मतत्त्वका उपदेश अपनी पत्नी मैत्रेयीके किया था— स एष नेति नेत्यात्मा, अगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यते। असङ्गो न हि सज्यते। तथा— यत्र सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्-इत्यादि। (बृहदारण्यक० ४।७।१५) 'वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया जानेवाला आत्मा अगृह्य है—ग्रहण नहीं किया जा सकता। अविनाशी है—विनष्ट नहीं हो सकता। असङ्ग है—आसक्तिमे नहीं पड़ सकता।' तथा 'जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ किससे किसको देखे।' इसी आत्मतत्त्वका उपदेश भगवान् वैवस्वत धर्मराजने अपने प्रिय शिष्य नचिकेताको साग्रह आत्मतत्त्वकी जिज्ञासाके उत्तरमें दिया है— सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ (कठ० १।२।१५) 'सम्पूर्ण वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं, सारी तपस्याओंको जिसकी प्राप्तिका साधन बताया जाता है, जिसकी इच्छा करते हुए मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस पदको मैं तुमसे सङ्क्षेपमें कहता हूँ, 'ओम्' यही वह पद है।' अत्यन्त गहन, अत्यन्त दुर्लभ, अतिनिगूढ आत्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेसे ही इन उपनिषदोंको रहस्यात्मक माना गया है तथा उन-उन ग्रन्थोंमें वैसा कहा भी गया है। तात्पर्य यह है कि रहस्यके अर्थमें 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग प्राय. भिन्न-भिन्न उपनिषद्-ग्रन्थोंमें देखा गया है। उपनिषदोंमें नाना प्रकारकी जो अनेकों आख्यायिकाएँ गुरु-शिष्य-संवादरूप-
५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * में, विद्वानोंके पारस्परिक प्रश्नोत्तरके रूपमे तथा उपदेशरूपमे प्राप्त होती हैं, उन सबका उद्देश्य है ब्रह्मविद्याकी सर्व- श्रेष्ठता तथा सर्वापेक्षा अधिक उपादेयताका प्रतिपादन करना । अनित्य वस्तुओंकी ओरसे पुरुषोंमें वैराग्य उत्पादन कर ब्रह्मविद्याकी ओर स्वतः उन्हें उन्मुख करना उनका लक्ष्य है। अतएव वे आख्यायिकाएँ सत्य हैं या असत्य—इस बातका अधिक आग्रह नहीं करना चाहिये । इसीलिये भिन्न भिन्न स्थलोंपर कहते हैं— आख्यायिका तु विद्याग्रहणविधिप्रदर्शनाय विधिसुत्यर्था च राजसेवितं पानीयमितिवत् । तथा— विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैवाख्यायिका । आख्यायिका तो विद्याग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके लिये तथा विधिकी प्रशंसा करनेके लिये है। जैसे किसी जलको श्रेष्ठ बतानेके लिये यह कह दिया जाय कि यहाँका पानी तो राजा भी ग्रहण कर चुके हैं। इसके सिवा, विद्याकी प्राप्तिका उपाय क्या है यह दिखलानेके लिये भी आख्यायिका दी जाती है। इसी प्रकार उन उपनिषदोंमें पञ्चाग्नि-विद्या, दहर-विद्या, संवर्ग विद्या, प्राणाग्निहोत्र विद्या आदि विद्याओंमें तथा मनुष्य- से लेकर ब्रह्मतक आनन्दके तारतम्यका निर्देश, प्राण आदिकी श्रेष्ठता और कनिष्ठताका कथन, जीवकी विश्व तैजस प्राज्ञ इन तीन अवस्थाओंका निरूपण करना और गुरु-शिष्योके वंश-वर्णन आदि विषयोंमे भी वही दृष्टि रखनी चाहिये । सर्वदा अनादि अविद्याके विलासमे विकसित तथा क्रिया, कारक और फलादिरूपसे भासित होनेवाले इस मिथ्या प्रपञ्चको विद्याके द्वारा तिरोहित करके नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सच्चिदानन्दैकरस अद्वैत ब्रह्मके रूपमे अवस्थित होना ही परम पुरुषार्थ है, उसकी प्राप्तिमे ही पुरुषकी कृतकृत्यता है—इसके प्रतिपादनके लिये ही उपनिषदें प्रवृत्त होती हैं, यही निगूढ रहस्य-तत्त्व उपनिषदोंमे वर्णित है। इस प्रकार उनमे सब कुछ उत्तम ही-उत्तम है। ब्रह्मविद्या ( ले०— श्रीमज्जगद्गुरु श्रीरामानुजसम्प्रदायाचार्य आचार्यपीठाधिपति श्रीराघवाचार्यजी स्वामी महाराज ) अनन्त अपौरुषेय वेदवाङ्मयका ज्ञानकाण्ड है वह उपनिषत्साहित्य, जिसके बलपर अध्यात्मवादियोंने घोषणा की थी— तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये । कर्म वह है जो बन्धनके लिये न हो और विद्या वह है जो बन्धनसे मुक्त कर दे। ऋषियोंने इसी विद्याके प्रकाशमें अनन्त सच्चिदानन्द परब्रह्मका साक्षात्कार किया, कराया और इस विद्याको ब्रह्मविद्या कहकर परमतत्त्व ( ब्रह्म ) के साथ रहनेवाले उसके सम्बन्धको भी स्पष्ट कर दिया । प्रतिपादनपद्धति, विशेष ज्ञातव्य, परम्परा, आदिके भेदसे उसके अनेक रूप स्वाभाविक थे, जो विविध उपनिषदोंमें तथा एक ही उपनिषद्के विविध भागोंमे परिगृहीत होकर साधुकोंके लिये प्रत्यक्ष भी हुए, तथापि ब्रह्मविद्याके इन विविध रूपोंके अन्तस्तलमें रहनेवाली स्वरूपगत एकता मिट न सकी, प्रत्युत सुस्थिर बनी रही। इसका श्रेय था मीमांसाकी उस पद्धतिके लिये, जिसने इन सभी ब्रह्मविद्याओंका—ब्रह्मविद्याके विविध रूपोंका समन्वय किया था। इसी पद्धतिका आश्रय लेकर ब्रह्मसूत्रकारने प्रमुख मानी जानेवाली बत्तीस ब्रह्मविद्याओं- की चर्चा की और उनके सामरस्यका विवेचन किया । विहङ्गम दृष्टिसे अवलोकन करनेपर १—सद्विद्या (छा०), २—आनन्दविद्या (तै०), ३-अन्तरादित्यविद्या (छा०), ४-आकाशविद्या (छा०), ५-प्राणविद्या (छा०), ६-गायत्री-ज्योतिर्विद्या (छा०), ७-इन्द्रप्राण- विद्या (छा० कौ०), ८-शाण्डिल्यविद्या (छा०, बृ० अग्नि- रहस्य), ९-नाचिकेतसविद्या (कठ०), १०-उपकोसल- विद्या (छा०), ११-अन्तर्यामिविद्या (बृ०), १२- अक्षरविद्या (मु०), १३—वैश्वानरविद्या (छा०), १४-भूमविद्या (छा०), १५-गार्ग्यक्षरविद्या (बृ०), १६-प्रणवोपास्य परमपुरुषविद्या (प्र०), १७-दहरविद्या (छा०, बृ०, तै०), १८-अङ्गुष्ठप्रमित विद्या (क०, श्वे०), १९-देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृ०), २०-मधुविद्या (छा०), २१-संवर्गविद्या (छा०), २२-अजाशरीरकविद्या (श्वे०, तै०), २३-बालाकिविद्या (कौ०, बृ०), २४-मैत्रेयीविद्या (बृ०), २५-दृहिंगणब्रह्मादिशरीरकविद्या, २६-पञ्चाग्निविद्या (छा०, बृ०), २७-आदित्यस्याह्नर्नामक विद्या (बृ०), २८-अक्षिस्याहन्नामक विद्या (बृ०), २९-पुरुषविद्या (छा०, तै०), ३०-ईशावास्यविद्या (ई०), ३१-उषस्ति कहोलविद्या (बृ०) और ३२-व्याहृतिशरीरकविद्या—ये बत्तीस विद्याएँ हैं । ये विद्याएँ क्रमशः बताती है कि (१) परब्रह्म अपने
- ब्रह्मविद्या * ५५ सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं, (२) वे कल्याणगुणाकर, वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं, (३) उनका रूप दिव्य है, (४) उपाधिरहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, (५) वे चराचरके प्राण हैं, (६) वे प्रकाशमान हैं, (७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनोंके आत्मा हैं, (८) प्रत्येक पदार्थकी सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके ही अधीन हैं, (९) समस्त संसारको लीन कर लेनेकी सामर्थ्य उनमें है, (१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्रमें है, (११) जगत् उनका शरीर है, (१२) उनके विराट् रूपकी कल्पनामें अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं, (१३) स्वर्लोक, आदित्य आदिके अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं, (१४) वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न हैं, (१५) वे नियन्ता हैं, (१६) वे मुक्त पुरुषोंके भोग्य हैं, (१७) वे सबके आधार हैं, (१८) वे अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदय- में विराजमान हैं, (१९) वे सभी देवताओंके उपास्य हैं, (२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्योंके आत्माके रूपमें उपास्य हैं, (२१) अधिकारानुसार वे सभीके उपासनीय हैं, (२२) वे प्रकृतितत्त्वके नियन्ता हैं, (२३) समस्त जगत् उनका कार्य है, (२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्षका साधन है, (२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओंके अन्तर्यामी होनेके कारण उन-उन देवताओंकी उपासनाके द्वारा वे प्राप्त होते हैं, (२६) संसारके बन्धन- से मुक्ति उनके अधीन है, (२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं, (२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं, (२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम) हैं, (३०) वे कर्मसहित उपासनात्मक ज्ञानके द्वारा प्राप्त होनेवाले हैं, (३१) उनके प्राप्त करनेमें अनिवार्य होते हैं अन्य भोजनादिविषयक नियम भी और (३२) व्यावृत्तियोंकी आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं। यह हृदयङ्गम कर लेनेपर परब्रह्मके स्वरूप, रूप, गुण, विभव आदिके सम्बन्धमें उठ सकनेवाली सभी शङ्काओंका समाधान हो जाता है। सगुण-निर्गुण, भेद-अभेद, द्वैत-अद्वैत, नित्यविभूति-लीलाविभूतिकी उलझनें भी सुलझ जाती हैं, किंतु पृथक्-पृथक् ब्रह्मविद्याओंमें परब्रह्मके पृथक् पृथक् नाम- करण तथा ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूप सन्देहके कारण बन सकते थे, इसके लिये शेषावतार श्रीरामानुजमुनीन्द्रने ब्रह्मसूत्रके लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणमें तैत्तिरीयोपनिषद्के नारायणानुवाकको उपस्थित करते हुए लिखा है— परविद्यासु अक्षरशिवशम्भुपरब्रह्मपरज्योतिपरतत्त्व- परमात्मादिशब्दनिर्दिष्टम् उपास्यं वस्तु तत्त एव शब्दै. अनुद्य तस्य नारायणत्वं विधीयते । (श्रीभाष्य) ब्रह्मविद्याओंमें जो अक्षर, शिव, शम्भु, परब्रह्म, परज्योति, परतत्त्व, परमात्मा आदि शब्द आये हैं, उन्हीं शब्दोंमें यहाँ (नारायणानुवाकमें) उपास्य परमतत्त्वका निर्देश करते हुए उनके नारायण होनेका विधान किया गया है। साथ ही— अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्द- वाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् । —लिखकर ब्रह्मविद्यासे होनेवाले ज्ञानको वाक्यार्थज्ञान- तक सीमित न कर उसे ध्यान, उपासना आदि शब्दोंका वाच्य ठहराया है। इस प्रकार निर्णय करनेमें श्रीभाष्यकारको पाञ्च- रात्र आगम और भगवद्गीताका समर्थन तथा सर्वश्रीबोधायन, टङ्क, द्रमिडाचार्यकी परम्पराका बल भी प्राप्त हुआ था। कहना न होगा कि जहाँ पाञ्चरात्र आगमने ज्ञानकाण्डको आराध्यपरक और कर्मकाण्डको आराधनपरक बताकर भगवदाराधनमें सम्पूर्ण वेदवाङ्मयका विनियोग किया तथा गीता- चार्यने ज्ञान-कर्मानुगृहीत भक्तियोगका उपदेश देकर ज्ञानकाण्डके उपासनात्मक स्वरूपको जाग्रत् किया, वहाँ महर्षि बोधायनकी परम्पराने कर्ममीमांसा, दैवतमीमांसा और ब्रह्ममीमांसाका सम्मेलन कर सर्वकर्मसमाराध्य सर्वदेवान्तर्यामी परब्रह्मकी उपासनाको परमपुरुषार्थका साधन स्थिर करके ब्रह्ममीमांसाकी प्रधानता स्थापित की। इस प्रकार ब्रह्मविद्याओंका जो मौलिक उपासनात्मक स्वरूप सामने आता है, उसको साध्यभक्ति समझ लेनेपर यह भी कह देना आवश्यक हो जाता है कि ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूपके अन्तर्भूत सिद्धभक्तिका सन्देश भी श्रीरामानुज- मुनीन्द्रने दिया है। शरण्य-परमतत्त्वके माहात्म्यके रूपमें यद्यपि प्रत्येक ब्रह्मविद्यामें इस सिद्ध-भक्तिकी झाँकी दिखायी देती है, तथापि पृथक् न्यासविद्या (तै० श्वे०) के रूपमें उसे वह स्वतन्त्र स्थान भी मिला है, जो बत्तीसौं ब्रह्मविद्याओंसे समानता ही नहीं करता, अपितु विशेषता भी ग्रहण करता है। यही ‘न्यास- विद्या’ है। परमगुह्यतम वह शरणागति-मार्ग, जिसमें परमपुरुष- की कृपाके सहारे साधक कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाता है। अन्य विद्याओंके रूपमें ब्रह्मविद्या ब्रह्मको प्राप्त करानेवाली विद्या है, परन्तु न्यासविद्याके रूपमें वह परब्रह्मकी अपनी दयामयी विद्या है, जो साधनकी सारी कठिनाइयोंको दूरकर और सारी बाधाओंको मिटाकर अकिञ्चन अनन्यगति साधक- को स्वय परब्रह्मतक पहुँचा देती है। उपनिषद्-अङ्कके लिये मङ्गलाशासन करते हुए हम शरण्य परमपुरुषसे प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी करुणा-दृष्टिसे शरण देकर समस्त प्राणियोंका परम कल्याण करें।
भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेदके
उपनिषत्तत्त्व ( श्रीमदामण्डलके एक साधु-सेवकद्वारा लिखित )
सम्पूर्ण वेद तीन भागोंमें विभक्त हैं। यथा—उपनिषद्- भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेदके ज्ञानकाण्डका प्रकाशक है। इस मन्वन्तरमें वेदकी ११८० शाखाएँ आविर्भूत हुईं । इतनी ही संख्यामें उपनिषद्, ब्राह्मण और मन्त्रभाग भी प्रकट हुए। पुराणों और उप- निषदोंमें वेदकी यह संख्या पायी जाती है। कलिकालके प्रभावसे इस संख्यामेंसे सहस्रांश भी इस समय नहीं मिलता है। उपनिषदोंके तुल्य ग्रन्थ पुराणोंमे भी मिलते हैं। जैसे कि महाभारतमें श्रीमद्भगवद्गीता, जो कि उपनिषदोंका सार कही जाती है। वेद अनादि है । सृष्टिके प्रारम्भमें हमारे ब्रह्माण्डमें जितना वेद प्रकट हुआ है, उसकी स्थिति सदा हमारे ब्राह्म- सर्गमें बनी रहती है । हमारे मृत्युलोकरूपी भारतवर्षमे वेदोंका आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है। सृष्टिकी प्रारम्भिक दशामे महर्षियोंके अन्तःकरणोंमें वेद ज्यों का त्यों सुनायी देता है, जैसे रेडियो-यन्त्रद्वारा हजारों कोसोंके शब्द ज्यों-के-त्यों सुनायी देते हैं, उसी प्रकार महर्षियोंके अन्तः- करणोंमें श्रुतियाँ अपने स्वरूपमें यथावत् प्रकट होती हैं। जिन पूज्यपाद महापुरुषोंके हृदयोंमे वेद आविर्भूत होते हैं, वे ही महर्षि कहलाते हैं। कितना ही बड़ा ज्ञानी पुरुष क्यों न हो, वह मन्त्रद्रष्टा न होनेसे महर्षि नहीं कहला सकता। वेद- मन्त्रोंके द्रष्टा ही ऋषि अथवा महर्षिपद-वाच्य हो सकते हैं। शास्त्रोंमें ऐसा प्रमाण मिलता है कि प्रत्येक सत्ययुगमे सम्पूर्ण वेदोंका आविर्भाव मोक्षभूमिरूप भारतखण्डमें हुआ करता है और प्रत्येक कलियुगमें वेदोंका ह्रास होते होते इस मृत्यु- लोकसे वेद ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। यही वेदके आविर्भाव और तिरोभावका रहस्य है। वेदका स्वरूप समझनेके लिये सबसे पहले देश-कालका ज्ञान अवश्य होना चाहिये। वेदके साथ अनादि-अनन्तकाल और ब्रह्माण्डरूपी देश तथा ब्रह्मके सदृश सत्, चित् और आनन्दभावका कैसा घनिष्ठ सम्बन्ध है, उसके समझे बिना वेदका स्वरूप ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ब्रह्मका स्वरूप त्रिभावात्मक है। इस कारण मीमांसाशास्त्र कहता है कि वेद भी तीन भावोंसे पूर्ण हैं और ब्रह्मकी स्वाभावरूपिणी प्रकृति जब त्रिगुणमयी हैं तो शब्द- ब्रह्मरूपी वेद भी तीन गुणोंसे पूर्ण हैं। वेद त्रिभावात्मक होनेके कारण वेदका मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग और उपनिषद्भाग भी प्रत्येक त्रिभावात्मक है और उनकी प्रत्येक श्रुतिका तीन प्रकारसे अर्थ होना निश्चित है। इसी कारण स्मृतिशास्त्र कहता है कि जैसे चावल, दुग्ध और शर्करा—तीनों मिलकर परम पवित्र सुमिष्ट परमान्न बनता है, वैसे ही प्रत्येक श्रुति त्रिभावात्मक होकर सब प्रकारके कल्याणका कारण होती है। अतः जबतक त्रिभाव-रहस्य और त्रिगुण रहस्यका ज्ञान साधकको नहीं होता और जबतक शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छह वेदाङ्ग तथा न्यायदर्शन और वैशेषिक-दर्शन—ये दोनों पदार्थवाददर्शन, योगदर्शन और सांख्यदर्शन—ये दोनों सांख्यप्रवचनदर्शन और वेदके कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डके तीन मीमांसादर्शन—इस प्रकारके सात वैदिक दर्शनोंका अच्छी तरहसे अनुशीलन साधक नहीं करता और साथ-ही-साथ भगवद्-उपासनाके द्वारा योगयुक्त अन्तर्मुखवृत्ति नहीं प्राप्त कर लेता, तबतक वेदार्थ समझनेमे साधक समर्थ नहीं होता। उपनिषद्-ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सृष्टिज्ञान और देश- कालका ज्ञान प्राप्त करना अत्यावश्यक है। सृष्टिके साथ जो कालका सम्बन्ध है, उसके विषयमे जैसा सुन्दर, विस्तृत और अलौकिक वर्णन वेद और शास्त्रोंमें पाया जाता है, वैसा और कहीं देखने अथवा सुननेमे नहीं आता। हमारे इस मृत्युलोक भारतवर्षकी आयुके निर्णय करनेमें अनेक पदार्थ विद्यासेवी (साइन्टिस्ट) विद्वानोंने अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की हैं। उन्होंने सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें, मनुष्य सृष्टिके विषयमें, वेदके आविर्भावके विषयमे और इसी प्रकारसे नाना देश और नाना पर्वत आदिकी सृष्टिके स्तरोके विषयमें नाना कल्पनाएँ भी की हैं। किसीने इसकी दो-चार हजार वर्षोंकी ही गणना की है। अब वह गणना कुछ आगे अवश्य बढ़ी है; किंतु उसके साथ भारतवर्षके प्राचीन सिद्धान्तोंको मिलानेपर एक कौतुक-सा मालूम होता है। सनातन धर्मके प्राचीन ग्रन्थोंमें एक ब्रह्माण्डकी आयुका निर्णय करनेमें इस प्रकारकी गणना पायी जाती है कि १०० त्रुटिका एक पर, ३० परका एक निमेष, १८ निमेषोंकी एक काष्ठा, २० काष्ठाओंकी एक कला, ३० कलाओंकी एक घटिका, दो घटिकाओंका एक क्षण, ३०
[Header] * उपनिषत्तरङ्ग * ५७.
