भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

[उपनिषत्तत्त्व]

उपनिषत्तत्त्व ६१


[बायाँ स्तम्भ]

पुनरुक्तियों मिल जानेसे उन्हें ही तत्त्व नहीं कहा जा सकता । यही कारण है कि विशिष्टाद्वैतसम्प्रदायाग्रणी भगवान् श्रीरामानन्दाचार्यने भी श्रीसुरसुरानन्दजीके 'तत्त्व किम्' इस प्रश्नके उत्तरमें —

विश्वं जात यतोऽद्या यदञ्चितमखिल लीनमप्यस्ति यस्मिन् सूर्यो यत्तेजसेन्दु सकलमविरत भामयत्येतदेष । यद्धीत्या वाति वातोऽवनिरपि सुतल याति नैवेश्वरो ञ्च साक्षी कूटस्थ एको बहुशुभगुणवानन्वयो विश्वभर्ता ॥

इस प्रकार ही तत्त्वका निरूपण किया है । इस श्लोकमें स्पष्ट है कि—

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । ( तैत्ति० ३ । १ । १)

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । ( श्वेता० ६ । १४ )

यदादित्यगत तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ ( गी० १५ । १० )

तथा—

भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषास्मा- दग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । ( तैत्ति० २ । ८ । १ )

'एवं य. सर्वज्ञ स सर्ववित्' —आदि मन्त्रोका ही भाव व्यक्त किया गया है ।

इसपर आजकलके कुछ उपनिषद्चिन्तन करनेवाले वेदान्तियोंका कथन है कि श्रीरामानन्दाचार्य आदि विद्वानोंने तो इन लक्षणोंको श्रीरामचन्द्रादिमें घटाया है, किंतु वह ब्रह्म तो अवतार नहीं लेता, क्योंकि वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्याप्त है, सर्वदेशीय है—

'ईश्वरो नावतरति व्यापकत्वाद् आकाशवत्'

इस अनुमानसे ईश्वरका अवतार बाधित होता है, किंतु न तो यह अनुमान ही सही है न इसका दृष्टान्त ही, क्योंकि आकाश भी वायुरूपमे अवतीर्ण होता है एव पुनरपि उसका तेज, जल और पृथ्वीरूपमें अवतरण होता है । सर्वोपनिषदूपी गौओंके दोग्धा श्रीगोपालनन्दनका कथन है कि 'मै अज, अव्ययात्मा एव सभी भूतोंका ईश्वर होता हुआ भी आत्ममायासे अवतीर्ण होता हूँ'—

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥ ( गीता ४ । ६ )

यह बात अवश्य है कि भगवान्‌का आत्ममायामय


[दायाँ स्तम्भ]

शरीर तथा जन्म-कर्म साधारण देहधारियोकी भाँति नहीं होता । श्रीमद्भागवतमे तभी तो भगवान्‌के सभी स्वरूपोंको मायातीत, अनन्य सच्चिदानन्दरूप, अतुल माहात्म्ययुक्त तथा सर्वथा अस्पृष्ट कहा गया है—

सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तय । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषदृशाम् ॥ ( श्रीमद्भा० १० । १३ । ५४ )

तभी तो जब विदेहराज श्रीजनकने भगवान् श्रीरामचन्द्रके स्वरूपका प्रथम बार दर्शन किया तो इनका सारा ब्रह्मज्ञान एवं वैराग्य हवा हो गया—

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय वेष धरि की सोइ आवा ॥ सहज विरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सति भाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥ इन्हहि विलोकत अति अनुरागा । बरवस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥

—इत्यादि उद्गार उनके मुखसे हठात् निकल पड़े । यह दशा उनकी कई बार हुई । वनवासके समय भगवान् श्रीरामचन्द्रसे मिलकर तो इनकी दशा देखते ही बनती थी । गोस्वामीजी विभोर होकर लिखते है—

जासु ग्यान रवि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल विकासा ॥ तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बडाई ॥ बिषई साधक सिद्ध समाने । त्रिविध जीव जग बेद बखाने ॥ राम सनेह सरस मन जासू । साधु सर्मा बड आदर तासू ॥ सोह न राम प्रेम बिनु ग्यानू । करनवार बिनु जिमि जलजानू ॥

यही बात भागवतमें भी—

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जित न शोभते ज्ञानमल निरञ्जनम् । ( श्रीमद्भा० १ । ५ । १२

—आदि श्लोकोंमे दर्शायी गयी है ।

इसपर कुछ लोग—

मायाख्याया कामधेनोर्जीवेशौ वत्सकावुभौ । यथेच्छ पिवता द्वैत तत्त्व त्वद्वैतमेव हि ॥

( माया नामकी कामधेनुके जीव, ईश्वर दोनो बछड़े हैं । यथेच्छ द्वैतको दोनों ही पी लें, पर तत्त्व तो अद्वैत ही है ।)

इत्यादि वचनोंको पढकर भगवान्‌के सगुण स्वरूपसे घृणा करने लग जाते है, पर उन्हे समझ रखना चाहिये कि द्वैत तभीतक मोहजनक होता है, जबतक ज्ञान नही होता । जब विचारद्वारा बोधकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय भक्तिके लिये कल्पना किया गया द्वैत तो अद्वैतकी अपेक्षा भी सुन्दर