भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 832 में से

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पृष्ठ 97
  • ब्रह्म और ईश्वरसम्बन्धी औपनिषदिक विचार * ८३ इस प्रकार निर्गुण ब्रह्मकी सत्ताको स्वीकार करते हुए भी जिसकी स्वीकृति हमें काट, हेगेल, शोपेनहर, ब्रैडले, बोसैन्के प्रभृति पश्चिमी विचारकोंके दर्शनोंमें भी मिलती है, श्रीशङ्करको सगुण ब्रह्मकी भक्तिकी परम महिमाको स्वीकार करनेमें कोई कठिनाई नहीं हुई । वास्तवमें वे भगवान्के सबसे बड़े भक्त हैं । 'भज गोविन्दम्, हरिमीडे' आदि अपने भक्तिपूर्ण स्तोत्रोंमें ही नहीं, वर अपने प्रकरण ग्रन्थोंमें भी उन्होंने इस सत्यको निर्भ्रान्तरूपसे स्पष्ट कर दिया है । उनके प्रबोध सुधाकरमें श्रीकृष्णका परमानन्दसे ओतप्रोत वर्णन और स्तवन है। उसी ग्रन्थमें वे आगे चलकर ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्गका अन्तर बतलाते हुए कहते हे कि दूसरेकी अपेक्षा पहला मार्ग दुर्गम और जटिल है, पर दोनोंसे जिस जिस आनन्दकी प्राप्ति होती है वे दो प्रकारके होते हुए भी अनन्त, भेदरहित, परम और सनातन हैं । श्रीकृष्ण ही मूर्त्तब्रह्म भी हैं और अमूर्तब्रह्म भी । इसलिये हमारी इच्छा या योग्यताके अनुरूप वे हमें या तो सायुज्य प्रदान करते हे, या कैवल्य । मूर्तं चैवामूर्तं द्वे एव ब्रह्मणो रूपे ॥१६९॥ इत्युपनिषत्तयोर्वा द्वौ भक्तौ भगवदुपदिष्टौ । क्लेशादवलेशाद्वा मुक्ति स्यादेतयोर्मध्ये ॥१७०॥ . . . . . . श्रुतिभिर्महापुराणै. सगुणगुणातीतयोरैक्यम् । यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१९४॥ भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमय सच्चिदानन्द । प्रकृते. पर. परात्मा यदुकुलतिलक स एवायम् ॥१९५॥ . . . . . . यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथ. । सर्वगत. सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्द. ॥२००॥ 'मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार) दोनों ही ब्रह्मके रूप हैं—ऐसा उपनिषद् कहते हैं, और भगवान्ने भी उन दोनों रूपोंके (व्यक्तीपासक तथा अव्यक्तोपासकभेदसे) दो प्रकारके भक्त बताये हैं। इनमेंसे एक अव्यक्तोपासकको क्लेशसे और दूसरे व्यक्तोपासकको सुगमतासे मुक्ति मिलती है ।' 'श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता गूढभावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ । जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित है, ये यदुकुलभूषण श्रीकृष्ण वही तो हैं।' 'यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायी देते हैं, तथापि सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्द- स्वरूप ही हैं।' इसको मैं गीताके इन दो प्रसिद्ध श्लोकोंकी सर्वोत्तम व्याख्या समझता हूँ । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । (१२।४-५) 'वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमे रत योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं। किंतु उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्ममें आसक्तचित्त- वाले पुरुषोके साधनमें परिश्रम विशेष है।' ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ (१४।२७) 'उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्य धर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय मै (श्रीकृष्ण) हूँ।' इस छोटे से लेखमे दूसरी भ्रामक धारणाका भी थोड़ेमे ही निराकरण करके सन्तोष करना है। जैसे त्रिमूर्तियाँ एक- दूसरेके प्रति विरूद्ध और सघर्षशील नहीं हे, उसी प्रकार अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत भी परस्पर विरोधी अथवा एक- दूसरेके प्रति प्रहार करनेवाले सम्प्रदाय नहीं हैं । त्रिमूर्तियोंके पारस्परिक युद्ध-सम्बन्धी पुराणोंमे वर्णित कुछ कथाओका प्रयोजन अन्धानुगमन और कट्टरताको प्रोत्साहन देना नही, वर एक ही सच्चिदानन्दघन भगवान्के विभिन्न रूपोंमेसे अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार माने हुए रूपविशेषमें भक्तिको घनीभूत करना है । श्रीव्यासजीने इन कथाओंको इसलिये नहीं लिखा है कि लोग उन्हें पढकर आपसमें सरफोड़ी करें, या एक दूसरेको बुरा-भला कहे और ललकारते फिरें । उन्होंने तो केवल उसी विचार-बीजको विभिन्न रूपोंमे विस्तारके साथ पल्लवित किया है, जिससे प्रेरित होकर उपनिषदोंके द्रष्टा ऋषियोंने केनोपनिषद्में यह कहा था कि इन्द्र तथा अन्य देवताओंको परब्रह्मका ज्ञान उमाने कराया था । ब्रह्मकी एकताको ऋग्वेद बहुत पहले ही घोषित कर चुका था—'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' (एक ही सत्यको विद्वान् लोग अलग-अलग पुकारते हैं) । त्रिमूर्तियों- मे व्यवहारको लेकर जो भेद है, वह उनकी तात्त्विक एकता- का बाध नहीं करता । यह बात वैसी ही है, जैसे वायसराय और गवर्नर-जनरलके कार्य अलग-अलग होते हुए भी वे इन
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