क्षणोंका एक अहोरात्र अर्थात् मनुष्यका पूरा दिन-रात होता है। इसी संख्यासे मानववर्ष-गणना की जाती है। इस हिसाबसे १७२८००० मानववर्षोंका सत्ययुग, १२९६००० मानववर्षों- का त्रेतायुग, ८६४००० वर्षोंका द्वापरयुग और ४३२९००० वर्षोंका कलियुग है और ४३२०००० मानववर्षोंका महायुग होता है। ७१ महायुगोंका अर्थात् ३०६७२०००० वर्षोंका एक मन्वन्तर होता है और ८६४००००००० वर्षोंका ब्रह्मा- का एक दिन रात अर्थात् एक कल्प होता है। ३११०४०००००००००० मानववर्षोंमें एक ब्रह्मापदधारी बदल जाते हैं। १८६६२४००००००००००००० मानव- वर्षोंमें एक विष्णुपदधारी बदल जाते हैं । इसी प्रकार ४४७८९७६०००००००००००००००००० मानववर्षोंकी भगवान् शिवकी आयु समझी जाती है, जो ब्रह्माण्डका प्रलय करके ब्रह्ममें लय हो जाते हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-भाण्डोदरी ब्रह्मशक्ति जगदम्बाकी एक त्रुटिके शिवजीके पाँच करोड़ निमेष होते हैं। इससे एक ब्रह्माण्डके लय होनेका समय निर्धारित किया जा सकता है। इससे यह तात्पर्य है कि जगदम्बाकी एक त्रुटिमे एक ब्रह्माण्डका सम्पूर्ण प्रलय हो जाता है। जैसे ब्रह्मा- विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिके प्रकट होनेसे पहले प्राकृतिक सृष्टि होती है और उसमे ब्रह्माण्डके उपादानरूपी परमाणु- पुञ्जोंको एकत्र करनेमे समय लगता है, उसी प्रकार भगवान् शिव जीवोंका प्रलय करके ब्रह्मीभूत हो जाते हैं। उसके बाद भी परमाणुपुञ्जोंके बिखरनेमें समय लगता है। सृष्टिके और प्रलयके सब कार्य जिस समयमें हों, उस समयको ब्रह्माण्डकी आयु कह सकते हैं और वह ब्रह्माण्डकी आयुका काल श्रीजगदम्बाकी एक त्रुटि समझी जा सकती है। *
श्रीमार्कण्डेय आदि पुराणोंमें १४ मन्वन्तरोंका संक्षिप्त वर्णन है और यह भी स्पष्ट वर्णन है कि ७१ महायुगोंका एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें देवराज इन्द्रपदधारी देवता भी कालराज मनुके साथ ही बदल जाते हैं। उस समय भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—तीनोंके बड़े-बड़े पदधारी
- (१) चतुर्युगसहस्राणि दिन पैतामहं भवेत् । पितामहसहस्राणि विष्णोश्च घटिका मता ॥ विष्णोर्द्वादशसहस्राणि कलार्धं रौद्रमुच्यते । (देवीमीमांसा भाष्य, उत्पत्तिपादसूत्र ४) (२) चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । पितामहसहस्राणि विष्णोरेका घटी मता ॥ विष्णोर्द्वादशसहस्राणि निमेषार्धं महेशितु । दश कोट्यो महेशानां श्रीमातुस्त्रुटिरूपका ॥ ( शक्तिरहस्य )
सब देवता बदल जाते हैं । कर्मके चालक देवता, ज्ञानके चालक ऋषि और स्थूल शरीर आदिके सञ्चालक पितृगण, जो तीनों ही तीन श्रेणीके देवता हैं, इनके जितने बड़े-बड़े पदधारी हैं, वे सब प्रत्येक मन्वन्तरमें बदल जाया करते हैं ! इस कारण भूः, भुवः, स्वः—इन तीनों लोकोंकी शृङ्खला और सभ्यता आदिमें बड़ा अन्तर पड़ जाता है। प्रत्येक मन्वन्तरमे जो परिवर्तन होता है, वह भूः, भुवः, स्व.रूपी त्रिलोकमें होता है। मन्वन्तरमें कभी पूरा प्रलय नहीं होता, खण्ड-प्रलय होता है और देवपदधारी तो अवश्य ही बदल जाते हैं। ये सब बातें प्राचीन आर्योंके वेद और शास्त्रोंसे भलीभाँति प्रमाणित हैं। इन सब कालके विभागोंकी संख्याके देखनेपर दैवीजगत्के माननेवाले विद्वान् तो आनन्दित होते ही हैं, किंतु जो दैवीजगत्पर आस्था न भी रखते हों, वे विद्वान् भी प्राचीन आर्योंके कालके सम्बन्धके इन हिसाबोंको देखकर चकित हुए बिना न रहेंगे। उपनिषदोंके देश-काल-ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शास्त्रोक्त दो मतोंका जानना परमावश्यक है। एक 'योगी-मत' और दूसरा 'वैष्णव-मत ।' योगी-मतमें—एक अद्वितीय ब्रह्मसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि होती है और पुनः उसीमे ब्रह्माण्डका लय हो जाता है। यह मत अद्वैतवादका पोषक है। दूसरा मत वैष्णव-मत कहलाता है। उसके अनुसार सृष्टि प्रवाह- रूपसे अनादि अनन्तरूप है । ब्रह्माण्ड कितने हैं, इसकी गणना कोई नहीं कर सकता । ऐसे अगणित ब्रह्माण्डोंके बीचमे एक गोलोक-धामका होना यह मत मानता है। उस गोलोकधाममें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्णचन्द्र विराजते हैं और वहाँ रास-महोत्सवका निरन्तर होना माना जाता है । वे यह भी मानते हैं कि पूर्णावतार श्रीकृष्णने भक्तोंके ऊपर कृपा करके इस महारास-महोत्सवका नमूना व्रजगोपिकाओंको दिखाया था । ऐसे दूसरे मतवाले जब अनादि अनन्त सृष्टि प्रवाहको मानते हैं तो स्वतः ही अद्वैत- वादियोंकी तरह वे मुक्ति नहीं मानते हैं। उपनिषदोंमें अधिकतर पहले मतका ओर कहीं-कहीं दूसरे मतका आभास मिलता है।
जब कोई ब्रह्माण्ड प्रथम उत्पन्न होता है, तब उस ब्रह्माण्डके परमाणुपुञ्ज प्रकृति माताकी आकर्षणशक्तिके अनुसार एकत्रित होकर जीववासोपयोगी स्थूल या सूक्ष्म लोकोंको उत्पन्न करते हैं । उस समय एक ब्रह्माण्डके अधिष्ठाता भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और भगवान् शिवका आविर्भाव नहीं रहता है। उस समय चाहे देवलोकसमूह हों अथवा हमारा मृत्यु- लोक हो, इन सबका केवल गोलक बनता है । इसी दशाको प्राकृतिक सृष्टि कहते हैं। क्योकि ये सब ब्रह्मप्रकृति त्रिगुण- मयी जगदम्बाके स्वाभाविक नियमके अनुसार ब्रह्माण्ड-गोलक-
बन जाते हैं। उस समय उनमें जीवोंका वास नहीं रहता। इस विषयमें पूज्यपाद प्राचीन ऋषिगण और आजकलके पदार्थविद्या (साइन्स) के विद्वज्जन दोनों एकमत हैं। पदार्थ विद्यासेवी (साइन्टिस्ट) भी साधारणतः यही कहते हैं कि हमारी पृथिवी पहले जीववासोपयोगी नहीं थी। इसी जीववासोपयोगी बननेसे पहलेकी अवस्थाका नाम 'प्राकृतिक सृष्टि' है। उसके अनन्तर सर्वशक्तिमान् भगवान्की इच्छासे जब ब्रह्मा विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिका आविर्भाव होता है और भगवान् ब्रह्मा अपनी इच्छाशक्तिसे जीव-सृष्टिका प्रारम्भ करते हैं और देवसृष्टि प्रारम्भ हो जाती है, उसीको 'ब्राह्मी सृष्टि' कहते हैं। उसके अनन्तर प्रजापतिगण उत्पन्न होकर विस्तृत सृष्टि- को केवल अपनी मानसशक्तिसे उत्पन्न करते हैं, वही 'मानस- सृष्टि' कहाती है। यह सृष्टि भी देवताओंकी ओरसे ही होती है। उसके अनन्तर स्त्री पुरुषके संयोगसे जो सृष्टि होती है, वह 'वैजी-सृष्टि' है। यही चार प्रकारका सृष्टिप्रकरण है, जो प्राचीन वेद और शास्त्रोंमे पाया जाता है। वेदके मन्त्रभाग और ब्राह्मणभागके सब मन्त्रोंमें यद्यपि त्रिभावात्मक तीन प्रकारके प्रयोग हो सकते हैं, परन्तु उपनिषदों- में, जो वेदके ज्ञानकाण्डके प्रकाशक हैं, इन तीन भावोंका अद्भुत रहस्य प्रकाशित है। बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंके पाठक इसको अच्छी तरह समझ सकते हैं। यद्यपि इस समय केवल १०८ के लगभग उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं। शेष सहस्राधिक लुप्त हो गये हैं तो भी जो उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं, वे परमानन्दप्रद हैं। पञ्चम वेदरूपी महाभारतकी श्रीमद्भगवद्- गीताके पाठ करनेसे भावुक भक्त यह समझ सकते हैं कि वह जिन उपनिषदोंका सार कही जाती है, उनकी ज्ञान- गरिमा कैसी है। उपनिषदोंके द्वारा काल ज्ञान, चतुर्दशभुवन- रूपी देश-ज्ञान, दैवी जगत्का विस्तृत ज्ञान, देवपदधारियोंका ज्ञान, सब वैदिक दर्शनोंका ज्ञान और कर्मका ज्ञान, जो कर्म ब्रह्मके सचिदानन्दभावके त्यागका कारण होता है, उसका रहस्य तथा अन्तिम वैदिक मीमांसाका सिद्धान्त, यथा- जगत् ही ब्रह्म है, ब्रह्म ही जगत् है, जीव ही ब्रह्म है इत्यादि आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण सभी सिद्धान्त मिलते हैं और वैदिक उपनिषदोंमे सब प्रकारके ज्ञानका बीज कैसे पाया जाता है। इसका दिग्दर्शन श्रीमद्भगवद्गीता कराती है, जिसके महत्त्व- के विषयमे सारा संसार एकमत है। यही उपनिषत्तत्त्व है।
औपनिषद-सिद्धान्त
(श्रीश्रीस्वामीजी श्रीविशुद्धानन्दजी परिव्राजक)
विश्वके समस्त मानव समाजको नव चेतना देकर आत्यन्तिक शान्ति प्रदान करनेका श्रेय हमारे औपनिषद- सिद्धान्तको है। उपनिषदें साक्षात् कामधेनु हैं। ब्रह्मसूत्रोंकी रचना इन्हींके आधारपर हुई है तथा श्रीमद्भगवद्गीता भी गोपालनन्दनद्वारा दोहन किया हुआ इन्हीका परममधुर दुग्धा- मृत है। भारतवर्षके जितने भी आस्तिक सम्प्रदाय हैं, सबके आधार ये ही तीन ग्रन्थरत्न हैं, जो 'प्रस्थानत्रयी'के नामसे प्रख्यात हैं। सभी सम्प्रदायों—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत और शिवाद्यैतादिकी आधारभूता प्रस्थानत्रयी है। इस प्रस्थानत्रयीके आधारपर ही सभी सम्प्रदायाचार्योंने अपने अपने विचारानुसार विवेचनात्मक व्याख्या करके परम सत्यका अन्वेषण किया है। उपनिषदोंका प्रादुर्भाव वेदके अत्युच्च शीर्षस्थानीय भाग- से हुआ है, जिन्हें प्रायः वेदान्त, ब्रह्मविद्या या आम्नाय- मस्तक कहते हैं। वस्तुतः उपनिषद् ही ब्रह्मविद्याके आदि- स्रोत हैं। उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूपमें विकसित हुई ज्ञान-गङ्गा जीवोंके पाप तापको शमन करती है। जिनके मन्त्रोंके पाठमात्रसे ही हृदय एक अपूर्व मस्तीका अनुभव करने लगता है, उन उपनिषदोंकी महिमा वर्णन करना सूर्यको दीपक दिखानेके समान है। हमारा उपनिषत्- सिद्धान्त ब्रह्मविद्याके जिज्ञासुओंको आत्मज्ञ होनेका आदेश देता है, न कि अशेषविद्या-महार्णवसम्पन केवल शास्त्रज्ञ होनेका ! क्योंकि केवल शास्त्रज्ञ होनेसे संसृतिचक्ररूप शोक- समुद्रको पार नहीं किया जा सकता, इसके लिये तो अनुभव- युक्त आत्मवेत्ता होनेकी ही आवश्यकता है। इसीलिये उपनिषदोंमें अनेक आख्यायिकाओंद्वारा सृष्टि प्रपञ्चका निरसन करके जिज्ञासुओंकी बुद्धिमें अभेद-ज्ञान स्थिर करनेके लिये 'एकमेवाद्वितीयम्' 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'उदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति' आदि अनेक श्रुतियोंसे अभेददर्शीकी प्रशंसा और भेददर्शीकी भर्त्सना की गयी है। अद्वैत वेदान्त प्रक्रियानुसार जीव अविद्याकी तीन शक्तियों 'मल, विक्षेप और आवरण' से आवृत है। इनमें मल—
- औपनिषद्-सिद्धान्त * ५९
