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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
  • तैत्तिरीयोपनिषद् और ब्रह्मसूत्र ~ ६५

और अन्तमे कहते है कि यह उपदेश है, वेदका रहस्य है और आज्ञा है । इसी प्रकार उपासना करनी चाहिये । ऐसा ही आचरण करना चाहिये ।

वेदाध्ययन गुरुकुलमे समाप्त कर ऐसा जीवन व्यतीत करनेवाले गृहस्थाश्रमीके लिये तो घर ही साधन-धाम और तपोभूमि बन जाता है । संसारमें लिप्त होकर और उसीमे यावत् सुख माननेवालेकी गति दूसरी होती है । आदर्श गृहस्थ- के लिये ऐसी शङ्का नहीं रहती और यह भी एक भ्रामक कल्पना है कि हिंदू-धर्म अधिकारभेदका विचार किये बिना मनुष्यको सांसारिक कर्तव्यसे विमुख करता है। धर्मपरायण आदर्श गृहस्थको सुख अनित्य और दुःख अनिवार्यकी भावना बराबर दृढ़ होती जाती है। जो संसारमे निमग्न हैं, उनकी तो सतत यह निष्फल चेष्टा रहती है कि दुःखसे निवृत्ति हो तथा सुख स्थायी हो, और सच्चे ब्राह्मणको सुख-दुःखसे अतीत अवस्थाकी जिज्ञासा होती है । निर्वेद हुए बिना अक्षय सुख या आनन्दकी खोज आरम्भ नहीं होती। तीनों एषणाओका त्याग और कर्म-संन्याससे अध्यात्म-जगत्में प्रवेश होता है । संन्यासकी शान्तिका वही अधिकारी बनता है, जिसकी विवेक- बुद्धि जागती है ! क्योंकि 'अनित्यम् असुखं लोकम्'की भावना तभी दृढ़ होती है। इस प्रकार ससार-सुखसे अतृप्त रहकर एक अभावका अनुभव कर भृगु अपने पिताके पास जगलमे जाता है और जिस ब्रह्मकी केवल चर्चामात्र वेदाध्ययनके समय सुनी थी, उसको भली प्रकार जाननेके लिये प्रश्न करता है। जबतक पूर्णरूपसे जिज्ञासा शान्त नहीं होती, भृगु बार-बार अरण्यको जाकर प्रश्न करते हैं । ब्रह्मिनिरूपणके बाद घर लौटकर उनका जाना सूचित नहीं किया गया । इशारा है कि वे भी ब्रह्मप्राप्तिके पश्चात् अरण्यवासी- गृहत्यागी हो गये । सूत्रकारने पहले ही सूत्रमें बड़ा चमत्कार दिखाया है। तीनो वल्लियोंका ध्यान रखकर, भृगुके निर्वेदकी ओर सङ्केत कर अन्तिम ध्येयतत्त्वकी बात कह डाली है और एक सूत्रमे रचना- चातुर्यसे अनुबन्धचतुष्टय भी दर्शा दिया है। केवल चार शब्दोंके छोटे सूत्रमे इतनी बातोंको समाविष्ट कर मानो गागरमें सागर भर दिया है । सूत्र है-

'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा

वल्ली सूत्रके पद अनुबन्धचतुष्टय १ शीक्षावल्ली अथ अधिकारी २ ब्रह्मानन्दवल्ली अत प्रयोजन ३ } भृगुवल्ली ब्रह्म विषय ४ } जिज्ञासा सम्बन्ध

उ० अ० ९-

ब्रह्मविद्याका अधिकारी कौन होता है ? जो भृगुजीकी तरह वेदाध्ययनके पश्चात् गृहस्थाश्रमके वर्मांका यथावत् पालन कर, घरमे ही रहकर स्वाध्याय-प्रवचनरूपी तप और शम-दमादि साधन-सम्पत्तिसे युक्त होकर सासारिक सुखोंकी अनित्यताका अनुभव कर लेता है और किमी अक्षय वस्तुकी खोजमे घरसे निकलकर त्यागी ब्रह्मज्ञानीके पास जाता है और 'परिपश्नेन सेव्या' ब्रह्मप्राप्ति करता हे । सूत्रमे 'अथ' शब्द जिसका अर्थ 'अनन्तर' भी है। इन सब अवस्थाओंको और जिज्ञासुके अधिकारको सूचित करता है। प्रथम वल्ली 'अथ' में समा गयी ।

ब्रह्मानन्दवल्लीमें प्रयोजनकी बात कही गयी है । भृगुको अरण्यमें जानेका प्रयोजन हे अक्षय वस्तुकी खोज । जो पदार्थ सुख-दुःखसे भी परे है या विलक्षण है । 'ब्रह्मविदामोति परम्' । यदि ससारसुखको सब कुछ मानकर उसीसे तृप्ति हो जाती तो फिर घरसे बाहर जाकर किसी अन्य वस्तुकी खोजका कुछ प्रयोजन ही न रहता । अभावके अनुभवने 'परम्' की जिज्ञासा जाग्रत् की और उसकी उपलब्धिके लिये सचेष्ट किया । 'अतः' शब्द इन्हीं भावोका सूचक होकर ब्रह्मानन्दवल्लीका साररूप है ।

ब्रह्म 'विषय' है जिसका निरूपण किया गया है- भृगुर्वे वारुणि । वरुण पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । (तैत्ति० ३।१।१)

इस प्रकार भृगु अपने पिता वरुणके पास जाकर ब्रह्मका बोध करानेकी प्रार्थना करते है । जिज्ञासाका विषय स्पष्ट ही ब्रह्म है । ब्रह्मको पूछा क्यों ? वेदाध्ययनके समय कुछ चर्चा सुन चुके हैं। शिष्यभावसे पिताके पास जाकर पूछना उचित ही है साथ ही दो बातें भी लक्षित हैं कि केवल स्वाध्याय और प्रवचनसे यह वारुणी विद्या प्राप्त नहीं हो सकी । स्वाध्याय और प्रवचन सहायक अवश्य है और साधनरूपसे बराबर स्वीकार करने पड़े । भृगुको पिताके उपदेशसे बार-बार तपस्या करनी पडी । परतु यह 'उपनिषद्'की बात है । गुरुके समीप जाकर प्रत्यक्ष उपदेशसे प्राप्त होती है, केवल तप और स्वाध्यायसे नहीं।

'सम्बन्ध' भी भृगुवल्लीमे स्पष्टत. दिया हुआ है और वह है पिता-पुत्र अथवा गुरु-शिष्यका । उपदेश तीन भावोंसे दिया जाता है-कान्ताभाव, सखिभाव और प्रभुभावसे । यहाँ प्रभुभावका उपदेश ग्राह्य है । सूत्रकारने 'जिज्ञासा' शब्द दिया है, क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति किसी कर्मका फल नहीं है । कर्मका

६६ ~ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * फल तो अनित्य होगा और यहाँ अक्षय पदार्थकी प्राप्तिकी बात है। ब्रह्मके विषयमे चिकीर्षाको स्थान नहीं केवल जिज्ञासा चाहिये । श्रद्धापूर्वक प्रश्न-परिपश्न और श्रवण-मनन निधि- ध्यासनकी ही आवश्यकता है। कर्म क्षेत्रमे—गृहस्थाश्रममे ही समाप्त हो चुका और ब्रह्म तो सुख-दुःख—अर्थात् कर्म- फलसे अतीत या परे है, जीवन्मुक्तावस्थामें सुख-दुःख समान हो जाते हैं और विदेहमे दोनो नही रहते । प्रथम सूत्रकी वाक्यपूर्तिमें 'भवति' शब्द जोड़ना चाहिये । भाव यह है कि जिज्ञासा उत्पन्न नहीं की जाती, स्वतः होती है यदि विधिवत् गृहस्थाश्रमका निर्वाह हो तो । जिज्ञासा होनेपर प्रश्न होता है कि ब्रह्म क्या है ? उपनिषद्- का उत्तर है— यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । ( तैत्ति० ३ । १ । १ ) इसपर वेदव्यासजीने दूसरा सूत्र बनाया—'जन्माद्यस्य यत ।' इसकी वाक्यपूर्ति करनेपर सूत्रका रूप होगा— 'यत जन्मादि अस्य भवति तद्ब्रह्म सत्य भवति' । सृष्टि, स्थिति, प्रलय और मोक्ष जिससे होते हे वह ब्रह्म है, 'जन्मादि' का यह अर्थ हुआ । जगत्के साथ देहधारी या जीवका भी विचार इसमे ग्राह्य होना उचित है, क्योंकि यदि केवल 'यत्प्रयन्ति' ही कहा होता तो लय हो अर्थ होता । जगत् ब्रह्ममे लीन होकर पुन. प्रकट होता रहता है और जीवोका भी यही हाल है कि प्रलयके बाद फिर सृष्टिमे आते हैं। साथमे 'अभिसंविशन्ति' शब्द भी दिया गया है। उपनिषद् इस शब्दको देकर मोक्षकी सूचना देता है। मुक्त जीव पूर्णरूपसे ब्रह्ममे सदाके लिये लीन हो जाते है, ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति' । केवल लीन होना परम वस्तु नही है और चाहिये 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण- ने इसी बातको कहा है— ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ( १८ । ५५ ) और समुद्रमें नदियोंके समा जानेकी उपमा देकर 'प्रविशन्ति' पद दिया है । 'अस्य' शब्दका अर्थ सूत्रकारके अनुसार है प्रत्यक्ष जगत्, जो इन्द्रियोंद्वारा अनुभवमें आता है अर्थात् जो अप्रत्यक्ष ब्रह्मसे विलक्षण है । सूचित यह कर दिया कि ब्रह्मके अस्तित्वमें इन्द्रियाँ साक्षी नही हो सकतीं । ‘यत’ का भाव है कि ब्रह्म आप ही जगत्‌का निमित्त और उपादान कारण है । वही सब कुछ बन गया है और वह भी अपने ही लिये । आप ही करनेवाला, आप ही बनने- वाला, अपने ही लिये और अपनेसे ही—ये सूत्र भाव ‘यतः’ शब्दगे व्याकरणकी दृष्टिसे भी आ जाते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय प्रकृतिमे निरन्तर होते रहते हैं, अतएव सत्य हैं; परतु ये विकारी सत्य हैं और ब्रह्म अविकारी सत्य है । वास्तवमें सत्य तो वही है जो अविकारी हो और सदा-सर्वदा एकरस हो । वैचित्र्य यही है कि ब्रह्म सदा अविकारी होते हुए और रहते हुए भी इस विकारी जगत्‌का अधिष्ठान है; अतएव ब्रह्म ही सत्य है । ब्रह्मका तटस्थ लक्षण बताया सृष्टि आदि । उसका सम्बन्ध कहकर उपनिषद्ने स्वरूपलक्षण कहा है—‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’। इस प्रकार व्यासजीने दूसरे सूत्रमे तटस्थ लक्षण और तीन स्वरूपलक्षणोंमेसे ‘सत्यम्’ को कह दिया। अब रह गये दो स्वरूपलक्षण ‘ज्ञानम्’ और ‘अनन्तम्’ । उनको अगले दो सूत्रोंमें क्रमसे कहते है। तीसरा सूत्र है—'शास्त्रयोनित्वात्' जिसका रूप वाक्यपूर्ति पर होता है— ‘शास्त्रयोनित्वात् तद्ब्रह्म ज्ञान भवति ।' इस सूत्रका आधार उपनिषद्वाक्य है— भीषास्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्य । भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । ( तैत्ति० २ । ८ । १ ) 'उस ब्रह्मके भयसे वायु चलता है । इसीके भयसे सूर्य उदय होता है तथा इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है अर्थात् ब्रह्म ही समस्त सृष्टिका शासनकर्ता है । वह सब तत्त्व और उनके देवताओंको जानता है । वह ज्ञानस्वरूप है, मनुष्य ज्ञानी है, परतु वह ज्ञानस्वरूप या ज्ञान है । मनुष्यको तामस ज्ञान हुआ तो वह अज्ञानी कहा जाता है । इस प्रकार अज्ञानीको भी ज्ञान तो रहता ही है; परतु ब्रह्म ज्ञानी नहीं, ज्ञानस्वरूप है । सृष्टिका कार्य उसके शासनसे होता है, वह स्वयं नहीं करता । सृष्टिमे जो नियमका पालन हो रहा है, उन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है । स्वरूपलक्षण 'अनन्तम्' भी उपनिषद्ने बताया है । उसके आधारपर व्यासजीने चौथा सूत्र बनाया—‘तत्त समन्व- यात् ।' जिसकी वाक्यपूर्ति करनेपर स्वरूप बना— 'समन्वयात् तन्तु ब्रह्म अनन्त भवति' अर्थात् वह ब्रह्म अनन्त है, क्योंकि सभी सृष्ट पदार्थोंमें

  • उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र * ६७ वह निश्चय ही भली प्रकार अनुस्यूत है। इस सूत्रका आधार उपनिषद्‌का निम्नाङ्कित वचन है— तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः। आकाशा- द्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषो- ऽन्नरसमयः। तस्येदमेव शिरः। अयं दक्षिणः पक्षः। अयमु- त्तरः पक्षः। अयमात्मा। इदं पुच्छं प्रतिष्ठा। (तैत्ति० २।१।२) ब्रह्मसे आकाशादि सब क्रमसे निकले और सृष्टि हुई। और सृष्टि होनेके साथ ही ब्रह्म भी सृष्ट पदार्थोंमें प्रविष्ट होता गया। 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' । और अन्तमें ब्रह्मसे ब्रह्ममें ही पहुँच गया। अर्थात् चक्रवत् व्यापार चला और जैसे चक्रका अन्त नहीं वैसे ही सृष्टिमें अनुस्यूत होनेसे आप ही चक्र पूरा कर प्रतिष्ठित रहा। अतएव वह अन्तरहित या अनन्त है। और आत्मा ही ब्रह्म है, यह भी उपनिषद्‌ने बता दिया। सूत्रमें 'सम्' पद आया है, वह भली प्रकार या अच्छी तरहका भाव दर्शाता है। अर्थात् सृष्टिके अङ्ग प्रत्यङ्गमें ब्रह्म समाया हुआ है। कणमें अल्प और पर्वतमें विशेष नहीं। सर्वत्र समान रूपसे। और वही ब्रह्म आत्मा है। भृगुवल्लीकी शिक्षा दो सूत्रोंमें आ गयी। इस प्रकार तैत्तिरीयोपनिषद्‌की तीनों वल्लियोंको प्रथम चार सूत्रोंमें बाँधकर वेदव्यासजीने रख दिया। ब्रह्मजिज्ञासा क्यों और किसको होती है, उसका कौन अधिकार है और ब्रह्मका तटस्थ और स्वरूपलक्षण बताकर उसका निरूपण कर दिया। जैसे उपनिषद्‌ने ब्रह्मप्राप्तिकी युक्ति बतायी है, उसीके आधारपर आगे भी सूत्र हैं। केवल चतुःसूत्री ही नहीं, समस्त ब्रह्मसूत्रकी रचना तैत्तिरीयोपनिषद्‌पर अवलम्बित है और इस उपनिषद्‌में ब्रह्म ज्ञानसम्बन्धी समस्त सिद्धान्तोंका समावेश होनेसे वेदव्यास भगवान्‌ने इसको इतना महत्त्व दिया है।

उपनिषदोंका सारसर्वस्व ब्रह्मसूत्र ( लेखक—पं० श्रीकृष्णदत्तजी भारद्वाज एम० ए०, आचार्य ) 'उपनिषद्' शब्दका मुख्य अर्थ है उपासना। इस विश्वके उदय, विभव और लयकी लीलामें¹ लीन परमात्माके निरतिशय ऐश्वर्यसे विमुग्ध प्राचीन ऋषि मुनियोंकी भक्तिभाव- भरित भावनाओंके शब्दचित्रोंके समुदायका नाम ही उपनिषद् है। प्रसङ्गतः अन्यान्य विषयोंका भी समावेश यद्यपि उपनिषद्-ग्रन्थोंमें है, तथापि मुख्य प्रतिपाद्य विषय उपासना ही है। ब्रह्मका साक्षात्कार करनेवाले ब्रह्मर्षियोंने उस परमतत्त्व- का प्रतिपादन करना चाहा, वाणीसे अतीतका वाणीद्वारा वर्णन करना चाहा तो अपने उस अलौकिक देवताकी वाङ्मयी आराधनामे वे लौकिक पदावलीका ही प्रयोग कर सके। परमेश्वरकी ऐकान्तिक और आत्यन्तिक दिव्यताको प्रकट करनेके लिये उन्हे अपने कोषमे प्राण², ज्योति³ और आकाश⁴ जैसे शब्दोंसे बढकर शब्द न मिल सके, अतएव उन्हीं पदोंके प्रयोगसे उन्हें सन्तोष करना पडा, किंतु साधारण जनताने प्राणादि शब्दोंका लौकिक अर्थ करना प्रारम्भ किया तो आवश्यकता इस बातकी हुई कि इस प्रकारके विरोधका परिहार किया जाय। ऐसे-ऐसे संशयास्पद स्थलोका परमात्म- परक अर्थ दिखानेके लिये एव ऐसी ही अन्यान्य पारमार्थिक शङ्काओंके निरासके साथ-साथ सत्सिद्धान्तके निरूपणके लिये कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने एक सूत्रमयी रचना की। उसी- का नाम ब्रह्मसूत्र है। वेदान्तसूत्र और भिक्षुसूत्र भी इसके पर्याय हैं। गीताकी रचनासे पूर्व ही इन सूत्रोंका निर्माण हो चुका था⁵। इन सूत्रोंको उपनिषदोंका सार कहना युक्तियुक्त है। विभिन्न आचार्योंने अपने अपने मतके अनुसार ब्रह्मसूत्र- पर भाष्य किये हैं जो सभी अपने-अपने दृष्टिकोणोंसे उपादेय हैं। पुराणशिरोमणि श्रीमद्भागवत ब्रह्मसूत्र-प्रतिपादित अर्थका ही समर्थक है, जैसी कि सूक्ति है— अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणाम् ।

१. लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्। ( ब्रह्मसूत्र २।१।३३ ) २ अत एव प्राण। ( ब्रह्मसूत्र १।१।२० ) ३ ज्योतिश्चरणाभिधानात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२५ ) ४. आकाशस्तल्लिङ्गात् । ( ब्रह्मसूत्र १।१।२२ ) ५. ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः । ( गीता १३।४)

उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना ( लेखक-श्रीजयदयालजी गोयन्दका ) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ( बृहदारण्यक० ५ । १ । १ ) ‘वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा अपने-आपसे परिपूर्ण है, यह ससार भी उस परमात्मासे परिपूर्ण है, क्योंकि उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मासे ही यह पूर्ण ( ससार ) प्रकट हुआ है, पूर्ण ( ससार ) के पूर्ण ( पूरक परमात्मा ) को स्वीकार करके उसमें स्थित होनेसे उस साधकके लिये एक पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही अवशेष रह जाता है।’

हिंदू-शास्त्रोंका मूल वेद है, वेद अनन्त ज्ञानके भण्डार हैं, वेदोंका ज्ञानकाण्ड उसका शीर्षस्थानीय या अन्त है, वही उपनिषद् या वेदान्तके नामसे ख्यात है। उपनिषदोंमें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ निर्णय किया गया है और साथ ही उसकी प्राप्तिके लिये विभिन्न रुचि और स्थितिके साधकोंके लिये विभिन्न उपासनाओंका प्रतिपादन किया गया है। उनमें जो प्रतीकोपासनाका वर्णन है, उसे भी एकदेशीय और सर्व- देशीय—दोनों ही प्रकारसे करनेको कहा गया है। ऐसी उपासना स्त्री, पुत्र, धन, अन्न, पशु आदि इस लोकके भोगोंकी तथा नन्दनवन, अप्सराएँ और अमृतपान आदि स्वर्गीय भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे करनेका भी प्रतिपादन किया गया है एव साथ ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी अनेक प्रकारकी उपासनाएँ बतलायी गयी हैं। उनमेंसे इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे की जानेवाली उपासनाओंके सम्बन्धमें यहाँ कुछ लिखनेका अवसर नहीं है। उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिविषयक उपासनाओंके जो विस्तृत विवेचन हैं, उन्हींका यहाँ बहुत संक्षेपमें कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है।

उपनिषदोंमें परमात्माकी प्राप्तिके लिये दृष्टान्त, उदाहरण, रूपक, संकेत तथा विधि निषेधात्मक विविध वाक्योंके द्वारा विविध युक्तियोंसे विभिन्न साधन बतलाये गये हैं, उनमेंसे किसी भी एक साधनके अनुसार संलग्न होकर अनुष्ठान करनेपर मनुष्यको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। उपनिषदुक्त सभी साधन १ भेदोपासना, और २ अभेदोपासना—इन दो उपासनाओंके अन्तर्गत आ जाते है। भेदोपासनाके भी दो प्रकार है। एक तो वह, जिसमे साधनमें भेदभावना रहती है और फलमें भी भेदरूप ही रहता है, और दूसरी वह, जिसमे साधनकालमे तो भेद रहता है, परतु फलमे अभेद होता है। पहले क्रमग हम भेदोपासनापर ही विचार करते हैं।

भेदोपासना

भेदोपासनामें तीन पदार्थ अनादि माने जाते हैं— १ माया ( प्रकृति ), २ जीव और ३. मायापति परमेश्वर । इनका वर्णन उपनिषदोंमें कई जगह आता है। प्रकृति जड है और उसका कार्यरूप दृश्यवर्ग क्षणिक, नाशवान् और परिणामी है। जीवात्मा और परमेश्वर—दोनों ही नित्य चेतन और आनन्दस्वरूप हैं, किंतु जीवात्मा अल्पज्ञ है और परमेश्वर सर्वज्ञ हैं; जीव असमर्थ है और परमेश्वर सर्वसमर्थ हैं, जीव अंश है और परमेश्वर अंशी हैं, जीव भोक्ता है और परमेश्वर साक्षी हैं एव जीव उपासक है और परमेश्वर उपास्य हैं। वे परमेश्वर समय-समयपर प्रकट होकर जीवोंके कल्याणके लिये उपदेश भी देते हैं।

इस विषयमे केनोपनिषद्में एक इतिहास आता है। एक समय परमेश्वरके प्रतापसे स्वर्गके देवताओंने असुरोंपर विजय प्राप्त की। पर देवता अज्ञानसे अभिमानवश यह मानने लगे कि हमारे ही प्रभावसे यह विजय हुई है। देवताओंके इस अज्ञानपूर्ण अभिमानको दूर कर उनका हित करनेके लिये स्वय सच्चिदानन्दघन परमात्मा उन देवताओंके निकट सगुण-साकार यक्षरूपमें प्रकट हुए। यक्षका परिचय जाननेके लिये इन्द्रादि देवताओंने पहले अग्निको भेजा। यक्षने अग्निसे पूछा—‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने उत्तर दिया कि ‘मै जातवेदा अग्नि हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको जला सकता हूँ।’ यक्षने एक तिनका रखा और उस जलानेको कहा, किंतु अग्नि उसको नही जला सके एवं लौटकर देवताओंसे बोले—‘मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है।’ तदनन्तर देवताओंके भेजे हुए वायुदेव गये। उनसे भी यक्षने यही पूछा कि ‘तुम कौन हो और तुम्हारा क्या सामर्थ्य है ?’ उन्होंने कहा—‘मैं मातरिश्वा वायु हूँ और चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्डको उड़ा सकता हूँ।’

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत् पाठ दिया गया है:


[पृष्ठ शीर्ष]

  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ६९

[बायाँ स्तम्भ]

तब यक्षने उनके सामने भी एक तिनका रखा किंतु वे उसे उडा नहीं सके और लौटकर उन्होंने भी देवताओंसे यही कहा कि 'मैं इसको नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ?' तत्पश्चात् स्वय इन्द्रदेव गये, तब यक्ष अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर इन्द्रने उसी आकाशमें हैमवती उमादेवीको देखकर उनसे यक्षका परिचय पूछा । उमादेवीने बतलाया कि 'वह ब्रह्म था और उस ब्रह्मकी ही इस विजयमें तुम अपनी विजय मानने लगे थे ।' इस उपदेशसे ही इन्द्रने समझ लिया कि 'यह ब्रह्म है।' फिर अग्नि और वायु भी उस ब्रह्मको जान गये । इन्होंने ब्रह्मको सर्वप्रथम जाना, इसलिये इन्द्र, अग्नि और वायुदेवता अन्य देवताओंसे श्रेष्ठ माने गये । इस कथासे यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्राणियोंमें जो कुछ भी बल, बुद्धि, तेज एव विभूति है, सब परमेश्वरसे ही है । गीतामे भी श्रीभगवान्ने कहा है— यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्व मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ( १० । ४१ ) ‘जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अशकी ही अभिव्यक्ति जान ।’ इस प्रकार उपनिषदोंमें कहीं साकाररूपसे और कहीं निराकाररूपसे, कहीं सगुणरूपसे और कहीं निर्गुणरूपसे भेद- उपासनाका वर्णन आता है । वहाँ यह भी बतलाया है कि उपासक अपने उपास्यदेवकी जिस भावसे उपासना करता है, उसके उद्देश्यके अनुसार ही उसकी कार्य-सिद्धि हो जाती है । कठोपनिषद्में सगुण-निर्गुणरूप ओंकारकी उपासनाका भेद रूपसे वर्णन करते हुए यमराज नचिकेताके प्रति कहते हैं— एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धयेवाक्षरं परम् । एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ एतदालम्बन श्रेष्ठमेतदालम्बन परम् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ( १ । २ । १६-१७ ) ‘यह अक्षर ही तो ब्रह्म है और अक्षर ही परब्रह्म है, इसी अक्षरको जानकर जो जिसको चाहता है, उसको वही मिल जाता है । यही उत्तम आलम्बन है, यही सबका अन्तिम आश्रय है । इस आलम्बनको भलीभाँति जानकर साधक ब्रह्म- लोकमें महिमान्वित होता है । इसलिये कल्याणकामी मनुष्योंको इस दुःखरूप संसार-


