भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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ब्रह्म और ईश्वरसम्बन्धी औपनिषदिक विचार ( लेखक-दीवानबहादुर श्री के० एस० रामस्वामी शास्त्री ) आज तो ऐसी धारणाओंका अस्तित्व देखनेमे आ रहा है, जिनसे हिंदुत्वके अन्त.प्रासादमें भी दरारें पड़ गयी है । उनसे हिंदुत्वकी अखण्डता संत्रस्त हो रही है । वहाँ उन्हींकी समीक्षा करनेका विचार है । पहली धारणा यह है कि श्रीशंकराचार्यके अद्वैत-वेदान्तने हिंदूधर्ममे एक नये सम्प्रदाय- को जन्म दिया और यह प्रस्थानत्रयके तीनो अङ्ग उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीतामेसे किसीके द्वारा भी अनुमोदित नहीं है । दूसरी धारणा यह है कि हिंदू-दर्शनके अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत—ये तीनों सम्प्रदाय परस्परविरोधी हैं, और हिंदूधर्मका कोई अविकल रूप नहीं है वर कई बेमेल मान्यताओंका यह एक अदृढ समुदायमात्र है । शक्तिहीन और अब अस्तित्वहीन राष्ट्रसङ्घ ( League of Nations ) के ही समरूप यह एक दुर्बल धर्मसङ्घ है । पर यथार्थ तो कुछ और ही है । ये दोनों धारणाएँ विल्कुल झूठी हैं । सम्प्रदाय और श्रुति दोनों अद्वैत-वेदान्तका पूर्णरूपसे अनुमोदन करते हैं और अद्वैत, विशिष्टाद्वैत एव द्वैत—ये तीनों ही किसी अखण्ड और एक ही धर्मके विभिन्न अङ्ग हैं, ठीक उसी तरह, जैसे शिव, विष्णु और ब्रह्मा—ये त्रिमूर्तियाँ वास्तवमें तीन रूपोंवाली एक ही मूर्ति हैं (कालिदास कुमारसम्भवमे कहते हैं—'एकैव मूर्तिर्बिभिदे त्रिधा सा' ) । इस एक मूर्तिकी सबसे सुन्दर अभिव्यक्ति शायद भगवान् दत्तात्रेयके सम्मिलित रूपमें हुई है । पहले पहली धारणाको कसौटीपर रखते हैं । वास्तविक बात तो यह है कि श्रीशङ्कराचार्यजीने स्वयं सम्प्रदायके अनुगमनमे विशेष गौरव माना है । वे कहते हैं— असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि मूर्खवदुपेक्षणीय । 'सम्प्रदायको न जाननेवाला सब शास्त्रोका पण्डित भी मूर्खके समान उपेक्षणीय है।' अपने तैत्तिरीयोपनिषदके भाष्यारम्भमे वे कहते हैं— यैरिमे गुरुभि पूर्वं पदवाक्यप्रमाणत । व्याख्याता सर्ववेदान्तास्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ पूर्वकालमे जिन गुरुजनोंने पद, वाक्य और प्रमाणोंके विवेचनपूर्वक इन सम्पूर्ण वेदान्तों (उपनिषदों) की व्याख्या की है, उन्हें मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ। उनके कथनानुसार सूत्रोंमे श्रुतिका सार है और उनके भाष्यमें प्रस्थानत्रयकी सम्प्रदायगत व्याख्याको ही प्रकट किया गया है। 'वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात् सूत्राणाम् ।' ( सूत्रभाष्य ) 'तदिद गीताशास्त्र समस्तवेदार्थसारसंग्रहभूते दुर्विज्ञेयार्थम्' ( गीताभाष्य ) फिर श्रीशङ्कराचार्यने बार-बार इस बातको आग्रह- पूर्वक कहा है कि ईश्वरविषयक ज्ञानका एकमात्र एवं सर्वश्रेष्ठ साधन श्रुति है । इसका अनुकूल तर्कसे समर्थन प्राप्त होना चाहिये तथा जिज्ञासुको अनुभव, अवगति अथवा साक्षात्कार आदि नामोंसे वाच्य स्थितिको प्राप्त करा देनेकी इसमे शक्ति होनी चाहिये । वे वेदोंको स्वतःप्रकाश और स्वत प्रमाण मानते थे और इसकी घोषणा भी करते थे । 'वेदस्य हि निरपेक्ष स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिव रूपविषये ।' शङ्करके मतमें निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म एक ही वस्तु- के दो रूप हैं । स्वरूप-दृष्टिसे वे निर्गुण है और जगत्के सम्बन्धसे वे सगुण हैं। अपने स्वरूपलक्षण तथा तटस्थलक्षणके सिद्धान्तद्वारा वे एक अनन्त, सनातन आनन्दतत्त्वमें द्वैतकी उद्भावना किये बिना भी विभेदकी स्थापना करनेमें समर्थ हुए हैं । निम्नलिखित श्रुतिवाक्योसे इस विषयका यथार्थ निर्णय हो जाता है । विशिष्टाद्वैती अथवा द्वैती इनकी किमी और प्रकारसे व्याख्या नहीं कर सकते । यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन क पश्येत् · · · केन कं विजानीयात् । ( बृहदारण्यक० ४।५।१५ ) 'जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे • और किसके द्वारा किसे जाने ।' वाचारम्भण विकारो नामधेय मृत्तिकेत्येव सत्यम् । ( छान्दोग्य० ६।१।४ ) 'विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है ।' यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति उ० अ० ११—१२—