अन्तःकरणके मलिन सस्कारजनित दोषोंकी निवृत्ति निष्काम- कर्मसे होती है, विक्षेप (चित्तचाञ्चल्य ) का नाश उपासनासे होता है और आवरण (स्वरूप-विस्मृति) का नाश तत्त्वज्ञान- -से होता है, अर्थात् चित्तके इन त्रिविध दोषोंके लिये उपनिषदोंमें अलग-अलग ओषधियाँ बतायी गयी हैं, जिनसे -तीन ही प्रकारकी गतियाँ होती हैं। सकामकर्मी लोग धूममार्ग- -से स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म लेते हैं और निष्कामकर्मी उपासक अर्चिरादिमार्ग- -से अपने उपास्यदेवके लोकमें जाकर अधिकारानुसार 'सालोक्य, -सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य' मुक्तिविशेष प्राप्त करते हैं। इन दोनों सकाम और निष्कामकर्मियोंसे भिन्न जो तत्त्वज्ञानी होते हैं, उनके प्राणोंका उत्क्रमण—लोकान्तरगमन नहीं होता अर्थात् उनके शरीर अपने-अपने तत्त्वोंमें लीन हो जानेसे उन्हें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है । अस्तु; इस प्रकार हमारे अनादि उपनिषद् उस परब्रह्म- के स्वरूपका विशद और स्फुट निरूपण कर हमारी हृदय- भूमिको इस योग्य बनाते हैं कि जिससे उसमें तत्त्वज्ञानरूप अङ्कुर शीघ्र ही प्रस्फुटित हो जाय एवं किसी भी कल्याण- कारिणी विद्याको ग्रहण करनेकेलिये मनुष्यको कितने मत्य, तप, -सेवा, त्याग, श्रद्धा और विनय आदिकी आवश्यकता है— यह बात उपनिषदोंकी कई आख्यायिकाओंद्वारा प्रदर्शित की गयी है। इतना ही नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्यकी अभय-प्राप्ति -निरूपणके साथ-साथ ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व और सर्वनाम रूपत्व- का वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता अनेक स्थलोंमें दिखलायी गयी है । तात्पर्य यह है कि प्रधानतया उपनिषदोंका लक्ष्य ब्रह्मविद्या-उपलब्धिकी ही ओर है, इसीलिये तत्त्वज्ञान एव तदुपयोगी कर्म और उपासनाओंका विशद तथा विस्तृत वर्णन किया गया है। ब्रह्मविद्याके प्रसादसे समत्वदर्शन होता है । अज्ञानकी ग्रन्थियोंका भेदन होकर समस्त सशयोंका विघात हो जाता है एव कर्मचाञ्चल्य सुसयत होकर चित्त अन्तर्मुखी हो जाता है । ब्रह्मविद्यासे ही मिथ्यानुभूतिका नाश होकर स्वयंप्रकाश अवाङ्मनसगोचर चेतनानन्दघनैकघन विज्ञानस्वरूप परब्रह्म- का साक्षात्कार होता है। ब्रह्मविद्यारूप अमृतपानका अकथनीय महत्त्व है, जिसने इस अमृततत्त्वका पान किया, वह निहाल हो गया; उसे फिर न कुछ कर्तव्य है, न प्राप्तव्य । ब्रह्मवेत्ता- की दृष्टिमें सारे प्रपञ्च प्रसारका विलय होकर सच्चिदानन्द- स्वरूप हो जाता है, उसे असत् जड और दुःखरूप प्रतीत नहीं होता । उसकी दृष्टिमें तो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन- रूप त्रिपुटीका भी विलय हो जाता है, वह एक निश्चल, निर्बाध, निष्कल और चिदानन्दघन-सत्तामात्र रह जाता है । उसके द्वारा जो भी आदर्श कार्य होते हे, वे अन्य लोगोंकी दृष्टिमे ही होते हैं । ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमे तो न कोई कार्य है और न कोई करनेवाला ही । क्योंकि तत्त्वदर्शी लोगोको जल और वीचिमे अन्तर नहीं दीखता । वह भिन्नत्व तो बाह्यदर्शी लोगों- की दृष्टिमे ही प्रतीत होता है, जिससे प्रेरित होकर वे कहते हैं कि जलमे तरङ्गे उठती हैं, किंतु जलने उन तरङ्ग-वीचियोंको कब देखकर उनकी गणना की है? कहनेका तात्पर्य यह है कि 'एक अखण्ड चिद्घन वस्तुको छोड़कर उत्पत्ति, प्रलय, बद्ध, साधक, मुमुक्षु और मुक्त आदि किसी भी प्रकारका व्यवहार ही नहीं है।' ब्रह्मतत्त्व अत्यन्त ही दुर्दर्श है, क्योंकि निरन्तर व्यवहारमें ही रत रहनेवाले विषयी जीवोंकी दृष्टि इस व्यवहारातीत लभ्यतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है । जिन वेदके पारगामी मुनिजनोंके राग, द्वेष, लोभ, भय और क्रोधादि विकार श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी कृपासे सर्वथा निवृत्त हो गये हैं, उन्हींको इस प्रपञ्चातीत अद्वयपदका बोध होता है । इस विशुद्ध तत्त्वका बोध हो जानेपर वह महात्मा सर्वथा निर्द्वन्द्व और निर्भय हो जाता है एव स्तुति, नमस्कार और स्वधाकारादि कर्मश्रेणीसे ऊपर उठकर यदृच्छा- लाभ-सन्तुष्ट हो जाता है । फिर बाहर-भीतर—सर्वत्र एक आत्म- तत्त्वको ओतप्रोत देख उसीमें रमण करता हुआ कभी तत्त्व- च्युत नही होता । यही बोधस्थिति है, इसीके लिये जिज्ञासुओं- का सारा प्रयत्न होता है और इसी स्थितिको प्राप्त होनेपर प्राणी कृतकृत्य होता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि 'औपनिषद दर्शन ही सम्यग्दर्शन है, जिसके प्रसादसे भव- भयका निरसन होकर आत्यन्तिक आनन्दकी प्राप्ति होती है।' इस विशुद्ध दृष्टिको प्राप्त कर लेना हीं मनुष्य जीवनका परम उद्देश्य है। एव गहनतामे अनुप्रविष्ट हुए इस औपनिषद-सिद्धान्त- को प्राप्त किये बिना जीवन व्यर्थ है । इसे प्राप्त न करना ही सबसे बड़ी हानि है । अतः इस प्रस्तुत उपनिषद्-अङ्कसे इस दृष्टिको पानेके लिये प्रत्येक कल्याणकामी पाठकको प्राणपणसे प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वह उपनिषद्के महान् और गूढतम सिद्धान्तको धारण करनेकी क्षमता प्राप्त कर सके ।
उपनिषत्तत्त्व ( लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा ) सर्ववेदान्तप्रतिपाद्य परब्रह्म ही उपनिषदोंका चरम तत्त्व है, किंतु इस तत्त्वको हृदयङ्गम करना अत्यन्त दुरूह है । विना अधिकारीके तत्त्वका साक्षात्कार भी नहीं होता । इसीलिये उपनिषदोंमे सर्वत्र ही अधिकारकी चर्चा आयी है । यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥ 'आचार्यवान् पुरुषो वेद', 'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्', 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्' तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ —आदि उपनिषन्मन्त्रों एव गीताके शब्दोंमें तत्त्वज्ञान- प्राप्तिके लिये अधिकारीके निमित्त गुरुपसदनादि कुछ विशिष्ट नियम भी बतलाये गये हैं । श्रीमद्भागवतमे बतलाया गया है कि वेदान्तके श्रवण-मननादिसे तथा भगवान्के गुणोंके वार-वार श्रवण करनेसे भगवद्ध्यानादिके द्वारा कामादि दोषों- का शीघ्र ही उपगमन होता है । इस तरह इन अमङ्गल- जनक वस्तुओंके नष्टप्राय हो जानेपर श्रेष्ठ पुरुषोंकी नित्य सङ्गति प्राप्त करनेसे भगवान्में नैष्ठिकी भक्ति उत्पन्न होती है। ऐसी परिस्थितिमें कामादि दोषोंके शान्त पड़ जानेपर निर्विक्ष चित्तमे केवल सत्त्वगुणकी स्थिति होती है, और चित्त प्रसन्नताको प्राप्त होता है। इस तरह मुक्तात्मा प्रसन्नमन पुरुषके हृदयमें भगवद्भक्तिके योगसे भगवत्तत्त्वका विज्ञान उदय होता है— शृण्वता स्वकथा कृष्ण पुण्यश्रवणकीर्तन । हृद्यन्तस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्य भागवतसेवया । भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥ तदा रजस्तमोभावा कामलोभादयश्च ये । चेत एतैरनाविद्ध स्थित सत्त्वे प्रसीदति ॥ एव प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगत । भगवत्तत्त्वविज्ञान मुक्तसङ्गस्य जायते ॥ ( श्रीमद्भा० १ । २ । १७–२० ) तत्त्वज्ञानकी फलश्रुतिमें कहा गया है कि आत्मामें ही ईश्वरके दर्शन होनेपर हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय विलीन हो जाते हैं और सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं— भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ ( श्रीमद्भा० १ । २ । २१ ) 'यही बात कुछ अन्तरम मुण्डकोपनिषद्के द्वितीय खण्डमे कही गयी है । 'तत्त्वं किम्'—तत्त्व क्या है—इस जिज्ञासा मे यदि उपनिषदों- का आलोडन या श्रवण मनन किया जाय तो 'यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है' 'यथार्थतः वह ब्रह्म ही सत्य है' और 'एकमात्र वही है' यही तत्त्व उपलब्ध होता है। 'ईशावास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत्', 'यस्मि- न्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोह कः शोक एकत्वमनुपश्यत', 'ऐतदात्म्यमिद सर्वम् 'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो', 'ओमित्येतदक्षरमिद सर्वं तस्योपव्या- ख्यानम्', 'सर्वं ह्येतद्ब्रह्म अयमात्मा ब्रह्म' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'नेह नानास्ति किञ्चन', 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति', 'एको देव सर्वभूतेषु गूढ', 'द्वितीयाद्वै भय भवति' —आदि श्रुतियाँ इस तत्त्वको स्पष्ट प्रतिपादित करती हैं । और— 'वासुदेव सर्वमिदम्', 'समं पश्यन्हि सर्वत्र', 'यो मां पश्यति सर्वत्र' 'सकलमिदमह च वासुदेव', 'एक स आत्मा पुरुष पुराण', 'सरित्समुद्राश्च हरे शरीरम्' सर्वभूतेषु य पश्येद्भगवद्भावमात्मन । भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ —आदि वचनोंसे अन्यत्र भी यही कहा गया है। कुछ लोग— 'ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशौ' 'क्षरं प्रधानममृताक्षर हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः', 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णा बह्वी प्रजा जनयन्ती सरूपाम् ।' —आदि श्रुतियोको सिद्धान्त मान बैठते है, किंतु यों सिद्धान्ततः तत्त्वनिरूपणकी बात नहीं है । ऐसे तो उपनिषदोंमें नचिकेता, यमराज, जनक, याज्ञवल्क्य आदि कितनोंके नाम आये हैं, पर किसीका नाम आ जानेसे किन्हीं शब्दोंकी
[उपनिषत्तत्त्व]
उपनिषत्तत्त्व ६१
[बायाँ स्तम्भ]
पुनरुक्तियों मिल जानेसे उन्हें ही तत्त्व नहीं कहा जा सकता । यही कारण है कि विशिष्टाद्वैतसम्प्रदायाग्रणी भगवान् श्रीरामानन्दाचार्यने भी श्रीसुरसुरानन्दजीके 'तत्त्व किम्' इस प्रश्नके उत्तरमें —
विश्वं जात यतोऽद्या यदञ्चितमखिल लीनमप्यस्ति यस्मिन् सूर्यो यत्तेजसेन्दु सकलमविरत भामयत्येतदेष । यद्धीत्या वाति वातोऽवनिरपि सुतल याति नैवेश्वरो ञ्च साक्षी कूटस्थ एको बहुशुभगुणवानन्वयो विश्वभर्ता ॥
इस प्रकार ही तत्त्वका निरूपण किया है । इस श्लोकमें स्पष्ट है कि—
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । ( तैत्ति० ३ । १ । १)
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । ( श्वेता० ६ । १४ )
यदादित्यगत तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ( गी० १५ । १० )
तथा—
भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषास्मा- दग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । ( तैत्ति० २ । ८ । १ )
'एवं य. सर्वज्ञ स सर्ववित्' —आदि मन्त्रोका ही भाव व्यक्त किया गया है ।
इसपर आजकलके कुछ उपनिषद्चिन्तन करनेवाले वेदान्तियोंका कथन है कि श्रीरामानन्दाचार्य आदि विद्वानोंने तो इन लक्षणोंको श्रीरामचन्द्रादिमें घटाया है, किंतु वह ब्रह्म तो अवतार नहीं लेता, क्योंकि वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्याप्त है, सर्वदेशीय है—
'ईश्वरो नावतरति व्यापकत्वाद् आकाशवत्'
इस अनुमानसे ईश्वरका अवतार बाधित होता है, किंतु न तो यह अनुमान ही सही है न इसका दृष्टान्त ही, क्योंकि आकाश भी वायुरूपमे अवतीर्ण होता है एव पुनरपि उसका तेज, जल और पृथ्वीरूपमें अवतरण होता है । सर्वोपनिषदूपी गौओंके दोग्धा श्रीगोपालनन्दनका कथन है कि 'मै अज, अव्ययात्मा एव सभी भूतोंका ईश्वर होता हुआ भी आत्ममायासे अवतीर्ण होता हूँ'—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ( गीता ४ । ६ )
