भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * है । यदि पारमार्थिक अद्वैत-बुद्धि रहते हुए भजनके लिये द्वैत-बुद्धि रक्खी जाय तो ऐसी भक्ति सैकड़ो मुक्तियोंसे भी बढ़कर है— द्वैतं मोहाय बोधात्प्राग् जाते बोधे मनीषया । भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं भजनहेतवे । तादृशी यदि भक्तिःस्यात्तु मुक्तिश्शताधिका ॥ कुछ लोगोंका कहना है कि मधुसूदन स्वामीने माना है कि अवतार नहीं होता, किंतु भक्तकी भावनासे विधुर- परिभावित कामिनी-साक्षात्कारके समान श्रीकृष्ण आदिका स्वरूप दिखलायी पड़ता है, किंतु यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि गीता ( ४ । ६ ) की टीकाम उन्होंने भगवदवतारको बहुत प्रयत्नसे सिद्ध किया है और— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् । जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम् । यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥ —आदि भागवतके श्लोकोंको सादर प्रमाणरूपसे उपन्यस्त किया है । इतना ही क्यों ? तत्त्वविषयक प्रश्नपर तो वे स्पष्ट कहते हैं कि मैं श्रीकृष्णसे बढ़कर और किसी तत्त्वको नहीं जानता— वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरमुख्खदरविन्दनेत्राद् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥ अधिक क्या, अद्वैतसम्प्रदायाग्रगण्य भगवान् शङ्कर भी कहते हैं कि जिसने ब्रह्माको अद्भुत, अनन्त ब्रह्माण्ड दिखलाये, वत्सोंसहित सभी गोपोंको विष्णुरूपमें दिखलाया, भगवान् शङ्कर जिनके चरणावनेजन-जलको अपने मस्तकपर धारण करते हैं, वे श्रीकृष्ण तो ब्रह्मा, विष्णु, शिव—इन तीनोसे परे कोई अविकृत चिदानन्दघन ही हैं— ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान् प्रत्यण्डमप्यद्भुतान् गोपान्वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णून्दशांश्च यः । शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रयात्- कृष्णोऽद्य पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा ॥ आनन्दसे विभोर होकर एक गोपी अपनी सखीसे कहती है कि 'ऐ सखि ! सुन, मैने श्रीनन्दके आँगनमें एक विचित्र कौतुक देखा है।' सखी पूछती है कि 'वह क्या ?' भगवद्दर्शनके आनन्दसे आह्लादित हुई गोपिका उत्तर देती है कि—'सकल- वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्म वहाँ गोधूलिसे सना हुआ नृत्य कर रहा है— शृणु सखि कौतुकमेकं नन्दनिकेताङ्गने मया दृष्टम् । गोधूलिधूसराङ्गो नृत्यति वेदान्तसिद्धान्तः ॥ इसी प्रकार एक अन्य प्रेममग्न भक्तके हृदयोद्गार हैं । वह कहता है— वृन्दारण्यनिविष्टं चिलुठितमाभीरधीरनारीभिः । सत्यचिदानन्दघनं ब्रह्म नराकारमालम्बे ॥ मैं वृन्दावनमे प्रविष्ट परम बुद्धिमती आभीर- नारियोंके सङ्गमे लुंठित नराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका अवलम्बन लेता हूँ—शरण ग्रहण करता हूँ । जब ऐसी बात है तभी तो श्रीब्रह्माजी भी कहते हैं कि व्रजमें कीटादि होकर भी जन्म ग्रहण करना बड़े भाग्यकी बात है, क्योंकि उस श्रीचरणकमलकी रज, जिसे सर्वदा श्रुतियाँ ढूँढती हैं, यहाँ सहज ही उपलब्ध होती है— तद्भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद्गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम् । यज्जीवितं तु निखिलं भगवान्मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव ॥ ( श्रीमद्भा० १० । १४ । ३४ ) यहाँ 'अद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव' यह पद ध्यान देने योग्य है । ब्रह्माजीका तात्पर्य है यहाँ श्रुतिरूपा गोपियोंसे । वे अब इस बातको समझ चुके हैं कि श्रुतिप्रतिपाद्य यह ब्रह्म ही यहाँ ब्रजमे अवतीर्ण हुआ है, और इसकी प्रतिपादिका श्रुतियाँ भी यहाँ गोपिकारूपमे अवतरित हुई हैं । 'सर्वे वै देवताप्रायाः' यह प्रसिद्ध है । इस विषयमे उपनिषदोंका ही प्रमाण देखनेयोग्य है । उपनिषदे कहती हैं कि 'एक बार श्रीरामचन्द्रजी ऋषि- मुनियोंके दर्शनार्थ जङ्गलमें गये । महाविष्णु, सच्चिदानन्द- लक्षण सर्वाङ्गसुन्दर भगवान् श्रीरामचन्द्रको देखकर सभी वनवासी मुनि विस्मित हो गये । उन ऋषियोंने उनके शरीर- स्पर्शकी कामना प्रकट की । भगवान्ने अन्यावतारमे उनकी इच्छा पूर्ण करनेका वचन दिया— श्रीमहानिष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं होचुर्नोऽवद्यमवतारात्त्वं गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति ॥ उन सभी देवताओं तथा ऋषियोंकी प्रार्थना स्वीकृत