भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

ॐ उपनिषद्में ज्ञानकी पराकाष्ठा ॐ ५३ 'तस्माद् बहून् पश्यन्त्या बहुभिर्भाष्यमाणाया अपि पति- व्रताया हृदयं स्वपताविव बहुभिर्वचनैरितस्ततो नीयमाना- नामपि भगवतीनामुपनिषदां नित्यनिरतिशयाखण्डानन्द- चिद्धनरूपामैक्य एव हृदयमवतिष्ठते' इति। 'जिस प्रकार बहुतसे पुरुषोंकी ओर देखती और बहुतोंसे बातें करती रहनेपर भी पतिव्रता स्त्रीका हृदय अपने पतिमें ही लीन रहता है; उसी प्रकार अनेकों वाक्योंद्वारा इधर-उधर लगायी जानेपर भी भगवती उपनिषद्-विद्याका हृदय नित्य, निरतिशय अखण्ड-आनन्द-चिद्धनरूप आत्मैकत्वमें ही स्थित रहता है।' उस प्रकारकी एकात्मरूपमें जो अवस्थिति है, वही मोक्ष है । उसीको ब्रह्मसाक्षात्कार कहते हैं । और वही अपुनरावृत्तिरूप परम पुरुषार्थ है। उसी स्थितिको लक्ष्य करके भगवान् वासुदेवने भी कहा है— सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन ॥ (गीता ६।२९) 'सर्वत्र समदृष्टि रखनेवाला योगयुक्त पुरुष सब भूतोंमें आत्माको और आत्मामें सब भूतोंको देखता है।' और उसी सर्वात्मभावमें स्थित होकर महर्षि वामदेव अपनेको सर्वरूप देखते हैं—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' मैं मनु हो गया और सूर्य हो गया। न केवल एक महर्षि वामदेवको ही ऐसा ज्ञान हुआ, बल्कि अन्य महर्षियों तथा साधारण मनुष्योंमें भी जिसको ऐसा ज्ञान हुआ है, उसने भी अपनी सर्वात्मताका ही दर्शन किया है। आज भी वैसा ज्ञानी पुरुष वैसी ही स्थितिमें आ सकता है। यह बात भगवती श्रुति ही आग्रहपूर्वक कह रही है— तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद सर्वं भवति। (बृहदारण्यक० १।४।१०) "इस समय भी जो इसको इस प्रकार जानता है अर्थात् 'मैं ही ब्रह्म हूँ' ऐसा जो अनुभव करता है वह यह सर्वरूप हो जाता है।' गीताके आचार्य भगवान् श्रीकृष्ण भी कहते हैं— बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता ॥ (गीता ४।१०) 'ज्ञान और तपस्यासे पवित्र हुए बहुतेरे महात्माजन मेरे स्वरूपको प्राप्त हो चुके हैं।' इस प्रकारके आत्मसाक्षात्कारकी प्राप्तिसे ही पूर्वकालमें महर्षिलोग सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करके सन्यास ग्रहण करते थे। यह श्रुति ही कहती है— एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणा पुत्रैषणायाश्च वित्तै- षणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति । (बृहदारण्यक० ३।५।१) तमेतं वै आत्मानं स्वं तत्त्वं विदित्वा ज्ञात्वा अयमहमास्मि परं ब्रह्म सदा सर्वसंसारविनिर्मुक्तं नित्यतृप्तम्' इति। (शाङ्करभाष्य) "शोक-मोह-जरा-मृत्यु-भूख-प्यास आदिसे रहित उस इस आत्माको ही जानकर ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणासे ऊपर उठकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं—भिक्षाजीवी संन्यासी हो जाते हैं उस इस आत्माको—अपने तात्त्विक स्वरूपको सदा संपूर्ण संसार-धर्मोंसे रहित नित्यतृप्त परब्रह्मके रूपमें जानकर 'यह मैं हूँ'—ऐसा समझकर—ऐसा 'तमात्मानं विदित्वा' पर श्रीशङ्कर भगवत्पादका भाष्य है। भगवान् याज्ञवल्क्यने इसी आत्मतत्त्वका उपदेश अपनी पत्नी मैत्रेयीके किया था— स एष नेति नेत्यात्मा, अगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो न हि शीर्यते। असङ्गो न हि सज्यते। तथा— यत्र सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत्-इत्यादि। (बृहदारण्यक० ४।७।१५) 'वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया जानेवाला आत्मा अगृह्य है—ग्रहण नहीं किया जा सकता। अविनाशी है—विनष्ट नहीं हो सकता। असङ्ग है—आसक्तिमे नहीं पड़ सकता।' तथा 'जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ किससे किसको देखे।' इसी आत्मतत्त्वका उपदेश भगवान् वैवस्वत धर्मराजने अपने प्रिय शिष्य नचिकेताको साग्रह आत्मतत्त्वकी जिज्ञासाके उत्तरमें दिया है— सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पद सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ (कठ० १।२।१५) 'सम्पूर्ण वेद जिस पदका प्रतिपादन करते हैं, सारी तपस्याओंको जिसकी प्राप्तिका साधन बताया जाता है, जिसकी इच्छा करते हुए मुमुक्षुजन ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस पदको मैं तुमसे सङ्क्षेपमें कहता हूँ, 'ओम्' यही वह पद है।' अत्यन्त गहन, अत्यन्त दुर्लभ, अतिनिगूढ आत्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेसे ही इन उपनिषदोंको रहस्यात्मक माना गया है तथा उन-उन ग्रन्थोंमें वैसा कहा भी गया है। तात्पर्य यह है कि रहस्यके अर्थमें 'उपनिषद्' शब्दका प्रयोग प्राय. भिन्न-भिन्न उपनिषद्-ग्रन्थोंमें देखा गया है। उपनिषदोंमें नाना प्रकारकी जो अनेकों आख्यायिकाएँ गुरु-शिष्य-संवादरूप-