यह बात अवश्य है कि भगवान्का आत्ममायामय
[दायाँ स्तम्भ]
शरीर तथा जन्म-कर्म साधारण देहधारियोकी भाँति नहीं होता । श्रीमद्भागवतमे तभी तो भगवान्के सभी स्वरूपोंको मायातीत, अनन्य सच्चिदानन्दरूप, अतुल माहात्म्ययुक्त तथा सर्वथा अस्पृष्ट कहा गया है—
सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥ ( श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४ )
तभी तो जब विदेहराज श्रीजनकने भगवान् श्रीरामचन्द्रके स्वरूपका प्रथम बार दर्शन किया तो इनका सारा ब्रह्मज्ञान एवं वैराग्य हवा हो गया—
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सति भाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥ इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरवस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥
—इत्यादि उद्गार उनके मुखसे हठात् निकल पड़े । यह दशा उनकी कई बार हुई । वनवासके समय भगवान् श्रीरामचन्द्रसे मिलकर तो इनकी दशा देखते ही बनती थी । गोस्वामीजी विभोर होकर लिखते है—
जासु ग्यान रवि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल विकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बडाई ॥ बिषई साधक सिद्ध समाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ॥ राम सनेह सरस मन जासू । साधु सर्मा बड आदर तासू ॥ सोह न राम प्रेम बिनु ग्यानू । करनवार बिनु जिमि जलजानू ॥
यही बात भागवतमें भी—
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जित न शोभते ज्ञानमल निरञ्जनम् । ( श्रीमद्भा० १ । ५ । १२
—आदि श्लोकोंमे दर्शायी गयी है ।
इसपर कुछ लोग—
मायाख्याया कामधेनोर्जीवेशौ वत्सकावुभौ । यथेच्छ पिवता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥
( माया नामकी कामधेनुके जीव, ईश्वर दोनो बछड़े हैं । यथेच्छ द्वैतको दोनों ही पी लें, पर तत्त्व तो अद्वैत ही है ।)
इत्यादि वचनोंको पढकर भगवान्के सगुण स्वरूपसे घृणा करने लग जाते है, पर उन्हे समझ रखना चाहिये कि द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नही होता । जब विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय भक्तिके लिये कल्पना किया गया द्वैत तो अद्वैतकी अपेक्षा भी सुन्दर
६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है । यदि पारमार्थिक अद्वैत-बुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैत-बुद्धि रक्खी जाय तो ऐसी भक्ति सैकड़ो मुक्तियोंसे भी बढ़कर है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग् जाते बोधे मनीषया । भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे । तादृशी यदि भक्तिःस्यात्तु मुक्तिश्शताधिका ॥ कुछ लोगोंका कहना है कि मधुसूदन स्वामीने माना है कि अवतार नहीं होता, किंतु भक्तकी भावनासे विधुर- परिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान श्रीकृष्ण आदिका स्वरूप दिखलायी पड़ता है, किंतु यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि गीता ( ४ । ६ ) की टीकाम उन्होंने भगवदवतारको बहुत प्रयत्नसे सिद्ध किया है और— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् । जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ —आदि भागवतके श्लोकोंको सादर प्रमाणरूपसे उपन्यस्त किया है । इतना ही क्यों ? तत्त्वविषयक प्रश्नपर तो वे स्पष्ट कहते हैं कि मैं श्रीकृष्णसे बढ़कर और किसी तत्त्वको नहीं जानता— वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुख्खदरविन्दनेत्राद् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥ अधिक क्या, अद्वैतसम्प्रदायाग्रगण्य भगवान् शङ्कर भी कहते हैं कि जिसने ब्रह्माको अद्भुत, अनन्त ब्रह्माण्ड दिखलाये, वत्सोंसहित सभी गोपोंको विष्णुरूपमें दिखलाया, भगवान् शङ्कर जिनके चरणावनेजन-जलको अपने मस्तकपर धारण करते हैं, वे श्रीकृष्ण तो ब्रह्मा, विष्णु, शिव—इन तीनोसे परे कोई अविकृत चिदानन्दघन ही हैं— ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमप्यद्भुतान् गोपान्वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णून्दशांश्च यः । शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात्- कृष्णोऽद्य पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा ॥ आनन्दसे विभोर होकर एक गोपी अपनी सखीसे कहती है कि 'ऐ सखि ! सुन, मैने श्रीनन्दके आँगनमें एक विचित्र कौतुक देखा है।' सखी पूछती है कि 'वह क्या ?' भगवद्दर्शनके आनन्दसे आह्लादित हुई गोपिका उत्तर देती है कि—'सकल- वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्म वहाँ गोधूलिसे सना हुआ नृत्य कर रहा है— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् । गोधूलिधूसराङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥ इसी प्रकार एक अन्य प्रेममग्न भक्तके हृदयोद्गार हैं । वह कहता है— वृन्दारण्यनिविष्टं चिलुठितमाभीरधीरनारीभिः । सत्यचिदानन्दघनं ब्रह्म नराकारमालम्बे ॥ मैं वृन्दावनमे प्रविष्ट परम बुद्धिमती आभीर- नारियोंके सङ्गमे लुंठित नराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका अवलम्बन लेता हूँ—शरण ग्रहण करता हूँ । जब ऐसी बात है तभी तो श्रीब्रह्माजी भी कहते हैं कि व्रजमें कीटादि होकर भी जन्म ग्रहण करना बड़े भाग्यकी बात है, क्योंकि उस श्रीचरणकमलकी रज, जिसे सर्वदा श्रुतियाँ ढूँढती हैं, यहाँ सहज ही उपलब्ध होती है— तद्भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद्गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् । यज्जीवितं तु निखिलं भगवान्मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥ ( श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४ ) यहाँ 'अद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव' यह पद ध्यान देने योग्य है । ब्रह्माजीका तात्पर्य है यहाँ श्रुतिरूपा गोपियोंसे । वे अब इस बातको समझ चुके हैं कि श्रुतिप्रतिपाद्य यह ब्रह्म ही यहाँ ब्रजमे अवतीर्ण हुआ है, और इसकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ भी यहाँ गोपिकारूपमे अवतरित हुई हैं । 'सर्वे वै देवताप्रायाः' यह प्रसिद्ध है । इस विषयमे उपनिषदोंका ही प्रमाण देखनेयोग्य है । उपनिषदे कहती हैं कि 'एक बार श्रीरामचन्द्रजी ऋषि- मुनियोंके दर्शनार्थ जङ्गलमें गये । महाविष्णु, सच्चिदानन्द- लक्षण सर्वाङ्गसुन्दर भगवान् श्रीरामचन्द्रको देखकर सभी वनवासी मुनि विस्मित हो गये । उन ऋषियोंने उनके शरीर- स्पर्शकी कामना प्रकट की । भगवान्ने अन्यावतारमे उनकी इच्छा पूर्ण करनेका वचन दिया— श्रीमहानिष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं होचुर्नोऽवद्यमवतारात्त्वं गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति ॥ उन सभी देवताओं तथा ऋषियोंकी प्रार्थना स्वीकृत
$$ॐ उपनिषत्तत्त्व ॐ\qquad\qquad६३$$
हुईं । वे सभी कृतकृत्य हो गये । कालान्तरमे भगवान्का प्राकट्य हुआ । भगवान्का स्वरूपभूत परमानन्द ही नन्द हुआ, ब्रह्मविद्या यशोदा हुईं । ब्रह्मपुत्रा गायत्री देवकी हुईं, स्वयं निगम ही वसुदेव हुए, वेदकी ऋचाएँ ही गोपियों तथा गौओंके रूपमे अवतीर्ण हुईं । भगवान्के मनोहर संस्पर्शके निमित्त ब्रह्मा भी मनोहर यष्टि हुए, भगवान् रुद्र सप्त- स्वरानुवादी वेणु होकर, इन्द्र गवयश्रृङ्ग होकर श्रीहस्तमें सुशोभित हुए और पाप ही असुर हुए— यो नन्द• परमानन्द. यशोदा मुक्तिगेहिनी । गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः ॥ वंशस्तु भगवान् रुद्रो शृङ्गमिन्रस्त्वघोऽसुरः । इसके अतिरिक्त वैकुण्ठ गोकुलवनके रूपमे अवतरित हुआ, तपस्वीगण वृक्षोंके रूपमे अवतीर्ण हुए, क्रोध लोभादि दैत्य हुए तथा मायासे विग्रह धारण करनेवाले साक्षात् श्रीहरि ही गोपरूपसे अवतीर्ण हुए । श्रीगोपनाग बलराम हुए और शाश्वत ब्रह्म ही श्रीकृष्ण हुआ । सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियोंके रूपमे ब्रह्मरूपा वेदोंकी ऋचाएँ तथा उपनिषदें प्रकट हुईं— गोकुल वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमा. । लोभक्रोधादयो दैत्या• कलिकालतिरस्कृत. ॥ गोपरूपो हरि• साक्षान्मायाविग्रहधारण• । शेषनागोऽभवद्रामः कृष्णो ब्रह्मैव शाश्वतम् ॥ अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्य. स्त्रियस्तथा । ऋचोपनिपदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋच स्त्रिय• ॥ यहाँतक कि द्वेष ही चाणूर मल्लरूपमें अवतीर्ण हुआ, मत्सर ही अजेय मुष्टिक हुआ, दर्प कुवलयापीड हाथी तथा गर्व बकासुर राक्षस हुआ । दया रोहिणी माताके रूपमें अवतीर्ण हुईं, धरा सत्यभामा हुईं, महाव्याधि अघासुर बना तथा कलि कंसरूपमे अवतीर्ण हुआ । शम मित्र सुदामा हुए, सत्य अक्रूर हुआ तथा दम उद्धव हुआ एव सर्वदा संस्पर्श पानेके लिये साक्षात् भगवान् विष्णु ही शङ्खरूपमें अवतीर्ण हुए— द्वेषश्चाणूरमल्लोऽय मत्त्सरो मुष्टिकोऽजयः । दर्प. कुवलयापीडो गर्वो रक्ष. खगो वक ॥ दया सा रोहिणी माता सत्यभामा धरेति वै । अघासुरो महाव्याधि कलि. कस. स भूपतिः ॥ शमो मित्र सुदामा च सत्याक्रूरोद्धवो दम. । यः शङ्ख. स स्वयं विष्णुलैक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥ इसी प्रकार आगे चलकर कहा गया है कि जिस प्रकार भगवान् पहले आनन्दपूर्वक क्षीरसमुद्रमें क्रीडन करते थे, वैसा ही आनन्द लेनेके लिये उन्होने क्षीरसमुद्रको दधि-दुग्धके भाण्डोंमे स्थापित किया एव शकटभञ्जन आदि लीलाएँ रचीं । गणेशजी चक्ररूपमे अवतीर्ण हुए, स्वय वायु ही चमर हुए एव अग्निके समान प्रकाशवाले तलवाररूपमे स्वय भगवान् महेश्वर आविर्भूत हुए । श्रीकश्यपजी उलूखल हुए, देवमाता अदिति रज्जु हुईं । इस प्रकार भगवान्के समस्त परिकरके रूपमें वे ही सब देवगण अवतीर्ण हुए जिन्हें सभी सादर नित्य नमस्कार करते है, इसमे किसी प्रकार भी सशय नहीं करना चाहिये । सर्वशत्रुनिवर्हिणी साक्षात् कालिका गदा- रूपमे अवतीर्ण हुईं और भगवान्की वैष्णवी माया शार्ङ्ग- धनुरूपमें उनके करकमलमे आ विराजी । शरद-ऋतु भगवान्के सुन्दर भोजनोंके रूपमें प्रकट हुआ । श्रीगरुड़जी भाण्डीरवट हुए तथा नारद मुनि श्रीदामानामक उनके सहचर गोपाल हुए । भक्ति वृन्दा हुईं। दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे । क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ ॥ सहारार्थं च शत्रूणा रक्षणाय च संस्थितः । यत्तत्पद्मीश्वरेणासीत्तच्चक्रं ग्रहरूपधृक् । जयन्तीसम्भवो वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः ॥ यत्त्वासौ ज्वलनाभास खड्गरूपो महेश्वरः । कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्मातादितिस्तथा ॥ यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जना• । नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशय. ॥ गदा च कालिका साक्षात्सर्वशत्रुनिवर्हिणी । धनु• शाङ्गं स्वमाया च शरत्काल• सुभोजन. ॥ गरुडो वटभाण्डीर श्रीदामा नारदो मुनि. । वृन्दाँ भक्ति क्रिया बुद्धि• सर्वजन्तुप्रकाशिनी ॥ इस तरह— 'नन्दाद्या ये व्रजे गोपा. याश्चामीपा च योषित. । वृष्णयो वसुदेवाद्या देवक्याद्या यदुस्त्रिय• ॥ सर्वे वै देवताप्रायाः' यह श्रीनारदकी उक्ति सर्वथा सत्य सिद्ध हुई— ऊपरके वर्णनसे यह सिद्ध हो गया कि परम पुरुप ही, जो उपनिषदोंका चरमतत्त्व है, श्रीकृष्ण तथा श्रीरामादि रूपोंसे विवक्षित है । वेदोंमें भी— 'इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्', 'त्रीणि पदानि विचक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः । अतो धर्माणि धारयन्,
