भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

उपनिषत्तत्त्व ( लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा ) सर्ववेदान्तप्रतिपाद्य परब्रह्म ही उपनिषदोंका चरम तत्त्व है, किंतु इस तत्त्वको हृदयङ्गम करना अत्यन्त दुरूह है । विना अधिकारीके तत्त्वका साक्षात्कार भी नहीं होता । इसीलिये उपनिषदोंमे सर्वत्र ही अधिकारकी चर्चा आयी है । यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्था प्रकाशन्ते महात्मन ॥ 'आचार्यवान् पुरुषो वेद', 'नावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्', 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम्' तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञान ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ —आदि उपनिषन्मन्त्रों एव गीताके शब्दोंमें तत्त्वज्ञान- प्राप्तिके लिये अधिकारीके निमित्त गुरुपसदनादि कुछ विशिष्ट नियम भी बतलाये गये हैं । श्रीमद्भागवतमे बतलाया गया है कि वेदान्तके श्रवण-मननादिसे तथा भगवान्के गुणोंके वार-वार श्रवण करनेसे भगवद्ध्यानादिके द्वारा कामादि दोषों- का शीघ्र ही उपगमन होता है । इस तरह इन अमङ्गल- जनक वस्तुओंके नष्टप्राय हो जानेपर श्रेष्ठ पुरुषोंकी नित्य सङ्गति प्राप्त करनेसे भगवान्में नैष्ठिकी भक्ति उत्पन्न होती है। ऐसी परिस्थितिमें कामादि दोषोंके शान्त पड़ जानेपर निर्विक्ष चित्तमे केवल सत्त्वगुणकी स्थिति होती है, और चित्त प्रसन्नताको प्राप्त होता है। इस तरह मुक्तात्मा प्रसन्नमन पुरुषके हृदयमें भगवद्भक्तिके योगसे भगवत्तत्त्वका विज्ञान उदय होता है— शृण्वता स्वकथा कृष्ण पुण्यश्रवणकीर्तन । हृद्यन्तस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्य भागवतसेवया । भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥ तदा रजस्तमोभावा कामलोभादयश्च ये । चेत एतैरनाविद्ध स्थित सत्त्वे प्रसीदति ॥ एव प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगत । भगवत्तत्त्वविज्ञान मुक्तसङ्गस्य जायते ॥ ( श्रीमद्भा० १ । २ । १७–२० ) तत्त्वज्ञानकी फलश्रुतिमें कहा गया है कि आत्मामें ही ईश्वरके दर्शन होनेपर हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे संशय विलीन हो जाते हैं और सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं— भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ ( श्रीमद्भा० १ । २ । २१ ) 'यही बात कुछ अन्तरम मुण्डकोपनिषद्के द्वितीय खण्डमे कही गयी है । 'तत्त्वं किम्'—तत्त्व क्या है—इस जिज्ञासा मे यदि उपनिषदों- का आलोडन या श्रवण मनन किया जाय तो 'यहाँ ब्रह्मके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है' 'यथार्थतः वह ब्रह्म ही सत्य है' और 'एकमात्र वही है' यही तत्त्व उपलब्ध होता है। 'ईशावास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्या जगत्', 'यस्मि- न्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोह कः शोक एकत्वमनुपश्यत', 'ऐतदात्म्यमिद सर्वम् 'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो', 'ओमित्येतदक्षरमिद सर्वं तस्योपव्या- ख्यानम्', 'सर्वं ह्येतद्ब्रह्म अयमात्मा ब्रह्म' 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' 'नेह नानास्ति किञ्चन', 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति', 'एको देव सर्वभूतेषु गूढ', 'द्वितीयाद्वै भय भवति' —आदि श्रुतियाँ इस तत्त्वको स्पष्ट प्रतिपादित करती हैं । और— 'वासुदेव सर्वमिदम्', 'समं पश्यन्हि सर्वत्र', 'यो मां पश्यति सर्वत्र' 'सकलमिदमह च वासुदेव', 'एक स आत्मा पुरुष पुराण', 'सरित्समुद्राश्च हरे शरीरम्' सर्वभूतेषु य पश्येद्भगवद्भावमात्मन । भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ —आदि वचनोंसे अन्यत्र भी यही कहा गया है। कुछ लोग— 'ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशौ' 'क्षरं प्रधानममृताक्षर हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः', 'अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णा बह्वी प्रजा जनयन्ती सरूपाम् ।' —आदि श्रुतियोको सिद्धान्त मान बैठते है, किंतु यों सिद्धान्ततः तत्त्वनिरूपणकी बात नहीं है । ऐसे तो उपनिषदोंमें नचिकेता, यमराज, जनक, याज्ञवल्क्य आदि कितनोंके नाम आये हैं, पर किसीका नाम आ जानेसे किन्हीं शब्दोंकी