भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 832 में से

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पृष्ठ 68

५४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * में, विद्वानोंके पारस्परिक प्रश्नोत्तरके रूपमे तथा उपदेशरूपमे प्राप्त होती हैं, उन सबका उद्देश्य है ब्रह्मविद्याकी सर्व- श्रेष्ठता तथा सर्वापेक्षा अधिक उपादेयताका प्रतिपादन करना । अनित्य वस्तुओंकी ओरसे पुरुषोंमें वैराग्य उत्पादन कर ब्रह्मविद्याकी ओर स्वतः उन्हें उन्मुख करना उनका लक्ष्य है। अतएव वे आख्यायिकाएँ सत्य हैं या असत्य—इस बातका अधिक आग्रह नहीं करना चाहिये । इसीलिये भिन्न भिन्न स्थलोंपर कहते हैं— आख्यायिका तु विद्याग्रहणविधिप्रदर्शनाय विधिसुत्यर्था च राजसेवितं पानीयमितिवत् । तथा— विद्याप्राप्त्युपायप्रदर्शनार्थैवाख्यायिका । आख्यायिका तो विद्याग्रहणकी विधि प्रदर्शित करनेके लिये तथा विधिकी प्रशंसा करनेके लिये है। जैसे किसी जलको श्रेष्ठ बतानेके लिये यह कह दिया जाय कि यहाँका पानी तो राजा भी ग्रहण कर चुके हैं। इसके सिवा, विद्याकी प्राप्तिका उपाय क्या है यह दिखलानेके लिये भी आख्यायिका दी जाती है। इसी प्रकार उन उपनिषदोंमें पञ्चाग्नि-विद्या, दहर-विद्या, संवर्ग विद्या, प्राणाग्निहोत्र विद्या आदि विद्याओंमें तथा मनुष्य- से लेकर ब्रह्मतक आनन्दके तारतम्यका निर्देश, प्राण आदिकी श्रेष्ठता और कनिष्ठताका कथन, जीवकी विश्व तैजस प्राज्ञ इन तीन अवस्थाओंका निरूपण करना और गुरु-शिष्योके वंश-वर्णन आदि विषयोंमे भी वही दृष्टि रखनी चाहिये । सर्वदा अनादि अविद्याके विलासमे विकसित तथा क्रिया, कारक और फलादिरूपसे भासित होनेवाले इस मिथ्या प्रपञ्चको विद्याके द्वारा तिरोहित करके नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सच्चिदानन्दैकरस अद्वैत ब्रह्मके रूपमे अवस्थित होना ही परम पुरुषार्थ है, उसकी प्राप्तिमे ही पुरुषकी कृतकृत्यता है—इसके प्रतिपादनके लिये ही उपनिषदें प्रवृत्त होती हैं, यही निगूढ रहस्य-तत्त्व उपनिषदोंमे वर्णित है। इस प्रकार उनमे सब कुछ उत्तम ही-उत्तम है। ब्रह्मविद्या ( ले०— श्रीमज्जगद्गुरु श्रीरामानुजसम्प्रदायाचार्य आचार्यपीठाधिपति श्रीराघवाचार्यजी स्वामी महाराज ) अनन्त अपौरुषेय वेदवाङ्मयका ज्ञानकाण्ड है वह उपनिषत्साहित्य, जिसके बलपर अध्यात्मवादियोंने घोषणा की थी— तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये । कर्म वह है जो बन्धनके लिये न हो और विद्या वह है जो बन्धनसे मुक्त कर दे। ऋषियोंने इसी विद्याके प्रकाशमें अनन्त सच्चिदानन्द परब्रह्मका साक्षात्कार किया, कराया और इस विद्याको ब्रह्मविद्या कहकर परमतत्त्व ( ब्रह्म ) के साथ रहनेवाले उसके सम्बन्धको भी स्पष्ट कर दिया । प्रतिपादनपद्धति, विशेष ज्ञातव्य, परम्परा, आदिके भेदसे उसके अनेक रूप स्वाभाविक थे, जो विविध उपनिषदोंमें तथा एक ही उपनिषद्के विविध भागोंमे परिगृहीत होकर साधुकोंके लिये प्रत्यक्ष भी हुए, तथापि ब्रह्मविद्याके इन विविध रूपोंके अन्तस्तलमें रहनेवाली स्वरूपगत एकता मिट न सकी, प्रत्युत सुस्थिर बनी रही। इसका श्रेय था मीमांसाकी उस पद्धतिके लिये, जिसने इन सभी ब्रह्मविद्याओंका—ब्रह्मविद्याके विविध रूपोंका समन्वय किया था। इसी पद्धतिका आश्रय लेकर ब्रह्मसूत्रकारने प्रमुख मानी जानेवाली बत्तीस ब्रह्मविद्याओं- की चर्चा की और उनके सामरस्यका विवेचन किया । विहङ्गम दृष्टिसे अवलोकन करनेपर १—सद्विद्या (छा०), २—आनन्दविद्या (तै०), ३-अन्तरादित्यविद्या (छा०), ४-आकाशविद्या (छा०), ५-प्राणविद्या (छा०), ६-गायत्री-ज्योतिर्विद्या (छा०), ७-इन्द्रप्राण- विद्या (छा० कौ०), ८-शाण्डिल्यविद्या (छा०, बृ० अग्नि- रहस्य), ९-नाचिकेतसविद्या (कठ०), १०-उपकोसल- विद्या (छा०), ११-अन्तर्यामिविद्या (बृ०), १२- अक्षरविद्या (मु०), १३—वैश्वानरविद्या (छा०), १४-भूमविद्या (छा०), १५-गार्ग्यक्षरविद्या (बृ०), १६-प्रणवोपास्य परमपुरुषविद्या (प्र०), १७-दहरविद्या (छा०, बृ०, तै०), १८-अङ्गुष्ठप्रमित विद्या (क०, श्वे०), १९-देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृ०), २०-मधुविद्या (छा०), २१-संवर्गविद्या (छा०), २२-अजाशरीरकविद्या (श्वे०, तै०), २३-बालाकिविद्या (कौ०, बृ०), २४-मैत्रेयीविद्या (बृ०), २५-दृहिंगणब्रह्मादिशरीरकविद्या, २६-पञ्चाग्निविद्या (छा०, बृ०), २७-आदित्यस्याह्नर्नामक विद्या (बृ०), २८-अक्षिस्याहन्नामक विद्या (बृ०), २९-पुरुषविद्या (छा०, तै०), ३०-ईशावास्यविद्या (ई०), ३१-उषस्ति कहोलविद्या (बृ०) और ३२-व्याहृतिशरीरकविद्या—ये बत्तीस विद्याएँ हैं । ये विद्याएँ क्रमशः बताती है कि (१) परब्रह्म अपने

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