कई अध्यायोंकी टीकामे वेदोंमे ब्रजलीलाको दर्शाया है एव
६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * 'प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते,' 'नीलग्रीवा शितिकण्ठा ' —आदि बहुतसे मन्त्र भगवान्के सगुण स्वरूपको सिद्ध करते हैं । श्रीनीलकण्ठ सूरिने तो श्रीहरिवंशपर्वके विष्णुपर्वके कई अध्यायोंकी टीकामे वेदोंमे ब्रजलीलाको दर्शाया है एव सर्वत्र यह स्पष्ट लिखा है कि यह लीला वेदके अमुक मन्त्रका उपबृंहण करती है। 'कल्याण' के गत वर्षके ४-५ अङ्कोंमें बहुत कुछ लिखा भी गया है । सच्ची बात तो यह है कि वेदोंका यथार्थ तात्पर्य इतिहास पुराणोंके अध्ययनसे ही लगाया जा सकता है—अन्यथा वेदेतिहासोंसे अनभिज्ञ पुरुष तो उनका अनर्थ ही कर डालता है— बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामय प्रहरिष्यति । इस तरह स्पष्ट है कि जो उपनिषदोंका तत्त्व है, वही पुराणेतिहासमे तथा सभी सज्जनोंका भी परमाराध्य तत्त्व है । सभी योगी मुनि उसीकी ही वन्दना करते हैं । ब्रह्मादि सभी देवतागण सर्वदा उसीका ध्यान करते हैं। श्रुतियाँ 'नेति- नेति' कहकर सर्वदा उसीका यशोगान करती हैं। उससे संसार- मे कोई भी वस्तु न तो भिन्न ही है और न अभिन्न ही । तस्माद्भिन्न न चाभिन्नमाभिभिन्न न वै विभु । और यदि ध्यानसे देखा जाय तो उपनिषदोंमें ही नहीं, प्रत्युत सम्पूर्ण मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद, सम्पूर्ण पुराण तथा रामायण एवं महाभारतके आदि, मध्य और अवसानमे सर्वत्र ही वह गीयमान है—यह सभीका चरम तत्त्व है— वेदे रामायणे पुण्ये पुराणे भारते तथा । आदौ मध्ये तथा चान्ते हरि सर्वत्र गीयते ॥ तैत्तिरीयोपनिषद् और ब्रह्मसूत्र ( लेखक—प्रो० प० श्रीजीवनशङ्करजी याज्ञिक, एम्० ए०, एल्-एल्० बी० ) पूज्यपाद भगवान् आद्य शङ्कराचार्यने सन्यास-आश्रमके दस सम्प्रदाय स्थापित किये प्रत्येक सम्प्रदायका अपना एक विशेष उपनिषद् कहा जाता है, जिसके अध्ययन और विचारसे ब्रह्मज्ञानप्राप्तिकी चेष्टा अनुयायी करते हैं । भगवान् वेदव्यास- ने ब्रह्मसूत्रमें यावत् उपनिषदोंकी मीमासा की है, ऐसा माना जाता है । इसीसे उपनिषद् और गीताके साथ ब्रह्मसूत्रकी गणना प्रस्थानत्रयीमें होती है, सभी उपनिषदोंका पठन तथा मनन कदाचित् सम्भव न हो, इसीलिये सम्प्रदायोंके लिये विशेष विशेष उपनिषदोंकी प्रधानता स्वीकार की गयी है । परतु ब्रह्मसूत्रको समझनेके लिये सभी उपनिषदोंका यथावत् ज्ञान होना आवश्यक माना जाय तो वेदव्यासजीकी अमर-कृति बहुत अग्रेमे अगम्य हो जाय । किंतु बात ऐसी नह । विचार- पूर्वक देखनेसे पता चलता है कि वेदव्यासजीने एक ही उपनिषद्को आधाररूप स्वीकार कर उसीपर अपने सूत्रोंकी रचना की है। वह आधार है कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद्, जिसमें वेदान्तसिद्धान्तोंका पूर्णरूपेण समावेश है । वेदव्यासजी- की दृष्टिमें इस उपनिषद्का कितना महत्त्व था, इसी वातसे स्पष्ट हो जाता कि उसको केवल आधार बनाकर ही सूत्रों- की रचना नहीं की, बल्कि आदिसे अन्ततक प्रत्येक सूत्रको इसी उपनिषद्पर अवलम्बित रक्खा । इस उपनिषद्में तीन वल्लियाँ है जो शीक्षा, ब्रह्मानन्द और भृगु नामसे प्रसिद्ध हं । प्रथम वल्लीमे उपासना और शिष्टाचारकी शिक्षा शिष्यको दी गयी है और अन्य दोनोंमें ब्रह्मविद्याका निरूपण और ब्रह्मप्राप्तिके उपाय वरुण और उनके जिज्ञासु पुत्र भृगुके सवादरूपसे बताये गये हैं। भृगु अपने पिता वरुणसे विद्या प्राप्त कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करते हैं । गृहस्थोचित धर्मका पालनकर देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ ऋणसे मनुष्य उऋण होता है और समाजमें एक उपयोगी व्यक्ति बना रहता है । अन्य धर्मकार्यों- के साथ शम-दमादिका साधन और स्वाध्याय प्रवचनादिरूपी तप घरमें रहकर होते हैं। अन्तमे ये ही ब्रह्मको जाननेके साधन होंगे । प्रथम वल्लीके अन्तमे समावर्तनके समय शिष्यको गुरु जो उपदेश देकर विदा करते हैं, उससे बढकर उपदेश गृहस्थ- के लिये हो नहीं सकता । भारतीय सभ्यता और उसके आदर्शकी अपूर्व झाँकी उसमे मिलती है— सत्य वद । धर्म चर । स्वाध्यायान्मा प्रमद । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सी । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्या न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्या न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव .....। ( तैत्ति० १ । ११ । १-२
- तैत्तिरीयोपनिषद् और ब्रह्मसूत्र ~ ६५
और अन्तमे कहते है कि यह उपदेश है, वेदका रहस्य है और आज्ञा है । इसी प्रकार उपासना करनी चाहिये । ऐसा ही आचरण करना चाहिये ।
वेदाध्ययन गुरुकुलमे समाप्त कर ऐसा जीवन व्यतीत करनेवाले गृहस्थाश्रमीके लिये तो घर ही साधन-धाम और तपोभूमि बन जाता है । संसारमें लिप्त होकर और उसीमे यावत् सुख माननेवालेकी गति दूसरी होती है । आदर्श गृहस्थ- के लिये ऐसी शङ्का नहीं रहती और यह भी एक भ्रामक कल्पना है कि हिंदू-धर्म अधिकारभेदका विचार किये बिना मनुष्यको सांसारिक कर्तव्यसे विमुख करता है। धर्मपरायण आदर्श गृहस्थको सुख अनित्य और दुःख अनिवार्यकी भावना बराबर दृढ़ होती जाती है। जो संसारमे निमग्न हैं, उनकी तो सतत यह निष्फल चेष्टा रहती है कि दुःखसे निवृत्ति हो तथा सुख स्थायी हो, और सच्चे ब्राह्मणको सुख-दुःखसे अतीत अवस्थाकी जिज्ञासा होती है । निर्वेद हुए बिना अक्षय सुख या आनन्दकी खोज आरम्भ नहीं होती। तीनों एषणाओका त्याग और कर्म-संन्याससे अध्यात्म-जगत्में प्रवेश होता है । संन्यासकी शान्तिका वही अधिकारी बनता है, जिसकी विवेक- बुद्धि जागती है ! क्योंकि 'अनित्यम् असुखं लोकम्'की भावना तभी दृढ़ होती है। इस प्रकार ससार-सुखसे अतृप्त रहकर एक अभावका अनुभव कर भृगु अपने पिताके पास जगलमे जाता है और जिस ब्रह्मकी केवल चर्चामात्र वेदाध्ययनके समय सुनी थी, उसको भली प्रकार जाननेके लिये प्रश्न करता है। जबतक पूर्णरूपसे जिज्ञासा शान्त नहीं होती, भृगु बार-बार अरण्यको जाकर प्रश्न करते हैं । ब्रह्मिनिरूपणके बाद घर लौटकर उनका जाना सूचित नहीं किया गया । इशारा है कि वे भी ब्रह्मप्राप्तिके पश्चात् अरण्यवासी- गृहत्यागी हो गये । सूत्रकारने पहले ही सूत्रमें बड़ा चमत्कार दिखाया है। तीनो वल्लियोंका ध्यान रखकर, भृगुके निर्वेदकी ओर सङ्केत कर अन्तिम ध्येयतत्त्वकी बात कह डाली है और एक सूत्रमे रचना- चातुर्यसे अनुबन्धचतुष्टय भी दर्शा दिया है। केवल चार शब्दोंके छोटे सूत्रमे इतनी बातोंको समाविष्ट कर मानो गागरमें सागर भर दिया है । सूत्र है-
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा
वल्ली सूत्रके पद अनुबन्धचतुष्टय १ शीक्षावल्ली अथ अधिकारी २ ब्रह्मानन्दवल्ली अत प्रयोजन ३ } भृगुवल्ली ब्रह्म विषय ४ } जिज्ञासा सम्बन्ध
उ० अ० ९-
ब्रह्मविद्याका अधिकारी कौन होता है ? जो भृगुजीकी तरह वेदाध्ययनके पश्चात् गृहस्थाश्रमके वर्मांका यथावत् पालन कर, घरमे ही रहकर स्वाध्याय-प्रवचनरूपी तप और शम-दमादि साधन-सम्पत्तिसे युक्त होकर सासारिक सुखोंकी अनित्यताका अनुभव कर लेता है और किमी अक्षय वस्तुकी खोजमे घरसे निकलकर त्यागी ब्रह्मज्ञानीके पास जाता है और 'परिपश्नेन सेव्या' ब्रह्मप्राप्ति करता हे । सूत्रमे 'अथ' शब्द जिसका अर्थ 'अनन्तर' भी है। इन सब अवस्थाओंको और जिज्ञासुके अधिकारको सूचित करता है। प्रथम वल्ली 'अथ' में समा गयी ।
ब्रह्मानन्दवल्लीमें प्रयोजनकी बात कही गयी है । भृगुको अरण्यमें जानेका प्रयोजन हे अक्षय वस्तुकी खोज । जो पदार्थ सुख-दुःखसे भी परे है या विलक्षण है । 'ब्रह्मविदामोति परम्' । यदि ससारसुखको सब कुछ मानकर उसीसे तृप्ति हो जाती तो फिर घरसे बाहर जाकर किसी अन्य वस्तुकी खोजका कुछ प्रयोजन ही न रहता । अभावके अनुभवने 'परम्' की जिज्ञासा जाग्रत् की और उसकी उपलब्धिके लिये सचेष्ट किया । 'अतः' शब्द इन्हीं भावोका सूचक होकर ब्रह्मानन्दवल्लीका साररूप है ।
ब्रह्म 'विषय' है जिसका निरूपण किया गया है- भृगुर्वे वारुणि । वरुण पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । (तैत्ति० ३।१।१)
इस प्रकार भृगु अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मका बोध करानेकी प्रार्थना करते है । जिज्ञासाका विषय स्पष्ट ही ब्रह्म है । ब्रह्मको पूछा क्यों ? वेदाध्ययनके समय कुछ चर्चा सुन चुके हैं। शिष्यभावसे पिताके पास जाकर पूछना उचित ही है साथ ही दो बातें भी लक्षित हैं कि केवल स्वाध्याय और प्रवचनसे यह वारुणी विद्या प्राप्त नहीं हो सकी । स्वाध्याय और प्रवचन सहायक अवश्य है और साधनरूपसे बराबर स्वीकार करने पड़े । भृगुको पिताके उपदेशसे बार-बार तपस्या करनी पडी । परतु यह 'उपनिषद्'की बात है । गुरुके समीप जाकर प्रत्यक्ष उपदेशसे प्राप्त होती है, केवल तप और स्वाध्यायसे नहीं।
'सम्बन्ध' भी भृगुवल्लीमे स्पष्टत. दिया हुआ है और वह है पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्यका । उपदेश तीन भावोंसे दिया जाता है-कान्ताभाव, सखिभाव और प्रभुभावसे । यहाँ प्रभुभावका उपदेश ग्राह्य है । सूत्रकारने 'जिज्ञासा' शब्द दिया है, क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है । कर्मका
