कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपनिषत्तत्त्व ( श्रीमदामण्डलके एक साधु-सेवकद्वारा लिखित )
सम्पूर्ण वेद तीन भागोंमें विभक्त हैं। यथा—उपनिषद्- भाग, मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग। उपनिषद्भाग वेदके ज्ञानकाण्डका प्रकाशक है। इस मन्वन्तरमें वेदकी ११८० शाखाएँ आविर्भूत हुईं । इतनी ही संख्यामें उपनिषद्, ब्राह्मण और मन्त्रभाग भी प्रकट हुए। पुराणों और उप- निषदोंमें वेदकी यह संख्या पायी जाती है। कलिकालके प्रभावसे इस संख्यामेंसे सहस्रांश भी इस समय नहीं मिलता है। उपनिषदोंके तुल्य ग्रन्थ पुराणोंमे भी मिलते हैं। जैसे कि महाभारतमें श्रीमद्भगवद्गीता, जो कि उपनिषदोंका सार कही जाती है। वेद अनादि है । सृष्टिके प्रारम्भमें हमारे ब्रह्माण्डमें जितना वेद प्रकट हुआ है, उसकी स्थिति सदा हमारे ब्राह्म- सर्गमें बनी रहती है । हमारे मृत्युलोकरूपी भारतवर्षमे वेदोंका आविर्भाव और तिरोभाव हुआ करता है। सृष्टिकी प्रारम्भिक दशामे महर्षियोंके अन्तःकरणोंमें वेद ज्यों का त्यों सुनायी देता है, जैसे रेडियो-यन्त्रद्वारा हजारों कोसोंके शब्द ज्यों-के-त्यों सुनायी देते हैं, उसी प्रकार महर्षियोंके अन्तः- करणोंमें श्रुतियाँ अपने स्वरूपमें यथावत् प्रकट होती हैं। जिन पूज्यपाद महापुरुषोंके हृदयोंमे वेद आविर्भूत होते हैं, वे ही महर्षि कहलाते हैं। कितना ही बड़ा ज्ञानी पुरुष क्यों न हो, वह मन्त्रद्रष्टा न होनेसे महर्षि नहीं कहला सकता। वेद- मन्त्रोंके द्रष्टा ही ऋषि अथवा महर्षिपद-वाच्य हो सकते हैं। शास्त्रोंमें ऐसा प्रमाण मिलता है कि प्रत्येक सत्ययुगमे सम्पूर्ण वेदोंका आविर्भाव मोक्षभूमिरूप भारतखण्डमें हुआ करता है और प्रत्येक कलियुगमें वेदोंका ह्रास होते होते इस मृत्यु- लोकसे वेद ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। यही वेदके आविर्भाव और तिरोभावका रहस्य है। वेदका स्वरूप समझनेके लिये सबसे पहले देश-कालका ज्ञान अवश्य होना चाहिये। वेदके साथ अनादि-अनन्तकाल और ब्रह्माण्डरूपी देश तथा ब्रह्मके सदृश सत्, चित् और आनन्दभावका कैसा घनिष्ठ सम्बन्ध है, उसके समझे बिना वेदका स्वरूप ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ब्रह्मका स्वरूप त्रिभावात्मक है। इस कारण मीमांसाशास्त्र कहता है कि वेद भी तीन भावोंसे पूर्ण हैं और ब्रह्मकी स्वाभावरूपिणी प्रकृति जब त्रिगुणमयी हैं तो शब्द- ब्रह्मरूपी वेद भी तीन गुणोंसे पूर्ण हैं। वेद त्रिभावात्मक होनेके कारण वेदका मन्त्रभाग, ब्राह्मणभाग और उपनिषद्भाग भी प्रत्येक त्रिभावात्मक है और उनकी प्रत्येक श्रुतिका तीन प्रकारसे अर्थ होना निश्चित है। इसी कारण स्मृतिशास्त्र कहता है कि जैसे चावल, दुग्ध और शर्करा—तीनों मिलकर परम पवित्र सुमिष्ट परमान्न बनता है, वैसे ही प्रत्येक श्रुति त्रिभावात्मक होकर सब प्रकारके कल्याणका कारण होती है। अतः जबतक त्रिभाव-रहस्य और त्रिगुण रहस्यका ज्ञान साधकको नहीं होता और जबतक शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छह वेदाङ्ग तथा न्यायदर्शन और वैशेषिक-दर्शन—ये दोनों पदार्थवाददर्शन, योगदर्शन और सांख्यदर्शन—ये दोनों सांख्यप्रवचनदर्शन और वेदके कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्डके तीन मीमांसादर्शन—इस प्रकारके सात वैदिक दर्शनोंका अच्छी तरहसे अनुशीलन साधक नहीं करता और साथ-ही-साथ भगवद्-उपासनाके द्वारा योगयुक्त अन्तर्मुखवृत्ति नहीं प्राप्त कर लेता, तबतक वेदार्थ समझनेमे साधक समर्थ नहीं होता। उपनिषद्-ज्ञान प्राप्त करनेके लिये सृष्टिज्ञान और देश- कालका ज्ञान प्राप्त करना अत्यावश्यक है। सृष्टिके साथ जो कालका सम्बन्ध है, उसके विषयमे जैसा सुन्दर, विस्तृत और अलौकिक वर्णन वेद और शास्त्रोंमें पाया जाता है, वैसा और कहीं देखने अथवा सुननेमे नहीं आता। हमारे इस मृत्युलोक भारतवर्षकी आयुके निर्णय करनेमें अनेक पदार्थ विद्यासेवी (साइन्टिस्ट) विद्वानोंने अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ की हैं। उन्होंने सृष्टिकी उत्पत्तिके विषयमें, मनुष्य सृष्टिके विषयमें, वेदके आविर्भावके विषयमे और इसी प्रकारसे नाना देश और नाना पर्वत आदिकी सृष्टिके स्तरोके विषयमें नाना कल्पनाएँ भी की हैं। किसीने इसकी दो-चार हजार वर्षोंकी ही गणना की है। अब वह गणना कुछ आगे अवश्य बढ़ी है; किंतु उसके साथ भारतवर्षके प्राचीन सिद्धान्तोंको मिलानेपर एक कौतुक-सा मालूम होता है। सनातन धर्मके प्राचीन ग्रन्थोंमें एक ब्रह्माण्डकी आयुका निर्णय करनेमें इस प्रकारकी गणना पायी जाती है कि १०० त्रुटिका एक पर, ३० परका एक निमेष, १८ निमेषोंकी एक काष्ठा, २० काष्ठाओंकी एक कला, ३० कलाओंकी एक घटिका, दो घटिकाओंका एक क्षण, ३०