भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 832 में से

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पृष्ठ 73
  • औपनिषद्-सिद्धान्त * ५९

अन्तःकरणके मलिन सस्कारजनित दोषोंकी निवृत्ति निष्काम- कर्मसे होती है, विक्षेप (चित्तचाञ्चल्य ) का नाश उपासनासे होता है और आवरण (स्वरूप-विस्मृति) का नाश तत्त्वज्ञान- -से होता है, अर्थात् चित्तके इन त्रिविध दोषोंके लिये उपनिषदोंमें अलग-अलग ओषधियाँ बतायी गयी हैं, जिनसे -तीन ही प्रकारकी गतियाँ होती हैं। सकामकर्मी लोग धूममार्ग- -से स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म लेते हैं और निष्कामकर्मी उपासक अर्चिरादिमार्ग- -से अपने उपास्यदेवके लोकमें जाकर अधिकारानुसार 'सालोक्य, -सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य' मुक्तिविशेष प्राप्त करते हैं। इन दोनों सकाम और निष्कामकर्मियोंसे भिन्न जो तत्त्वज्ञानी होते हैं, उनके प्राणोंका उत्क्रमण—लोकान्तरगमन नहीं होता अर्थात् उनके शरीर अपने-अपने तत्त्वोंमें लीन हो जानेसे उन्हें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है । अस्तु; इस प्रकार हमारे अनादि उपनिषद् उस परब्रह्म- के स्वरूपका विशद और स्फुट निरूपण कर हमारी हृदय- भूमिको इस योग्य बनाते हैं कि जिससे उसमें तत्त्वज्ञानरूप अङ्कुर शीघ्र ही प्रस्फुटित हो जाय एवं किसी भी कल्याण- कारिणी विद्याको ग्रहण करनेकेलिये मनुष्यको कितने मत्य, तप, -सेवा, त्याग, श्रद्धा और विनय आदिकी आवश्यकता है— यह बात उपनिषदोंकी कई आख्यायिकाओंद्वारा प्रदर्शित की गयी है। इतना ही नहीं, बल्कि ब्रह्मविद्यकी अभय-प्राप्ति -निरूपणके साथ-साथ ब्रह्मके सर्वान्तर्यामित्व और सर्वनाम रूपत्व- का वर्णन करते हुए ब्रह्मवेत्ताके आनन्दकी सर्वोत्कृष्टता अनेक स्थलोंमें दिखलायी गयी है । तात्पर्य यह है कि प्रधानतया उपनिषदोंका लक्ष्य ब्रह्मविद्या-उपलब्धिकी ही ओर है, इसीलिये तत्त्वज्ञान एव तदुपयोगी कर्म और उपासनाओंका विशद तथा विस्तृत वर्णन किया गया है। ब्रह्मविद्याके प्रसादसे समत्वदर्शन होता है । अज्ञानकी ग्रन्थियोंका भेदन होकर समस्त सशयोंका विघात हो जाता है एव कर्मचाञ्चल्य सुसयत होकर चित्त अन्तर्मुखी हो जाता है । ब्रह्मविद्यासे ही मिथ्यानुभूतिका नाश होकर स्वयंप्रकाश अवाङ्मनसगोचर चेतनानन्दघनैकघन विज्ञानस्वरूप परब्रह्म- का साक्षात्कार होता है। ब्रह्मविद्यारूप अमृतपानका अकथनीय महत्त्व है, जिसने इस अमृततत्त्वका पान किया, वह निहाल हो गया; उसे फिर न कुछ कर्तव्य है, न प्राप्तव्य । ब्रह्मवेत्ता- की दृष्टिमें सारे प्रपञ्च प्रसारका विलय होकर सच्चिदानन्द- स्वरूप हो जाता है, उसे असत् जड और दुःखरूप प्रतीत नहीं होता । उसकी दृष्टिमें तो द्रष्टा, दृश्य और दर्शन- रूप त्रिपुटीका भी विलय हो जाता है, वह एक निश्चल, निर्बाध, निष्कल और चिदानन्दघन-सत्तामात्र रह जाता है । उसके द्वारा जो भी आदर्श कार्य होते हे, वे अन्य लोगोंकी दृष्टिमे ही होते हैं । ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमे तो न कोई कार्य है और न कोई करनेवाला ही । क्योंकि तत्त्वदर्शी लोगोको जल और वीचिमे अन्तर नहीं दीखता । वह भिन्नत्व तो बाह्यदर्शी लोगों- की दृष्टिमे ही प्रतीत होता है, जिससे प्रेरित होकर वे कहते हैं कि जलमे तरङ्गे उठती हैं, किंतु जलने उन तरङ्ग-वीचियोंको कब देखकर उनकी गणना की है? कहनेका तात्पर्य यह है कि 'एक अखण्ड चिद्घन वस्तुको छोड़कर उत्पत्ति, प्रलय, बद्ध, साधक, मुमुक्षु और मुक्त आदि किसी भी प्रकारका व्यवहार ही नहीं है।' ब्रह्मतत्त्व अत्यन्त ही दुर्दर्श है, क्योंकि निरन्तर व्यवहारमें ही रत रहनेवाले विषयी जीवोंकी दृष्टि इस व्यवहारातीत लभ्यतक पहुँचना अत्यन्त कठिन है । जिन वेदके पारगामी मुनिजनोंके राग, द्वेष, लोभ, भय और क्रोधादि विकार श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुकी कृपासे सर्वथा निवृत्त हो गये हैं, उन्हींको इस प्रपञ्चातीत अद्वयपदका बोध होता है । इस विशुद्ध तत्त्वका बोध हो जानेपर वह महात्मा सर्वथा निर्द्वन्द्व और निर्भय हो जाता है एव स्तुति, नमस्कार और स्वधाकारादि कर्मश्रेणीसे ऊपर उठकर यदृच्छा- लाभ-सन्तुष्ट हो जाता है । फिर बाहर-भीतर—सर्वत्र एक आत्म- तत्त्वको ओतप्रोत देख उसीमें रमण करता हुआ कभी तत्त्व- च्युत नही होता । यही बोधस्थिति है, इसीके लिये जिज्ञासुओं- का सारा प्रयत्न होता है और इसी स्थितिको प्राप्त होनेपर प्राणी कृतकृत्य होता है । कहनेका तात्पर्य यह है कि 'औपनिषद दर्शन ही सम्यग्दर्शन है, जिसके प्रसादसे भव- भयका निरसन होकर आत्यन्तिक आनन्दकी प्राप्ति होती है।' इस विशुद्ध दृष्टिको प्राप्त कर लेना हीं मनुष्य जीवनका परम उद्देश्य है। एव गहनतामे अनुप्रविष्ट हुए इस औपनिषद-सिद्धान्त- को प्राप्त किये बिना जीवन व्यर्थ है । इसे प्राप्त न करना ही सबसे बड़ी हानि है । अतः इस प्रस्तुत उपनिषद्-अङ्कसे इस दृष्टिको पानेके लिये प्रत्येक कल्याणकामी पाठकको प्राणपणसे प्रयत्न करना चाहिये, जिससे वह उपनिषद्के महान् और गूढतम सिद्धान्तको धारण करनेकी क्षमता प्राप्त कर सके ।

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