६६ ~ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * फल तो अनित्य होगा और यहाँ अक्षय पदार्थकी प्राप्तिकी बात है। ब्रह्मके विषयमे चिकीर्षाको स्थान नहीं केवल जिज्ञासा चाहिये । श्रद्धापूर्वक प्रश्न-परिपश्न और श्रवण-मनन निधि- ध्यासनकी ही आवश्यकता है। कर्म क्षेत्रमे—गृहस्थाश्रममे ही समाप्त हो चुका और ब्रह्म तो सुख-दुःख—अर्थात् कर्म- फलसे अतीत या परे है, जीवन्मुक्तावस्थामें सुख-दुःख समान हो जाते हैं और विदेहमे दोनो नही रहते । प्रथम सूत्रकी वाक्यपूर्तिमें 'भवति' शब्द जोड़ना चाहिये । भाव यह है कि जिज्ञासा उत्पन्न नहीं की जाती, स्वतः होती है यदि विधिवत् गृहस्थाश्रमका निर्वाह हो तो । जिज्ञासा होनेपर प्रश्न होता है कि ब्रह्म क्या है ? उपनिषद्- का उत्तर है— यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । ( तैत्ति० ३ । १ । १ ) इसपर वेदव्यासजीने दूसरा सूत्र बनाया—'जन्माद्यस्य यत ।' इसकी वाक्यपूर्ति करनेपर सूत्रका रूप होगा— 'यत जन्मादि अस्य भवति तद्ब्रह्म सत्य भवति' । सृष्टि, स्थिति, प्रलय और मोक्ष जिससे होते हे वह ब्रह्म है, 'जन्मादि' का यह अर्थ हुआ । जगत्के साथ देहधारी या जीवका भी विचार इसमे ग्राह्य होना उचित है, क्योंकि यदि केवल 'यत्प्रयन्ति' ही कहा होता तो लय हो अर्थ होता । जगत् ब्रह्ममे लीन होकर पुन. प्रकट होता रहता है और जीवोका भी यही हाल है कि प्रलयके बाद फिर सृष्टिमे आते हैं। साथमे 'अभिसंविशन्ति' शब्द भी दिया गया है। उपनिषद् इस शब्दको देकर मोक्षकी सूचना देता है। मुक्त जीव पूर्णरूपसे ब्रह्ममे सदाके लिये लीन हो जाते है, ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति' । केवल लीन होना परम वस्तु नही है और चाहिये 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण- ने इसी बातको कहा है— ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ( १८ । ५५ ) और समुद्रमें नदियोंके समा जानेकी उपमा देकर 'प्रविशन्ति' पद दिया है । 'अस्य' शब्दका अर्थ सूत्रकारके अनुसार है प्रत्यक्ष जगत्, जो इन्द्रियोंद्वारा अनुभवमें आता है अर्थात् जो अप्रत्यक्ष ब्रह्मसे विलक्षण है । सूचित यह कर दिया कि ब्रह्मके अस्तित्वमें इन्द्रियाँ साक्षी नही हो सकतीं । ‘यत’ का भाव है कि ब्रह्म आप ही जगत्का निमित्त और उपादान कारण है । वही सब कुछ बन गया है और वह भी अपने ही लिये । आप ही करनेवाला, आप ही बनने- वाला, अपने ही लिये और अपनेसे ही—ये सूत्र भाव ‘यतः’ शब्दगे व्याकरणकी दृष्टिसे भी आ जाते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय प्रकृतिमे निरन्तर होते रहते हैं, अतएव सत्य हैं; परतु ये विकारी सत्य हैं और ब्रह्म अविकारी सत्य है । वास्तवमें सत्य तो वही है जो अविकारी हो और सदा-सर्वदा एकरस हो । वैचित्र्य यही है कि ब्रह्म सदा अविकारी होते हुए और रहते हुए भी इस विकारी जगत्का अधिष्ठान है; अतएव ब्रह्म ही सत्य है । ब्रह्मका तटस्थ लक्षण बताया सृष्टि आदि । उसका सम्बन्ध कहकर उपनिषद्ने स्वरूपलक्षण कहा है—‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’। इस प्रकार व्यासजीने दूसरे सूत्रमे तटस्थ लक्षण और तीन स्वरूपलक्षणोंमेसे ‘सत्यम्’ को कह दिया। अब रह गये दो स्वरूपलक्षण ‘ज्ञानम्’ और ‘अनन्तम्’ । उनको अगले दो सूत्रोंमें क्रमसे कहते है। तीसरा सूत्र है—'शास्त्रयोनित्वात्' जिसका रूप वाक्यपूर्ति पर होता है— ‘शास्त्रयोनित्वात् तद्ब्रह्म ज्ञान भवति ।' इस सूत्रका आधार उपनिषद्वाक्य है— भीषास्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्य । भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । ( तैत्ति० २ । ८ । १ ) 'उस ब्रह्मके भयसे वायु चलता है । इसीके भयसे सूर्य उदय होता है तथा इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है अर्थात् ब्रह्म ही समस्त सृष्टिका शासनकर्ता है । वह सब तत्त्व और उनके देवताओंको जानता है । वह ज्ञानस्वरूप है, मनुष्य ज्ञानी है, परतु वह ज्ञानस्वरूप या ज्ञान है । मनुष्यको तामस ज्ञान हुआ तो वह अज्ञानी कहा जाता है । इस प्रकार अज्ञानीको भी ज्ञान तो रहता ही है; परतु ब्रह्म ज्ञानी नहीं, ज्ञानस्वरूप है । सृष्टिका कार्य उसके शासनसे होता है, वह स्वयं नहीं करता । सृष्टिमे जो नियमका पालन हो रहा है, उन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है । स्वरूपलक्षण 'अनन्तम्' भी उपनिषद्ने बताया है । उसके आधारपर व्यासजीने चौथा सूत्र बनाया—‘तत्त समन्व- यात् ।' जिसकी वाक्यपूर्ति करनेपर स्वरूप बना— 'समन्वयात् तन्तु ब्रह्म अनन्त भवति' अर्थात् वह ब्रह्म अनन्त है, क्योंकि सभी सृष्ट पदार्थोंमें
- उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र * ६७ वह निश्चय ही भली प्रकार अनुस्यूत है। इस सूत्रका आधार उपनिषद्का निम्नाङ्कित वचन है— तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशा- द्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषो- ऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमु- त्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। (तैत्ति० २।१।२) ब्रह्मसे आकाशादि सब क्रमसे निकले और सृष्टि हुई। और सृष्टि होनेके साथ ही ब्रह्म भी सृष्ट पदार्थोंमें प्रविष्ट होता गया। 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' । और अन्तमें ब्रह्मसे ब्रह्ममें ही पहुँच गया। अर्थात् चक्रवत् व्यापार चला और जैसे चक्रका अन्त नहीं वैसे ही सृष्टिमें अनुस्यूत होनेसे आप ही चक्र पूरा कर प्रतिष्ठित रहा। अतएव वह अन्तरहित या अनन्त है। और आत्मा ही ब्रह्म है, यह भी उपनिषद्ने बता दिया। सूत्रमें 'सम्' पद आया है, वह भली प्रकार या अच्छी तरहका भाव दर्शाता है। अर्थात् सृष्टिके अङ्ग प्रत्यङ्गमें ब्रह्म समाया हुआ है। कणमें अल्प और पर्वतमें विशेष नहीं। सर्वत्र समान रूपसे। और वही ब्रह्म आत्मा है। भृगुवल्लीकी शिक्षा दो सूत्रोंमें आ गयी। इस प्रकार तैत्तिरीयोपनिषद्की तीनों वल्लियोंको प्रथम चार सूत्रोंमें बाँधकर वेदव्यासजीने रख दिया। ब्रह्मजिज्ञासा क्यों और किसको होती है, उसका कौन अधिकार है और ब्रह्मका तटस्थ और स्वरूपलक्षण बताकर उसका निरूपण कर दिया। जैसे उपनिषद्ने ब्रह्मप्राप्तिकी युक्ति बतायी है, उसीके आधारपर आगे भी सूत्र हैं। केवल चतुःसूत्री ही नहीं, समस्त ब्रह्मसूत्रकी रचना तैत्तिरीयोपनिषद्पर अवलम्बित है और इस उपनिषद्में ब्रह्म ज्ञानसम्बन्धी समस्त सिद्धान्तोंका समावेश होनेसे वेदव्यास भगवान्ने इसको इतना महत्त्व दिया है।
उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र ( लेखक—पं० श्रीकृष्णदत्तजी भारद्वाज एम० ए०, आचार्य ) 'उपनिषद्' शब्दका मुख्य अर्थ है उपासना। इस विश्वके उदय, विभव और लयकी लीलामें¹ लीन परमात्माके निरतिशय ऐश्वर्यसे विमुग्ध प्राचीन ऋषि मुनियोंकी भक्तिभाव- भरित भावनाओंके शब्दचित्रोंके समुदायका नाम ही उपनिषद् है। प्रसङ्गतः अन्यान्य विषयोंका भी समावेश यद्यपि उपनिषद्-ग्रन्थोंमें है, तथापि मुख्य प्रतिपाद्य विषय उपासना ही है। ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले ब्रह्मर्षियोंने उस परमतत्त्व- का प्रतिपादन करना चाहा, वाणीसे अतीतका वाणीद्वारा वर्णन करना चाहा तो अपने उस अलौकिक देवताकी वाङ्मयी आराधनामे वे लौकिक पदावलीका ही प्रयोग कर सके। परमेश्वरकी ऐकान्तिक और आत्यन्तिक दिव्यताको प्रकट करनेके लिये उन्हे अपने कोषमे प्राण², ज्योति³ और आकाश⁴ जैसे शब्दोंसे बढकर शब्द न मिल सके, अतएव उन्हीं पदोंके प्रयोगसे उन्हें सन्तोष करना पडा, किंतु साधारण जनताने प्राणादि शब्दोंका लौकिक अर्थ करना प्रारम्भ किया तो आवश्यकता इस बातकी हुई कि इस प्रकारके विरोधका परिहार किया जाय। ऐसे-ऐसे संशयास्पद स्थलोका परमात्म- परक अर्थ दिखानेके लिये एव ऐसी ही अन्यान्य पारमार्थिक शङ्काओंके निरासके साथ-साथ सत्सिद्धान्तके निरूपणके लिये कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने एक सूत्रमयी रचना की। उसी- का नाम ब्रह्मसूत्र है। वेदान्तसूत्र और भिक्षुसूत्र भी इसके पर्याय हैं। गीताकी रचनासे पूर्व ही इन सूत्रोंका निर्माण हो चुका था⁵। इन सूत्रोंको उपनिषदोंका सार कहना युक्तियुक्त है। विभिन्न आचार्योंने अपने अपने मतके अनुसार ब्रह्मसूत्र- पर भाष्य किये हैं जो सभी अपने-अपने दृष्टिकोणोंसे उपादेय हैं। पुराणशिरोमणि श्रीमद्भागवत ब्रह्मसूत्र-प्रतिपादित अर्थका ही समर्थक है, जैसी कि सूक्ति है— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणाम् ।
१. लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्। ( ब्रह्मसूत्र २।१।३३ ) २ अत एव प्राण। ( ब्रह्मसूत्र १।१।२० ) ३ ज्योतिश्चरणाभिधानात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२५ ) ४. आकाशस्तल्लिङ्गात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२२ ) ५. ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः । ( गीता १३।४)
उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना ( लेखक-श्रीजयदयालजी गोयन्दका ) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ( बृहदारण्यक० ५ । १ । १ ) ‘वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा अपने-आपसे परिपूर्ण है, यह ससार भी उस परमात्मासे परिपूर्ण है, क्योंकि उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ( ससार ) प्रकट हुआ है, पूर्ण ( ससार ) के पूर्ण ( पूरक परमात्मा ) को स्वीकार करके उसमें स्थित होनेसे उस साधकके लिये एक पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही अवशेष रह जाता है।’
हिंदू-शास्त्रोंका मूल वेद है, वेद अनन्त ज्ञानके भण्डार हैं, वेदोंका ज्ञानकाण्ड उसका शीर्षस्थानीय या अन्त है, वही उपनिषद् या वेदान्तके नामसे ख्यात है। उपनिषदोंमें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्णय किया गया है और साथ ही उसकी प्राप्तिके लिये विभिन्न रुचि और स्थितिके साधकोंके लिये विभिन्न उपासनाओंका प्रतिपादन किया गया है। उनमें जो प्रतीकोपासनाका वर्णन है, उसे भी एकदेशीय और सर्व- देशीय—दोनों ही प्रकारसे करनेको कहा गया है। ऐसी उपासना स्त्री, पुत्र, धन, अन्न, पशु आदि इस लोकके भोगोंकी तथा नन्दनवन, अप्सराएँ और अमृतपान आदि स्वर्गीय भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे करनेका भी प्रतिपादन किया गया है एव साथ ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी अनेक प्रकारकी उपासनाएँ बतलायी गयी हैं। उनमेंसे इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाओंके सम्बन्धमें यहाँ कुछ लिखनेका अवसर नहीं है। उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिविषयक उपासनाओंके जो विस्तृत विवेचन हैं, उन्हींका यहाँ बहुत संक्षेपमें कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है।
उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिके लिये दृष्टान्त, उदाहरण, रूपक, संकेत तथा विधि निषेधात्मक विविध वाक्योंके द्वारा विविध युक्तियोंसे विभिन्न साधन बतलाये गये हैं, उनमेंसे किसी भी एक साधनके अनुसार संलग्न होकर अनुष्ठान करनेपर मनुष्यको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। उपनिषदुक्त सभी साधन १ भेदोपासना, और २ अभेदोपासना—इन दो उपासनाओंके अन्तर्गत आ जाते है। भेदोपासनाके भी दो प्रकार है। एक तो वह, जिसमे साधनमें भेदभावना रहती है और फलमें भी भेदरूप ही रहता है, और दूसरी वह, जिसमे साधनकालमे तो भेद रहता है, परतु फलमे अभेद होता है। पहले क्रमग हम भेदोपासनापर ही विचार करते हैं।