[दायाँ स्तम्भ]

सागरसे सदाके लिये पार होकर परमेश्वरको प्राप्त करनेके लिये ही उनकी उपासना करनी चाहिये, सासारिक पदार्थोंके लिये नहीं। वे परमेश्वर इस शरीरके अदर सबके हृदयमें निराकार- रूपसे सदा सर्वदा विराजमान हैं, परतु उनको न जाननेके कारण ही लोग दुःखित हो रहे हैं। जो उन परमेश्वरकी उपासना करता है, वह उन्हें जान लेता है और इसलिये सम्पूर्ण दुःखों और शोकससमूहोंसे निवृत्त होकर परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है । मुण्डकोपनिषद्में भी बतलाया है— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्य. पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- ऽनीशया शोचति मुह्यमान. । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोक ॥ यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ( ३ । १ । १-३ ) ‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी ( जीवात्मा और परमात्मा ) एक ही वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, उन दोनोंमेंसे एक तो उस वृक्षके कर्मरूप फलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, किंतु दूसरा न खाता हुआ केवल देखता रहता है । इस शरीररूपी समान वृक्षपर रहनेवाला जीवात्मा शरीरकी गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है और असमर्थतारूप दीनताका अनुभव करता हुआ मोहित होकर शोक करता रहता है, किंतु जब कभी भगवान्‌की अहैतुकी दयासे भक्तोद्वारा नित्यसेवित तथा अपनेसे भिन्न परमेश्वरको और उनकी महिमाको यह प्रत्यक्ष कर लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है तथा जब यह द्रष्टा ( जीवात्मा ) सबके शासक, ब्रह्माके भी आदिकारण, सम्पूर्ण जगत्‌के रचयिता, दिव्यप्रकाशस्वरूप परमपुरुषको प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्य पाप—दोनोंसे रहित होकर निर्मल हुआ वह ज्ञानी भक्त सर्वोत्तम समताको प्राप्त कर लेता है ।’ वह सगुण-निर्गुणरूप परमेश्वर सब इन्द्रियोंमे रहित होकर भी इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है । वह सबकी उत्पत्ति

७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * और पालन करनेवाला होकर भी अकर्ता ही है । उस सर्वेश, सर्वव्यापी, अकारण दयालु और परम प्रेमी हृदयस्थित निराकार परमेश्वरकी स्तुति-प्रार्थना करनी चाहिये । उस भजनेयोग्य परमात्माकी शरण लेनेसे मनुष्य सारे दुःख, क्लेश, पाप और विकारोंसे छूटकर परम शान्ति और परम गतिस्वरूप मुक्तिको प्राप्त करता है । इसलिये सबकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वव्यापी, सूक्ष्म-से-सूक्ष्म और महान्-से-महान् उस सर्वसुहृद् परमेश्वरको तत्त्वसे जानकर उसे प्राप्त करनेके लिये सब प्रकारसे उसीकी शरण लेनी चाहिये । श्वेताश्वतरोपनिषद्में परमेश्वरकी भेदरूपसे उपासना- का वर्णन विस्तारसहित आता है, उसमेंसे कुछ मन्त्र यहाँ दिये जाते हैं— सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥ ( ३ । १७ ) ‘जो परमपुरुष परमेश्वर समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है तथा सबका स्वामी, सबका शासक और सबसे बड़ा आश्रय है, उसकी शरण जाना चाहिये ।’ अणोरणीयान्महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तो । तमक्रतु पश्यति वीतशोको धातु. प्रसादान्महिमानमीशम् ॥ ( ३ । २० ) ‘वह सूक्ष्मसे भी अतिसूक्ष्म तथा बड़ेसे भी बहुत बड़ा परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपा हुआ है, सब- की रचना करनेवाले परमेश्वरकी कृपासे जो मनुष्य उस सङ्कल्प- रहित परमेश्वरको और उसकी महिमाको देख लेता है, वह सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ।’ और भी कहा है-- मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ( ४ । १०-११ ) ‘माया तो प्रकृतिको समझना चाहिये और महेश्वरको मायापति समझना चाहिये; उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्यसमुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है । जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है, जिसमें यह समस्त जगत् प्रलयकालमें विलीन हो जाता है, और सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है, उस सर्वनियन्ता, वरदायक, स्तुति करनेयोग्य परमदेव परमेश्वरको तत्त्वसे जानकर मनुष्य निरन्तर बनी रहनेवाली इस मुक्तिरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है ।’ सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥ ( ४ । १४ ) ‘जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, हृदयगुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित, अखिल विश्वकी रचना करनेवाला, अनेक रूप धारण करनेवाला तथा समस्त जगत्‌को सब ओरसे घेरे रखने- वाला है, उस एक अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली शान्तिको प्राप्त होता है ।’ एको देव सर्वभूतेषु गूढ. सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्ष. सर्वभूताधिवास. साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ एको वशी निष्क्रियाणा बहूनामेक बीजं बहुधा य. करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषा सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥ ( ६ । ११-१२ ) ‘वह एक देव ही सब प्राणियोंमें छिपा हुआ सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है, वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत है तथा जो अकेला ही बहुत-से वास्तवमें अक्रिय जीवोंका शासक है और एक प्रकृतिरूप बीजको अनेक रूपोंमें परिणत कर देता है, उस हृदयस्थित परमेश्वरका जो धीर पुरुष निरन्तर अनुभव करते हैं, उन्हींको सदा रहनेवाला परमानन्द प्राप्त होता है, दूसरोंको नहीं ।’ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तंह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ॥ ( ६ । १८ ) ‘जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो निश्चय ही उस ब्रह्माको समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करता है, उस परमात्मविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मोक्षकी इच्छावाला साधक शरण लेता हूँ ।’

  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७१ [बायाँ स्तम्भ] जिसमें साधनमे भी भेद हो और फलमें भी भेद हो, ऐसी भेदोपासनाका वर्णन ऊपर किया गया, अब साधनमे तो भेद हो, किंतु फलमे अभेद ऐसी उपासनापर विचार किया जाता है । शास्त्रोंमें भेदोपासनाके अनुसार चार प्रकारकी मुक्ति बतलायी गयी है—१. सालोक्य, २. सामीप्य. ३. सारूप्य और ४. सायुज्य । इनमेंसे पहली तीन तो साधनमे भी भेद और फलमे भी भेदवाली हैं, किंतु सायुज्य-मुक्तिमे साधनमे तो भेद है, पर फलमे भेद नहीं रहता । भगवान्‌के परम धाममे जाकर वहाँ निवास करनेको 'सालोक्य' मुक्ति कहते हैं; जो वात्सल्य आदि भावसे भगवान्‌की उपासना करते हैं,वे 'सालोक्य' मुक्तिको पाते हैं । भगवान्‌के परम धाममें जाकर उनके समीप निवास करनेको 'सामीप्य' मुक्ति कहते हैं; जो दासभावसे या माधुर्यभावसे भगवान्‌की उपासना करते है, वे 'सामीप्य' मुक्तिको प्राप्त होते हैं । भगवान्‌के परम धाममे जाकर भगवान्‌के जैसे स्वरूपवाले होकर निवास करनेको 'सारूप्य' मुक्ति कहते हैं, जो सखाभावसे भगवान्‌की उपासना करते हैं, वे 'सारूप्य' मुक्ति पाते हैं । इन सब भक्तोंमे सृष्टिकी उत्पत्ति, स्थिति और पालनरूप भगवत्सामर्थ्यके सिवा भगवान्‌के सब गुण आ जाते हैं । भगवान्‌के स्वरूपमे अभेदरूपसे विलीन हो जानेको 'सायुज्य' मुक्ति कहते हैं। जो शान्तभावसे (ज्ञानमिश्रित भक्तिसे ) भगवान्‌की उपासना करते हैं, वे 'सायुज्य' मुक्तिको प्राप्त होते हैं तथा जो वैरसे, द्वेषसे अथवा भयसे भगवान्‌को भजते हैं, वे भी 'सायुज्य' मुक्तिको पाते हैं । जिस प्रकार नदियोंका जल अपने नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमें मिलकर समुद्र ही हो जाता है, इसी प्रकार ऐसे साधक भगवान्‌मे लीन होकर भगवत्स्वरूप ही हो जाते हैं । इसके लिये उपनिषदोंमें तथा अन्य शास्त्रोंमें जगह-जगह अनेक प्रमाण मिलते हैं । कठोपनिषद्‌में यमराज नचिकेतासे कहते हैं— यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ ( २ । १ । १५ ) ‘जिस प्रकार निर्मल जलमे मेघोंद्वारा सब ओरसे बरसाया हुआ निर्मल जल वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार हे गौतमवंशीय नचिकेता ! एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है—इस प्रकार जाननेवाले मुनिका आत्मा परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है अर्थात् परमेश्वरमें मिलकर तद्रूप हो जाता है ।’ [दायाँ स्तम्भ] मुण्डकोपनिषद्मे भी कहा है- स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम्। उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमैतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ ( ३ । २ । १) ‘वह निष्काम-भाववाला पुरुष इस परम विशुद्ध ( प्रकाशमान ) ब्रह्मधामको जान लेता है, जिसमे सम्पूर्ण जगत् स्थित हुआ प्रतीत होता हैं, जो भी कोई निष्काम साधक परम पुरुषकी उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान् रजोवीर्यमय इस जगत्‌को अतिक्रमण कर जाते हैं।’ यथा नद्यः स्यन्दमाना समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्म- वित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति । ( ३ । २ । –९ ) ‘जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम- रूपसे रहित होकर उत्तम-से-उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है । निश्चय ही जो कोई भी उस परब्रह्म परमात्माको जान लेता है, वह महात्मा ब्रह्म ही हो जाता है, उसके कुलमे ब्रह्मको न जाननेवाला नहीं होता, वह शोकसे पार हो जाता है, पाप-समुदायसे तर जाता है, हृदयकी गाँठोंसे सर्वथा छूटकर अमृत हो जाता है अर्थात् जन्म मृत्युसे रहित होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाता है ।’ जो मनुष्य माया (प्रकृति), जीव और परमेश्वरको भिन्न-भिन्न समझकर उपासना करता है और यह समझता है कि ईश्वरकी यह प्रकृति ईश्वरसे अभिन्न है, क्योंकि शक्ति शक्तिमान्‌से अभिन्न होती है एव जीव भिन्न होते हुए भी ईश्वरका अग होनेके कारण अभिन्न ही हैं, इसलिये प्रकृति और जीव—दोनोंसे परमात्मा भिन्न होते हुए भी अभिन्न ही हैं। वह पुरुष भेदरूपसे साधन करता हुआ भी अन्तमें अभेदरूपसे ही परमात्माको प्राप्त हो जाता है। यह बात भी शास्त्रोंमें तथा उपनिषदोंमें अनेक स्थानोंमें मिलती है। जैसे— ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशा- वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रय यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥

७२ - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावा- द्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥ ( श्वेताश्वतर० १। ९-१०) 'सर्वज्ञ और अल्पज्ञ, सर्वसमर्थ और असमर्थ—ये दोनों परमात्मा और जीवात्मा अजन्मा है तथा भोगनेवाले जीवात्मा- के लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त और अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है ( इन तीनोंमें जो ईश्वर-तत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) क्योंकि वह परमात्मा अनन्त, सम्पूर्ण रूपोंवाला और कर्त्तापनके अभिमानसे रहित है। जब मनुष्य इस प्रकार ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको ब्रह्मरूपमें प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनो- से मुक्त हो जाता है)। तथा प्रकृति तो विनाशशील है, इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतरूप अविनाशी है, इन विनाशशील जड-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है, इस प्रकार जानकर उनका निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उसमें लगाये रहनेसे तथा तन्मय हो जानेसे अन्तमें उसीको प्राप्त हो जाता है, फिर समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है। यहांतक भेदोपासनाके दोनों प्रकारोंको उपनिषद्के अनुसार संक्षेपमे बतलाकर अब अभेदोपासनापर विचार करते हैं— अभेदोपासना अभेद-उपासनाके भी प्रधान चार भेद हैं। उनमेंसे पहले दो भेद 'तत्' पदको और बादके दो भेद 'त्वम्' पद- को लक्ष्य करके संक्षेपमे नीचे बतलाये जाते हैं— १. इस चराचर जगत्में जो कुछ प्रतीत होता है, सब ब्रह्म ही है, कोई भी वस्तु एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे भिन्न नहीं है। इस प्रकार उपासना करे। २. वह निर्गुण निराकार निष्क्रिय निर्विकार परमात्मा इस क्षणभङ्गुर नाशवान् जड दृश्यवर्ग मायासे सर्वथा अतीत है—इस प्रकार उपासना करे। ३. जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम सम्पूर्ण चराचर जगत् एक ब्रह्म है और वह ब्रह्म मैं हूँ। इसलिये सब मेरा ही स्वरूप है—इस प्रकार उपासना करे। ४. जो नाशवान् क्षणभङ्गुर मायामय दृश्यवर्गसे अतीत, निराकार, निर्विकार, नित्य विज्ञानानन्दघन निर्विशेष परब्रह्म परमात्मा है, वह मेरा ही आत्मा है अर्थात् मेरा ही स्वरूप है—इस प्रकार उपासना करे। अब इनको अच्छी प्रकार समझनेके लिये उपनिषदोंके प्रमाण देकर कुछ विस्तारसे विचार किया जाता है। (१) सर्गके आदिमें एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही थे। उन्होंने विचार किया कि 'मैं प्रकट होऊँ और अनेक नाम- रूप धारण करके बहुत हो जाऊँ' 'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति' (तैत्तिरीयोपनिषद् २। ६) इस प्रकार वह ब्रह्म एक ही बहुत रूपोंमें हो गये। इसलिये यह जो कुछ भी जड चेतन, स्थावर-जङ्गम जगत् है, वह परमात्मा का ही स्वरूप है। श्रुति कहती है— ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मै- वेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ (मुण्डक० २। २। ११) 'यह अमृतरूप परब्रह्म ही सामने है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दायीं ओर तथा बायीं ओर, नीचेकी ओर तथा ऊपरकी ओर भी फैला हुआ है. यह जो सम्पूर्ण जगत् है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है। संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः। ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ (मुण्डक० ३। २। ५) 'सर्वथा आसक्तिरहित और विशुद्ध अन्तःकरणवाले ऋषिदोग इस परमात्माको पूर्णतया प्राप्त होकर ज्ञानसे तृप्त एवं परम शान्त हो जाते हैं, अपने-आपको परमात्मामें संयुक्त कर देनेवाले वे ज्ञानीजन सर्वव्यापी परमात्माको सब ओरसे प्राप्त करके सर्वरूप परमात्मामे ही प्रविष्ट हो जाते हैं।' सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्। (माण्डूक्य० २) 'क्योंकि यह सब-का-सब जगत् परब्रह्म परमात्मा है तथा जो यह चार चरणोंवाला आत्मा है, वह आत्मा भी परब्रह्म परमात्मा है।' सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत। (छान्दोग्योपनिषद् ३। १४। १)

  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७३ 'यह समस्त जगत् निश्चय ही ब्रह्म है, इसकी उत्पत्ति, स्थिति और लय—उस ब्रह्मसे ही है—इस प्रकार समझकर शान्तचित्त हुआ उपासना करे।' (२) 'तत्' पदके लक्ष्य ब्रह्मके स्वरूपका, जो कुछ जड़-चेतन, स्थावर-जङ्गम चराचर संसार है, वह सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार निरूपण किया गया । अब उसी 'तत्' पदके लक्ष्यार्थ ब्रह्मके निर्विशेष स्वरूपका वर्णन किया जाता है । वह निर्गुण-निराकार अक्रिय निर्विकार परमात्मा इस क्षणभङ्गुर नाशवान् जड़ दृश्यवर्ग मायासे सर्वथा अतीत है । जो कुछ यह दृश्यवर्ग प्रतीत होता है, वह सब अज्ञानमूलक है । वास्तवमें एक विज्ञानानन्दघन अनन्त निर्विशेष ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । इस प्रकारके अनुभवसे वह इस जन्म-मृत्युरूप संसारसे मुक्त होकर अनन्त विज्ञान आनन्दघन ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है । यह बात शास्त्रों- में तथा उपनिषदोंमें अनेक जगह बतलायी गयी है । कठोपनिषद्में परब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करते हुए यमराज कहते हैं— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ (१।३।१५) 'जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित है तथा जो अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (असीम) महत्तत्त्वसे परे एव सर्वथा सत्य तत्त्व है, उस परमात्माको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे सदाके लिये छूट जाता है।' मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ (२।१।११) 'यह परमात्मतत्त्व शुद्ध मनसे ही प्राप्त किये जानेयोग्य है, इस जगत्में एक परमात्माके अतिरिक्त नाना—भिन्न-भिन्न भाव कुछ भी नहीं है, इसलिये जो इस जगतमें नानाकी भाँति देखता है, वह मनुष्य मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है अर्थात् बार-बार जन्मता-मरता रहता है।' मुण्डकोपनिषद्‌में भी कहा है— न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ (३।१।८) 'वह निर्गुण निराकार परब्रह्म परमात्मा न तो नेत्रोंसे, न वाणीसे और न दूसरी इन्द्रियोंसे ही ग्रहण करनेमें आता है तथा तपसे अथवा कर्मोंसे भी वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, उस अवयवरहित परमात्माको तो विशुद्ध अन्त:- करणवाला साधक उस विशुद्ध अन्तःकरणसे निरन्तर उसका ध्यान करता हुआ ही ज्ञानकी निर्मलतासे देख पाता है।' तैत्तिरीयोपनिषद्‌में भी कहा है— ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । (२।१।१) 'ब्रह्मज्ञानी परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है, उसी भावको व्यक्त करनेवाली यह श्रुति कही गयी है—ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है।' (३) 'तत्' पदकी उपासनाके प्रकारका वर्णन करके अब 'त्वम्' पदकी उपासनाका प्रकार बतलाया जाता है । जो कुछ जड़-चेतन स्थावर-जङ्गम प्रतीत होता है, वह सब ब्रह्म है और जो ब्रह्म है, वह मैं हूँ । इसलिये मनुष्यको सम्पूर्ण भूतोंमें अपने आत्माको अर्थात् अपने-आपको और आत्मामें सम्पूर्ण भूतोंको ओतप्रोत देखना चाहिये । अभिप्राय यह है कि 'जो भी कुछ है, सब मेरा ही स्वरूप है' इस प्रकारका अभ्यास करनेवाला साधक शोक और मोहसे पार होकर विज्ञान-आनन्दघन ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । यह बात शास्त्रोंमें तथा उपनिषदोंमें जगह-जगह मिलती है । गीतामें कहा है— सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ (६।२९) 'सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सर्वमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।' ईशावास्योपनिषद्‌में भी कहा है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ (६-७) उ० अ० १०—

७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ‘परन्तु जो मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मामें ही देखता है और आत्माको सारे भूतोंमें देखता है अर्थात् सम्पूर्ण भूतों- को अपना आत्मा ही समझता है, वह फिर किसीसे घृणा नहीं करता—सबको अपना आत्मा समझनेवाला किससे कैसे घृणा करे ? इस प्रकारसे जब आत्मतत्त्वको जाननेवाले महात्माके लिये सब आत्मा ही हो जाता है, तब फिर एकत्वका अर्थात् सबमें एक आत्माका अनुभव करनेवाले उस मनुष्यको कहाँ मोह है और कहाँ शोक है अर्थात् सबमें एक विज्ञान आनन्दमय परब्रह्म परमात्माका अनुभव करनेवाले पुरुषके शोक-मोह आदि विकारोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है।’ इस विषयका रहस्य समझानेके लिये छान्दोग्य-उपनिषद्में एक इतिहास आता है। अरुणका पौत्र और उद्दालकका पुत्र श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामे गुरुके पास विद्यालाभके लिये गया और वहाँसे वह विद्या पढकर चौबीस वर्षकी अवस्था होनेपर घर लौटा। वह अपनेको बुद्धिमान् और व्याख्यानदाता मानता हुआ अनम्रभावसे ही घरपर आया तथा उसने बुद्धिके अभिमानवश पिताको प्रणाम नहीं किया। इसपर उसके पिताने उससे पूछा— श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धो- ऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः। येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। (६।१।२-३) ‘हे श्वेतकेतु ! हे सोम्य ! तू जो अपनेको ऐसा महामना और पण्डित मानकर अविनीत हो रहा है, सो क्या तूने वह आदेश आचार्यसे पूछा है, जिस आदेशसे अश्रुत श्रुत हो जाता है, बिना विचारा हुआ विचारमें आ जाता है अर्थात् बिना निश्चय किया हुआ निश्चित हो जाता है और बिना जाना हुआ ही विशेषरूपसे जाना हुआ हो जाता है।’ इसपर श्वेतकेतुने कहा कि ‘भगवन् ! वह आदेश कैसा है।’ तब उद्दालक बोले— यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातꣳस्या- द्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। (६।१।४) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा समस्त मृत्तिकामय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है।’ यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातम् स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्। (६।१।५) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणि (सुवर्ण) का ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण सुवर्णमय पदार्थ जान लिये जाते हैं; क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल सुवर्ण ही है।’ यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातꣳ स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवꣳ सोम्य स आदेशो भवतीति। (६।१।६) ‘सोम्य ! जिस प्रकार एक नखनिकृन्तन (नहन्ना) अर्थात् लोहेके ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही है, हे सोम्य ! ऐसा ही वह आदेश है।’ यह सुनकर श्वेतकेतु बोला— न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धयेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाꣳस्त्वेव मे तद्ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच। (६।१।७) ‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे । यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते । अब आप ही मुझे अच्छी तरह बतलाइये।’ तब पिताने कहा—‘अच्छा सोम्य ! बतलाता हूँ।’ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । (६।२।१) ‘हे सोम्य ! आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।’ इसपर श्वेतकेतुने कहा—‘हे पिताजी ! मुझको यह विषय और स्पष्ट करके समझाइये ।’ उद्दालक आरुणि बोले—‘हे सोम्य ! जैसे दही मथनेसे उसका सूक्ष्मसार तत्त्व नवनीत ऊपर तैर आता है; इसी प्रकार जो अन्न खाया जाता है, उसका सूक्ष्म सार अंश मन बनता है । जलका सूक्ष्म अंश प्राण और तेजका सूक्ष्म अंश वाक् बनता है। असलमें ये मन, प्राण और वाणी तथा इनके कारण अन्नादि कार्यकारणपरम्परासे मूलमें एक ही सत् वस्तु ठहरते हैं । सबका मूल कारण सत् है; वही परम आश्रय और अधिष्ठान है । सत्के कार्य नाना प्रकारकी आकृतियाँ सब वाणीके विकार हैं, नाममात्र हैं। यह सत् अणुकी भाँति सूक्ष्म है, समस्त जगत्का आत्मारूप है। हे श्वेतकेतु ! वह ‘सत्’ वस्तु तू ही है—‘तत्त्वमसि ।’

