कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंबन जाते हैं। उस समय उनमें जीवोंका वास नहीं रहता। इस विषयमें पूज्यपाद प्राचीन ऋषिगण और आजकलके पदार्थविद्या (साइन्स) के विद्वज्जन दोनों एकमत हैं। पदार्थ विद्यासेवी (साइन्टिस्ट) भी साधारणतः यही कहते हैं कि हमारी पृथिवी पहले जीववासोपयोगी नहीं थी। इसी जीववासोपयोगी बननेसे पहलेकी अवस्थाका नाम 'प्राकृतिक सृष्टि' है। उसके अनन्तर सर्वशक्तिमान् भगवान्की इच्छासे जब ब्रह्मा विष्णु महेशरूपी त्रिमूर्तिका आविर्भाव होता है और भगवान् ब्रह्मा अपनी इच्छाशक्तिसे जीव-सृष्टिका प्रारम्भ करते हैं और देवसृष्टि प्रारम्भ हो जाती है, उसीको 'ब्राह्मी सृष्टि' कहते हैं। उसके अनन्तर प्रजापतिगण उत्पन्न होकर विस्तृत सृष्टि- को केवल अपनी मानसशक्तिसे उत्पन्न करते हैं, वही 'मानस- सृष्टि' कहाती है। यह सृष्टि भी देवताओंकी ओरसे ही होती है। उसके अनन्तर स्त्री पुरुषके संयोगसे जो सृष्टि होती है, वह 'वैजी-सृष्टि' है। यही चार प्रकारका सृष्टिप्रकरण है, जो प्राचीन वेद और शास्त्रोंमे पाया जाता है। वेदके मन्त्रभाग और ब्राह्मणभागके सब मन्त्रोंमें यद्यपि त्रिभावात्मक तीन प्रकारके प्रयोग हो सकते हैं, परन्तु उपनिषदों- में, जो वेदके ज्ञानकाण्डके प्रकाशक हैं, इन तीन भावोंका अद्भुत रहस्य प्रकाशित है। बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंके पाठक इसको अच्छी तरह समझ सकते हैं। यद्यपि इस समय केवल १०८ के लगभग उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं। शेष सहस्राधिक लुप्त हो गये हैं तो भी जो उपनिषद्-ग्रन्थ मिलते हैं, वे परमानन्दप्रद हैं। पञ्चम वेदरूपी महाभारतकी श्रीमद्भगवद्- गीताके पाठ करनेसे भावुक भक्त यह समझ सकते हैं कि वह जिन उपनिषदोंका सार कही जाती है, उनकी ज्ञान- गरिमा कैसी है। उपनिषदोंके द्वारा काल ज्ञान, चतुर्दशभुवन- रूपी देश-ज्ञान, दैवी जगत्का विस्तृत ज्ञान, देवपदधारियोंका ज्ञान, सब वैदिक दर्शनोंका ज्ञान और कर्मका ज्ञान, जो कर्म ब्रह्मके सचिदानन्दभावके त्यागका कारण होता है, उसका रहस्य तथा अन्तिम वैदिक मीमांसाका सिद्धान्त, यथा- जगत् ही ब्रह्म है, ब्रह्म ही जगत् है, जीव ही ब्रह्म है इत्यादि आध्यात्मिक रहस्यपूर्ण सभी सिद्धान्त मिलते हैं और वैदिक उपनिषदोंमे सब प्रकारके ज्ञानका बीज कैसे पाया जाता है। इसका दिग्दर्शन श्रीमद्भगवद्गीता कराती है, जिसके महत्त्व- के विषयमे सारा संसार एकमत है। यही उपनिषत्तत्त्व है।
औपनिषद-सिद्धान्त
(श्रीश्रीस्वामीजी श्रीविशुद्धानन्दजी परिव्राजक)
विश्वके समस्त मानव समाजको नव चेतना देकर आत्यन्तिक शान्ति प्रदान करनेका श्रेय हमारे औपनिषद- सिद्धान्तको है। उपनिषदें साक्षात् कामधेनु हैं। ब्रह्मसूत्रोंकी रचना इन्हींके आधारपर हुई है तथा श्रीमद्भगवद्गीता भी गोपालनन्दनद्वारा दोहन किया हुआ इन्हीका परममधुर दुग्धा- मृत है। भारतवर्षके जितने भी आस्तिक सम्प्रदाय हैं, सबके आधार ये ही तीन ग्रन्थरत्न हैं, जो 'प्रस्थानत्रयी'के नामसे प्रख्यात हैं। सभी सम्प्रदायों—अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, द्वैत और शिवाद्यैतादिकी आधारभूता प्रस्थानत्रयी है। इस प्रस्थानत्रयीके आधारपर ही सभी सम्प्रदायाचार्योंने अपने अपने विचारानुसार विवेचनात्मक व्याख्या करके परम सत्यका अन्वेषण किया है। उपनिषदोंका प्रादुर्भाव वेदके अत्युच्च शीर्षस्थानीय भाग- से हुआ है, जिन्हें प्रायः वेदान्त, ब्रह्मविद्या या आम्नाय- मस्तक कहते हैं। वस्तुतः उपनिषद् ही ब्रह्मविद्याके आदि- स्रोत हैं। उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूपमें विकसित हुई ज्ञान-गङ्गा जीवोंके पाप तापको शमन करती है। जिनके मन्त्रोंके पाठमात्रसे ही हृदय एक अपूर्व मस्तीका अनुभव करने लगता है, उन उपनिषदोंकी महिमा वर्णन करना सूर्यको दीपक दिखानेके समान है। हमारा उपनिषत्- सिद्धान्त ब्रह्मविद्याके जिज्ञासुओंको आत्मज्ञ होनेका आदेश देता है, न कि अशेषविद्या-महार्णवसम्पन केवल शास्त्रज्ञ होनेका ! क्योंकि केवल शास्त्रज्ञ होनेसे संसृतिचक्ररूप शोक- समुद्रको पार नहीं किया जा सकता, इसके लिये तो अनुभव- युक्त आत्मवेत्ता होनेकी ही आवश्यकता है। इसीलिये उपनिषदोंमें अनेक आख्यायिकाओंद्वारा सृष्टि प्रपञ्चका निरसन करके जिज्ञासुओंकी बुद्धिमें अभेद-ज्ञान स्थिर करनेके लिये 'एकमेवाद्वितीयम्' 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'उदरमन्तरं कुरुते, अथ तस्य भयं भवति' आदि अनेक श्रुतियोंसे अभेददर्शीकी प्रशंसा और भेददर्शीकी भर्त्सना की गयी है। अद्वैत वेदान्त प्रक्रियानुसार जीव अविद्याकी तीन शक्तियों 'मल, विक्षेप और आवरण' से आवृत है। इनमें मल—