भेदोपासना
भेदोपासनामें तीन पदार्थ अनादि माने जाते हैं— १ माया ( प्रकृति ), २ जीव और ३. मायापति परमेश्वर । इनका वर्णन उपनिषदोंमें कई जगह आता है। प्रकृति जड है और उसका कार्यरूप दृश्यवर्ग क्षणिक, नाशवान् और परिणामी है। जीवात्मा और परमेश्वर—दोनों ही नित्य चेतन और आनन्दस्वरूप हैं, किंतु जीवात्मा अल्पज्ञ है और परमेश्वर सर्वज्ञ हैं; जीव असमर्थ है और परमेश्वर सर्वसमर्थ हैं, जीव अंश है और परमेश्वर अंशी हैं, जीव भोक्ता है और परमेश्वर साक्षी हैं एव जीव उपासक है और परमेश्वर उपास्य हैं। वे परमेश्वर समय-समयपर प्रकट होकर जीवोंके कल्याणके लिये उपदेश भी देते हैं।
इस विषयमे केनोपनिषद्में एक इतिहास आता है। एक समय परमेश्वरके प्रतापसे स्वर्गके देवताओंने असुरोंपर विजय प्राप्त की। पर देवता अज्ञानसे अभिमानवश यह मानने लगे कि हमारे ही प्रभावसे यह विजय हुई है। देवताओंके इस अज्ञानपूर्ण अभिमानको दूर कर उनका हित करनेके लिये स्वय सच्चिदानन्दघन परमात्मा उन देवताओंके निकट सगुण-साकार यक्षरूपमें प्रकट हुए। यक्षका परिचय जाननेके लिये इन्द्रादि देवताओंने पहले अग्निको भेजा। यक्षने अग्निसे पूछा—‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने उत्तर दिया कि ‘मै जातवेदा अग्नि हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको जला सकता हूँ।’ यक्षने एक तिनका रखा और उस जलानेको कहा, किंतु अग्नि उसको नही जला सके एवं लौटकर देवताओंसे बोले—‘मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है।’ तदनन्तर देवताओंके भेजे हुए वायुदेव गये। उनसे भी यक्षने यही पूछा कि ‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने कहा—‘मैं मातरिश्वा वायु हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको उड़ा सकता हूँ।’
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[पृष्ठ शीर्ष]
- उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ६९
[बायाँ स्तम्भ]
तब यक्षने उनके सामने भी एक तिनका रखा किंतु वे उसे उडा नहीं सके और लौटकर उन्होंने भी देवताओंसे यही कहा कि 'मैं इसको नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ?' तत्पश्चात् स्वय इन्द्रदेव गये, तब यक्ष अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर इन्द्रने उसी आकाशमें हैमवती उमादेवीको देखकर उनसे यक्षका परिचय पूछा । उमादेवीने बतलाया कि 'वह ब्रह्म था और उस ब्रह्मकी ही इस विजयमें तुम अपनी विजय मानने लगे थे ।' इस उपदेशसे ही इन्द्रने समझ लिया कि 'यह ब्रह्म है।' फिर अग्नि और वायु भी उस ब्रह्मको जान गये । इन्होंने ब्रह्मको सर्वप्रथम जाना, इसलिये इन्द्र, अग्नि और वायुदेवता अन्य देवताओंसे श्रेष्ठ माने गये । इस कथासे यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्राणियोंमें जो कुछ भी बल, बुद्धि, तेज एव विभूति है, सब परमेश्वरसे ही है । गीतामे भी श्रीभगवान्ने कहा है— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्व मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ( १० । ४१ ) ‘जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अशकी ही अभिव्यक्ति जान ।’ इस प्रकार उपनिषदोंमें कहीं साकाररूपसे और कहीं निराकाररूपसे, कहीं सगुणरूपसे और कहीं निर्गुणरूपसे भेद- उपासनाका वर्णन आता है । वहाँ यह भी बतलाया है कि उपासक अपने उपास्यदेवकी जिस भावसे उपासना करता है, उसके उद्देश्यके अनुसार ही उसकी कार्य-सिद्धि हो जाती है । कठोपनिषद्में सगुण-निर्गुणरूप ओंकारकी उपासनाका भेद रूपसे वर्णन करते हुए यमराज नचिकेताके प्रति कहते हैं— एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धयेवाक्षरं परम् । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बन परम् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ( १ । २ । १६-१७ ) ‘यह अक्षर ही तो ब्रह्म है और अक्षर ही परब्रह्म है, इसी अक्षरको जानकर जो जिसको चाहता है, उसको वही मिल जाता है । यही उत्तम आलम्बन है, यही सबका अन्तिम आश्रय है । इस आलम्बनको भलीभाँति जानकर साधक ब्रह्म- लोकमें महिमान्वित होता है । इसलिये कल्याणकामी मनुष्योंको इस दुःखरूप संसार-
[दायाँ स्तम्भ]
सागरसे सदाके लिये पार होकर परमेश्वरको प्राप्त करनेके लिये ही उनकी उपासना करनी चाहिये, सासारिक पदार्थोंके लिये नहीं। वे परमेश्वर इस शरीरके अदर सबके हृदयमें निराकार- रूपसे सदा सर्वदा विराजमान हैं, परतु उनको न जाननेके कारण ही लोग दुःखित हो रहे हैं। जो उन परमेश्वरकी उपासना करता है, वह उन्हें जान लेता है और इसलिये सम्पूर्ण दुःखों और शोकससमूहोंसे निवृत्त होकर परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है । मुण्डकोपनिषद्में भी बतलाया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्य. पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- ऽनीशया शोचति मुह्यमान. । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोक ॥ यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ( ३ । १ । १-३ ) ‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है । इस शरीररूपी समान वृक्षपर रहनेवाला जीवात्मा शरीरकी गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है और असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ मोहित होकर शोक करता रहता है, किंतु जब कभी भगवान्की अहैतुकी दयासे भक्तोद्वारा नित्यसेवित तथा अपनेसे भिन्न परमेश्वरको और उनकी महिमाको यह प्रत्यक्ष कर लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है तथा जब यह द्रष्टा ( जीवात्मा ) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, सम्पूर्ण जगत्के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परमपुरुषको प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्य पाप—दोनोंसे रहित होकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है ।’ वह सगुण-निर्गुणरूप परमेश्वर सब इन्द्रियोंमे रहित होकर भी इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है । वह सबकी उत्पत्ति
७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * और पालन करनेवाला होकर भी अकर्ता ही है । उस सर्वेश, सर्वव्यापी, अकारण दयालु और परम प्रेमी हृदयस्थित निराकार परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करनी चाहिये । उस भजनेयोग्य परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सारे दुःख, क्लेश, पाप और विकारोंसे छूटकर परम शान्ति और परम गतिस्वरूप मुक्तिको प्राप्त करता है । इसलिये सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् उस सर्वसुहृद् परमेश्वरको तत्त्वसे जानकर उसे प्राप्त करनेके लिये सब प्रकारसे उसीकी शरण लेनी चाहिये । श्वेताश्वतरोपनिषद्में परमेश्वरकी भेदरूपसे उपासना- का वर्णन विस्तारसहित आता है, उसमेंसे कुछ मन्त्र यहाँ दिये जाते हैं— सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ ( ३ । १७ ) ‘जो परमपुरुष परमेश्वर समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है तथा सबका स्वामी, सबका शासक और सबसे बड़ा आश्रय है, उसकी शरण जाना चाहिये ।’ अणोरणीयान्महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तो । तमक्रतु पश्यति वीतशोको धातु. प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ ( ३ । २० ) ‘वह सूक्ष्मसे भी अतिसूक्ष्म तथा बड़ेसे भी बहुत बड़ा परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपा हुआ है, सब- की रचना करनेवाले परमेश्वरकी कृपासे जो मनुष्य उस सङ्कल्प- रहित परमेश्वरको और उसकी महिमाको देख लेता है, वह सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ।’ और भी कहा है-- मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ( ४ । १०-११ ) ‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और महेश्वरको मायापति समझना चाहिये; उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्यसमुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है । जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है, जिसमें यह समस्त जगत् प्रलयकालमें विलीन हो जाता है, और सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है, उस सर्वनियन्ता, वरदायक, स्तुति करनेयोग्य परमदेव परमेश्वरको तत्त्वसे जानकर मनुष्य निरन्तर बनी रहनेवाली इस मुक्तिरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।’ सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ( ४ । १४ ) ‘जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, हृदयगुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित, अखिल विश्वकी रचना करनेवाला, अनेक रूप धारण करनेवाला तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रखने- वाला है, उस एक अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है ।’ एको देव सर्वभूतेषु गूढ. सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्ष. सर्वभूताधिवास. साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ एको वशी निष्क्रियाणा बहूनामेक बीजं बहुधा य. करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषा सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ ( ६ । ११-१२ ) ‘वह एक देव ही सब प्राणियोंमें छिपा हुआ सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है, वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है तथा जो अकेला ही बहुत-से वास्तवमें अक्रिय जीवोंका शासक है और एक प्रकृतिरूप बीजको अनेक रूपोंमें परिणत कर देता है, उस हृदयस्थित परमेश्वरका जो धीर पुरुष निरन्तर अनुभव करते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परमानन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं ।’ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तंह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ॥ ( ६ । १८ ) ‘जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो निश्चय ही उस ब्रह्माको समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उस परमात्मविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मोक्षकी इच्छावाला साधक शरण लेता हूँ ।’