कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * निःसन्दिग्ध रूपसे सिद्ध करता है, जिससे ईशोपनिषद्का तात्पर्य 'शक्ति-कारणवादसे' स्पष्ट हो जाता है।
विद्या, अविद्या, सम्भूति, असम्भूति
'विद्या-अविद्या' आदि प्रतिपादन करनेवाले छः मन्त्रोंके अर्थ उपनिषद्के भाष्यकारोंने भिन्न भिन्न रीतिसे परस्पर विलक्षण रूपसे किये हैं। कोई समुच्चयवादके अनुसार, कोई क्रमसमुच्चयके अनुसार, तो कोई कुछ, तो कोई कुछ। सम्भूति- असम्भूतिका भी अर्थ ऐसे ही किया गया है—कोई विज्ञानवाद- के खण्डनमें करते हैं, तो कोई प्रतिमा पूजनके निषेधमे। इन अर्थांपर दृष्टि डालते हैं तो इनका अभिप्राय समझना एक दुरूह कार्य प्रतीत होता है। 'ललितासहस्रनाम'के 'सौभाग्य- भास्कर' भाष्य करनेवाले स्वनामधन्य आचार्य भास्कररायने 'विद्याविद्यास्वरूपिणी' इस नामकी जो विलक्षण व्याख्या की है उसे यहाँ देते हैं, जिससे इसका यथार्थ अर्थ समझा जा सकता है—
विद्या चाविद्या च यस्तद्वेदोभय सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥
इति श्रुतौ प्रसिद्धे विद्याविद्ये, विद्या स्वात्मरूपं ज्ञानम् अविद्या चरमवृत्तिरूपं ज्ञान तदुभय स्वरूपमस्याः । उक्त च बृहन्नारदीये—
तस्य शक्तिः परा विष्णोर्जगत्कार्यपरिक्षमा । भावाभावस्वरूपा सा विद्याविद्येति गीयते ॥
इति देवीभागवतेऽपि ब्रह्मैव सातिदुष्प्रापा विद्या- विद्यास्वरूपिणीति । तत्रैव स्थलान्तरे 'विद्याविद्येति देव्या द्वे रूपे जानीहि पार्थिव । एकया मुच्यते जन्तुरन्यया बध्यते पुनरिति । यद्वा विद्यैव चरमवृत्तिरूपं ज्ञानम्, अविद्या भेदभ्रान्तिरूपं ज्ञानं स्वपरब्रह्मात्मकं ज्ञानम् । स्वपदस्यात्म- वाचित्वात् स्वं ज्ञातावात्मनीति कोशात्, एतत्त्रयं रूपमस्या.। उक्तं च लैङ्गे—
भ्रान्तिर्विद्या परं चेति शिवरूपमिदं त्रयम् । अर्थेषु भिन्नरूपेषु विज्ञानं भ्रान्तिरुच्यते ॥ आत्माकारेण संवित्तिर्बुद्धेर्विद्येति कथ्यते । विकल्परहितं तत्त्वं परमित्यभिधीयते ॥ इति ।
अर्थात् 'विद्या चाविद्या च' इस मन्त्रमें विद्याविद्या प्रसिद्ध है। विद्या स्वात्मरूप ज्ञान और अविद्या चरमवृत्तिरूप 'अहं ब्रह्मास्मि' का ज्ञान—ये दोनों जिसके स्वरूप हैं, उसे विद्याविद्या कहते हैं। परोक्षापरोक्ष ज्ञान भी वेदान्तमें इसकी संज्ञा है। बृहन्नारदीयमे कहा है—'उस परमात्माकी पराशक्ति जगत्कार्य करनेमें समर्थ है। वह भाव-अभाव रूपवाली विद्या- विद्या शब्दसे कही जाती है।' देवीभागवतमें भी कहा है—'वह दुष्प्राप्य पराशक्ति ब्रह्म ही है। वह विद्याविद्यास्वरूपवाली है।' वहीं दूसरे स्थलपर कहा है—'हे राजन् ! विद्याविद्या दो रूप देवी- के हैं, एकसे प्राणी मुक्त होता है और दूसरेसे बँधता है। अथवा विद्या ही चरमवृत्तिरूप ज्ञान है। भेद-भ्रान्तिरूप ज्ञान अविद्या है, 'स्व' परब्रह्म ज्ञान—ये तीनों जिसके स्वरूप हैं 'स्व'पद आत्मा- का वाचक है।' लिङ्गपुराणमें कहा है—'भ्रान्ति, विद्या और पर— ये तीन रूप शिवके हैं। पदार्थोंमे भेदबुद्धिरूप जो ज्ञान है, वह 'भ्रान्ति' है। आत्माकार अनुभव 'विद्या' है, विकल्परहित तत्त्व 'पर' है।' इन पुराण-वचनोंसे विद्याविद्याका अर्थ व्यक्त हो जाता है, जिसे महर्षि व्यासने भिन्न-भिन्न प्रसङ्गोंपर पुराणोंमे व्याख्यान किया है—
सम्भूति-असम्भूति साकार-निराकार उपासनाके द्योतक हैं। उत्तरगीतामें इसी रूपमे माना गया है। जिस तरह परोक्षापरोक्ष ज्ञानका साहचर्य है, ऐसा ही सम्भूति-असम्भूति- का भी साहचर्य अभिप्रेत है। ऐसा अर्थ माननेपर स्वाभाविक अर्थसंगति लग जाती है। लिङ्गपुराणमें ज्ञानके जो तीन भेद कहे गये हैं, उनकी संगति इस उपनिषद्में बैठ जाती है। आठ मन्त्रतक तत्त्व-ज्ञान, छः मन्त्रोंमें विद्याविद्याका ज्ञान और शेष अविद्यामे ही पर्यवसित हैं।
उपसंहार
संक्षिप्त रूपमें पराशक्तिका ईशोपनिषत्प्रतिपादित जो क्रम यहाँ बताया गया है, उसका समन्वय वेदान्तवाक्योंमें भी है, जिसे देवीभागवत आदि शक्तिके पुराण-ग्रन्थ एवं तन्त्रोंमें माना गया है। उसके अध्ययन करनेवाले पाठक इससे भलीभाँति परिचित हैं। इस संकेतमात्रसे यद्यपि सर्वथा समाधान होना अशक्य है, तथापि विचारकोंके लिये एक मार्ग अवश्य निर्दिष्ट हो जाता है, जिसे कोई समानधर्मा पूर्ण कर सकेगा। ॐ शम्। प्रेषक—पं० श्रीरेवाशंकरजी त्रिपाठी, श्रीपीताम्बरापीठ