  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७५ [बायाँ स्तम्भ] श्वेतकेतुने कहा—‘भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।’ पिता आरुणिने कहा—‘अच्छा, एक वट-वृक्षका फल तोड़कर ला ! फिर तुझे समझाऊँगा ।’ श्वेतकेतु फल ले आया । पिताने कहा—‘इसे तोड़कर देख, इसमें क्या है ?’ श्वेतकेतुने फल तोड़कर कहा—‘भगवन् ! इसमें छोटे-छोटे बीज हैं।’ ऋषि उद्दालक बोले—‘अच्छा, एक बीजको तोड़कर देख, उसमे क्या है ?’ श्वेतकेतुने बीजको तोड़कर कहा—‘इसमें तो कुछ भी नहीं दीखता ।’ तब पिता आरुणि बोले—‘‘हे सोम्य ! तू इस वट-बीजके सूक्ष्म तत्त्वको नहीं देखता, इस अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्वसे ही महान् वटका वृक्ष निकलता है। बस, जैसे यह अत्यन्त सूक्ष्म वट-बीज बड़े भारी वटके वृक्षका आधार है, इसी प्रकार सूक्ष्म मत् आत्मा इस समस्त स्थूल जगत्का आधार है। हे सोम्य ! मैं सत्य कहता हूँ, तू मेरे वचनमें श्रद्धा रख । यह जो सूक्ष्म तत्त्व आत्मा है, वह सत् है और यही आत्मा है । हे श्वेतकेतु ! वह ‘सत्’ तू ही है—‘तत्त्वमसि” ( ६ । १२ । ३ ) । इस प्रकार उद्दालकने अनेक दृष्टान्त और युक्तियोंसे इस तत्त्वको विस्तारसे समझाया है, किंतु यहाँ उसका कुछ दिग्दर्शनमात्र कराया गया है । पूरा वर्णन देखना हो तो छान्दोग्य-उपनिषद्मे देखना चाहिये । उपर्युक्त विषयके सम्बन्धमे बृहदारण्यक-उपनिषद्में भी इस प्रकार कहा है— ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत्तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेव प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एव वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इद सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषा स भवति । ( १ । ४ । १० ) “पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको ही जाना कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ । अतः वह सर्व हो गया । उसे देवोंमेंसे जिस-जिसने जाना वही तद्रूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्योंमेंसे भी जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना—‘मैं मनु हुआ और सूर्य भी’ । उस इस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’, वह यह सर्व हो जाता है । उसके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है ।” उपर्युक्त विषयका रहस्य समझानेके लिये बृहदारण्यक [दायाँ स्तम्भ] उपनिषद्में भी एक इतिहास मिलता है । महर्षि याज्ञवल्क्यके दो स्त्रियाँ थीं—एक मैत्रेयी और दूसरी कात्यायनी । महर्षि याज्ञवल्क्यने संन्यास ग्रहण करते समय मैत्रेयीसे कहा—‘मैं इस गृहस्थाश्रमसे ऊपर सन्यास-आश्रममें जानेवाला हूँ, अतः सम्पत्तिका बँटवारा करके तुमको और कात्यायनीको दे दूँ तो ठीक है।’ मैत्रेयीने कहा—‘भगवन ! यदि यह धनसे सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाय तो क्या म उससे किसी प्रकार अमृतस्वरूप हो सकती हूँ ?’ याज्ञवल्क्यने कहा—‘नहीं, भोग- सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा जीवन हो जायगा । धनसे अमृतत्वकी तो आशा है नहीं।’ मैत्रेयीने कहा—‘जिससे मैं अमृतस्वरूप नहीं हो सकती, उसे लेकर क्या करूँगी ? श्रीमान् ! जो कुछ अमृतत्वका साधन हो, वही मुझे बतलाइयें।’ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—‘धन्य है ! अरी मैत्रेयी ! तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और अब भी तू प्रिय बात कह रही है। अच्छा, मैं तुझे उसकी व्याख्या करके समझाऊँगा । तू मेरे वाक्योंके अभिप्रायका चिन्तन करना ।’ याज्ञवल्क्यने फिर कहा— ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेद सर्वं विदितम् ।’ ( २ । ४ । ५ ) ‘अरी मैत्रेयी ! सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं । यह आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है। हे मैत्रेयी ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एव विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ।’ तथा— ‘इदं ब्रह्मेद क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानीद सर्वं यदयमात्मा ।’ ( २ । ४ । ६ ) ‘हे मैत्रेयी ! यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और यह सब जो कुछ भी है, सब आत्मा ही है ।’ एव— ‘यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतर पश्यति तदितर इतर शृणोति तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिघ्रेत् तत्केन कं पश्येत्तत्केन क

७६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * श्रृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन क मन्वीत तत्केन कं विजानीयात् । येनेदम् सर्वं विजानाति तं केन विजानीया- द्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ।' ( २ । ४ । १४ ) 'जहाँ ( अविद्यावस्थामें ) द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यका मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है, किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किस- के द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसको किसके द्वारा जाने ? हे मैत्रेयी ! विज्ञाता को किसके द्वारा जाने ?' इस प्रकार बृहदारण्यक उपनिषद्के दूसरे तथा चौथे अध्यायमें यह प्रसङ्ग विस्तारसे आया है, यहाँ तो उसका कुछ अंश ही दिया गया है । ( ४ ) जो नाशवान्, क्षणभङ्गुर, मायामय दृश्यवर्गसे रहित निराकार, निर्विकार, नित्य, विज्ञानानन्दघन निर्विशेष परब्रह्म परमात्मा है, वह मेरा ही आत्मा है अर्थात् मेरा ही स्वरूप है, इस प्रकार उस निराकार निर्विशेष विज्ञानानन्दघन परमात्माको एकीभावसे जानकर मनुष्य उसे प्राप्त हो जाता है । श्रुति कहती है— योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । ( बृहदारण्यक० ४ । ४ । ६ ) 'जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ।' इस विषयका रहस्य समझानेके लिये— बृहदारण्यक उपनिषद्में एक इतिहास मिलता है । एक बार राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाला यज्ञ किया । उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके बहुत-से ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस समय राजा जनकने यह जाननेकी इच्छासे कि इन ब्राह्मणोंमें कौन सबसे बढ़कर प्रवचन करनेवाला है, अपनी गोशालामें ऐसी दस हजार गौएँ दान देनेके लिये रोक लीं, जिनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दस-दस पाद सुवर्ण बँधा था और उन ब्राह्मणोंसे कहा—'पूजनीय ब्राह्मणो ! आपमें जो ब्रह्मिष्ठ हों, वे इन गौओंको ले जायें।' ब्राह्मणोंने राजाकी बात सुन ली; किंतु उनमें किसीका साहस नहीं हुआ । तब याज्ञवल्क्य- ने अपने ब्रह्मचारीसे उन गौओंको ले जानेके लिये कहा । वह उन्हें ले चला । इससे वे सब ब्राह्मण कुपित हो गये और जनकके होता अश्बलने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मिष्ठ हो ?' याज्ञवल्क्यने कहा—'ब्रह्मिष्ठ- को तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' यह सुनकर क्रमशः अश्बल, आर्तभाग और भुज्युने उनसे अनेकों प्रश्न किये और महर्षि याज्ञवल्क्यने उनक भलीभाँति समाधान किया । फिर चाक्रायण उपस्तने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'हे याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' याज्ञवल्क्यने कहा— एष त आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो य प्राणेन प्राणिति स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानिति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः । ( ३ । ४ । १ ) 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है ।' उपस्तने पूछा— 'वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' याज्ञवल्क्यने कहा—'जो प्राणसे प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो अपान- से अपानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' उपस्तने फिर पूछा कि वह सर्वान्तर कौन-सा है। तब याज्ञवल्क्य पुनः बोले— ' 'सर्वान्तर । न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतार शृणुया न मतेर्मन्तार मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजा- नीयाः । एष त आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होपस्त- श्चाक्रायण उपरराम ।' ( ३ । ४ । २ ) 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है । तू उस दृष्टिके द्रष्टाको नहीं देख सकता; श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकता, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको नहीं जान सकता । तेरा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे भिन्न आर्त ( नाशवान् ) है।' यह सुनकर चाक्रायण उपस्त चुप हो गया । अथ हैन कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे

  • उपनिषदोंमें भेद और अभेद-उपासना * ७७ [बायाँ स्तम्भ] व्याचक्ष्वेत्येष त आत्मा सर्वान्तरः । कतमो याज्ञवल्क्य सर्वा- न्तरो योऽशनायापिपासे शोकं मोहं जरां मृत्युमत्येति । (३।५।१) 'इसके पश्चात् कौषीतकेय कहोलने 'हे याज्ञवल्क्य !' (इस प्रकार सम्बोधित करके) कहा—'जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम मेरे प्रति व्याख्या करो।' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' कहोलने पूछा—'याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर कौन-सा है।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है (वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है)।' फिर आरुणि उद्दालकने याज्ञवल्क्यसे कहा—'यदि तुम उस सूत्र और अन्तर्यामीको नहीं जानते हो और फिर भी ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमें कहा—'मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानताँ हूँ।' हे गौतम ! वायु ही वह सूत्र है, इस वायुरूप सूत्रके द्वारा ही यह लोक, परलोक और समस्त भूतसमुदाय गुँथे हुए हैं।' तब इसका समर्थन करते हुए उद्दालकने अन्तर्यामी- का वर्णन करनेको कहा। याज्ञवल्क्यने कहा— 'यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्त- र्याम्यमृतः ।' (३।७।३) 'जो पृथिवीमें रहनेवाला पृथिवीके भीतर है; जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका पृथ्वी शरीर है और जो भीतर रहकर पृथिवीका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। तथा— 'अदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोतामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञाता नान्योऽतोऽस्ति * विज्ञातैष त आत्मान्तर्याम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तं ततो होद्दालक आरुणिरुपरराम ।' (३।७।२३) 'वह दिखायी न देनेवाला किंतु देखनेवाला है, सुनायी न देनेवाला किंतु सुननेवाला है, मननका विषय न होनेवाला किंतु मनन करनेवाला है और विशेषताया ज्ञात न होने- वाला किंतु विशेषरूपसे जाननेवाला है । यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है। इससे भिन्न सब नाशवान [दायाँ स्तम्भ] है।' यह सुनकर अरुणपुत्र उद्दालक प्रश्न करनेसे निवृत्त हो गया। तदनन्तर वाचक्नवी गार्गीने तथा शाकल्य विदग्धने अनेकों प्रश्न किये, जिनके उत्तर याज्ञवल्क्यजीने तुरत दे दिये। अन्तमें उन्होंने शाकल्यसे कहा—'अब मैं तुमसे उस औपनिषद पुरुषको पूछता हूँ, यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया नहीं बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये उसका मस्तक गिर गया। फिर याज्ञवल्क्यने कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, वह मुझसे प्रश्न करे अथवा आपसे मैं प्रश्न करूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। इस विषयका रहस्य समझानेके लिये बृहदारण्यक- उपनिषद्में और भी कहा है— स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयं हि वै ब्रह्म भवति य एवं वेद। (४।४।२५) 'वह यह महान् अजन्मा आत्मा अजर, अमृत, अभय एव ब्रह्म है, निश्चय ही ब्रह्म अभय है, जो इस प्रकार जानता है, वह अवश्य अभय ब्रह्म ही हो जाता है।' यह 'त्वम्' पदके लक्ष्यार्थ समस्त दृश्यवर्गसे अतीत आत्मस्वरूप निर्विशेष ब्रह्मकी उपासनापर संक्षिप्त विचार हुआ। ऊपर बतलायी हुई इन उपासनाओंमेंसे किसीका भी भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर मनुष्यको परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। पहले साधक भेद या अभेद—जिस भावसे उपासना करता है, वह अपनी रुचि, समझ तथा किसीके द्वारा उपदिष्ट होकर साधन आरम्भ करता है, परन्तु यदि उसका लक्ष्य सचमुच भगवान्‌को प्राप्त करना है; तो वह चाहे जिस भावसे उपासना करे, अन्तमें उसे भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है, क्योंकि सबका अन्तिम परिणाम एक ही है। गीतामें भी भगवान्‌ने बतलाया है— यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ (५।५) 'ज्ञानयोगियोंके द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंद्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिये

७८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।' और भी कहा है— ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ (१३ । २४) 'उस परमात्माको कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिसे ध्यानके द्वारा हृदयमें देखते हैं; अन्य कितने ही ज्ञानयोगके द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोगके द्वारा देखते हैं अर्थात् प्राप्त करते हैं।' गीता, उपनिषद् आदि शास्त्रोंमें जितने साधन बतलाये हैं, उन सबका फल—अन्तिम परिणाम एक ही है और वह अनिर्वचनीय है, जिसे कोई किसी प्रकार भी बतला नहीं सकता । जो कुछ भी बतलाया जाता है, उससे वह अत्यन्त विलक्षण है । इस प्रकार यहाँ सगुण-निर्गुणरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माकी भेदोपासना एव अभेदोपासनापर बहुत ही संक्षेपसे विचार किया गया है । उपनिषदुक्त उपासनाका विषय बहुत ही विस्तृत और अत्यन्त गहन है । स्थान-सङ्कोचसे यहाँ केवल दिग्दर्शनमात्र कराया गया है । सुरुचि-सम्पन्न जिज्ञासु पाठक इस विषयको विशेषरूपसे जानना चाहें तो वे उपनिषदोंमें ही उसे देखें और उसका यथायोग्य मनन एंव धारण कर जीवनको सफल करें ।


