कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- ब्रह्मविद्या * ५५ सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं, (२) वे कल्याणगुणाकर, वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं, (३) उनका रूप दिव्य है, (४) उपाधिरहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, (५) वे चराचरके प्राण हैं, (६) वे प्रकाशमान हैं, (७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनोंके आत्मा हैं, (८) प्रत्येक पदार्थकी सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके ही अधीन हैं, (९) समस्त संसारको लीन कर लेनेकी सामर्थ्य उनमें है, (१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्रमें है, (११) जगत् उनका शरीर है, (१२) उनके विराट् रूपकी कल्पनामें अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं, (१३) स्वर्लोक, आदित्य आदिके अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं, (१४) वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न हैं, (१५) वे नियन्ता हैं, (१६) वे मुक्त पुरुषोंके भोग्य हैं, (१७) वे सबके आधार हैं, (१८) वे अन्तर्यामीरूपसे सबके हृदय- में विराजमान हैं, (१९) वे सभी देवताओंके उपास्य हैं, (२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्योंके आत्माके रूपमें उपास्य हैं, (२१) अधिकारानुसार वे सभीके उपासनीय हैं, (२२) वे प्रकृतितत्त्वके नियन्ता हैं, (२३) समस्त जगत् उनका कार्य है, (२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्षका साधन है, (२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओंके अन्तर्यामी होनेके कारण उन-उन देवताओंकी उपासनाके द्वारा वे प्राप्त होते हैं, (२६) संसारके बन्धन- से मुक्ति उनके अधीन है, (२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं, (२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं, (२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम) हैं, (३०) वे कर्मसहित उपासनात्मक ज्ञानके द्वारा प्राप्त होनेवाले हैं, (३१) उनके प्राप्त करनेमें अनिवार्य होते हैं अन्य भोजनादिविषयक नियम भी और (३२) व्यावृत्तियोंकी आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं। यह हृदयङ्गम कर लेनेपर परब्रह्मके स्वरूप, रूप, गुण, विभव आदिके सम्बन्धमें उठ सकनेवाली सभी शङ्काओंका समाधान हो जाता है। सगुण-निर्गुण, भेद-अभेद, द्वैत-अद्वैत, नित्यविभूति-लीलाविभूतिकी उलझनें भी सुलझ जाती हैं, किंतु पृथक्-पृथक् ब्रह्मविद्याओंमें परब्रह्मके पृथक् पृथक् नाम- करण तथा ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूप सन्देहके कारण बन सकते थे, इसके लिये शेषावतार श्रीरामानुजमुनीन्द्रने ब्रह्मसूत्रके लिङ्गभूयस्त्वाधिकरणमें तैत्तिरीयोपनिषद्के नारायणानुवाकको उपस्थित करते हुए लिखा है— परविद्यासु अक्षरशिवशम्भुपरब्रह्मपरज्योतिपरतत्त्व- परमात्मादिशब्दनिर्दिष्टम् उपास्यं वस्तु तत्त एव शब्दै. अनुद्य तस्य नारायणत्वं विधीयते । (श्रीभाष्य) ब्रह्मविद्याओंमें जो अक्षर, शिव, शम्भु, परब्रह्म, परज्योति, परतत्त्व, परमात्मा आदि शब्द आये हैं, उन्हीं शब्दोंमें यहाँ (नारायणानुवाकमें) उपास्य परमतत्त्वका निर्देश करते हुए उनके नारायण होनेका विधान किया गया है। साथ ही— अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्द- वाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् । —लिखकर ब्रह्मविद्यासे होनेवाले ज्ञानको वाक्यार्थज्ञान- तक सीमित न कर उसे ध्यान, उपासना आदि शब्दोंका वाच्य ठहराया है। इस प्रकार निर्णय करनेमें श्रीभाष्यकारको पाञ्च- रात्र आगम और भगवद्गीताका समर्थन तथा सर्वश्रीबोधायन, टङ्क, द्रमिडाचार्यकी परम्पराका बल भी प्राप्त हुआ था। कहना न होगा कि जहाँ पाञ्चरात्र आगमने ज्ञानकाण्डको आराध्यपरक और कर्मकाण्डको आराधनपरक बताकर भगवदाराधनमें सम्पूर्ण वेदवाङ्मयका विनियोग किया तथा गीता- चार्यने ज्ञान-कर्मानुगृहीत भक्तियोगका उपदेश देकर ज्ञानकाण्डके उपासनात्मक स्वरूपको जाग्रत् किया, वहाँ महर्षि बोधायनकी परम्पराने कर्ममीमांसा, दैवतमीमांसा और ब्रह्ममीमांसाका सम्मेलन कर सर्वकर्मसमाराध्य सर्वदेवान्तर्यामी परब्रह्मकी उपासनाको परमपुरुषार्थका साधन स्थिर करके ब्रह्ममीमांसाकी प्रधानता स्थापित की। इस प्रकार ब्रह्मविद्याओंका जो मौलिक उपासनात्मक स्वरूप सामने आता है, उसको साध्यभक्ति समझ लेनेपर यह भी कह देना आवश्यक हो जाता है कि ब्रह्मविद्याओंके मौलिक स्वरूपके अन्तर्भूत सिद्धभक्तिका सन्देश भी श्रीरामानुज- मुनीन्द्रने दिया है। शरण्य-परमतत्त्वके माहात्म्यके रूपमें यद्यपि प्रत्येक ब्रह्मविद्यामें इस सिद्ध-भक्तिकी झाँकी दिखायी देती है, तथापि पृथक् न्यासविद्या (तै० श्वे०) के रूपमें उसे वह स्वतन्त्र स्थान भी मिला है, जो बत्तीसौं ब्रह्मविद्याओंसे समानता ही नहीं करता, अपितु विशेषता भी ग्रहण करता है। यही ‘न्यास- विद्या’ है। परमगुह्यतम वह शरणागति-मार्ग, जिसमें परमपुरुष- की कृपाके सहारे साधक कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाता है। अन्य विद्याओंके रूपमें ब्रह्मविद्या ब्रह्मको प्राप्त करानेवाली विद्या है, परन्तु न्यासविद्याके रूपमें वह परब्रह्मकी अपनी दयामयी विद्या है, जो साधनकी सारी कठिनाइयोंको दूरकर और सारी बाधाओंको मिटाकर अकिञ्चन अनन्यगति साधक- को स्वय परब्रह्मतक पहुँचा देती है। उपनिषद्-अङ्कके लिये मङ्गलाशासन करते हुए हम शरण्य परमपुरुषसे प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी करुणा-दृष्टिसे शरण देकर समस्त प्राणियोंका परम कल्याण करें।