भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

[Header] * उपनिषत्तरङ्ग * ५७.

क्षणोंका एक अहोरात्र अर्थात् मनुष्यका पूरा दिन-रात होता है। इसी संख्यासे मानववर्ष-गणना की जाती है। इस हिसाबसे १७२८००० मानववर्षोंका सत्ययुग, १२९६००० मानववर्षों- का त्रेतायुग, ८६४००० वर्षोंका द्वापरयुग और ४३२९००० वर्षोंका कलियुग है और ४३२०००० मानववर्षोंका महायुग होता है। ७१ महायुगोंका अर्थात् ३०६७२०००० वर्षोंका एक मन्वन्तर होता है और ८६४००००००० वर्षोंका ब्रह्मा- का एक दिन रात अर्थात् एक कल्प होता है। ३११०४०००००००००० मानववर्षोंमें एक ब्रह्मापदधारी बदल जाते हैं। १८६६२४००००००००००००० मानव- वर्षोंमें एक विष्णुपदधारी बदल जाते हैं । इसी प्रकार ४४७८९७६०००००००००००००००००० मानववर्षोंकी भगवान् शिवकी आयु समझी जाती है, जो ब्रह्माण्डका प्रलय करके ब्रह्ममें लय हो जाते हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-भाण्डोदरी ब्रह्मशक्ति जगदम्बाकी एक त्रुटिके शिवजीके पाँच करोड़ निमेष होते हैं। इससे एक ब्रह्माण्डके लय होनेका समय निर्धारित किया जा सकता है। इससे यह तात्पर्य है कि जगदम्बाकी एक त्रुटिमे एक ब्रह्माण्डका सम्पूर्ण प्रलय हो जाता है। जैसे ब्रह्मा- विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिके प्रकट होनेसे पहले प्राकृतिक सृष्टि होती है और उसमे ब्रह्माण्डके उपादानरूपी परमाणु- पुञ्जोंको एकत्र करनेमे समय लगता है, उसी प्रकार भगवान् शिव जीवोंका प्रलय करके ब्रह्मीभूत हो जाते हैं। उसके बाद भी परमाणुपुञ्जोंके बिखरनेमें समय लगता है। सृष्टिके और प्रलयके सब कार्य जिस समयमें हों, उस समयको ब्रह्माण्डकी आयु कह सकते हैं और वह ब्रह्माण्डकी आयुका काल श्रीजगदम्बाकी एक त्रुटि समझी जा सकती है। *

श्रीमार्कण्डेय आदि पुराणोंमें १४ मन्वन्तरोंका संक्षिप्त वर्णन है और यह भी स्पष्ट वर्णन है कि ७१ महायुगोंका एक मन्वन्तर होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें देवराज इन्द्रपदधारी देवता भी कालराज मनुके साथ ही बदल जाते हैं। उस समय भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक—तीनोंके बड़े-बड़े पदधारी

  • (१) चतुर्युगसहस्राणि दिन पैतामहं भवेत् । पितामहसहस्राणि विष्णोश्च घटिका मता ॥ विष्णोर्द्वादशसहस्राणि कलार्धं रौद्रमुच्यते । (देवीमीमांसा भाष्य, उत्पत्तिपादसूत्र ४) (२) चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । पितामहसहस्राणि विष्णोरेका घटी मता ॥ विष्णोर्द्वादशसहस्राणि निमेषार्धं महेशितु । दश कोट्यो महेशानां श्रीमातुस्त्रुटिरूपका ॥ ( शक्तिरहस्य )

सब देवता बदल जाते हैं । कर्मके चालक देवता, ज्ञानके चालक ऋषि और स्थूल शरीर आदिके सञ्चालक पितृगण, जो तीनों ही तीन श्रेणीके देवता हैं, इनके जितने बड़े-बड़े पदधारी हैं, वे सब प्रत्येक मन्वन्तरमें बदल जाया करते हैं ! इस कारण भूः, भुवः, स्वः—इन तीनों लोकोंकी शृङ्खला और सभ्यता आदिमें बड़ा अन्तर पड़ जाता है। प्रत्येक मन्वन्तरमे जो परिवर्तन होता है, वह भूः, भुवः, स्व.रूपी त्रिलोकमें होता है। मन्वन्तरमें कभी पूरा प्रलय नहीं होता, खण्ड-प्रलय होता है और देवपदधारी तो अवश्य ही बदल जाते हैं। ये सब बातें प्राचीन आर्योंके वेद और शास्त्रोंसे भलीभाँति प्रमाणित हैं। इन सब कालके विभागोंकी संख्याके देखनेपर दैवीजगत्के माननेवाले विद्वान् तो आनन्दित होते ही हैं, किंतु जो दैवीजगत्पर आस्था न भी रखते हों, वे विद्वान् भी प्राचीन आर्योंके कालके सम्बन्धके इन हिसाबोंको देखकर चकित हुए बिना न रहेंगे। उपनिषदोंके देश-काल-ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शास्त्रोक्त दो मतोंका जानना परमावश्यक है। एक 'योगी-मत' और दूसरा 'वैष्णव-मत ।' योगी-मतमें—एक अद्वितीय ब्रह्मसे ब्रह्माण्डकी सृष्टि होती है और पुनः उसीमे ब्रह्माण्डका लय हो जाता है। यह मत अद्वैतवादका पोषक है। दूसरा मत वैष्णव-मत कहलाता है। उसके अनुसार सृष्टि प्रवाह- रूपसे अनादि अनन्तरूप है । ब्रह्माण्ड कितने हैं, इसकी गणना कोई नहीं कर सकता । ऐसे अगणित ब्रह्माण्डोंके बीचमे एक गोलोक-धामका होना यह मत मानता है। उस गोलोकधाममें अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक श्रीकृष्णचन्द्र विराजते हैं और वहाँ रास-महोत्सवका निरन्तर होना माना जाता है । वे यह भी मानते हैं कि पूर्णावतार श्रीकृष्णने भक्तोंके ऊपर कृपा करके इस महारास-महोत्सवका नमूना व्रजगोपिकाओंको दिखाया था । ऐसे दूसरे मतवाले जब अनादि अनन्त सृष्टि प्रवाहको मानते हैं तो स्वतः ही अद्वैत- वादियोंकी तरह वे मुक्ति नहीं मानते हैं। उपनिषदोंमें अधिकतर पहले मतका ओर कहीं-कहीं दूसरे मतका आभास मिलता है।

जब कोई ब्रह्माण्ड प्रथम उत्पन्न होता है, तब उस ब्रह्माण्डके परमाणुपुञ्ज प्रकृति माताकी आकर्षणशक्तिके अनुसार एकत्रित होकर जीववासोपयोगी स्थूल या सूक्ष्म लोकोंको उत्पन्न करते हैं । उस समय एक ब्रह्माण्डके अधिष्ठाता भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और भगवान् शिवका आविर्भाव नहीं रहता है। उस समय चाहे देवलोकसमूह हों अथवा हमारा मृत्यु- लोक हो, इन सबका केवल गोलक बनता है । इसी दशाको प्राकृतिक सृष्टि कहते हैं। क्योकि ये सब ब्रह्मप्रकृति त्रिगुण- मयी जगदम्बाके स्वाभाविक नियमके अनुसार ब्रह्माण्ड-गोलक-