ईशोपनिषद्‌में 'शक्तिकारणवाद' (लेखक—श्री १०८ स्वामीजी महाराज)

सृष्टिके आदिकालसे ही मनुष्य अक्षय सुख और शान्ति- की प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता रहा है। उसीका परिणाम धार्मिक जगत्‌में विस्तृत भिन्न-भिन्न सिद्धान्त एव पन्थभेद हैं। प्रारम्भ- कालमें प्रत्येक पन्थमें अनेकता देखनेमे आती है। पर जब सतत अभ्याससे राग द्वेष, आग्रह-अहङ्कार आदि अज्ञानजन्य दोष निवृत्त हो जाते हैं तथा वास्तविकता झलकने लगती है, तत्र भेदभावका मूल्य जाता रहता है और सर्वत्र एक तत्त्वका ही अनुगम होने लगता है । इस प्रसङ्गको वैदिक साहित्यके मूर्धन्य उपनिषद् ग्रन्थोंमे जिस प्रकारसे उपस्थित किया गया है, वैसा अन्यत्र कहीं भी मिलना अत्यन्त दुर्लभ है। सनातन कालसे ही तत्त्वज्ञानियोने परमतत्त्वको भिन्न-भिन्न नाम रूपोंसे अनुभव किया है एव उसीके अनुसार चलकर उन्होंने सिद्धि प्राप्त की है, क्योंकि चरम लक्ष्यकी प्राप्ति उसी परम तत्त्वकी उपलब्धिमें है और उसीमें अक्षय सुख एव शान्ति है। पिता, बन्धु, सखा आदि भावोंके आलम्बनसे जिस प्रकार सम्बन्ध जोड़कर हम उसे पहचानते हैं, वैसे ही मातृभाव- से भी उसे प्राप्त करते हैं; इसीका परिणाम शक्तिकी उपासना है जो कि सनातन कालसे ही हमारे देशमें प्रचलित है और कृपा, दया, करुणा, स्नेह आदि भावोंकी अभिव्यक्तिके लिये उपासनामार्गमे अपना श्रेष्ठ स्थान रखती है। स्वामी श्रीराम- तीर्थजीने अपने अमेरिकाके एक व्याख्यानमें इसे बड़े ही सुन्दर शब्दोंमे यों कहा है—

"In this country you worship God as the Father-'My Father which art in Heaven' But in India God is worshipped not only as the Father but as the Mother also The Mother is the dearest word in the Indian language (Mātājī), the blessed God the dearest God." “इस देशमें आप सब ईश्वरकी उपासना पिताके रूपमें करते हैं, जो कि स्वर्गमें रहता है, पर हिंदुस्थानमें पिता- के ही रूपमें उसकी उपासना नहीं होती है, बल्कि उसे माता- के रूपमें भी पूजते हैं। भारतीय भाषामें 'माताजी' यह अत्यन्त प्रिय शब्द है। यह परम कल्याणका करनेवाला परम प्रिय ईश्वरतत्त्व है !”

शक्तितत्त्व नाम-रूपसे व्यक्त सभी पदार्थोंमें शक्तितत्त्व धर्म या गुण- रूपसे व्यक्त हो रहा है, इसीसे पदार्थका परिचय होता है और उसका व्यवहार किया जाता है। यह तत्त्व परम सत्ता— ब्रह्ममे अपृथक् रूपसे विद्यमान है। उपनिषद्‌के ऋषियोंने बतलाया है—'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' वास्तवमें यह तत्त्व देवकी स्वरूपशक्ति है। देवको अचलरूपसे अपनी सत्ता- में धारण किये हुए है। यह पदार्थ शक्तिके सिवा भिन्न नहीं हो सकता। इसीलिये आचार्यप्रवर श्रीशङ्करस्वामीने कहा है— शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं

  • ईशोपनिषदमें 'शक्तिकारणवाद' * न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि । (सौ० ल०) शक्तियुक्त ब्रह्म ही कार्य करनेमें समर्थ होता है, अन्यथा वह कुछ भी नहीं कर सकता। ब्रह्मवाद निरीह, निष्क्रिय, निरञ्जन आदि लक्षणोंवाले परम तत्त्वको बतलाता है, परंतु ऐसे लक्षणोंवाले तत्त्वसे सृष्टि-कार्य नहीं हो सकता, न उससे सृष्टिका सङ्कल्प ही बन सकता है, न उसमे आविर्भाव-तिरोभाव ही हो सकते हैं। अतएव शक्ति-पदार्थको ही जगत्‌का कारण मानना पड़ता है। इस मतमें ब्रह्म जीवको भी अन्ततोगत्वा धर्मी शक्तिके रूपमें अङ्गीकार कर लिया गया है। इस प्रकार सारा विश्व शक्तिमयके रूपमें ही दृष्टिगोचर होता है— 'सर्वं शाक्तमजीवन्त्‌' (बह्वृच०) इस श्रुतिका भाव ही सर्वत्र अनुभूत होता है। 'ईशावास्य- मिदम्' इसी अभिप्रायका द्योतक है। इसलिये शक्तिकारणवाद ही युक्तिसङ्गत सिद्धान्त है। 'तदेजति तन्नैजति' इत्यादि मन्त्रका अर्थ ब्रह्मवादसे ठीक सङ्गत नहीं लग सकता, क्योंकि 'एजृ कम्पने'का अर्थ क्रियापरक ही है। निष्क्रिय ब्रह्मवाद- में यह असम्भव है। इसकी यथार्थ सङ्गति शक्तिकारणवादसे ही लग सकती है। इसी प्रकार अन्य मन्त्रोंका अर्थ भी समझना चाहिये। द्वैत-विशिष्टाद्वैतवादोंमे तो शक्तिपदार्थ माना ही जाता है। शक्तिवादके सर्वथा विपरीत मायावादमे भी इसे मानना ही पड़ा है। स्वामी श्रीविद्यारण्यने कहा है— वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा । अन्योन्यधर्मसाङ्कर्याद्विप्लवेत् जगत्खलु ॥ (प० द० ३।३९) 'वस्तुधर्मको नियमन करनेवाली यदि शक्ति न हो तो परस्पर अन्योन्य धर्मका सङ्कर होकर जगत् नष्ट हो जायगा।' शक्तिपदार्थ स्वसत्ताशून्य मिथ्या होकर जगत्‌का नियामक कैसे हो सकता है, यह एक विचारणीय बात इस मतमें है। -शाक्तसिद्धान्तमें शक्तिपदार्थ स्वतन्त्र सच्चिदानन्दस्वरूप माना गया है। इसीके अनुसार ईशोपनिषद्‌का अर्थ कैसे सङ्गत होता है, इसे यहाँ बताते हैं। उपनिषदर्थ-संगति काण्व-माध्यन्दिनी दोनों शाखाओंके पाठानुसार इस उपनिषद्में एक ही तत्त्वका प्रतिपादन हुआ है। यद्यपि दोनों- के पाठोंमें शब्दकृत अनेक भेद हैं तथापि मौलिक अर्थमें भेद नहीं है। उपक्रमोपसंहारन्यायसे एक ही पराशक्तिसे आरम्भ करके उसीमें उपसंहार किया गया है। 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' इस मन्त्रमें 'ईशाया आवास्यम्' ऐसा अ ऽ लेनेसे 'ईशा' परा- शक्तिरूप परब्रह्मका अभिन्न रूप ही यहाँ अभिप्रेत होता है; इसी पराशक्तिका यह सारा संसार वासस्थान है। इसमे त्याग- रूपसे अर्थात् उसीका सब कुछ है, उसके प्रसादरूपसे ही भोग्य-वस्तुओंका ग्रहण कर मुमुक्षुको अपना निर्वाह करना चाहिये । 'ददाति प्रतिगृह्णाति'के अनुसार ही परम सिद्धि प्राप्त होती है। यह अर्थ उपक्रमसे कथन कर उपसंहारमें 'योऽसाव- सौ पुरुषः सोऽहमस्मि' (१६) इस मन्त्रार्थके द्वारा पराशक्तिमें ही उपसहार किया गया है। 'सोऽहम्' यह पराशक्तिका वाचक है। सकारः शक्तिरूपः स्याद्धकारः शिवरूपक । उभयोरैक्यमादाय पराशक्तिरुदीर्यते ॥ इस तन्त्रवचनसे यह स्फुट होता है। प्रथम मन्त्रमें जो तत्त्व कहा गया है उसे जान लेनेपर संसारमें कर्म करते हुए भी साधक निर्लिप्त रहता है, यह दूसरे मन्त्रका अर्थ है। तीसरे मन्त्रमें आत्मज्ञानकी आवश्यकता बतायी गयी है। चौथे- पाँचवें मन्त्रोंमें परमात्माका स्वरूपलक्षण बताया गया है, छठे-सातवेंमें आत्मज्ञानका फल शोक-मोहकी निवृत्तिरूप कहा गया है। आठवेंमें जगत्‌के सञ्चालक सगुण रूपको बताया गया है। इस प्रकार प्रथम वर्णक आठ मन्त्रोंका है। शक्तिका निर्देश प्रायः स्त्रीलिङ्ग शब्दोंसे ही होता है; परंतु यह नियम नहीं है कि पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्गका प्रयोग उसके विषयमें वर्जित हो। कवि कालिदासने कहा है— न त्वमम्ब पुरुषो न चाङ्गना चित्स्वरूपिणि न षण्ढतापि ते । नापि भर्तुरपि ते त्रिलिङ्गिता त्वां विना न तदपि स्फुरेद्यम् ॥ इसलिये इन उक्त आठों मन्त्रोंमें पुँल्लिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग शब्दोंका प्रयोग उक्त अर्थकी सिद्धिमें विरुद्धताका आपादक नहीं हो सकता। दूसरे वर्णकमें विद्या-अविद्या, सम्भूति-असम्भूतिके रहस्य- का वर्णन छः मन्त्रोंमें किया गया है। निर्देश तथा अर्थके अनुसार यह अर्थ शक्तिपरक ही है। शेष तीन मन्त्रोंमें उक्त अर्थका उपसंहार करके शक्ति-तत्त्वमें पर्यवसान किया गया है; एवं अद्वैतकी सिद्धिके लिये जीव-तत्त्वका अभेद 'अस्मि' क्रियापदसे बताया गया है। अन्तिम मन्त्रमें क्रममुक्तिके प्रापक मार्ग (देवयान) को बताया है, जो मध्यमाधिकारियोंके लिये कहा गया है। ईशा, विद्या, अविद्या, सम्भूति, असम्भूति, सोऽहम् आदि शक्तिवाचक अनेकों पदोंका प्रयोग उक्त अर्थको

८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * निःसन्दिग्ध रूपसे सिद्ध करता है, जिससे ईशोपनिषद्‌का तात्पर्य 'शक्ति-कारणवादसे' स्पष्ट हो जाता है।

विद्या, अविद्या, सम्भूति, असम्भूति

'विद्या-अविद्या' आदि प्रतिपादन करनेवाले छः मन्त्रोंके अर्थ उपनिषद्‌के भाष्यकारोंने भिन्न भिन्न रीतिसे परस्पर विलक्षण रूपसे किये हैं। कोई समुच्चयवादके अनुसार, कोई क्रमसमुच्चयके अनुसार, तो कोई कुछ, तो कोई कुछ। सम्भूति- असम्भूतिका भी अर्थ ऐसे ही किया गया है—कोई विज्ञानवाद- के खण्डनमें करते हैं, तो कोई प्रतिमा पूजनके निषेधमे। इन अर्थांपर दृष्टि डालते हैं तो इनका अभिप्राय समझना एक दुरूह कार्य प्रतीत होता है। 'ललितासहस्रनाम'के 'सौभाग्य- भास्कर' भाष्य करनेवाले स्वनामधन्य आचार्य भास्कररायने 'विद्याविद्यास्वरूपिणी' इस नामकी जो विलक्षण व्याख्या की है उसे यहाँ देते हैं, जिससे इसका यथार्थ अर्थ समझा जा सकता है—

विद्या चाविद्या च यस्तद्वेदोभय सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥

इति श्रुतौ प्रसिद्धे विद्याविद्ये, विद्या स्वात्मरूपं ज्ञानम् अविद्या चरमवृत्तिरूपं ज्ञान तदुभय स्वरूपमस्याः । उक्त च बृहन्नारदीये—

