कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 832 में से
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८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [बायाँ स्तम्भ] स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । ( छान्दोग्य० ७ । २४ । १ ) 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता—वह भूमा है, किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एव कुछ और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वही मर्त्य है।' इदꣳ सर्वं यदयमात्मा । ( बृहदारण्यक० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७ ) 'यह सब आत्मा ही है।' आत्मैवेदं सर्वम् । ( छान्दोग्य० ७ । २५ । २ ) 'आत्मा ही यह सब है।' ब्रह्मैवेदꣳ सर्वम् । ( नृसिंह० ७ । ३ ) 'ब्रह्म ही यह सब है।' सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । ( छान्दोग्य० ६ । २ । १ ) 'हे सोम्य ! आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था।' तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते । ( केन० १ । ५ । ८ ) 'उसीको तू ब्रह्म जान । जिसकी लोक उपासना करता है, वह ब्रह्म नहीं है।' प्रज्ञानं ब्रह्म । ( शु० २० २ । १ ) 'प्रज्ञान ही ब्रह्म है।' तत्त्वमसि । ( छान्दोग्य० ६ । ८ । ७, ६ । १० । ४, ६ । १४ । ३ ) 'वही तू है।' अयमात्मा ब्रह्म । ( बृहदारण्यक० २ । ५ । १९ ) 'यह आत्मा ही ब्रह्म है।' अहं ब्रह्मास्मि । ( बृहदारण्यक० १ । ४ । १० ) 'मैं ब्रह्म हूँ।' इसी प्रकार यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि बादरायणके ब्रह्मसूत्र इस बातपर जोर देते हैं कि परमात्मा ही जगत्का स्रष्टा, पालक और सहारकर्ता है और जीवात्मा परमात्मासे प्रेरित एव नियन्त्रित हुआ गतागतके चक्रमें तबतक घूमा करता है जबतक कि ब्रह्मलोकमें पहुँचकर अनावृत्तिको नहीं [दायाँ स्तम्भ] प्राप्त हो जाता । पर वे आत्मा एव परमात्माकी आत्यन्तिक, वास्तविक, आन्तरिक एव नैसर्गिक एकतापर भी जोर देते हैं और इस बातकी घोषणा करते हैं कि जगत्की प्रातिभासिक सत्ता ब्रह्मकी पारमार्थिक सत्तापर अवलम्बित है तथा मूलतः दोनों एक ही हैं । तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः । ( ब्रह्म० २ । १ । १४ ) —सूत्रकी व्याख्या करते हुए अपने भाष्यमें श्रीशङ्कराचार्य- जी कहते हैं— तस्माद् यथा घटकरकाद्याकाशानां महा- काशानन्यत्वम्, यथा च मृगतृष्णिकोदकादीनामू- षरादिभ्योऽनन्यत्व दृष्टनष्टरूपत्वात् स्वरूपेणानुपारख्यत्वात्, एवमस्य भोग्यभोक्त्रादिप्रपञ्चजातस्य ब्रह्म- व्यतिरेकेणाभाव इति द्रष्टव्यम् । . . . सूत्रकारोऽपि परमार्थोऽभिप्रायेण तदनन्यत्वमित्याह । . . . अप्रत्याख्यायैव कार्यप्रपञ्च परिणामप्रक्रिया चाश्रयति । इसलिये जैसे घटाकाश, करकाकाश आदि महाकाशसे अभिन्न हैं, जैसे जल-सी भासनेवाली मृगतृष्णा ऊपरसे अभिन्न है, क्योंकि उनका स्वरूप दृष्टिगोचर होकर नष्ट हो जाता है और वे सत्तारहित हैं, उसी प्रकार यह भोक्तृ, भोग्ये आदि प्रपञ्च ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, ऐसा समझना चाहिये । ... सूत्रकार भी परमार्थके अभिप्रायसे 'तदनन्यत्वम्०' ( कार्य- कारणका अनन्यत्व—अभेद है) ऐसा सूत्रमें कहते हैं। .. और कार्य प्रपञ्चका प्रत्याख्यान किये बिना परिणाम प्रक्रियाका आश्रयण करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं— क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । ( १३ । २ ) 'हे अर्जुन ! तू सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ अर्थात् जीवात्मा भी मुझे ही जान ।' अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । ( १० । २० ) 'हे अर्जुन ! मै सब भूतोंके हृदयमे स्थित सबका आत्मा हूँ।' अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ ( १३ । १२ ) 'वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही ।' अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । ( १३ । ३१ ) 'हे अर्जुन ! अनादि होनेसे और निर्गुण होनेसे यह अविनाशी परमात्मा शरीरमे स्थित होनेपर भी वास्तवमें न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है।'