भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 832 में से

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पृष्ठ 66

५२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *

आनन्दस्वरूप ब्रह्म और आत्माकी एकताका निरूपण करना।' उनमें ध्यानयोग उपासनादि तथा सृष्टिमें अनुप्रवेशादि अन्य विषय भी प्रतिपादित हुए हैं, परंतु उनका मुख्यतः प्रतिपादन नहीं हुआ है, प्रकृत अर्थको अभिव्यञ्जित करनेके लिये ही उनका प्रतिपादन हुआ है। इनका मुख्य प्रयोजन है—भेद- बुद्धिका निवारण करना।

यद्यपि लोकमें एक सौ आठ उपनिषदें प्रचलित हैं और मुक्तिकोपनिषद्में भी वे नाम ले लेकर गिनी गयी हैं तथापि उनमें उपर्युक्त बारह उपनिषदोंकी ही प्रधानता तथा सर्वापादेयता है। इनमें बतलाये हुए अर्थका ही बहुतेरी उपनिषदें अनुवाद करती हैं। दूसरी कुछ उपनिषदें ऐसी भी हैं जो देवता- विशेषका नाम लेकर उसके स्वरूप-माहात्म्यादिका निरूपण करती हैं, परंतु वे समयाचारके प्रतिपादक (साम्प्रदायिक) ग्रन्थोंकी कोटिमें आकर सर्वत्र तथा सर्वजनोंमें आदर नहीं प्राप्त करतीं, परंतु ये द्वादश उपनिषदें साम्प्रदायिक विषयोंमें तनिक भी न पड़कर सबके लिये उपादेय बनती हैं। केवल अखण्डैकरस, निर्गुण, क्रियाकारकसे शून्य, पर, एक, सर्वात्मा, सच्चिदानन्दघनमें परम तात्पर्य रखना ही इनकी सर्वोच्चमता और सर्वादरणीयताका मुख्य कारण है। वस्तुतः अखण्ड- आनन्दैकरसस्वरूप ब्रह्म ही उपनिषद्-प्रतिपादित तत्त्व है, ऐसा श्रुतिने ही कहा है। बृहदारण्यक-उपनिषद्में कथा है कि महाराज जनकने 'कौन सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता है' यह जाननेके लिये एक सहस्र गोदानकी शर्त की। उस समय भगवान् याज्ञवल्क्यने उन सहस्रों गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया, इसपर राजसभामें बैठे हुए विद्वान् कुपित होकर उनसे अनेक प्रकारके प्रश्न करने लगे। उनमें एक शाकल्य भी था। उसके अनेक प्रश्नोंका उत्तर देनेके पश्चात् अन्तमें महर्षि याज्ञवल्क्यने भी उससे पूछा—

'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि, तं चेन्मे न विवक्ष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति।' (बृहदारण्यक० ३।९।२६)

'शाकल्य ! मैं तुमसे उस उपनिषद् प्रतिपादित पुरुषको पूछता हूँ, यदि मुझसे उसको नहीं बतलाओगे तो तुम्हारा सिर गिर जायगा।'

शाकल्य इसका उत्तर नहीं जानता था, अतः उससे उत्तर न बन पड़ा, इस कारण उसका सिर गिर गया। इस आख्यायिका- को कहकर अन्तमें औपनिषद पदके अर्थको श्रुतिने स्वय ही खोला है।

'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणम्।' (बृहदारण्यक० ३।९।२८)

'ब्रह्म विज्ञानानन्दस्वरूप है, वह धन देनेवाले यजमानकी परम गति है।' यहाँ भगवान् शङ्कराचार्यजी अपने भाष्यमें कहते हैं—

"अतिक्रान्तवानुपाधिधर्म हृदयाद्यात्मस्थ स्वेनैवात्मना व्यवस्थितो य औपनिषद पुरुष. अशनायादिवर्जित. उपनिषत्स्वेव विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्य तं त्वां विद्याभिमानिनं पुरुषं पृच्छामि इति ।"

"विज्ञानं विज्ञप्तिः विज्ञानं तच्चानन्द न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम् । किं तर्हि प्रसन्नं शिवमतुममनायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थ ।"

'हृदयादिको ही आत्मा माननेरूप जो उपाधि-धर्म है, उसको अतिक्रान्त करनेवाला अपने आत्मरूपमे ही व्यवस्थित, क्षुधा-पिपासा आदि धर्म.से वर्जित, उपनिषदोंमे ही जाननेयोग्य तथा दूसरे प्रमाणोंके द्वारा जाननेमें नहीं आ सकनेवाला जो औपनिषद पुरुष है, उस पुरुषके विषयमें मे विद्याका अभिमान रखनेवाले तुमसे पूछता हूँ।'

'विज्ञप्ति (बोध) का ही नाम विज्ञान हे, वही आनन्द भी है। ब्रह्म विज्ञान विषय विज्ञानकी भाँति दुःखमे व्याप्त नहीं है। तो फिर कैसा है? प्रसन्न, कल्याणमय, अनुपम, आयास रहित, नित्यतृप्त और एकरस हे। ऐसा इसका तात्पर्य है।'

इस सन्दर्भके द्वारा यह स्पष्टरूपसे ज्ञात होता है कि पूर्वनिर्दिष्ट आत्मस्वरूप एकमात्र उपनिषदोंके द्वारा ही प्राप्त होने योग्य है। अतएव उसको औपनिषद पुरुष कहते हैं।

यहाँ 'शिव' शब्द सगुणब्रह्मका वाचक नहीं है, बल्कि माण्डूक्योपनिषद्में उल्लिखित 'शान्त शिवमद्वैत चतुर्थं मन्यन्ते' इस वाक्यगत शिवका ही पुनः निर्देश यहाँ भाष्य कारने किया है। वहाँ माण्डूक्योपनिषद्में 'शिवम्' पदके द्वारा सगुणब्रह्मके उपादानकी लेशमात्र भी गन्ध नहीं है। क्योंकि 'वह अद्वैत है' यह बात आगे स्पष्टरूपसे कही गयी है। इसका विवरणभाष्य करते हुए कहा गया है—'शिवं परिशुद्धं परमानन्दबोधम्' अर्थात् 'शिव'का अभिप्राय 'परिशुद्ध परम आनन्दमय बोध।'

इस प्रकार इन मुख्य मुख्य उपनिषदोंका स्वतः प्रतीत होनेवाला अभिप्राय नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, निर्गुण, एकरस, निरतिशय अखण्ड-आनन्दस्वरूप, अद्वैत आत्माका बोध कराना ही है। कहीं कहीं द्वैत-सगुण आदि तथा अन्यत्र भी जो इनकी प्रवृत्ति दीख पड़ती है, वह भी अद्वैततत्त्वके साधन रूपमें ही ह, न कि परम तात्पर्यरूपमें । अतएव किसी अग्रगण्य विद्वान्ने कहा है—

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