तस्य शक्तिः परा विष्णोर्जगत्कार्यपरिक्षमा । भावाभावस्वरूपा सा विद्याविद्येति गीयते ॥

इति देवीभागवतेऽपि ब्रह्मैव सातिदुष्प्रापा विद्या- विद्यास्वरूपिणीति । तत्रैव स्थलान्तरे 'विद्याविद्येति देव्या द्वे रूपे जानीहि पार्थिव । एकया मुच्यते जन्तुरन्यया बध्यते पुनरिति । यद्वा विद्यैव चरमवृत्तिरूपं ज्ञानम्, अविद्या भेदभ्रान्तिरूपं ज्ञानं स्वपरब्रह्मात्मकं ज्ञानम् । स्वपदस्यात्म- वाचित्वात् स्वं ज्ञातावात्मनीति कोशात्, एतत्त्रयं रूपमस्या.। उक्तं च लैङ्गे—

भ्रान्तिर्विद्या परं चेति शिवरूपमिदं त्रयम् । अर्थेषु भिन्नरूपेषु विज्ञानं भ्रान्तिरुच्यते ॥ आत्माकारेण संवित्तिर्बुद्धेर्विद्येति कथ्यते । विकल्परहितं तत्त्वं परमित्यभिधीयते ॥ इति ।

अर्थात् 'विद्या चाविद्या च' इस मन्त्रमें विद्याविद्या प्रसिद्ध है। विद्या स्वात्मरूप ज्ञान और अविद्या चरमवृत्तिरूप 'अहं ब्रह्मास्मि' का ज्ञान—ये दोनों जिसके स्वरूप हैं, उसे विद्याविद्या कहते हैं। परोक्षापरोक्ष ज्ञान भी वेदान्तमें इसकी संज्ञा है। बृहन्नारदीयमे कहा है—'उस परमात्माकी पराशक्ति जगत्कार्य करनेमें समर्थ है। वह भाव-अभाव रूपवाली विद्या- विद्या शब्दसे कही जाती है।' देवीभागवतमें भी कहा है—'वह दुष्प्राप्य पराशक्ति ब्रह्म ही है। वह विद्याविद्यास्वरूपवाली है।' वहीं दूसरे स्थलपर कहा है—'हे राजन् ! विद्याविद्या दो रूप देवी- के हैं, एकसे प्राणी मुक्त होता है और दूसरेसे बँधता है। अथवा विद्या ही चरमवृत्तिरूप ज्ञान है। भेद-भ्रान्तिरूप ज्ञान अविद्या है, 'स्व' परब्रह्म ज्ञान—ये तीनों जिसके स्वरूप हैं 'स्व'पद आत्मा- का वाचक है।' लिङ्गपुराणमें कहा है—'भ्रान्ति, विद्या और पर— ये तीन रूप शिवके हैं। पदार्थोंमे भेदबुद्धिरूप जो ज्ञान है, वह 'भ्रान्ति' है। आत्माकार अनुभव 'विद्या' है, विकल्परहित तत्त्व 'पर' है।' इन पुराण-वचनोंसे विद्याविद्याका अर्थ व्यक्त हो जाता है, जिसे महर्षि व्यासने भिन्न-भिन्न प्रसङ्गोंपर पुराणोंमे व्याख्यान किया है—

सम्भूति-असम्भूति साकार-निराकार उपासनाके द्योतक हैं। उत्तरगीतामें इसी रूपमे माना गया है। जिस तरह परोक्षापरोक्ष ज्ञानका साहचर्य है, ऐसा ही सम्भूति-असम्भूति- का भी साहचर्य अभिप्रेत है। ऐसा अर्थ माननेपर स्वाभाविक अर्थसंगति लग जाती है। लिङ्गपुराणमें ज्ञानके जो तीन भेद कहे गये हैं, उनकी संगति इस उपनिषद्में बैठ जाती है। आठ मन्त्रतक तत्त्व-ज्ञान, छः मन्त्रोंमें विद्याविद्याका ज्ञान और शेष अविद्यामे ही पर्यवसित हैं।

उपसंहार

संक्षिप्त रूपमें पराशक्तिका ईशोपनिषत्प्रतिपादित जो क्रम यहाँ बताया गया है, उसका समन्वय वेदान्तवाक्योंमें भी है, जिसे देवीभागवत आदि शक्तिके पुराण-ग्रन्थ एवं तन्त्रोंमें माना गया है। उसके अध्ययन करनेवाले पाठक इससे भलीभाँति परिचित हैं। इस संकेतमात्रसे यद्यपि सर्वथा समाधान होना अशक्य है, तथापि विचारकोंके लिये एक मार्ग अवश्य निर्दिष्ट हो जाता है, जिसे कोई समानधर्मा पूर्ण कर सकेगा। ॐ शम्। प्रेषक—पं० श्रीरेवाशंकरजी त्रिपाठी, श्रीपीताम्बरापीठ

ब्रह्म और ईश्वरसम्बन्धी औपनिषदिक विचार ( लेखक-दीवानबहादुर श्री के० एस० रामस्वामी शास्त्री ) आज तो ऐसी धारणाओंका अस्तित्व देखनेमे आ रहा है, जिनसे हिंदुत्वके अन्त.प्रासादमें भी दरारें पड़ गयी है । उनसे हिंदुत्वकी अखण्डता संत्रस्त हो रही है । वहाँ उन्हींकी समीक्षा करनेका विचार है । पहली धारणा यह है कि श्रीशंकराचार्यके अद्वैत-वेदान्तने हिंदूधर्ममे एक नये सम्प्रदाय- को जन्म दिया और यह प्रस्थानत्रयके तीनो अङ्ग उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीतामेसे किसीके द्वारा भी अनुमोदित नहीं है । दूसरी धारणा यह है कि हिंदू-दर्शनके अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत—ये तीनों सम्प्रदाय परस्परविरोधी हैं, और हिंदूधर्मका कोई अविकल रूप नहीं है वर कई बेमेल मान्यताओंका यह एक अदृढ समुदायमात्र है । शक्तिहीन और अब अस्तित्वहीन राष्ट्रसङ्घ ( League of Nations ) के ही समरूप यह एक दुर्बल धर्मसङ्घ है । पर यथार्थ तो कुछ और ही है । ये दोनों धारणाएँ विल्कुल झूठी हैं । सम्प्रदाय और श्रुति दोनों अद्वैत-वेदान्तका पूर्णरूपसे अनुमोदन करते हैं और अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत—ये तीनों ही किसी अखण्ड और एक ही धर्मके विभिन्न अङ्ग हैं, ठीक उसी तरह, जैसे शिव, विष्णु और ब्रह्मा—ये त्रिमूर्तियाँ वास्तवमें तीन रूपोंवाली एक ही मूर्ति हैं (कालिदास कुमारसम्भवमे कहते हैं—'एकैव मूर्तिर्बिभिदे त्रिधा सा' ) । इस एक मूर्तिकी सबसे सुन्दर अभिव्यक्ति शायद भगवान् दत्तात्रेयके सम्मिलित रूपमें हुई है । पहले पहली धारणाको कसौटीपर रखते हैं । वास्तविक बात तो यह है कि श्रीशङ्कराचार्यजीने स्वयं सम्प्रदायके अनुगमनमे विशेष गौरव माना है । वे कहते हैं— असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि मूर्खवदुपेक्षणीय । 'सम्प्रदायको न जाननेवाला सब शास्त्रोका पण्डित भी मूर्खके समान उपेक्षणीय है।' अपने तैत्तिरीयोपनिषदके भाष्यारम्भमे वे कहते हैं— यैरिमे गुरुभि पूर्वं पदवाक्यप्रमाणत । व्याख्याता सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ पूर्वकालमे जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है, उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ। उनके कथनानुसार सूत्रोंमे श्रुतिका सार है और उनके भाष्यमें प्रस्थानत्रयकी सम्प्रदायगत व्याख्याको ही प्रकट किया गया है। 'वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात् सूत्राणाम् ।' ( सूत्रभाष्य ) 'तदिद गीताशास्त्र समस्तवेदार्थसारसंग्रहभूते दुर्विज्ञेयार्थम्' ( गीताभाष्य ) फिर श्रीशङ्कराचार्यने बार-बार इस बातको आग्रह- पूर्वक कहा है कि ईश्वरविषयक ज्ञानका एकमात्र एवं सर्वश्रेष्ठ साधन श्रुति है । इसका अनुकूल तर्कसे समर्थन प्राप्त होना चाहिये तथा जिज्ञासुको अनुभव, अवगति अथवा साक्षात्कार आदि नामोंसे वाच्य स्थितिको प्राप्त करा देनेकी इसमे शक्ति होनी चाहिये । वे वेदोंको स्वतःप्रकाश और स्वत प्रमाण मानते थे और इसकी घोषणा भी करते थे । 'वेदस्य हि निरपेक्ष स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिव रूपविषये ।' शङ्करके मतमें निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म एक ही वस्तु- के दो रूप हैं । स्वरूप-दृष्टिसे वे निर्गुण है और जगत्के सम्बन्धसे वे सगुण हैं। अपने स्वरूपलक्षण तथा तटस्थलक्षणके सिद्धान्तद्वारा वे एक अनन्त, सनातन आनन्दतत्त्वमें द्वैतकी उद्भावना किये बिना भी विभेदकी स्थापना करनेमें समर्थ हुए हैं । निम्नलिखित श्रुतिवाक्योसे इस विषयका यथार्थ निर्णय हो जाता है । विशिष्टाद्वैती अथवा द्वैती इनकी किमी और प्रकारसे व्याख्या नहीं कर सकते । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन क पश्येत् · · · केन कं विजानीयात् । ( बृहदारण्यक० ४।५।१५ ) 'जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे • और किसके द्वारा किसे जाने ।' वाचारम्भण विकारो नामधेय मृत्तिकेत्येव सत्यम् । ( छान्दोग्य० ६।१।४ ) 'विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ।' यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति उ० अ० ११—१२—

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८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [बायाँ स्तम्भ] स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । ( छान्दोग्य० ७ । २४ । १ ) 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता—वह भूमा है, किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एव कुछ और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वही मर्त्य है।' इदꣳ सर्वं यदयमात्मा । ( बृहदारण्यक० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७ ) 'यह सब आत्मा ही है।' आत्मैवेदं सर्वम् । ( छान्दोग्य० ७ । २५ । २ ) 'आत्मा ही यह सब है।' ब्रह्मैवेदꣳ सर्वम् । ( नृसिंह० ७ । ३ ) 'ब्रह्म ही यह सब है।' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । ( छान्दोग्य० ६ । २ । १ ) 'हे सोम्य ! आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते । ( केन० १ । ५ । ८ ) 'उसीको तू ब्रह्म जान । जिसकी लोक उपासना करता है, वह ब्रह्म नहीं है।' प्रज्ञानं ब्रह्म । ( शु० २० २ । १ ) 'प्रज्ञान ही ब्रह्म है।' तत्त्वमसि । ( छान्दोग्य० ६ । ८ । ७, ६ । १० । ४, ६ । १४ । ३ ) 'वही तू है।' अयमात्मा ब्रह्म । ( बृहदारण्यक० २ । ५ । १९ ) 'यह आत्मा ही ब्रह्म है।' अहं ब्रह्मास्मि । ( बृहदारण्यक० १ । ४ । १० ) 'मैं ब्रह्म हूँ।' इसी प्रकार यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि बादरायणके ब्रह्मसूत्र इस बातपर जोर देते हैं कि परमात्मा ही जगत्‌का स्रष्टा, पालक और सहारकर्ता है और जीवात्मा परमात्मासे प्रेरित एव नियन्त्रित हुआ गतागतके चक्रमें तबतक घूमा करता है जबतक कि ब्रह्मलोकमें पहुँचकर अनावृत्तिको नहीं [दायाँ स्तम्भ] प्राप्त हो जाता । पर वे आत्मा एव परमात्माकी आत्यन्तिक, वास्तविक, आन्तरिक एव नैसर्गिक एकतापर भी जोर देते हैं और इस बातकी घोषणा करते हैं कि जगत्‌की प्रातिभासिक सत्ता ब्रह्मकी पारमार्थिक सत्तापर अवलम्बित है तथा मूलतः दोनों एक ही हैं । तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः । ( ब्रह्म० २ । १ । १४ ) —सूत्रकी व्याख्या करते हुए अपने भाष्यमें श्रीशङ्कराचार्य- जी कहते हैं— तस्माद् यथा घटकरकाद्याकाशानां महा- काशानन्यत्वम्, यथा च मृगतृष्णिकोदकादीनामू- षरादिभ्योऽनन्यत्व दृष्टनष्टरूपत्वात् स्वरूपेणानुपारख्यत्वात्, एवमस्य भोग्यभोक्त्रादिप्रपञ्चजातस्य ब्रह्म- व्यतिरेकेणाभाव इति द्रष्टव्यम् । . . . सूत्रकारोऽपि परमार्थोऽभिप्रायेण तदनन्यत्वमित्याह । . . . अप्रत्याख्यायैव कार्यप्रपञ्च परिणामप्रक्रिया चाश्रयति । इसलिये जैसे घटाकाश, करकाकाश आदि महाकाशसे अभिन्न हैं, जैसे जल-सी भासनेवाली मृगतृष्णा ऊपरसे अभिन्न है, क्योंकि उनका स्वरूप दृष्टिगोचर होकर नष्ट हो जाता है और वे सत्तारहित हैं, उसी प्रकार यह भोक्तृ, भोग्ये आदि प्रपञ्च ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, ऐसा समझना चाहिये । ... सूत्रकार भी परमार्थके अभिप्रायसे 'तदनन्यत्वम्०' ( कार्य- कारणका अनन्यत्व—अभेद है) ऐसा सूत्रमें कहते हैं। .. और कार्य प्रपञ्चका प्रत्याख्यान किये बिना परिणाम प्रक्रियाका आश्रयण करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । ( १३ । २ ) 'हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान ।' अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । ( १० । २० ) 'हे अर्जुन ! मै सब भूतोंके हृदयमे स्थित सबका आत्मा हूँ।' अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ ( १३ । १२ ) 'वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही ।' अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । ( १३ । ३१ ) 'हे अर्जुन ! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमे स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।'

