कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें- तैत्तिरीयोपनिषद् और ब्रह्मसूत्र ~ ६५
और अन्तमे कहते है कि यह उपदेश है, वेदका रहस्य है और आज्ञा है । इसी प्रकार उपासना करनी चाहिये । ऐसा ही आचरण करना चाहिये ।
वेदाध्ययन गुरुकुलमे समाप्त कर ऐसा जीवन व्यतीत करनेवाले गृहस्थाश्रमीके लिये तो घर ही साधन-धाम और तपोभूमि बन जाता है । संसारमें लिप्त होकर और उसीमे यावत् सुख माननेवालेकी गति दूसरी होती है । आदर्श गृहस्थ- के लिये ऐसी शङ्का नहीं रहती और यह भी एक भ्रामक कल्पना है कि हिंदू-धर्म अधिकारभेदका विचार किये बिना मनुष्यको सांसारिक कर्तव्यसे विमुख करता है। धर्मपरायण आदर्श गृहस्थको सुख अनित्य और दुःख अनिवार्यकी भावना बराबर दृढ़ होती जाती है। जो संसारमे निमग्न हैं, उनकी तो सतत यह निष्फल चेष्टा रहती है कि दुःखसे निवृत्ति हो तथा सुख स्थायी हो, और सच्चे ब्राह्मणको सुख-दुःखसे अतीत अवस्थाकी जिज्ञासा होती है । निर्वेद हुए बिना अक्षय सुख या आनन्दकी खोज आरम्भ नहीं होती। तीनों एषणाओका त्याग और कर्म-संन्याससे अध्यात्म-जगत्में प्रवेश होता है । संन्यासकी शान्तिका वही अधिकारी बनता है, जिसकी विवेक- बुद्धि जागती है ! क्योंकि 'अनित्यम् असुखं लोकम्'की भावना तभी दृढ़ होती है। इस प्रकार ससार-सुखसे अतृप्त रहकर एक अभावका अनुभव कर भृगु अपने पिताके पास जगलमे जाता है और जिस ब्रह्मकी केवल चर्चामात्र वेदाध्ययनके समय सुनी थी, उसको भली प्रकार जाननेके लिये प्रश्न करता है। जबतक पूर्णरूपसे जिज्ञासा शान्त नहीं होती, भृगु बार-बार अरण्यको जाकर प्रश्न करते हैं । ब्रह्मिनिरूपणके बाद घर लौटकर उनका जाना सूचित नहीं किया गया । इशारा है कि वे भी ब्रह्मप्राप्तिके पश्चात् अरण्यवासी- गृहत्यागी हो गये । सूत्रकारने पहले ही सूत्रमें बड़ा चमत्कार दिखाया है। तीनो वल्लियोंका ध्यान रखकर, भृगुके निर्वेदकी ओर सङ्केत कर अन्तिम ध्येयतत्त्वकी बात कह डाली है और एक सूत्रमे रचना- चातुर्यसे अनुबन्धचतुष्टय भी दर्शा दिया है। केवल चार शब्दोंके छोटे सूत्रमे इतनी बातोंको समाविष्ट कर मानो गागरमें सागर भर दिया है । सूत्र है-
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा
वल्ली सूत्रके पद अनुबन्धचतुष्टय १ शीक्षावल्ली अथ अधिकारी २ ब्रह्मानन्दवल्ली अत प्रयोजन ३ } भृगुवल्ली ब्रह्म विषय ४ } जिज्ञासा सम्बन्ध
उ० अ० ९-
ब्रह्मविद्याका अधिकारी कौन होता है ? जो भृगुजीकी तरह वेदाध्ययनके पश्चात् गृहस्थाश्रमके वर्मांका यथावत् पालन कर, घरमे ही रहकर स्वाध्याय-प्रवचनरूपी तप और शम-दमादि साधन-सम्पत्तिसे युक्त होकर सासारिक सुखोंकी अनित्यताका अनुभव कर लेता है और किमी अक्षय वस्तुकी खोजमे घरसे निकलकर त्यागी ब्रह्मज्ञानीके पास जाता है और 'परिपश्नेन सेव्या' ब्रह्मप्राप्ति करता हे । सूत्रमे 'अथ' शब्द जिसका अर्थ 'अनन्तर' भी है। इन सब अवस्थाओंको और जिज्ञासुके अधिकारको सूचित करता है। प्रथम वल्ली 'अथ' में समा गयी ।
ब्रह्मानन्दवल्लीमें प्रयोजनकी बात कही गयी है । भृगुको अरण्यमें जानेका प्रयोजन हे अक्षय वस्तुकी खोज । जो पदार्थ सुख-दुःखसे भी परे है या विलक्षण है । 'ब्रह्मविदामोति परम्' । यदि ससारसुखको सब कुछ मानकर उसीसे तृप्ति हो जाती तो फिर घरसे बाहर जाकर किसी अन्य वस्तुकी खोजका कुछ प्रयोजन ही न रहता । अभावके अनुभवने 'परम्' की जिज्ञासा जाग्रत् की और उसकी उपलब्धिके लिये सचेष्ट किया । 'अतः' शब्द इन्हीं भावोका सूचक होकर ब्रह्मानन्दवल्लीका साररूप है ।
ब्रह्म 'विषय' है जिसका निरूपण किया गया है- भृगुर्वे वारुणि । वरुण पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । (तैत्ति० ३।१।१)
इस प्रकार भृगु अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मका बोध करानेकी प्रार्थना करते है । जिज्ञासाका विषय स्पष्ट ही ब्रह्म है । ब्रह्मको पूछा क्यों ? वेदाध्ययनके समय कुछ चर्चा सुन चुके हैं। शिष्यभावसे पिताके पास जाकर पूछना उचित ही है साथ ही दो बातें भी लक्षित हैं कि केवल स्वाध्याय और प्रवचनसे यह वारुणी विद्या प्राप्त नहीं हो सकी । स्वाध्याय और प्रवचन सहायक अवश्य है और साधनरूपसे बराबर स्वीकार करने पड़े । भृगुको पिताके उपदेशसे बार-बार तपस्या करनी पडी । परतु यह 'उपनिषद्'की बात है । गुरुके समीप जाकर प्रत्यक्ष उपदेशसे प्राप्त होती है, केवल तप और स्वाध्यायसे नहीं।
'सम्बन्ध' भी भृगुवल्लीमे स्पष्टत. दिया हुआ है और वह है पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्यका । उपदेश तीन भावोंसे दिया जाता है-कान्ताभाव, सखिभाव और प्रभुभावसे । यहाँ प्रभुभावका उपदेश ग्राह्य है । सूत्रकारने 'जिज्ञासा' शब्द दिया है, क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है । कर्मका