  • ब्रह्म और ईश्वरसम्बन्धी औपनिषदिक विचार * ८३ इस प्रकार निर्गुण ब्रह्मकी सत्ताको स्वीकार करते हुए भी जिसकी स्वीकृति हमें काट, हेगेल, शोपेनहर, ब्रैडले, बोसैन्के प्रभृति पश्चिमी विचारकोंके दर्शनोंमें भी मिलती है, श्रीशङ्करको सगुण ब्रह्मकी भक्तिकी परम महिमाको स्वीकार करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई । वास्तवमें वे भगवान्के सबसे बड़े भक्त हैं । 'भज गोविन्दम्, हरिमीडे' आदि अपने भक्तिपूर्ण स्तोत्रोंमें ही नहीं, वर अपने प्रकरण ग्रन्थोंमें भी उन्होंने इस सत्यको निर्भ्रान्तरूपसे स्पष्ट कर दिया है । उनके प्रबोध सुधाकरमें श्रीकृष्णका परमानन्दसे ओतप्रोत वर्णन और स्तवन है। उसी ग्रन्थमें वे आगे चलकर ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्गका अन्तर बतलाते हुए कहते हे कि दूसरेकी अपेक्षा पहला मार्ग दुर्गम और जटिल है, पर दोनोंसे जिस जिस आनन्दकी प्राप्ति होती है वे दो प्रकारके होते हुए भी अनन्त, भेदरहित, परम और सनातन हैं । श्रीकृष्ण ही मूर्त्तब्रह्म भी हैं और अमूर्तब्रह्म भी । इसलिये हमारी इच्छा या योग्यताके अनुरूप वे हमें या तो सायुज्य प्रदान करते हे, या कैवल्य । मूर्तं चैवामूर्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥ इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ । क्लेशादवलेशाद्वा मुक्ति स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥ . . . . . . श्रुतिभिर्महापुराणै. सगुणगुणातीतयोरैक्यम् । यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१९४॥ भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमय सच्चिदानन्द । प्रकृते. पर. परात्मा यदुकुलतिलक स एवायम् ॥१९५॥ . . . . . . यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथ. । सर्वगत. सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्द. ॥२००॥ 'मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्मके रूप हैं—ऐसा उपनिषद् कहते हैं, और भगवान्ने भी उन दोनों रूपोंके (व्यक्तीपासक तथा अव्यक्तोपासकभेदसे) दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक अव्यक्तोपासकको क्लेशसे और दूसरे व्यक्तोपासकको सुगमतासे मुक्ति मिलती है ।' 'श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता गूढभावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ । जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, ये यदुकुलभूषण श्रीकृष्ण वही तो हैं।' 'यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायी देते हैं, तथापि सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्द- स्वरूप ही हैं।' इसको मैं गीताके इन दो प्रसिद्ध श्लोकोंकी सर्वोत्तम व्याख्या समझता हूँ । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । (१२।४-५) 'वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमे रत योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं। किंतु उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्तचित्त- वाले पुरुषोके साधनमें परिश्रम विशेष है।' ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ (१४।२७) 'उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्य धर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मै (श्रीकृष्ण) हूँ।' इस छोटे से लेखमे दूसरी भ्रामक धारणाका भी थोड़ेमे ही निराकरण करके सन्तोष करना है। जैसे त्रिमूर्तियाँ एक- दूसरेके प्रति विरूद्ध और सघर्षशील नहीं हे, उसी प्रकार अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत भी परस्पर विरोधी अथवा एक- दूसरेके प्रति प्रहार करनेवाले सम्प्रदाय नहीं हैं । त्रिमूर्तियोंके पारस्परिक युद्ध-सम्बन्धी पुराणोंमे वर्णित कुछ कथाओका प्रयोजन अन्धानुगमन और कट्टरताको प्रोत्साहन देना नही, वर एक ही सच्चिदानन्दघन भगवान्के विभिन्न रूपोंमेसे अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार माने हुए रूपविशेषमें भक्तिको घनीभूत करना है । श्रीव्यासजीने इन कथाओंको इसलिये नहीं लिखा है कि लोग उन्हें पढकर आपसमें सरफोड़ी करें, या एक दूसरेको बुरा-भला कहे और ललकारते फिरें । उन्होंने तो केवल उसी विचार-बीजको विभिन्न रूपोंमे विस्तारके साथ पल्लवित किया है, जिससे प्रेरित होकर उपनिषदोंके द्रष्टा ऋषियोंने केनोपनिषद्में यह कहा था कि इन्द्र तथा अन्य देवताओंको परब्रह्मका ज्ञान उमाने कराया था । ब्रह्मकी एकताको ऋग्वेद बहुत पहले ही घोषित कर चुका था—'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (एक ही सत्यको विद्वान् लोग अलग-अलग पुकारते हैं) । त्रिमूर्तियों- मे व्यवहारको लेकर जो भेद है, वह उनकी तात्त्विक एकता- का बाध नहीं करता । यह बात वैसी ही है, जैसे वायसराय और गवर्नर-जनरलके कार्य अलग-अलग होते हुए भी वे इन

८४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *


[बायाँ स्तम्भ]

पदोंके अधिकारीकी एकताको नहीं मिटाते या जैसे जिला-न्यायाधीश और सेशन्स-जजके कार्य अलग-अलग होते हुए भी इन पदोंपर आसीन एक ही अधिकारीकी एकताको नहीं नष्ट करते ।

मेरे विचारसे इसी प्रकार अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत सिद्धान्तोंकी एकता भी अक्षुण्ण है। यहाँ भी श्रीकृष्णकी वाणी सदाकी भाँति हमे समन्वयकी कुञ्जी प्रदान करती है—

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ (गीता ९। १५)

'दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण निराकार ब्रह्मका ज्ञानयज्ञके द्वारा अभिन्नभावसे पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं, और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराटरूप परमेश्वरकी पृथग्भावसे उपासना करते है।' सायुज्य और कैवल्यके स्वरूपमें कोई भेद नहीं है । विशिष्टाद्वैतकी विदेहमुक्ति अद्वैतीकी जीवन्मुक्तिका निराकरण नहीं करती । द्वैती तब भूल करता है, जब वह नित्यबद्ध और नित्य संसारी जीवोंकी बात कहता है। मोक्षके अधिकारी सभी हैं, परतु इतना तो हम समझ सकते हैं कि जबतक प्राकृत शरीरका अभ्यास बना है, तबतक श्रेणीविभाजन रहेगा ही और शुद्ध सात्त्विक अप्राकृत देहका अभिमान हो जानेपर श्रेणीविभाजन नहीं रहेगा, अपितु साम्यके रूपमें एकता हो जायगी (निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति) । किंतु इन अवस्थाओंका अनुभव असप्रज्ञात समाधिमें निष्पन्न होनेवाली परमात्माके साथ आत्माकी अविकल एकाकारताके अनुभवका निराकरण नहीं करता। श्रीरामकृष्ण परमहंसके शब्दोंमें तालावमें छोड़ देनेपर विल्कुल भीग जानेपर भी कपड़ेकी गुड़िया अपनी आकृति को बनाये रक्खेगी, परतु चीनी अथवा नमककी गुड़िया अपने भिन्न आकारको तो खो ही देगी, वह तड़ागमें घुल मिलकर उसीमे विलीन भी हो जायगी।

मेरी समझसे निम्नाङ्कित दो प्रसिद्ध श्लोक हमे उस धरातलपर पहुँचा देते हैं जहाँसे हम, जिन्हें आजकल लोग परस्पर प्रतिकूल, विरोधी और विनाशी समझते हैं, उनमें सामञ्जस्य, समता और एकताका अवलोकन कर सकते हैं।

दृष्टिं ज्ञानमयी कृत्वा पश्येद् ब्रह्ममयं जगत् । देहबुद्ध्या तु दासोऽहं जीवबुद्ध्या त्वदंशकः । आत्मबुद्ध्या त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मति ॥


[दायाँ स्तम्भ]

'आँखोंमे ज्ञानाञ्जन लगाकर संसारको ब्रह्ममय देखना चाहिये ।'

'देहबुद्धिसे तो मे दास हूँ, जीवबुद्धिसे आपका अंग ही हूँ और आत्म बुद्धिसे मैं वही हूँ जो आप हैं। यही मेरी निश्चित मति है।'

इसीलिये तो ब्रह्मसूत्रके अध्याय दो, पाद तीनमे आत्माकी परमात्मासे पृथक्ता और उसपर निर्भरता बताकर सूत्रकार कहते हैं—

'आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च ।' (४ । १ । ३)

इस सूत्रपर भाष्य करते हुए श्रीशङ्कराचार्यजी अन्तमें कहते हैं—

'तस्मादात्मत्वेनेश्वरे मनो दधीत ।'

इस कारण यह मेरा आत्मा ही है, इस प्रकार ईश्वरमे मन लगाना चाहिये ।'

इस दृष्टिकोणके द्वारा सूत्रकारने बादरिको इस मान्यताका कि, मोक्षकी अवस्था मे जीवात्माका मन और इन्द्रियोंसे सम्बन्ध छूट जाता है, जैमिनिके इस मतके साथ कि यह सम्बन्ध उस अवस्थामें भी बना रह सकता है, समन्वय किया है। बादरायण कहते हे कि परमानन्द दो प्रकारका अर्थात् उभयविध होता है।

अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४।४।१० ॥ भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४।४।११ ॥ द्वादशाहवदुभयविध बादरायणोऽत ॥ ४।४।१२ ॥

श्रीशङ्कराचार्यजी इसपर अपने भाष्यमे स्पष्ट कहते हं—

'बादरायण पुनराचार्योऽत एवोभयलिङ्गश्रुतिदर्शनादुभयविधत्वं साधु मन्यते यदा सशरीरता संकल्पयति, तदा सशरीरो भवति, यदा त्वशरीरता तदाऽशरीर इति । सत्यसंकल्पत्वात्, संकल्पवैचित्र्याच्च ।'

'परंतु बादरायण आचार्य इसीसे उभयलिङ्गकी श्रुति देखनेसे उभय प्रकारको साधु—उचित मानते हे । जब-सशरीरताका सङ्कल्प करता है, तब सशरीर होता हे और जब अशरीरताका सङ्कल्प करता है तब अशरीर होता है, क्योंकि उसका सङ्कल्प सत्य है और सङ्कल्पका वैचित्र्य है।'

ऐसे प्रकरणोके रहते हुए हमारे मध्यकालीन एव अर्वाचीन सभी विवादोंका अन्त हो जाना चाहिये। हमे वास्तविक, अखण्ड, समग्र, प्रगतिशील महान् हिंदूधर्म का ज्ञान प्राप्त कर उसीका अनुगमन करना चाहिये।